गुरुवार, 20 मई 2010

बिखरे सितारे भाग ३ गर्दिशमे क़िस्मत.

(गतांक: बेवफाई?..मै बेतहाशा रोने लगी...इस तरह का इलज़ाम मेरी कल्पना के परे था..क्या से क्या हो गया था..जिस परिवार के ख़ातिर ,बच्चों की ख़ातिर मै हर तकलीफ़ सह गयी,उनमे से कोई मेरे पास न था..क्या करूँ? क्या करूँ? कहाँ  जाऊं? कौनसी ऐसी जगह थी इस दुनियामे,जिसे मै अपना कह सकती थी? जहाँ से निकल जाने के लिए मुझे कोई न कहता? मेरी बेटी के ससुरालवाले क्या सोचेंगे..?

यहभी नही जानती थी,की,यह तो एक भयानक सिलसिले की शुरुआत भर है....अब आगे पढ़ें.)

पता नहीं कैसे,पर यह ख़बर माँ को भी मिली..वो भी आ गयीं..एक दिन के लिए बेटा,अमन भी आया..गौरव ने ज़ाहिर है,उसे भी बताया..मै बेहद अपमानित महसूस कर रही थी..जानती थी,की, गौरव अक्सर अपनी बात इस तरह पेश करता है,की, सामने वाला उस वक्तव्य को सच समझ  लेता है... उसकी इस आदत से परिचित लोग भी उसकी बातों में आ जाते हैं.....

मैंने अमन से  पूछा:" अमन, तुझे विश्वास होता है की, मै सच कह रही हूँ? मै अपने आपको पुन: स्थापित करना चाह रही हूँ..लोग जानकारी के लिए फोन करते हैं..मिस कॉल के मै जवाब भी देती हूँ..ऐसे नंबर याद रखना मेरे बसकी बात नही.."
अमन: " पता नही...क्या देर  रातको बात करना ज़रूरी है? ऐसी कौनसी आफत थी,की, रात को बात करनी पड़े?"
अमन का जवाब सुन मुझे सख्त चोंट पहुँची..गौरव ने अपनी पत्नी के बारेमे, अपनी ही औलाद को क्या बताया होगा? मुझे अधिक बहस में पढ़ना नही था..मेरी गरिमा के खिलाफ था..

बरसों बंजारों की तरह दिन काटे थे..कोई गिला शिकवा नही था..गौरव की सेवा निवृत्ती के बाद मैंने सोचा था, मै अपने कितने ही छंद दोबारा शुरू कर सकती हूँ..घर से दूर रह नौकरी करने का निर्णय गौरव का था..गाडी की सर्विसिंग, पूरे घरमे आए दिन होनेवाले मरम्मत के काम, कभी तरखान खोजना है,तो कभी  प्लंबर..सारा ज़िम्मा मुझ पे था..और  ऐसा अविश्वास?

ऐसा नही की, गौरव का यह रूप मुझे पता ही नही था..उसके सामने गर कोई मेरी तारीफ़ कर देता तो ,मै कुछ कहूँ,उससे पहले,वह खुद हँसते,हँसते कह देता," अरे भाई टाइम पास तो करना होता है न! "
अन्यथा मेहमानों को दीवारें चद्दरें आदि की ओर इंगित कर ,मेरी तारीफों के पुल भी बाँध लेता! लोगबाग कह उठते,कितना अभिमान है इसे अपनी पत्नी का! उसके रहते,किसी के सामने ,मै अपनी कला या काम के बारे में मूह खोलती ही न थी..पर यह इलज़ाम तो सारी हदें पार कर गया था..

गुज़रे सालों में मै कई नाकाम कोशिशें कर चुकी थी,की, कमसे कम हफ्ते में एकबार हम सब इकट्ठे बैठ, अपने,अपने मन की बातें एक दूसरे से साझा करें..लेकिन हर बार हश्र यह होता,की, गौरव छोड़ अन्य कोई बात ही न कर पाता..किसी और की बात को तवज्जो देना उसके मिज़ाज में ही नही था..इस हदतक की, गर उसके दोस्त या सहकर्मी मेरे पास कुछ मेसेज छोड़ते तो मुझे उसके मूड की प्रतीक्षा करनी पड़ती या,कागज़ पे लिख उसके PA के पास मै पुर्ज़ा पहुँचा देती..अवकाश प्राप्ती के बाद भी उसके पास सब्र न होता की, मेरी बात सुने..दो तीन बार हताश,हो मैंने इ-मेल लिख दी थी..आपसी संपर्क सहजता से बनाये रखने के मेरे सारे यत्न हमेशा असफल हुए..

