मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

बिखरे सितारे १४: खाली घोंसला!

(गतांक :पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करेगी ..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी  ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी...अब आगे पढ़ें...आज मै,पूजा ,अपने पाठकोंसे मुखातिब होती हूँ...)

हवाई अड्डे से अतिथि गृह  और वहाँ से अपनी पोस्टिंग की जगह गौरव और मै  लौट आए.. तकरीबन छ: एकरों में बना ,छ: हज़ार square फीट से बड़ा घर ....और सिर्फ दो बाशिंदे...पति अपने कामों में व्यस्त..

 मै ऐसे ही,बेमकसद,अमन के कमरे में गयी..कुछ ही दिन पूर्व ,अमन आके लौटा  था....करीने से लगा हुआ, साफ़ सुथरा कमरा..मेरा मन अपने बच्चों के बचपन में विहार करने लगा...अपने नन्हें मुन्नों की आवाजें कानों में गूँजने लगीं   और उनमे मेरी आवाज़ भी शामिल हो गयी..
" माँ, देखो ना...इसने बाथरूम में कितने बाल बिखराएँ हैं...!छी :!इसे हटाने को कहिये न...!" अमन केतकी की शिकायत कर रहा था..
"माँ! इसने मेरे यूनीफ़ॉर्म पे अपना गीला तौलिया लटका दिया है..इसे पहले वो हटाने के लिए कहो ना...!" केतकी ने अपनी शिकायत सामने रखी...
" चुप करो दोनों! मुझे किसी की कोई बात नही सुननी है...!" मै भी खीज उठी..
" माँ! मेरी एकही जुराब है...प्लीज़,मुझे दूसरी वाली खोज  दो न...!" यह अमन बोला..
" खोजो अपने आप...रात को अपनी जगह पे अपना सामान नही रखोगे तो ऐसाही होगा..!"मै भी चिंघाड़ उठी...
" माँ! मेरी कम्पस में रूलर नही है...अमन ने लिया होगा..."केतकी शोर मचा रही थी..
"उफ़ ! अभी स्कूल बस आनेवाली होगी...तुम दोनों ने क्या आफत उठा रखी है...अमन! यह लो तुम्हारी जुराब...और केतकी, यह रहा तुम्हारा रूलर..यहीं तो पड़ा था...चलो,चलो टिफिन और पानी की बोतलें उठाओ..बस आ गयी होगी...",मेरी आवाज़...!

दोनों चले जाने के बाद एक प्याली चाय की फ़ुरसत होती...मुझे तस्वीरों वाले सजे,सजाये कमरे कितने सुन्दर लगते...!
"लो तुम्हारा तस्वीरों वाला कमरा...ख़ुश? अब यहाँ की चद्दर पे एक सिलवट भी नही पड़ेगी...देख लो! डेस्क पे बेतरतीब किताबों का ढेर नही...इस्त्री किये कपड़ों पे गीला तौलिया नही...न कम्पस की खोज न जुराब की...टीवी चैनल परसे झगडा नही...अंत में "कोई कुछ नही देखेगा", ऐसा झल्लाके कहने वाली मै खामोश खड़ी..
" और लेलो फ़ुरसत...", मेरे मनने एक और उलाहना दी..आज मुझे वो सुबह की व्यस्तता याद आ रही थी...पीती रहो चाय...मैंने कैसे कभी सोचा नही,की, घोंसले से एकबार पँछी उड़ गए तो पता नही कब लौटेंगे? मै इंतज़ार करुँगी और वो आकाश में उड़ान भर लेंगे..!
मेरी आँखों से पानी बहने लगा..मै अमन के कमरे से केतकी के कमरेमे आ गयी...किसी के अस्तित्व की कोई निशानी नही...हाँ ! एक कोने में केतकी की कोल्हापुरी  चपलें पडी हुई थी..बस! पलंग फेंका हुआ दुपट्टा नही, अधखुली सूटकेसेस नही, पोर्टफोलियो के कागजात नही...खाली ड्रेसिंग टेबल...वैसे भी केतकी कोई सिंगार नही करती...इतने दिनों से ड्रेसिंग टेबल पे कागज़ात ही बिखरे हुए थे..वहाँ के हलके से अँधेरे  से घबराके मैंने बिजली जला दी..मन फिर एकबार विगत में दौड़ा...

