रविवार, 13 दिसंबर 2009

भाग २ :बिखरे सितारे:२ पीका नगर

अबतक  की  मलिका  का  सारांश: भाग  २  :बिखरे सितारे:२  पीका नगर

एक गांधी वादी,मुस्लिम परिवार में   पूजा/तमन्ना का  जन्म हुआ...उसका बचपन गाँव में बीता. दादा दादी का भरपूर प्यार उसने पाया. खुले विचारों में पली बढ़ी. लेकिन एक समस्या उसे हमेशा परेशान करती रही...अपनी माँ के प्रति दादा का सख्त व्यवहार...पिता की ओरसे भी माँ छली गयी..

यौवन की दहलीज़ पे उसकी मुलाक़ात किशोर से हुई. किशोर सरकारी, तबादलों वाली नौकरी में कार्यरत था. मुलाक़ात भी अजीब हालात में हुई...पूजाके भाईके हाथ से( जो तब केवल १२/१३ साल का था),बंदूक से गोली छूट गयी...दादाजी ने अपनी ओरसे बंदूक खाली कर दी थी,लेकिन उसमे एक गोली रह गयी थी.भाई  को भी नही पता था. खेतपर के किसी लड़के के उकसाए जानेपर, उसने उसके पैरों पर निशाना ले गोली दाग दी.

खून में लथपथ उस लड़के को दादा जी अस्पताल ले गए. लड़का तो ठीक हो गया. लेकिन दादा जी बंदूक ज़प्त कर ली गयी. उन्हों ने हादसे की ज़िम्मेदारी पूरी तरह खुद पे ले ली. वो बेहद सत्य वचनी थे.इन्ही हालातों के चलते IAS के अफसर किशोर से उस परिवार की मुलाक़ात हुई. पूजा उस वक़्त छात्रावास में थी. लौटी तो किशोर से परिचय हुआ. दोनों के मनमे प्यार पनपा.

किशोर का दिल्ली तबादला हो गया. जानेसे पूर्व उसने पूजासे अपना धरम परिवर्तन की मांग की. मासूम पूजा बात की गहराई को समझी नही और उसने हाँ कर दी.

जब पूजा की माँ और पूजा किशोर के परिवार से मिलने दिल्ली गए तो वहाँ इस बात का ज़िक्र छिड़ा. पूजा की माँ हैरान हो गयी..खुद पूजा को भी जब बात का गाम्भीर्य  पता चला तो वो भी सकते में आ गयी..उसने अपनी गलती मान ली और किशोर से इस बात का विरोध जताया. वो प्यार करके हार गयी..सपने चकनाचूर हुए.

इसमे उसके मूहसे यह बात कोशोर के चंद दोस्तों के आगे निकल गयी और वो खूब रोई. इन दोस्तों में एक गौरव भी था. गौरव ने अपने परिवार की सहमती से पूजा के साथ ब्याह करने का निर्णय लिया. पूजाके परिवार ने स्वीकार किया.

ब्याह के पश्च्यात पूजा की समझमे आ गया की, गौरव की मानसिकता किशोर से अलग नही थी...उसने चाहा की, पूजा उसके परिवारकी एहसान मंद रहे,की, उन्हों ने एक' ऐसी, लडकी से ब्याह करने की इजाज़त दी..मानो वो किसी की उतरन हो! सुहाग रात को ही पूजा को यह बात सुननी पडी और वो दर्द से  कराह उठी.

अब आगे पढ़ें:

पूजा ने अपने आप को ऐसे माहौल में बेहद अकेला पाया. पूरा दिन वो घरवालों के ताने सुनती. शाम जब गौरव घर आता, तो घरवाले पूजा के खिलाफ उसके कान भरते. पूजा को समझ में नही आया,की, गर ऐसे हालात थे,तो गौरव ने उसके साथ शादी क्यों की...उसने कुछ छुपाया नही था...

घरका सारा काम,बिना किसी नौकर चाकर के उसने संभाल लिया था, लेकिन जी जान लगा के भी, उसे ताने ही सुनने पड़ते थे.
बल्कि, जिस रात वो सब लखनऊ से दिल्ली पहुँचे उसके अगले दिन की बात:

गौरव अपनी भाई के साथ सुबह कहीँ घूमने गया. पड़ोस का एक कमरा  इन दोनों के खातिर  तीन दिनों के लिए,  लिया गया था.गौरव ने लौटते ही पूजा से पूछा
:" तुमने वहाँ झाडू लगाई?"