माँ को तो मुझपे पूरा विश्वास हुआ..की, जोभी हुआ वो केवल एक हादसा था..मेरी बहन बहनोई उसी शहर में थे जहाँ गौरव को नौकरी मिली थी..अफ़सोस! जो बहन अपने जीजा को अच्छी तरह जानती थी, वो भी उसके झासे में आ गयी..बहन, जो मेरी सबसे अज़ीज़ सहेली थी..

मुझे याद नही,की मै किस तरह दिन काट रही थी..सोचने की शक्ती जवाब दे गयी..यह बात तो माँ ने कही:" इस हदतक जाने की गौरव को सूझी कैसे? "
कुछ हफ़्तों पहले की एक घटना,जिसे मैंने क़तई तूल नहीं दिया,था,याद आई..जूली, मेरी निरक्षर नौकरानी, जिसकी बेटी के पढाई लिखाई.....और बाद में ब्याह का ज़िम्मा मैंने ले रखा था...जो एक विधवा थी....जिसकी गलतियों पे मै अक्सर पर्दा डाल देती थी..के उसे डांट न पड़े..मेरे  पास कॉर्ड लेस फोन ले आई. घुस्से में थी, की,वो शख्स ठीक से अपना परिचय नही दे रहा था..

दूसरी ओरसे,एक व्यक्ती पूछना  चाह रहा था,की, क्या  मै, शहर से काफ़ी दूर बने उसके फार्म हाउस का landscaping कर सकती हूँ?
पल भर सोच,मैंने कहा:" मै डिज़ाइन तो बना दे सकती हूँ..लेकिन मेरे पास अपनी टीम नहीं है...फिलहाल मेरा काम सुझाव तक सीमित है.."
उसने कहा:" गर मै आपको एक टीम बना दूँ,तो आप कभी कभार supervion कर सकती हैं?"
मै:" गर आप मुझे अपना नंबर दें,तो मै कलतक सोच के बता दूँगी...माफी चाहती हूँ,की,तुरंत नही बता सकती..!"

मैंने बात ख़त्म की ही थी,की, माँ का फोन आ गया..मैंने ही उठा लिया और हम दोनों बातें करने लगी...जूली दो तीन बार मुझ से कहने आई की, मै खाना खा लूँ..मै हरबार इशारे से ,'बस पाँच मिनट', जताती रही..
माँ से बातचीत ख़त्म कर मै बाथरूम में हाथ धोने चली गयी...मुझे पहले तो फोन बजने की आवाज़ आई..और फिर जूली के अलफ़ाज़ कान पे पड़े:" मैडम बाथरूम में हैं.."
कुछ पलके बाद:" हाँ..यह फोन बिजी था...वो किसी साहब का फोन था.. हमेशा आता है..ठीक से नाम नही बताता .."
इससे पहले की,मै उसके हाथ से रिसीवर लेलूँ,उसने रख दिया था..मैंने चिढ के  कहा" जूली....! क्या बकवास कर रही है..अव्वल तो मै माताजी से बात कर रही थी..और तुझे क्या ज़रुरत पडी है किसी को यह सब बताने की?"

जूली:" साहब का फोन था..वो पूछ रहे थे,की फोन engage क्यों आ रहा था..तो मैंने बता दिया,की.."
मै:" तू क्या बदतमीज़ी कर रही,है,तुझे कुछ पता भी है?"
उसने मेरे साथ बहस करनी चाही, पर तबतक मैंने पलटके गौरव को फोन लगाया..उसकी आवाज़ परसे ही पता चला की वह बहुत घुस्सेमे है.." मै तुमसे बाद में बात करूँगा',कह उसने उधर से फोन रख दिया..
अचानक मुझे महसूस हुआ,की, हो न हो, इस तरह की गलत फहमी में अबके जूली का भी हाथ है..
पर क्या सिर्फ उसका था?

इस प्रसंग से तो मै किसी तरह उभरी..मेरे भाई और बहनोई,दोनों ही ने गौरव को काफ़ी समझाया..इतने सालों में पहली बार,मेरे भाई  ने अपना मूह खोला था..मुझे अपने घर और जीवन से रफा दफा करने की बात उस समय तो गौरव ने नही दोहराई....क्या ख़बर थी,की,एक और,इससे कहीँ अधिक  भयानक प्रसंग मेरे इंतज़ार में था..??
क्रमश:

21 टिप्‍पणियां:

kunwarji's ने कहा…

क्रमशः ......

