शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

Bikhare sitare-ek yebhee diwali thee..20

'वो ' तो  चले  गए ...जाने  से  पूर्व  एकबार  पूजा  को  अपनी  बाँहों  में  भरते  हुए  कहा ,"गर मेरी माँ ने कहा तो , क्या तुम 'convert' हो  जाओगी?"
पूजा:" हाँ!
पूजा को इसका मतलब समझ में ही नही आया. उसने ,इस का अर्थ 'धर्म परिवर्तन' से है ,ये ना समझा, ना जाना...उसपे केवल  एक हिन्दुस्तानी होने के संस्कार हुए थे...उसे लगा, तमन्ना नाम हटा के वो किसी अन्य नाम से पुकारी जायेगी...या घर में होने वाले पूजा पाठ आदि में शामिल होना होगा..

उसे इन सब से क़तई ऐतराज़ नही था...मन में इतना सवाल   आया, के , पूजा नाम रहेगा...जिसे उस के दादा ने इतने प्यार से रखा था...घर में तो सब 'तमन्ना ' कह बुलाते थे...लेकिन अन्य कई दोस्त/परिवार उसे 'पूजा' ,इस नाम से ही  संबोधित करते थे...शायद इनकी माँ को जब ये बात पता चलेगी,की, लडकी का नाम पूजा है...वो घर के हर तौर तरीके अपना लेगी,तो उन्हें क्या फ़र्क़ पडेगा??

पूजा ने अपने घर में ये बात बतानी चाहिए, ऐसा सोचा ही नही. लड़का पूजा से तकरीबन १० साल बड़ा था...पूजा इस कारण भी उसकी अधिक इज्ज़त करती..बड़े होने के नाते,'वो' कोई गलत बात तो नही कह सकते ये विश्वास उस के मन में था..इसीलिये चुम्बन को लेके वो परेशान हो उठी थी...

' उन्हें' दो माह बाद किसी सरकारी काम से बेलगाम आना पडा...'वो' रुके तो पूजा के घर पे ही..और वहाँ काम ख़त्म होते, होते मलेरिया से बीमार हो गए...उन्हें अस्पताल में भारती कराया गया...पूजा काफ़ी समय अस्पताल में गुज़ार देती..एक दिन उस के साथ बतियाते हुए वो बोले:" तुम्हें पता है, मै तुम्हें कब से प्यार करने लगा?"
पूजा ने लजाते हुए कहा:" नही तो?"
वो:" तुम्हारे बारे में केवल सुना था तुम्हारे दादा से...तब से...तसवीर तो उन्हों ने बाद में दिखाई...और साथ में यह भी कह दिया की, 'तमन्ना की मंगनी हो चुकी है'....मै बेहद निराश हो गया इस बात को सुन के.."
पूजा लजा के लाल हुए जा रही थी..उसके मन में एक बार आया की, वह भी कुछ कहे...जो उसे लगा था,जब उसे 'इनके' बारे में बताया गया...की, उसे भी 'उन्हें' देखने से पहले ही प्यार हो गया था....वो खामोश ही रही...

तबियत ठीक होने के पश्च्यात' वो 'चले गए...उनका नाम था , किशोर...और उन के जाने के बाद फिर वही बिरह की शामे...और मदहोशी भरी तनहा रातें...पहले पहले प्यार ने ये क्या जादू कर दिया ??

एक माह बाद पूजा तथा उसकी माँ, मासूमा दिल्ली गए...लड़के के अन्य परिवार वालों से मिलने...माँ को शादी की बात भी करनी थी...घरवालों के खयालात से रु-b -रु भी होना था..

वहाँ  जब 'धरम परिवर्तन' की बात चली तो माँ को ये पता चला,के, पूजा ने पहले ही हामी भर दी है...! उन्हों ने एकांत में पूजा को  कोसते हुए कहा:" ये तुम ने क्या कह दिया किशोर से ?"
पूजा:" क्या कहा मैंने?"
उसने अचंभित होके माँ से पूछा...
माँ:" तुम धर्म परिवर्तन के लिए राज़ी  हो, ये बात तुमने कैसे कह दी? बिना बड़ों का सलाह मशवरा लिए? मै तो हैरान रह गयी...!"
पूजा:" मैंने धरम परिवर्तन के बारे में तो नही कुछ कहा...मुझे तो 'उन्हों' ने 'convert' होने  के  बारे  में  कहा  था ...मैंने तो उस बात के लिए हामी भरी थी...पूजा  पाठ तो करना होगा,गर उनकी माँ की इसी में खुशी है..."

