सोमवार, 28 सितंबर 2009

'बिखरे सितारे...१५) ख्वाबों ख़यालों में...

पूजाकी लिखी चंद पंक्तियाँ पेश कर रही हूँ...इसकी आखरी पंक्तियाँ आज नही.... फिर कभी...

"सूरज की किरनें ताने में,
चाँदनी के तार बाने में,
इक चादर बुनी सपनों में,
फूल भी जड़े, तारे भी टाँके,
क़त्रये शबनम नमीके लिए,
कुछ सुर्ख तुकडे भरे,
बादलों के उष्मा के लिए,
कुछ रंग ऊषाने दे दिए
चादर बुनी साजन के लिए...

पहली फुहार के गंध जिसमे,
साथ संदली सुगंध उसमे,
काढे कई नाम उसपे,
जिन्हें पुकारा मनही मनमे
कैसे थे लम्हें इंतज़ार के,
बयाने दास्ताँ थी आँखें,
ख़ामोशी थी लबों पे...
चादर बुनी सपनों में..."

ऐसा ही हाल था,पूजा के मन का .....उसके साथ घरवाले भी बेहद खुश थे...उनकी आँखों का सितारा चमकने लगा था...उन आँखों की चमक उसके दादा, दादी, माँ, बहन , भाई....सभी के आँखों में प्रतिबिंबित हो रही थी...भाई काफ़ी छोटा था...फिरभी उसकी 'आपा' खुश थी, इतना तो उसे नज़र आ रहा था...

पूजा ने घरको गुल दानों में फूल पत्तियाँ लगा, खूब सजाया...लाज के मारे वो घर में किसी से निगाहें मिला नही पा रही थी...फिरभी, गुलदान सजा रही पूजा को दादा ने धीरेसे अपने गले से लगा लिया...और देरतक उसके माथे पे हाथ फेरते रहे...उनकी आँखों की नमी किसी से छुपी नही...

और पूजा की आँखें..अपने पहले प्यारको सलाम फरमा रही थीं...छुप छुप के...

दिन धीरे, धीरे सरकते रहा...शाम गहराती रही...और वो वक्त भी आया जब उसे अपने साजन की जीप की आवाज़ सुनाई दी...वो कमरेमे भाग खड़ी हुई...बहन उसे धकेल के अपने भावी जीजाके पास ले आयी...अंधेरे में उन कपोलों की रक्तिमा छुपी रही...बगीचे में अभी चाँद ऊपर निकलने वाला था..जिसमे लाज भरी अखियाँ तो नज़र आती, लालिमा नही...

कुछ देर बाद परिवार ने उन दोनों को अकेले छोड़ दिया...'उसने' पूजा की लम्बी पतली उंगली को छुआ और उसकी आँखों में झाँक के कहा,
" क्या तुम्हें एक जद्दो जहद भरी ज़िंदगी मंज़ूर है?"
पूजाने ब-मुश्किल अपनी सुराही दार गर्दन हिला दी...
रात गहराती रही...अगले   दिन   'वो' दोपहर के भोजन के लिए आनेवाला था..और वहीँ से अलविदा कह दिल्ली के चल पड़ने वाला था...
वो रात कैसे कटी? ज़िंदगी की सबसे हसीं रातों में से एक रात...या...

क्रमश:

पोस्ट छोटी है...उसकी वजह अगली कड़ी में पाठक जान जायेंगे...

18 टिप्‍पणियां:

Amit K Sagar ने कहा…

आपको भी विजयादशमी की बहुत-बहुत शुभकामनाएं. जारे रहें.

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लेखक / लेखिका के रूप में ज्वाइन [उल्टा तीर] - होने वाली एक क्रान्ति!

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

असत्य पर सत्य की जीत के पावन पर्व
विजया-दशमी की आपको शुभकामनाएँ!

योगेश स्वप्न ने कहा…

kavita umda lagi . badhai. kahani ke agle part ki intzaar.

लता 'हया' ने कहा…

shukria,
waiting for d next1

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पूजा की लिखी दिलकश नज़्म लाजवाब है .......... उसके दिल में छाया खुमार प्यार का है ......... आपको दशहरे की बहुत बहुत शुभकामनाएं .........

Jogi ने कहा…

Today i just came to your post and read it, i just read the first part but couldn't stop myself to read all the story from the beginning..Just amazing one...Gr8 !! Better if you plan to publish this as a novel...
Thanks for sharing this great thing...waiting for the next part :)

शोभना चौरे ने कहा…

ade intjar ke bad achha lga puja ke lal kpolo ko mhsus karna .
agli kdi ka besbri se intjar.

'अदा' ने कहा…

are kshama ji,
nazm to bahut hi pyari lagi
aur padhte padhte kapool to hamare bhi laal ho gaye
ha ha ha ha
agli kadi ka intezaar hain..

Nirmla Kapila ने कहा…

पूजा की नज़्म लाजवाब लगी शुभकामनायें

raj ने कहा…

agli kadhi ka entzaar rahega....

दिलीप कवठेकर ने कहा…

आप लिखती बढियां हैं, मगर व्यस्तता की वजह से क्रम बना पाना मुश्किल लग रहा है.

rohitler ने कहा…

बेहतरीन इंतेख़ाब

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत बेहतरीन नज़्म. बहुत नाज़ुक सी , कोमल सी. अपने सारे मनोभावों को दर्शाती हुई. श्रृंखला पूरी रोचकता के साथ आगे बढ रही है.

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut hi maarmik rachana aur komal bhi .

Rakesh ने कहा…

जिन्हें पुकारा मनही मनमे
कैसे थे लम्हें इंतज़ार के,
बयाने दास्ताँ थी आँखें,
ख़ामोशी थी लबों पे...
चादर बुनी सपनों में
kshama
wakai bahut umda dharapravah lekhan hai aapka
badhai

Basanta ने कहा…

A great narration again! And what a beautiful poem by Pooza!

गौतम राजरिशी ने कहा…

...तो पूजा कविता भी कहती है। लो, इसमें आश्चर्य की क्या बात हुई...इश्क कविता ही तो करवाता है कमबख्त...

लेकिन ये पोस्ट कुछ ज्यादा संक्षिप्त थी।