अमन अंगूठा चूसा करता था..मेरे परिवारवाले मेरे पीछे पड़े रहते...'इसकी यह आदत छुडाओ..'दो साल के अमन को मै एक बार अपने बिस्तर पे लेके बैठी...उसने मेरी गोदीमे सर रख दिया..मैंने कहा,
"तुमने देखा बेटे? तुम्हारे पापा अंगूठा नही चूसते, मै नही चूसती, नाना नानी नही चूसते'...और न जाने कितनी लम्बी फेहरिस्त सुना दी..
उसने मूह से अंगूठा निकला..मुझे लगा, वाह! कुछ तो असर हुआ..अगले पल वो बोला," माँ ! इन छब को बोलो अंगूठा चूछ्ने को..", अंगूठा वापस अन्दर..
कई बार सोने से पहले वो काहानी की ज़िद करता और मै हज़ार काम आगे कर, टाल जाती..." देखो, दादी माँ को रोटी देनी है न?."..आदि,आदि...
काश मैंने वो सब छोड़ कहानी सुना ही दी होती...
केतकी को मेरी सहत को लेके हमेशा चिंता रहती...ख़ास कर मेरा मायग्रेन...जब वो होस्टल में थी तो दिल खोल के ख़त लिखती..अंत में हमेशा दो चेहरे अंकित करती...एक चिंतित , ख़त लिखने के पहले का और दूसरा...निश्चिन्त.... ख़त लिख लेने के बाद का..काश मैंने वो ख़त संभाल के रखे होते! अब अपने हस्ताक्षर में केतकी मुझे थोड़े ही ख़त लिखेगी...और वो भी लम्बे,लम्बे..अब तो इ-मेल आ जाया करेगी...चंद शब्दों की ...तबादलों के चक्कर में मैंने सब फेंक दिया था...कहाँ पता था की, ऐसे खाली घर में मुझे रहना पडेगा?

पिछले कई महीनों से उसने मुझसे बस काम की ही बात चीत की थी...मै समझ रही थी की, इतने सालों का दर्द उसपे हावी हो गया है..मेरी ज़िंदगी एक तारपर की कसरत थी, जिस में मेरी बेटी ने मुझे हमेशा सहारा दिया था..अब मुझे उसकी खामोशी या चिडचिड, दोनों बरदाश्त करने ही होंगे...राघव के रूप में उसे मनमीत मिल गया था..जिसके साथ वो अपने सब दुःख दर्द बाँट सकती थी...
आँखों की धारा और तेज़ हो गयी...मैंने उस कमरेसे बाहर निकल फट से टीवी चला दिया...बस इंसानी आवाज़ के खातिर...अब इंतज़ार  के अलावा अन्य चारा नही था...मेरे अनगिनत छंद थे..लेकिन इस वक़्त मुझे, इंसानी सोहबत की चाह थी...
मन में आ रहे विचार मैंने कागज़ पे उतार दिए..और तीन भिन्न भाषाओँ में लिख, अखबारों को भेज दिए...पढने वाले रो पड़े..मुझे अनगिनत ख़त आए..फोन आए..लोग मिलने भी पहुँचे और मेरे पास बैठ अपनी,अपनी कहानी  सुना, ज़रोजार रो गए....तीन अखबारों में अब मेरे साप्ताहिक colunm छपने लगे..लेकिन ,लेकिन..बच्चों की याद..खासकर केतकी की, मुझे रुलाती रही...जीवन में उसे चैन नही हासिल हुआ...और चाहे गलती किसीकी हो...उसकी ज़िम्मेदार,एक माँ की तौरपे मै भी थी..आज माँ की मामता मुझे चैन नही लेने दे रही थी...

क्रमश:

29 टिप्‍पणियां:

Basanta ने कहा…

Very heartbreaking narration! The story is told so beautifully, but it's so full of sadness----. It's just heartbreaking!

Wish you and all the readers of this blog a very happy new year 2067!

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

रोचक,आगे का इन्तजार रहेगा.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

अच्छा लगता है...पढना...

मेरी ज़िंदगी एक तारपर की कसरत थी....

मेरे अनगिनत छंद थे..लेकिन इस वक़्त मुझे, इंसानी सोहबत की चाह थी....

दीपक 'मशाल' ने कहा…

aapka lekhan harbaar ek alag dunia me le jata hai. ek aisi dunia jisme sirf is kahani(haqeeqat) ke patra hain aur unse judee meri samvednayen aur beech me koi nahin.

ali ने कहा…

क्षमा जी
आज फुर्सत से पढ़ा ... लगता है मन रम जायेगा चूंकि यह आलेख धारावाहिक की शक्ल में है इसलिए मुझे आगा पीछा सोचने और प्रतिक्रिया देने का अवसर दीजिये !
आज बस इतना ही कि पढना अच्छा लग रहा है ! शुक्रिया !

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दरता से आपने कहानी प्रस्तुत किया है! बड़ा ही रोचक और शानदार लगा! अब अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा!

देवेश प्रताप ने कहा…

जवाब नहीं आपके लेखन का .......

pragya ने कहा…

एक ऐसी कहानी जो अपनी उदासी में जाने कितनी उत्सुकताएँ लपेटे है....