इन्तजार रहेगा जी.....

कुंवर जी,

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

पढ़ रहा हूँ,रोचकता बनी है,आगे की प्रतीक्षा है,आभार.

ali ने कहा…

अकल्पनीय और त्रासद परिस्थितियां ...संबंधों में इतनी असहजता ! संदेह मनुष्य बना रह पाना दुष्कर कर देता है !

दीपक 'मशाल' ने कहा…

इन्ही सब बातों से एक पुरुष नारी के मन से विश्वास खो देता है.. बिना सच जाने समझे ही जो मन में आता है वही सच मान लेता है.. जूली पर भी बहुत गुस्सा आया, ऐसी घरों में आग लगाने वाली औरतें भी होती हैं.. क्या कहें?

मनोज कुमार ने कहा…

रोचक। अगली कड़ी की प्रतिक्षा में।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत देर से आई. अफ़सोस है मुझे देर से आने का. पिछले अंक भी आज ही पढे. सब चलचित्र की भांति घूम गया आंखों के सामने....

Shri"helping nature" ने कहा…

purn viram k liye ( shift ke sath \ )dabaiyega auchha nahi lg raha uske bina post ||||||
yaa copy past kr lijiyga
aapki rachna auchhi hai
8/10

Basanta ने कहा…

Felt your pain as your.

Waiting for the next episode.

वन्दना ने कहा…

behad marmik vivran hai ..........ye shak ka kiida bahut hi bhayanak hota hai ..........andaza bhi nahi laga sakta koi ki aage kya huaa hoga.

Babli ने कहा…

बहुत ही बढ़िया और रोचक लगा! अब तो अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है!

bhagyareema ने कहा…

I sometimes wonder why some ppls lives are filled wiith more pain than others

Deepak Shukla ने कहा…

नमस्कार जी,

मैं आपके आलेख में दर्द की अनुभूति कर रहा हूँ...

इतने दिन का साथ और इतना अविश्वास...और वो भी uske साथ जिसके साथ जीवन के स्वर्णिम पल बिताये हों... ठीक है गौरव जी को ग़लतफ़हमी हो सकती थी पर वो किसी और से कहने से पहले आपसे बात कर सकते थे...आखिर पत्नी से ज्यादा सहज और प्रिय रिश्ता क्या हो सकता है.. जो सहचर है उसका भी सहचर भी तो बनना है... ये क्या बात हुई की सुख में साथ हैं पर जैसे ही मौका मिला कन्नी काटने के प्रयत्नशील हो गए...

खैर दुःख के साथ ही सही पर es मार्मिक गाथा की अगली कड़ी की प्रतीक्षा में...

दीपक शुक्ल..

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

कभी कुछ बहुत खास सा लगता है...
कभी नहीं...
पर उत्सुकता बनी रहती है...

Tripat "Prerna" ने कहा…

sachmuch intezaaar rahega....

http://liberalflorence.blogspot.com/

Rewa ने कहा…

wow v nicee....waiting for next

PKSingh ने कहा…

बहुत ही रोचक ,आगे का इन्तजार रहेगा

दिगम्बर नासवा ने कहा…

त्रासदी की इंतेहा ... दर्द की अनंत लकीर की तरह आपकी रचना आगे बढ़ रही है ...

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

बहुत ही रोचक ,आगे का इन्तजार रहेगा

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

नारी के संघर्षों की गाथा का इतना बढ़िया वर्णन मैने कहीं पढ़ा नही था..बहुत भावपूर्ण कहानी...बीच में कुछ छूटे हूटे किस्तों से कुछ इधर उधर लगता है जल्द ही उसे भी पढ़ लूँगा अब आगे के किस्तों का इंतज़ार बेसब्री से रहेगा....सुंदर कहानी के लिए धन्यवाद

arvind ने कहा…

रोचकता बनी है,आगे की प्रतीक्षा है.

गौतम राजरिशी ने कहा…

कब से सोच रहा था कि पूजा की इस जीवन-यात्रा पर फिर से निकलूँ...आज एकदम फुरसत से आया हूँ।

पिछले कुछ किस्तें पढ़ीं तो अब ढ़र्रे पर आ गया हूँ।

गौरव और उसके बीच बढ़ती दूरी और गलतफहमी आगे कुछ और बढ़ने वाली है अंदाजा लगा सकता हूँ। जूली की बेवकूफी पे चिढ़ भी हुई...