पूजा:" ना..नही तो..मुझे नही पता था..मै तो सवेरे ४ बजे ही नीचे आ गयी थी.."
( उस दिन करवा चौथ का व्रत था)

गौरव: " तो झाडू तुम्हारा बाप आके लगाएगा या मेरा बाप?"

गौरव ने भरे हुए घर में,सबके सामने, पूजा का अपमान किया..पूजा की आँखें भर आयीं..

पूजा:" मै अभी लगा देती हूँ..."
पूजा का इतना कहना भर था,की, उस घरकी मालकिन वहाँ आ पहुँची और बोली:" माफी चाहती हूँ, हमें आज ही कमरा चाहिए.."

पूजा के मनमे झाडू का विचार भी आता तो चाभी गौरव के पास थी...और गौरव बाहर चला गया था...

मकान मालकिन चाभी ले गयी, और पूजा पर गौरव औरभी गरज पडा..पूजा से बोला ना गया..बोलती भी तो उसकी कौन सुनता? उसने अपनी सास तथा जेठानी के मुखपे एक कुटिल -सी मुस्कान देखी.
और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..

क्रमश:

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19 टिप्‍पणियां:

महफूज़ अली ने कहा…

ओह ! हो.... हम तो अभी पहले कि ही किस्त पूरी पढ़ रहे हैं...... प्रिंट आउट ले लिया है..... पूरा पढ़ के अच्छे से ...फिर दोबारा आते हैं........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

पूजा का धारावाहिक बढ़िया चल रहा है!

गौतम राजरिशी ने कहा…

आप की तबीयत ठीक नहीं थी?
अब कैसी हैं आप??

पूजा/तमन्ना की कहानी फिर चल पड़ी...थैंक गाड!

get well soon!

शहरोज़ ने कहा…

पहली बार आना हुआ.बहुत खूब लेखन है आपका.क्या नहीं है उसमें जीवन की उमंगें हैं, रुसवाई है, सीधा सा अंदाज़ है कहने का, लेकिन व्यंग्य की फुआर भी! वहीँ गंभीरता अपनी जगह कायम है.आभार!

Basanta ने कहा…

'बिखरे सितारे' एक नशा बन गया है!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

thanks for the summerization Kshama ji...
nice compilation...

शमीम ने कहा…

सारांश प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद । कहानी समझने में सुविधा हुई । यह अंक भी अच्छा लगा । अब फिर से, अगली कड़ी का इंतजार है । आभार...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपने सारांश लिखा ... पढ़ कर बहुत अच्छा लगा ........ आयेज की कहानी भी बहुत अच्छी चल रही है ...... पूजा के माध्यम से समाज की मानसिकता को बखूबी उतार रहीं हैं आप ...........

Dr. kavita 'kiran' (poetess) ने कहा…

sunder.sarthak serial.

Jyoti ने कहा…

Sarash diya ye achha kiya..ab agalee kadee ka intezaar rahega!

निर्मला कपिला ने कहा…

कथा अच्छी चल रही है आगे का इन्तज़ार रहेगा धन्यवाद्

mark rai ने कहा…

और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..
.........bahut hi achcha yah silsila chalte rahna chahiye..

डॉ टी एस दराल ने कहा…

मार्मिक कहानी है।
ऐसा भी होता है।

हरीश झारिया ने कहा…

मैं नहीं जानता था कि नैट पर इतनी बढ़िया रचनाएं प्रकाशित होती हैं…
मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

इतनी छोटी किस्त? अगली भी अभी तक पोस्ट नहीं की...यहीं धूनी रमा लें क्या दी?

psingh ने कहा…

बहुत अच्छी रचना
बहुत -२ बधाइयाँ

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

बहुत अच्छी जा रही है कहानी । सारांश पढ कर समझ में आ गई पर फिर भी कुतुहल वश फिर पीछे जाकर सारी शुरू से पढी आपकी लेखन शैली औत्सुक्य को बनाये रखती है ।

ज्योति सिंह ने कहा…

jeevan ke har rang se judi behtrin rachna ,is baar kamse kam lautna nahi pada ,aage kya kahoon ,is suraj ko diya dikhane wali baat hogi ,aur us grah ke takkar ka grah nahi mere pass. antriksh me mere chand hai, jo suraj ka mohtaaj hai .wo chaand bhi mera madhyam sa hi hai .

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

agli kadi ka intzaar...