सोमवार, 30 जुलाई 2012

दयाकी दृष्टी सदाही रखना.....1(Kahani)


शीघ्र सवेरे कुछ साढ़े चार बजे,आशाकी आँखे इस तरह खुल जाती मानो किसीने अलार्म लगाके उसे जगाया हो। झट-से आँखों पे पानी छिड़क वो छत पे दौड़ती और सूर्योदय होनेका इंतज़ार करते हुए प्राणायाम भी करती। फिर नीचे अपनी छोटी-सी बगियामे आती। कोनेमेकी हिना ,बाज़ू मे जास्वंदी,चांदनी,मोतियाकी क्यारी, गेट के कमानपे चढी जूहीकी बेलें,उन्हीमे लिपटी हुई मधुमालती। हरीभरी बगिया। लोग पूछते, क्या डालती हो इन पौधों मे ? हमारे तो इतने अच्छे नही होते? प्यार! वो मुस्कुराके कहती।

हौले,हौले चिडियांचूँ,चूँ करने लगती।पेडों परके पत्तों की शबनम कोमल किरनोमे चमकने लगती! पँछी इस टहनी परसे उस टहनी पर फुदकने लगते। बगियाकी बाड्मे एक बुलबुलने छोटा -सा घोंसला बनाके अंडे दिए थे। वो रोज़ दूरहीसे झाँक कर उसमे देखती। खुदही क्यारियोंमेकी घाँस फूँस निकालती। फिर झट अन्दर भागती। अपनेको और कितने काम निपटाने हैं,इसका उसे होश आता।

नहा धोकर बच्चों तथा पतीके लिए चाय नाश्ता बनाती। पती बैंक मे नौकरी करता था। वो स्वयम शिक्षिका। बच्चे डॉक्टरी की पढाई मे लगे हुए। कैसे दिन निकल शादी होकर आयी थी तब वो केवल बारहवी पास थी बाप शराबी था। माँ ने कैसे मेहनत कर के उसे पाला पोसा था। तब पती गराज मे नौकरी करता था।

शादी के बाद झोपड़ पट्टी मे रहने आयी। पड़ोस की भाभी ने एक हिन्दी माध्यम के स्कूलमे झाडू आदि करने वाली बाई की नौकरी दिलवा थी । बादमे उसी स्कूलकी मुख्याध्यापिकाके घर वो कपडे तथा बर्तन का काम भी कर ने लगी। पढ़ने का उसे शौक था। उसे उन्हों ने बाहर से बी ए करने की सलाह दी। वो अपने पतीके भी पीछे लग गयी। खाली समयमे पढ़ लो,पदवीधर बन जाओ,बाद मे बैंक की परीक्षाएँ देना,फायदेमे रहोगे।
धीरे,धीरे बात उसकी भी समझ मे आयी। कितनी मेहनत की थी दोनो ने! पढाई होकर,ठीक-से नौकरी लगनेतक बच्चों को जन्म न देनेका निर्णय लिया था दोनोने। पती को बैंक मे नौकरी लगी तब वो कितनी खुश हुई थी !

क्रमश:

मेरा कथासंग्रह,"नीले पीले फूल" इस किताब से ये कहानी ली है।


11 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

suruat ho chuki, aage dekhte hani...

ali ने कहा…

आपकी कहानी क्रमशः है तो फिर हमारा कमेन्ट भी क्रमशः रहेगा ! कथा पूरी हो जाये तो फिर प्रतिक्रिया दें :)

Ramakant Singh ने कहा…

अगले भाग की प्रतीक्षा बड़ी बेसब्री से

Ramakant Singh ने कहा…

अगले भाग की प्रतीक्षा बड़ी बेसब्री से

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

अच्छी लग रही है कहनी.... आगे का इंतजार

शालिनी कौशिक ने कहा…

बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति आभार. मोहपाश को छोड़ सही राह अपनाएं . रफ़्तार ज़िन्दगी में सदा चलके पाएंगे .

शालिनी कौशिक ने कहा…

बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति आभार. मोहपाश को छोड़ सही राह अपनाएं . रफ़्तार ज़िन्दगी में सदा चलके पाएंगे .

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह ...... कहानी पोस्ट हुई है, मैं तो देख ही नहीं पाई :)

राजेश सिंह ने कहा…

दोनों लघु कथाएं मन को छू गई अब तो पूरा संग्रह पढना ही पड़ेगा

आशा जोगळेकर ने कहा…

आप की लेखनी धारा प्रवाह बहती है । बहुत दिनों बाद आई हूँ तो देखा कहानी के चार भाग हो चुके हैं सोचा शुरू से ही पढती हूँ ।

pradeep kumar ने कहा…

wah ji wah ! main bhi ajeeb hoon . pataa nahi kyon pahle saatwaan hissa padh gayaa aur wo bhi ek saans me . ab shuru se padhne me mazaa aayega. sahi tippani to poora padh kar hi doonga ...