वन्दना ने कहा…

ek maa ke dil ka soonapan, akelapan aur uski tees sab jhalak rahi hai.......ek maa jo apne bachchon ki khatir khud ko kurbaan karti rahi aaj wo hi use chod kar door ja base to aise mein us dil par kya bitegi ye koi bhuktbhogi hi samajh sakta hai hum jaise to sirf kah hi sakte hain magar dard to anubhav ki cheese hai jise shabdon mein vyakt nhi kiya ja sakta.

bhagyareema ने कहा…

Very touching....
Children grow and fly away to search their destinations and we are left behind, nothing can be done, its a fact of life and bound to happen. But the bond b/w mother and child always remains, yes equations may change but still the bond remains.
Usually its not 'people' who hurt us but our expecatations of them. Puja expected her daughter to always care for her as she used to do when small but the fact is now ketaki had a life of her own too.
Eventually we all have to find happiness within ourselves.
Bahut bol gayi, kshama kijiyega, par khud ko rok nahi payi.

संहिता ने कहा…

बहुत संवेदनशील कहानी !!! हर बार की तरह इस बार भी अगली पोस्ट का इंतजार है । कुछ प्रश्न मन मे आ रहे है - बिटिया (केतकी) के अचानक रूखे व्यवहार की वजह क्या है ? क्या वह सब से दूर अपना अलग अस्तीत्व खोज रही है ? क्या पतिदेव (गौरव) को अपने व्यवहार पर पछतावा है ?
क्षमा जी, कहानी की अगली कडीयो मे शायद कुछ positive turn आये ..

रचना दीक्षित ने कहा…

हमेशा की तरह बहुत दर्द भरी है ये पोस्ट भी दिल भर आता है पर क्या करे फिर भी आगे तो बढ़ना ही पड़ता है.आगे भी इंतजार रहेगा ....

arvind ने कहा…

मेरी ज़िंदगी एक तारपर की कसरत थी....
बहुत ही सुन्दरता से आपने कहानी प्रस्तुत किया , रोचक, शानदार , अगली कड़ी का इंतज़ार ....

ज्योति सिंह ने कहा…

मेरी ज़िंदगी एक तारपर की कसरत थी....

मेरे अनगिनत छंद थे..लेकिन इस वक़्त मुझे, इंसानी सोहबत की चाह थी....
tanhai kitni bojhil hoti hai.apno ke hote bhi hum akele hai ,har insaan jyo jyo badhte jaata hai dooriya bhi aapas ki badhti jaati hai ,kisi ke paas fursat ke lamhe nahi ,saath waqt ko gujarne ke
liye ,aese me bachpan ki betuki baate bhi hame kitni aham lagti hai .tab wo pal jeene ka sahara bante hai .marmik rachna .

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

aruna kapoor 'jayaka' ने कहा…

इतनी सरलसी भाषा में सुंदर अभिव्यक्ति!... उत्सुकता जगा रही है!

अभिन्न ने कहा…

bahut sundar blog,damdaar lekhan aur is vidha ke kya kahne.......
svjivni KAH SAKTE HAI IS VIDHA KO...is vidha me bahut kam log likhte hain yah aatm katha aur savkatha se bhinn hoti hai.aap ke pure blog ko padhna chahta hoon shigr hi lautunga

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

"माँ ! इन छब को बोलो अंगूठा चूछ्ने को..."
गज़ब!

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

पढ़ रहे हैं...
अच्छा लगता है...

अरुणेश मिश्र ने कहा…

रोचक ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

संवेदना बढ़ती जा रही है ...

अल्पना वर्मा ने कहा…

bahut achchha lagata hai aap ko padhna
--rochak katha ...lekhan prabhavi.

चिट्ठाचर्चा ने कहा…

आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है. आशा है हमारे चर्चा स्तम्भ से आपका हौसला बढेगा.

Mayur Malhar ने कहा…

आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा. साहित्य में गहरी रूचि लगती है.
अब तफसील से पार्ट १ से इसे पदूंगा.

akelahoon ने कहा…

yeh naya prayog hai. bhasha par aise pakad bahut kam logon mein dekhi gayi hai. agali kadi ka intazaar rahega.

कुमार संभव ने कहा…

कितनी सीधी, सदा, सच्ची बातें बहुत अच्छा लगा पढ़ कर .........

Ram Krishna Gautam ने कहा…

मेरी साईट पर आकर उत्साहवर्धन करने के लिए आपका तहेदिल से आभार!!!



आपके लेखन शैली ने मुझे बेहद प्रभावित किया!!!


उम्मीद करता हूँ आप यूँ ही मेरा उत्साह बढ़ाते रहेंगी!!






"रामकृष्ण गौतम"

दिनेश शर्मा ने कहा…

सुन्दर!अगली बार....

गौतम राजरिशी ने कहा…

आज दिनों बाद अपनी प्रिय गाथा के लिये समय निकाल पाया हूं।

कैसी हैं आप?...ओहो, किससे पूछूँ ये सवाल मैं- पूजा से या क्षमा से?

दिनों बाद बीती हुई सारी कहानी फिर से मन-मस्तिष्क में दौड़ गयी। ये वाली किश्त को पेश करने का अंदाज़ खूब भाया। पूजा का बार-बार फैल्श-बैक में जाने वाला अंदाज़...