माँ:" पागल लडकी...ये काम इतना आसान नही...तुमसे कानूनन मज़हब बदलने के लिए कहा गया है...प्यार में ये कैसी शर्त ? जैसे हम लोगों ने कोई शर्त नही रखी, वैसे उन्हों ने भी तुम्हें , तुम जैसी हो स्वीकार कर लेना चाहिए..तुम शादी के बाद जो चाहे करो...शादी से पूर्व नही..और शादी के बाद भी, मै नही सलाह दूँगी...एक हिन्दुस्तानी हो, वही रहो...इस माहौल में क्या तुम खुद को ढाल पाओगी ? जब तक प्यार का नशा है तब तक ठीक...जब ज़मीनी हकीकत सामने आयेगी, तब क्या करोगी?"

माँ बोले चली जा रही थी और पूजा दंग रह गयी...! अब वो क्या करे? उसे वो पल भी याद आए, जब किशोर ने कुछ 'गलत' जगहों पे उसे छुआ था...अब वो क्या करे...? माँ को तो हरगिज़ नही बता सकती...

कुछ देर बाद  किशोर ने उससे मुखातिब हो कहा:" तुमने तो धर्म परिवर्तन के लिए हाँ कर दी थी...और तुम्हारे घरवालों को ये बात ही नही पता? मेरी माँ तो इस के बिना शादी के लिए राज़ी हो नही सकती...मै माँ की इच्छा के विरुद्ध जा नही सकता...और वो तुम्हारे दादा...और भाई...उन्हें लगता है,की, इस रिश्ते को नकारते हुए उनका काम हो जायेगा?"

पूजा:" लेकिन जैसे तुम्हारी माँ को तुम दर्द नही पहुँचा सकते, मै भी नही पहुँचा सकती.."
किशोर:" लेकिन तुमने तो हामी भर दी थी..अब क्या मुकर जाओगी?"

पूजा निशब्द हो गयी..माँ ने कहा था,की, वो पूजाके दादा दादी की सलाह के बिना कुछ नही करेंगी..किशोरकी माँ का रवैय्या पूजा के साथ बेहद सख्त रहा था...वो उसे अपमानित करने का एकभी मौक़ा नही छोड़ती.."वैसे अच्छा ही हुआ, आँचल जल गया.. हमारे घरमे आना मतलाब आग से खेलना है..",उन्हों ने पूजा से कह दिया, जब पूजा के आँचल ने खिड़की में रखी अगरबत्ती  से आग पकड़ ली...
उसके दादा को क्या कहेगी ?? और छोटे भाई बहन जो अपनी आपा को इतना मान देते हैं...??बहन अफशां और भाई आफताब..अब उसने कौनसा क़दम उठाना  चाहिए...??? पूजा बेहद संभ्रम में पड़ गयी, और पहली बार उसे ज़बरदस्त सर दर्द ने घेर लिया...बेहद उदास और सहमी-सी हो गयी...उसके प्यार का अब क्या हश्र होगा?

आने वाली दिवाली तक तो उसके परिवार ने उसके ब्याह के बारेमे सोचा था,की, करही देंगे  ...दिवाली बस आनेवाली थी...और उसके लिए क्या तोहफा था????..कभी वो किसी की  तमन्ना बन, किसी की आँखों का तारा बन इस दुनिया में आयी थी...उस सितारे का क्या भविष्य था? क्या वो बिखरने वाला था...दादा-दादी के आँखों के सामने टूटने वाला था...?

क्रमश:

17 टिप्‍पणियां:

Dipak 'Mashal' ने कहा…

bahut hi dilchasp kahani, jabardast prastutikaran aur sath hi baandh ke rakhne ki kshamta hai isme. ya shaya main jeevni ko kahani kahne ki bhool kar raha hoon.
Shubh Deepawali

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

ye deep parva shubh ho/ sneh se rakhe ham sabko/
sach kaha, ittafaq hi he yah/ kher..itminaan se padhhunga aapki rachna/ bahut marmik he aour ise fursat me beth kar hi padhhaa jaa saktaa he/
punah- deevali ki aseem shubh kamanaaye/

Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर लिखा है आपने! आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आज खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

योगेश स्वप्न ने कहा…

आपको और आपके परिवार को दीपावली की मंगल कामनाएं.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बढ़िया रचना..दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ!!

