मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

युगों पहले,युगों बाद....!

                               ना ये सपना है ना ही वस्तुस्थिती...एक विचित्र अनुभव ज़रूर है. चलचित्र की भांती,मेरी आँखें जो देख रही होती हैं,वो बेहद सजीव है. उसकी नायिका भी  मै ही हूँ और सूत्र धार भी. लेकिन सूत्र संचालन करते हुए भी, नायिका की ज़िंदगी पे मेरा इख्तियार नही. हाँ...जब,जब नायिका की जान पे बन आती, चित्र की चौखट बदल जाती.

वो देखो उस यौवना को...कबकी बात है ये??ये कौनसे मंज़र हैं जो जाने पहचाने होके भी अनजाने हैं??कितने हजारों साल पहले ये घटना घट रही है?

कैसी प्रलयंकारी, धुआंधार  वर्षा हो रही है! कहाँ सरोवर है,कहाँ रास्ता समझ में नही आता...उस युवती ने अपना घाघरा घुटनों तक उठा किया है. मद्धिम-सी रौशनी. लगता है समय रुक-सा गया है. सहर भी हो सकती है,संध्या भी. सूत्रधार को भी पता नही. मै स्वयं खुद को गौर से  निहारने का यत्न करती हूँ. चेहरा धुन्दला है. हाँ! खुले बाल पानी से तर हैं..चुनरिया तन से लिपटी है...क्या ये कोई राजपूत कन्या है? माथेपे झूमर है,पैरों में पाजेब.

ये दूर दिया टिमटिमा रहा है या,किसी ने मशाल पकड़ रखी है? क्षितिज पे मानो किसी महल की आकृती उभरी है. या बड़ी-सी हवेली है? बारिश के परदे की ओट से ठीक नज़र नही आता.यौवना डरी,डरी-सी इधर उधर देख रही है. उसकी नज़र के साथ,साथ मेरी नज़र भी परिसर का मुआयना करती है.उसे किसी अनजान खतरे का भय है....फिर औरभी छोटी,छोटी आकृतियाँ उभरीं.ये गली चौबारे हैं....सुनसान राहे हैं...पुर ख़तर राहें हैं..

लडकी ने छम-से क़दम उठाया और दौड़ने लगी. उसे किसी को ज़रूरी पैगाम पहुचाना है.लंबा फासला तय करना है,बचते बचाते. मीलों? या फिर एक युग से दूसरे युग में? विगत में या अनागत में? पूर्व जनम से पुनर्जन्म का सफ़र है ये बात मै समझ रही हूँ.जितना ये नज़ारा रहस्यमय, गूढ़ है,उतना ही स्पष्ट और नि:संदेह!दोनों स्थितियाँ विरोधाभासी  हैं. लेकिन अपने जनम का पूर्व भाग  या मृत्यु के पश्च्यात  की स्थिती  कौन जान पाया है? यहाँ ना आदि दिखाई देता है ना अंत! फिरभी जानती हूँ,मुझे कहाँ जाना है.....क्योंकि युगों पहले,युगों युगों तक ऐसी ही घनघोर बरसात में, मै संदेसा लेके निरंतर दौड़ी हूँ. इस लोक को पार कर के दूसरे लोक में मेरा साथी मेरा इंतज़ार कर रहा है.हम कई हजारों साल पहले भी साथी थे,जो हजारों बार बिछड़े.उस बिछड़े साथी को किसी अनजान,जानलेवा खतरे से मुझे आगाह करना है.

छुपते ,छिपाते मै अपने राज महल के अंत:पूर से निकल पडी हूँ.जीवन की सीमा लांघ के मुझे उसके पास पहुंचना है. अब तरूणी बेहद थक गयी है.सैलाब बढ़ता जा रहा है. कहीँ से तलवार की खनक सुनायी देती है.नही....अब मुझसे नही सहा जाता.दृश्य की चौखट बदल जाती है.सूत्रधार उसे बदलता है.....सूत्रधार,जो मै स्वयं हूँ!

