रविवार, 12 सितंबर 2010

Bikhare sitare:Raheema:2

(गतांक: पिछली रात की घटना के बारे में मेरे दिमाग में उथलपुथल तो मच ही गयी थी.ऐसा क्या हुआ होगा?क्या मैंने खुद होके रहीमा को पूछना चाहिए या नही? शायद वो खुद ही बताना चाहे!


ये बाते मनमे आ रहीं थीं और रहीमा का डरा-सा फ़ोन आया,"तुम तुरंत आओ और मुझे किसी तरह बचा लो!बड़ी मुश्किल से मुझे फ़ोन करने का मौक़ा मिला है..." अब आगे पढ़ें).
 
रहीमा का फोन आतेही पाँच मिनट के भीतर मै उस के घर के तरफ निकल पडी. दिमाग में तेज़ी से ख़याल आते रहे. क्या उसने अपने भाई को अपनी समस्या के बारेमे कुछ ख़बर दी होगी? उससे मै एक बार मिली थी..रहीमा के ही घर. रहीमा ने तब मुझ से बताया था;" ज़फर की  बहुत खूबसूरत और खानदानी लडकी से शादी हुई थी...लेकिन इसके सरपे कनाडा में बसने का भूत सवार हुआ और उसने उस लडकी को तलाक़ दे दिया.उसे एक बेटी  भी है. तलाक़ के बाद इस नीग्रो लडकी से ब्याह किया...ग्रीन कार्ड के ख़ातिर..."
 
उसकी दूसरी पत्नी तब घर में मौजूद थी.मुझे नही पता की उस औरत को उसके पति के इरादों के बारेमे कितना पता था. मन ही मन मुझे अफ़सोस ज़रूर हुआ. और अब रहीमा के साथ न जाने क्या घट रहा था...
 
मै उसके घर पहुँची तो देखा,रहीमा रो रही थी.उसका शौहर घरमे ही था. उसने पी रखी थी और नशेमे रहीमा की खूब मार पिटाई कर रहा था. मुझे देखते ही उसने रहीमा को छोड़ दिया. मै दंग रह गयी...समझ में नही आ रहा था,की,आखिर वजह क्या हुई होगी...मेरे पती ने, "रहीमा का चरित्र ठीक नही",ऐसा क्यों कहा था?बच्चे घरमे थे और ज़ाहिरन,सहमे हुए थे. इस हाल में मै क्या कर सकती थी? मैंने क्या करना चाहिए था?
 
सहसा मुझे कुछ सूझ गया और मैंने लतीफ़,रहीमा  के पती से कहा," दरअसल मेरी तबियत कुछ ठीक नही थी...मै डॉक्टर के गयी थी,और लौटते समय सोचा क्यों न आपके घर होते हुए जाऊँ ...ये तो अमरावती गए हैं...सोचा आज की रात रहीमा और महताब मेरे पास रह जाएँ तो कैसा रहेगा? मुझे अकेले कुछ डर-सा महसूस हो रहा है...क्या आप इस बात के लिए मुझे इजाज़त देंगे? रहीमा साथ होगी तो मुझे बहुत राहत महसूस होगी...."
 
कर्नल साहब को शायद मुझे मना करने में कुछ झिजक-सी महसूस हुई और वो बोले," हाँ,हां...क्यों नही? रहीमा और महताब दोनों आपके साथ चले जायेंगे..."
 
मैंने रहीमा को कहा," चलो,दो चार कपडे रख लो..मेरे घर चलते हैं...तुम्हारा खानसामा कर्नल साहब का खाना आदि तो बनाही देगा ना?"
 
"खाने पीने का तो सब इंतज़ाम है...चलो मै तैयार हो जाती हूँ...,"रहीमा ने कहा और साथ महताब को भी अन्दर ले गयी.
 
आफताब,रहीमा का बेटा हमें गेट तक छोड़ने आया. मेरे यहाँ पहुँच,महताब मेरे बच्चों के साथ टीवी देखने लग गयी.मै रहीमा को अपने कमरेमे ले गयी और रहीमा ने पिछले चंद दिनों घटीं बातें मुझे बताना शुरू कर दीं.
 
"मुझे बचपनसे एक लड़के से प्यार था. हम एकही स्कूलमे पढ़ते थे. वो भी मुझे बहुत चाहता था,लेकिन मेरे भाई ने हमारी शादी की जमके खिलाफत की. वजह इतनी,की वो लोग ज़्यादा पैसेवाले नही हैं. लड़के का नाम था/है ज़ाहिद. वो सदमे के कारण दुबई चला गया और उसके बाद लौटा ही नही. उसने पैसे तो खूब कमाए लेकिन शादी नही की.
 
"दो हफ्ते पहले वो पहली बार भारत लौटा. उसकी माँ बीमार थी इसलिए. पड़ोस होने के कारण हमारी मुलाक़ात भी हुई. उसकी माँ की कुछ तबियत ठीक हुई उस दिन लतीफ़ ने हमारी छत परसे उसे घर बुलाया और हमारे साथ जलगांव चलने का आग्रह करने लगा. जलगांव में हमारी unit का वर्धापन दिवस मन रहा था.  ज़ाहिद राज़ी हो गया. वहाँ तुम्हारे पतिसे भी हमारी मुलाक़ात हुई.
 