Nirmla Kapila ने कहा…

ऎसे अवसरों पर अपनों की याद रोज़ से कुछ अधिक ही आती है मगर क्या करें इस और उस दीपावली के अन्तर को मिटाने के लिये । दीपावली की शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।
युग सदा विज्ञान का, चलता रहेगा।।
रोशनी से इस धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

'अदा' ने कहा…

bahut hi romantic, romanchak aur na jaane kya kya..sabhi bhav to hain aapki kahani mein...
bahut hi dilchasp mod par hai aapki kahani...
dekhte hain aage kya hai..
deepawali abhi hi gayi hai isliye badhai dene mein der nahi kahungi...
aapka jeewan khushiyon se bhara poora rahee yahi prarthana hai...

ज्योति सिंह ने कहा…

shubh diwali ,ab to pooja apni lagane lagi .uski kahani hame is kadar bandh li .

गौतम राजरिशी ने कहा…

मैं तनिक विलंब से आता हूँ अपने पसंदीदा ब्लौगरों के पोस्ट पर, ताकि पोस्ट के साथ-साथ तमाम टिप्पणियों पर भी गौर फरमा सकूँ। टिप्पणी के जरिये कई लोगों की पहचान हो जाती है।

खैर तो पूजा/तमन्ना पे आते हैं...थोड़ा अंतराल हो जाने पर पहले तो आप अवश्य जिक्र कर दे संक्षेप में अब तक बीते की। वैसे मैम एक झलक देख आया पिछली पोस्ट को...

इस कड़ी में पूजा के भाए-बहन के नाम जानना अच्छा लगा और कहानी का फिर से ट्विस्ट लेना कुछ अजीब-सा। अगली कड़ी का इंतजार है...

शुरू से पढ़ता आया और अब आप कहती हैं कि कहानी का सूत्र खुद नायिका संभालने वाली है और मैं आपकी प्रोफाइल के टैग-लाइन में उलझ जाता हूँ "जान जायेंगे...धीरे-धीरे..."

Jogi ने कहा…

waah ji..bahut achha likha,,,agli kadi ka intajar hai

kshama ने कहा…

आज मैंने 'छोटी छोटी ' खुशियों वाली 'बड़ी गहन' बात पढी ..यही बचपन को जिलाए रखना चाहिए ...इसीमे संजीदगी छुपी होती है ...जो लोग 'बड़े ' होने का आभास देते हैं , वो अपना बचपन खोके बचपना करते हैं . ...


मै भी अपने अन्दर एक छोटी नटखट बच्ची लिए घूमती हूँ ...जब उसके चुलबुले पन का गला घोंटना पड़ता है, तब, तब, मन उदास हो जाता है...जैसे एक जानदार , चुलबुला बच्चा कोमा में चला गया हो...

आपका कभी पुणे आना हुआ तो पूजा से मुलाक़ात करवा दूँगी..ये वादा रहा...तब सभी संभ्रम ख़त्म हो जायेंगे...लेकिन kahanee ख़त्म होने के बाद...!!!!

कहानी असली जीवनी है...उसमे तो आगे चल बेहद ट्विस्ट हैं, अजीब, अबीब पड़ाव हैं...इसीलिए तो लिखना आरंभ की..life is stranger than fiction.....

Basanta ने कहा…

This Kishor seems very mean and selfish. Why didn't he say that earlier?!

सर्वत एम० ने कहा…

कहानी है तो ठीक है लेकिन अगर यह सच्ची घटना है तो बेहद खतरनाक मामला है. सआदत हसन मंटो की इसी विषय पर वक बेहद शानदार कहानी है जिसका अंत मज़ा दे जाता है. प्रार्थी उस कहानी का शीर्षक भूल गया है, आपको याद हो तो बताने की कृपा कीजियेगा. अब आपकी कथा के अगले चरण/चरणों की प्रतीक्षा है. पत्रिकाएँ पढना इसी कारण बंद कर दी थीं कि वे धारावाहिक परोसने लगीं थीं. टी.वी. सीरियलों को भी इसी कारण नहीं देखता. अब यह बीमारी ब्लॉग तक आ पहुँची है और प्रार्थी को भी लपेट रही है. खुदा मेरी हिफाजत करे.

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

क्षमा जी !
बहुत अच्छे और प्रभावी ढंग से चल रही है कहानी , एक रहस्यमयता सी ओढे हुए ! कभी कभी उलझा सा देती है फिर पिछली पोस्ट पढ़नी पड़ती है ! किसी कहानी से साम्य सा लगने लगता है !आपका Wave page थोडी हैरत में डाल देता है ! आपका लेखन बहुत रोचक होता जा रहा है !

youakiduniya ने कहा…

itna dard padhkar bahut ukjhan hui man ekdam ashant ho gaya.prabhavit karane vali rachna hai