नायिका एक बड़े-से प्रवेशद्वार पे पहुँचती है.प्रवेशद्वार अपनेआप खुलता है. यहाँ कोई पहरेदार नही. फिर एक के बाद एक महाद्वार खुलते चले जाते हैं. हर द्वार एक दालान में खुलता है.दूर दूर तक फैले बगीचे,ऊंचे,ऊंचे दरख़्त,नि:स्तब्ध खड़े,तरूणी के प्यार की मूक दुहाई दे रहे हैं.और वो रहा उसका बिछड़ा साथी! मगर ये कैसा अद्भुत न्याय है प्रकृती का!! तरूणी स्त्री रूप में सौदामिनी है! और वो पुरुष जो बाहें पसारे खड़ा है,उसे छूते ही नष्ट हो जाएगा! मिलन की घड़ी,बिरहा की भी है! सौदामिनी  अपने प्रियतम को छूते ही बदरी में लुप्त हो जायेगी! तो फिर किस दुश्मन से आगाह करने मै चल पडी थी? किसका पैगाम लिए दौड़ रही थी?? मै जान गयी...! खुद मुझी से उसे आगाह करना था! और मुझ पे मेरा ही नियंत्रण नही..मैही उसके विनाश का कारण बन सकती हूँ...! उफ़! ये दर्दनाक मिलन मै नही देख सकती!!दृश्य की चौखट बदल जाती है.

तरूणी अब अपने जन्म जन्मान्तर के प्रियकर का गर्भ अपनी कोखमे लिए नगरी,नगरी ,उसे खोज रही है.जब तक उस प्रेमी युगुल का मिलन नही होगा,गर्भ जनम नही ले पायेगा!!कैसा खेल है ये नियति का! मेरी रूह तड़प रही है...कहीँ चैन नही...अब आभी जाओ मेरे साथी! कितने युगों से तुम्हारा इंतज़ार है!क्यों  मुझ पे तरस नही खाते? ऐसी क्या मजबूरी है? कहाँ ढूँढू तुम्हें? किसे पूछूँ तुम्हारा पता? और कैसे पूछूँ? क्या बताऊँ? मेरे ज़हन में अंकित तुम्हारा स्पर्श है....ना जाने किस जनम की बात है यह,जब तुम्हारी बाहों में सिमट गयी थी? तुम्हारा कोई चेहरा नही है,जिसका मै वर्णन करूँ. देखो! अपने मिलन की निशानी मेरी कोख में है! कितनी सदियाँ बीती,नही जानती...कब मिट जाती हूँ,कब जन्म लेती हूँ,याद नही....तुम्हारा अंश लिए नष्ट होती हूँ....अंश लिए ही जन्म लेती हूँ...! कोई इसे कल्पना विलास समझे तो समझे! मेरे लिए यही एक सत्य है!

जन्म मरण का चक्र निरंतर है. तुम्हारी खोज निरंतर है. बहुत कुछ भूलके भी मुझे थोड़ा थोड़ा याद है.किसी एक जनम में मै नदी थी,जो तुम्हारी तलाश में रेगिस्तान पहुँच गयी थी. जब रेगिस्तान ने मुझे अपने अन्दर समा लिया तो समझ गयी की,तुम ही रेगिस्तान थे.जलते,तपते....जिसकी विराट भुजाओं में समा के मै लुप्त हो गयी.लेकिन ये तो एक युग की कहानी है...बीते समय की रेखाओं पे कितनी परतें पड़ गयीं हैं....हमारे क़दमों के निशाँ खो गए हैं...मेरी पुकार तुम तक क्यों नही पहुँचती?? साथ ही मै ये भी जानती हूँ की मुझे सदियों इंतज़ार करना होगा!!क़यामत की हदों तक!!

