गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

बिखरे सितारे 16 -बिखरने लगे सारे तारे




( पिछली कड़ी में बताया था, की, माँ तथा पूजा किशोर के परिवार से मिलने दिल्ली गए..और वहाँ धर्मांतर सवाल उठाया गया, जो माँ को मंज़ूर नही था, और पूजा भी उसका गाम्भीर्य देख परेशान हो उठी...अब आगे पढें..)



आज ,मै पूजा, खुद आप से रु-b -रु हो रही हूँ...जिन हालातों से गुज़री...जिस मोड़ पे ये दास्ताँ हैं...उस गहराई तक, मुझे ही जाना होगा....अपने मन को टटोल खंगाल के लिखना होगा...

मेरे प्रीतम ने जब पहली बार प्यार का इज़हार किया तब एक कविता लिखी थी, जिसे दोहरा रही हूँ...और उसका अंतिम चरण आज बयाँ करती हूँ...



सूरज की किरने ताने में,

चांदनी के तार बानेमे,

इक चादर बुनी सपनों में,

फूल भी जड़े,तारे भी टाँके,

क़त्रये शबनम नमी के लिए,

कुछ सुर्ख टुकड़े भरे,

बादलों के, उष्मा के लिए,

कुछ रंग ऊषा ने दिए,

चादर बुनी साजन के लिए...



पहली फुहार के गंध जिस में,

साथ संदली सुगंध उसमे,

काढे कई नाम जिस पे,

जिन्हें पुकारा मनही मनमे,

कैसे थे लम्हें इंतज़ार के?

बयाने दास्ताँ थी आँखें,

खामोशी लिखी लबों पे,

चादर बुनी सपनों में,



क्यों बिखरे सितारे इसके?

क्यों उधडे ताने इसके?

कहाँ गए बाने इसके?

कैसे जोडूँ तुकडे इसके?

रंग औ नमी, लाऊं कहाँ से?

रौशनी लाऊं किधर से?

चांदनी की ठंडक आए कैसे?

दोबारा इसे बुनूँ कैसे?



सोच, सोच के मन बिखरता जा रहा था...जब दिल्ली से माँ और मै लौटे तो दादा-दादी से आँखें चुराने का मन हो रहा था...क्या बताती उन से? हादसे वाली बात तो कहने से रही..बाकी बातें बताते हुए माँ को सुन लिया...



मै घंटों घरके पिछवाडे की सीढियों पे बैठी रहती...या फिर नीम पे लगे झूले पे झूलती रहती..जानती थी की, मेरे घरवालों से मेरा दर्द देखा नही जा रहा था...दादा कभी चुपके-से आते और मेरे सर पे हाथ फेर जाते..मन भी और जीवन भी किसी झूले की तरह झूल रहा था...मेरा वर्तमान ज़्यादा दुःख दाई था या मेरा अनागत? क्या लिखा गया था विधी के विधान में?या ये विधान मैंने लिखना था? मेरे भाग्य में क्या अटल था?



'उन्हें' मन ही मन कई ख़त लिख डाले...कागज़ पे भी लिखे..और फाड़ के फ़ेंक दिए...मेरे किस जवाब में सभी की भलाई थी? गरिमा थी? मेरा उत्तर दायित्व क्या था? मेरी अपनी अस्मिता...उसका क्या?



एक उत्तर धीरे, धीरे स्पष्ट होने लगा....धर्मान्तरण के लिए नकार..चाहे जो हो....मै हर वो तौर तरीके अपना लेने के वास्ते तैयार थी, लेकिन, कागजात पे धर्मांतर? एक गांधीवादी परिवार में जनम लेके? मै तो ना हिन्दू थी ना मुस्लिम...थी तो केवल एक हिन्दुस्तानी..उसपे कैसे आँच आने देती?



मैंने तथा माँ ने 'उन्हें' तथा उनकी माँ को अलग अलग ख़त लिखे...जिस में स्पष्ट कर दिया की , ब्याह के लिए ये शर्त मंज़ूर नही..सब रीती रिवाज निबाह लूँगी...लेकिन ब्याह के बाद..हर काम ,हर सेवा के लिए तैयार हूँ...लेकिन ये शर्त मंज़ूर नही..और खतो किताबत एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया...खतों के इंतज़ार का...कई बार ख़त पहुँच ने में एक माह तक लगता...पोस्टल खाते की स्ट्राइक भी हुई और रेल की भी...हमने शहर में रहने वाले हमारे फॅमिली डॉक्टर का पता दे रखा.. वरना शहर से गाँव ख़त आने में २/३ दिन और लग जाते...



प्यार की डगर कितनी कठिन है, मन समझने लगा...हे ईश्वर...! ए मेरे अल्लाह! ये दर्द किसी को नसीब ना हो..किसी के जीवन में ऐसा दौर ना आए...ऐसी कठिन स्थिती...अपना दर्द सह लूँ लेकिन मेरे अपनों का???जिन्हें मै जान से प्यारी थी उनका...जिनकी आँखों का सितारा थी...जिनकी तमन्ना थी , उनका? नही नही....



क्रमश:

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (20-12-13) को "पहाड़ों का मौसम" (चर्चा मंच:अंक-1467) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

jyoti khare ने कहा…

भावुक और प्रभावशाली
उत्कृष्ट प्रस्तुति
सादर

ज्योति

Ramakant Singh ने कहा…

वाह जी वाह सुन्दर तानाबाना

शारदा अरोरा ने कहा…

man ke taar hilane layak prastuti..

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

मन के भीतर के ऐसे उथल पुथल की स्थिति का बहुत मार्मिक वर्णन. शुभकामनाएं!