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गुरुवार, 12 अगस्त 2010

बिखरे सितारे: टूटते हुए....


( गतांक:बिटिया ने कहा," माँ अब तुम पर से विश्वास उठ गया है..न जाने फिर कब लौटेगा..! उस के पास तुम्हारी तस्वीरें और आवाज़ कहाँ से आयी? "
मै :" मै हज़ार बार कह चुकी हूँ,की,मेरी शूटिंग भी हुई थी और रेकॉर्डिंग भी! और गर नही है विश्वास तो उसी व्यक्ती से पूछ लो...और मै क्या कह सकती हूँ...इस विषय पे मै और एक शब्द भी सुनना नही चाहती...ख़ास कर तुम से..मै आत्म ह्त्या कर लूँगी...मेरे बरदाश्त की अब हद हो गयी है...!" खैर!
दो माह के बाद इन जनाब का एक माफी नामा आया. उन्हें पश्च्याताप हो रहा था..देर आए,दुरुस्त आए..पर मै बहुत कुछ  खो चुकी थी...आत्म विश्वास और अपनों का विश्वास..खासकर अपनी बेटी का..गौरव के अविश्वास की तो आदत पड़ गयी थी...अब आगे.)
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इन्हीं हालातों के चलते एक बार पूजा और उसकी माँ के दरमियान अन्तरंग बातें हो रही थी.माँ ने कहा:" पता नही,ख़ता किसकी होती है,और भुगतना किसे पड़ता है!  अजब दुनिया है...कभी सोचती हूँ,तूने,मेरी इस बिटिया  ने   कभी किसी का बुरा न किया...उसकी क़िस्मत में क्यों इतना दर्द लिखा है?
"अन्दर से इक आवाज़ आती है-इसका सिरा मेरी माँ से जुड़ता है..तेरी नानी ने अपनी ननद की बेटी से बहुत बुरा बर्ताव किया था. जबकि तेरी इस मासी ने कभी उन्हें पलट के लफ्ज़ नही कहा..बेचारी बिन माँ बाप की अनाथ लडकी थी...मै तो उनसे काफ़ी छोटी थी...तब नही समझ पाती  थी,लेकिन आज लगता है,क़ुदरत ने यह न्याय किया है...ना जीवन में मुझे चैन मिला न तुझे..."

पूजा गहरी सोच में पड़ गयी थी. उसे याद आया,उसका ही लिखा एक आलेख,जिसमे उसने लिखा था--श्रवन कुमार ने श्राप तो राजा दशरथ को दिया था. उस श्राप से उसके अंधे माता पिता की मुश्किलें तो कम नही हुई. लेकिन उसका असर कहाँ से कहाँ हुआ.
राम को बनवास भेजनेवाली कैकेयी ने खुद भुगता. माता कौशल्या ने भुगता, भरत  की पत्नी,लक्ष्मण की पत्नी और सीता..इन सबने भुगता...इन तीनों के नैहर वालों ने उसकी आँच सही होगी...न सिर्फ यह,अंत में,सीता के बच्चे लव कुश जो राजपुत्र थे,वाल्मिकी मुनी ने वन में पाला पोसा.
सीता ने अग्नी परिक्षा दी,फिरभी क़िस्मत में वनवास ही लिखा था.  ..इन सब की क्या खता थी?

नही,पूजा तमन्ना स्वयं को सीता नही समझती है. ऐसा कोई मुगालता उसे नही है. वो केवल एक इंसान है. इंसान जो गलतियाँ करता है,वह गलतियाँ उससे भी हुई. पर अपराध नही.

उसे अनेक बार अनेकों ने सवाल पूछे....उसने ऐसे पती को छोड़ क्यों नही दिया? इसका तो बहुत सरल जवाब रहा.. वह अपने बच्चों के बिना कदापि नही रह सकती. और गौरव ने उसे बच्चों के लिए ज़रूर तडपाया होता. वैसे भी उसे लगता की,पती से अलग हो जाना बहुत ही आसान उपाय कहलाता है..खैर यह सच तो नही,लेकिन जैसे की वह कहती है,क्या पता,उस बात पे भी दोष उसी के सर मढ़ा जाता...साथ रहते हुए भी गौरव ने बच्चों को कई बार उनके आपसी तकरार की एकही बाज़ू बतायी थी. पूजा भरसक कोशिश करती की,यह तकरार आपसमे ही निपट जाये. पर उसे पता तक न चलता और गौरव अमन को अपने तरीके  से  बात बता देता.
केतकी पे अपने बचपन का यह असर हुआ,की,वो अपने बच्चे नही चाहती!फिर वही बात दोहरा रही हूँ.... श्रवण कुमार ने श्राप राजा दशरथ को दिया और भुगता किस किस ने!

इस जीवनी लेखन की शुरुआत ठीक पिछले वर्ष इन्हीं दिनों हुई थी...पूजा की दादा-दादी के शुरुआती जीवन से यह दास्ताँ आरम्भ हुई...और अब आके थमी है...दास्ताँ या किस्सा गोई तो थमी है,जीवन नही. जीवन आगे क्या रंग दिखाएगा किसे पता?
चंद सवालों के जवाब जीवन में नही मिलते...तो इस जीवनी में भी कुछ सवाल अनुत्तरित रहे हैं. केतकी को आज भी पूजा दोष नही देती. मानसिक तौर से वह भी बिखर गयी थी. जब कभी उसे केतकी पे गुस्सा भी आता है,तो वह संभल जाती है...यह सोच के,की,इस बच्ची ने बचपन में बहुत अन्याय भुगता है.
केतकी और उसका पती,शुरू में अमरीका में थे. दो साल इंग्लॅण्ड में रहे.अब  कनाडा जाने की सोच रहे हैं. अमन कभी कभार नाइजीरिया जाने की बात करता है..एक अकेला पन पूजा को घेरे रहता है.
पूजा की चंद तस्वीरें पोस्ट कर रही हूँ. उसने बनाई लघु फिल्म 'धरोहर' से यह ली हैं.शिकायत मिली है की ये तस्वीरें नज़र नही आ रही हैं.मै एक दो दिनों में इस दोषको हटाने का यत्न ज़रूर करुँगी!फिलहाल माफी चाहती हूँ.

  ( 3 या  4 दिनों  बाद  यह  मालिका  ब्लॉग  पर  से  हटा  दी  जायेगी . सभी  पाठक ,जो  इस  मालिका  से  जुड़े  रहे ,उनका  तहे  दिलसे  शुक्रिया  अदा  करती  हूँ . उनकी  हौसला  अफ़्ज़ायी  के  बिना  यह  मालिका  लिखना  संभव  न  होता ! किसी को कुछ सवाल पूछने हों इस दरमियान तो ज़रूर पूछें!)