तरूणी की हालात अब मुझसे देखी नही जाती...दृश्य की चौखट बदलनी होगी. उसके प्रियतम को कोई नाम देना होगा. तभी तो वो उसे खोज सकेगी!!क्या नाम होगा उसका??

क्रमश:

17 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर ने कहा…

आप ने बहुत अच्छा लिखा है,

संजय भास्कर ने कहा…

सूत्रधार उसे बदलता है.....सूत्रधार,जो मै स्वयं हूँ!
... बेहद प्रभावशाली

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

क्षमा जी! अचानक से इसको पढकर टिप्पणी करना सतही होगा... लिहाज़ा दुबारा लौटकर आने का वादा करके जा रहा हूँ... वैसे भी क्रमशः की तलवार टाँग रखी है आपने, तो कितनी दूर जा सकता है कोई! चलिए, एक एक किरदार को ध्यान से जीकर कमेंट करता हूँ!!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

बहुत अच्छा लग रहा है सृजन.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

आदरणीया क्षमा जी.. शुरुआती ५-६ पंक्तियाँ पढीं और शिल्प बहुत ही बेहतरीन व नवीनता सिमेटे हुए लगा.. समय कुछ कम है इसलिए पूरा नहीं पढ़ पाया इसलिए पोस्ट को सहेज लिया है.. कहानी पूरी हो जाने पर या बीच में किसी दिन समय निकाल कर पढ़ लूँगा.. आशा है आप बुरा नहीं मानेंगीं.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

khoobsurat!

PRIYANKA RATHORE ने कहा…

बहुत खुबसूरत उतार चढाव.....
..लंबा फासला तय करना है,बचते बचाते. मीलों? या फिर एक युग से दूसरे युग में? विगत में या अनागत में?......

जन्म मरण का चक्र निरंतर है. तुम्हारी खोज निरंतर है. बहुत कुछ भूलके भी मुझे थोड़ा थोड़ा याद है.किसी एक जनम में मै नदी थी,जो तुम्हारी तलाश में रेगिस्तान पहुँच गयी थी. जब रेगिस्तान ने मुझे अपने अन्दर समा लिया तो समझ गयी की,तुम ही रेगिस्तान थे.जलते,तपते....

क्षमा जी! क्या कहूँ शब्द भी कम पड़ रहे है ....बस इतना ही कह सकती हूँ की .....सूत्रधार उसे बदलता है.....सूत्रधार,जो स्वयं आप हैं !
... बेहद प्रभावशाली

Apanatva ने कहा…

interesting..........

वन्दना ने कहा…

आज तो कल्पनाशीलता को कहाँ से कहाँ ले गयी आप कि हम तो उसी मे डूबे हैं अभी तक्…………अब आगे का इंतज़ार है।

सागर ने कहा…

बस शुक्रिया अदा करने आया हूँ, एक ईमानदार और लगातार बने रहने वाली पाठक को सलाम करने आया हूँ. कुछ समय सोचालय पर मुसलसल वक्त देने का बहुत बहुत शुक्रगुज़ार हूँ.... यहाँ भी ख्याल नदी से बह रहे हैं, इश्वर करे बहती रहे.. हमारी शुभकामनाएं... आमीन

arvind ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति , हार्दिक बधाई,
ढेर सारी शुभकामनायें

रचना दीक्षित ने कहा…

क्या लिखूं इसी कश्म कश में हूँ आपकी लेखनी के आगे मेरी लेखनी चलना बंद कर देती है "कितने चित्र उकेरे तूने कितने चित्र बिखेरे इक पत्थर को पिघलाने को"
बहुत बहुत बहुत अच्छा लगा.......

ali ने कहा…

इंट्रेसटिंग !

शारदा अरोरा ने कहा…

ऐसा लगता है ...नेपथ्य से कोई पटकथा लिख रहा है ...

ALOK KHARE ने कहा…

achha rochak vratant,
badhai swikare

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

abhi antim bhag padh raha tha, to laga, pahle peechhe jana parega.....:)