"लतीफ़ ने शुरुसे ही मुझे शारीरिक मानसिक रूप से बेहद तंग किया. हमारी शादी के समय उसने अपने परिवार के बारे में झूठ भी बताया. मेरे पिता और भाई,दोनोको मेरी शादी की इतनी जल्दी पडी थी,की,ठीक से तलाश तक नही की. खैर! मैंने इस ज़िंदगी को अपनी क़िस्मत मान लिया. उसे अपने बच्चों से तक लगाव नही है. ना जाने उसने ज़ाहिद को जलगांव क्यों बुलाया लेकिन,मै ख़ुश हुई की,कुछ दिन उसका साथ मिलेगा.
 
"एक समारोह के बाद शराब पीके लतीफ़ ने मुझे हमारे कमरेमे घसीट चांटा मार दिया. ज़ाहिद ने देख लिया. दूसरे दिन सुबह मुझे चंद पल अकेला पाके उसने हाथ पकड़ के कहा," तुझे बहुत सताता है न ये आदमी?"
 
"लतीफ़ ने देख लिया और हंगामा खड़ा कर दिया. तब तेरे पती भी वहीँ थे. 'मैंने रहीमा और ज़ाहिद को रंगे हाथों पकड़ लिया",कहके लतीफ़ ने खूब शोर मचाया. हम दोनोने तब से उसकी बार बार माफ़ी माँगी. ज़ाहिद तो लौट रहा है. वो फिर कभी नही आएगा,लेकिन लतीफ़ रोज़ बच्चों के आगे मुझे ज़लील करता है...मेरा सर दीवार पे पटकता है..बाल खींचता है..."
 
हमारी इतनी बात होही रही थी,की,एक फोन आया. फोन लतीफ़ का था. रहीमा ने लिया. दो चार पल बाद मुझे पकडाया...दूसरी ओरसे लतीफ़ चींख रहा था," मै पहले घरको और फिर पेट्रोल पम्प को आग लगाने जा रहा हूँ..साथ तुम्हारे बेटे को भी...बचाना चाहती हो तो अभी लौट आओ...."
 
क्रमश:

14 टिप्‍पणियां:

ali ने कहा…

ये दास्तां भी शक-ओ-शुबहे पे शुरू हुई ! अमूमन लड़कियों और लड़कों की बदकिस्मती है कि वे उस समाज में पैदा हुए जहां मुहब्बत गुनाह है और मुहब्बत की शादी का कोई चांस नहीं फिर कौन रोक सकता है शादी के बाद की जिंदगी को दोज़ख होने से ?

दीपक 'मशाल' ने कहा…

कितनी दर्दनाक दास्तानें दबी पड़ी हैं इस दुनिया में.. पढ़ के दिल दहल रहा है..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

महिलाओं की त्रासदी है ये. जबकि शादी के बाद अपने प्रेम सम्बन्धों को भुला देना, खासियत होती है लड़कियों की, लेकिन शौहरों को कोई कैसे समझाए? शक का कीड़ा यदि दिमाग में चलने लगे, तो फिर रुकता ही नहीं. इस मामले में महिलाएं कितनी मासूम होती हैं, कभी अपने पति पर अविश्वास करती ही नही.

रचना दीक्षित ने कहा…

अच्छी चल रही है ये कहानी

आशा जोगळेकर ने कहा…

कैसे कैसे चरित्रों से पाला पडता है आपका । महिलाओं की त्रासदी है कि कहीं कोई अंत ही नही दिखता । रहीमा की कथा के दोनो भाग पढे हैं बहुत अच्छी जा रही है कहानी । अगली कडी का इंतजार है ।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आपकी धाराप्रवाह शैली, क्रमश: शब्द आने पर ही रूकती है...

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्यशास्त्र (भाग-1) – काव्य का प्रयोजन, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की प्रस्तुति पढिए!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

हम भी ज़माने की तरह बहुत ग़ौर से सुन रहे हैं दास्ताँ!!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश कि शीघ्र उन्नत्ति के लिए आवश्यक है।

एक वचन लेना ही होगा!, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वारूप की प्रस्तुति, पधारें

arvind ने कहा…

bahut badhiya prastuti.

Babli ने कहा…

बहुत ही अच्छी लगी ये कहानी! अब तो अगली कड़ी का इंतज़ार है!

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति.

यहाँ भी पधारें:-
अकेला कलम...

amar jeet ने कहा…

बहुत बढ़िया कहानी लिखी है आपने धाराप्रवाह और अच्छी कहानी के लिए आपको बधाई आपने अपनी कहानी के माध्यम से आइना दिखाया है,आगे की स्टोरी का इंतजार है!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

"बचाना चाहती हो तो अभी लौट आओ...."

सही ड्रामा है यह आदमी!