रविवार, 15 जुलाई 2012

कहानी किस किसकी?

पता नहीं मैंने कौनसा बटन दबा दिया कि , इसके पहले की पोस्ट गायब हो गयी! खैर।..

आज मैंने आमिर खान का 'सत्यमेव जयते' ये व्रुद्धों की समस्यायों पे आधारित कार्यक्रम देखा... बड़े दिनों से एक परिवार के बारे में लिखना चाह रही थी पर  उसे लिखने की चाहत खो चुकी थी।...वो चाहत फिर से जागृत हो गयी।

बात मेरे नैहर के एक परिवार की है...महाराष्ट्रियन परिवार...मेरी पाठशाला उस परिवार के पास में थी....दोपहरक का भोजन खाने,मई अपना टिफिन लेके उनके घर जाती थी ....उस परिवार की मुखिया एक 50 वर्षीय बेवा महिला थी...मुझे अचार आदि परोस देतीं....उन्हें मै  'आजी' मतलब दादी कहके बुलाती... मेरी दादी के साथ उनकी अच्छी खासी पटती थी। दादी उन्हें काफी सारे हाथ के हुनर सिखाये। वो महिला उन  हुनर के सहारे थोड़ा बहुत कमा भी लेती थीं।

उनके चार बेटे थे।उनके पति फ़ौज में डॉक्टर थे।सबसे छोटा बेटा जब 2 साल का था,तब उनका देहांत हो गया।इस 4 जमात पास महिला ने अपने बच्चों को बड़ा किया....पढाया लिखाया...उनका घर एक दो मंज़िले इमारत  में था। पहले माले पे...पैखाना नीचे उतर के था.... पूरी इमारत के लिए केवल एक ....!

समय आगे बढ़ता गया...बेटे बड़े होते गए।...पढ़े लिखे.... दो बेटे आयुर्वेदिक डॉक्टर बने....एक बेटे ने अपने पिता  की practice संभाली।( वो  की जगह को इस महिलाने छोड़ा नहीं था). उसका ब्याह उस महिला ने अपने भाई के बेटी के साथ कर दिया..उसे भी दो बेटे हुए ..... मै  अन्य  बेटों के परिवार की बारीकियों में नहीं जाउंगी ,क्योंकि इसी बेटे की पत्नी के बारेमे लिखना चाहती हूँ ...उस वृद्धा के अलावा ...

मेरी दादी अपनी सहेली को हमेशा कहती रहती की,अपनी जायदाद,अपने जीते जी किसी के नाम नहीं करना ....लेकिन उसने ये सलाह नहीं मानी .....बँटवारा कर दिया .....और नतीजा ये की,अंत में चारों ने किनारा कर लिया! वो बेचारी कभी किसी बेटे के घर तो कभी किसी के घर रहतीं ....सभी की गृहस्थी में अपना हाथ बंटाती ....खाना बनाती,सफाई करतीं...बचे हुए समय कढ़ाई बुनाई करतीं ... कुछ साल तो ये सिलसिला थी रहा।लेकिन धीरे,धीरे समय बदलता गया ..बेटों को बूढ़ीमाँ अखरने  लगी।...उनका मिज़ाज भी ज़रा तेज़ था ..पर वो बहू बेटों का ख़याल भी बहुत करतीं .....अपने पोते  पोतियों की देखभाल कर लेतीं..

और एक दिन वो भी आया जब सबसे छोटे बेटे ने उन्हें घरसे धक्का मार निकाल दिया! वो धाम से जा गिरी .....हड्डियाँ टूट गयीं।...अस्पताल में दाखिल कराया गया.....मेरा तो तबतक ब्याह हो चुका था। बाद में उन्हें उस बेटे के घर लाया गया जिसकी पत्नी उनके अपने सगे भाई की बेटी थी।

अब ये वृद्ध अधिकतर बीमार रहने लगीं।...एक बार मई उन्हें मिलने गयी तो बेचारी बिस्तर में पड़े,पड़े बहुत रोने लगीं।...बोलीं," देख मेरा क्या हाल हो गया है! ईश्वर  मुझे उठा क्यों नहीं लेता? मेरा कौनसा इम्तेहान ले रहा है? मै  सीढियाँ  उतरके पैखाने में भी नहीं जा सकती.... "
मै  क्या कहती?उन्हें अपने साथ भी नहीं ले जा सकती ....हम लोग खुद ही बंजारों की-सी ज़िंदगी जी रहे थे ....ना घर का पता रहता न दरका...उनकी देख भाल कैसे करती....? और एक दिन ख़बर  मिली की वो चल बसीं .....उन्हें दर्द से मुक्ती तो मिली पर कई अनसुलझे  सवालात हम सभी के मन में घिर गए।

समय बीतता रहा ....जिस पुत्र ने  अपने पिता  का दवाखाना सँभाला  था ....जिसकी पत्नी उसकी खुद की मुमेरी बहन थी .... उसके बेटों का भी ब्याह हो गया ... बड़े वाला पुणे  में नौकरी करने लगा और छोटे वाला ,जिसने homeopathy पढी( पर सुना  है वो भी पूरी नहीं),अपने पिता  के साथ काम करने लगा ....पिता  की शोहरत बहुत थी ....उसे अपने पिता की शोहरत का लाभ हुआ और इस बेटे को उस के पिता की शोहरत का!

मेक बार मई अपने मायके गयी हुई थी और अचानक खबर सूनी की,उसके पिता  का,जो हमारे परिवार के भी डॉक्टर रहे थे,अचानक निधन हो गया! हम सभी को बहुत दुःख हुआ....उनकी बहू भी homeopath थी।....उन्ही के दवाखाने में अपनी practice करती थी।...मै  एक दो बार जब उससे मुखातिब हुई थी,तो मुझे वो बेहद सडियल लगी थी....

फिर सुननेमे आया ....अपनी आँखों से देखा भी,की इस बहू ने और बेटे ने अपनी माँ के साथ बहुत बुरा सुलूक शुरू किया.. हम लोग भाई बहन उन्हें भाभी कह के बुलाया करते....अब दरबदर भटकने की भाभी की बारी आ गयी! समय ने एक पूरा चक्र घुमा लिया था! मेरी दादी हमेशा कहा करतीं," रानी के साथ भी वही होगा,जो उसने उसकी सास के साथ किया।..देखते रहना!"

कितना सत्य था दादी के वचन में ....लेकिन भाभी ने तो अपने बच्चों के साथ ना अपनी बहुओं के साथ कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं की थी।...उनके साथ ऐसा क्यों? हमारे मन में सवाल ज़रूर था....जवाब ये की उनके अपने पति  ने अपने मृत्यु पत्र  में उनके लिए कोई सुविधा नहीं की थी! जबकि बेटे को एक घर बनवा दिया था ....उनका लड़का उस घर में रहने भी नहीं गया,क्योंकि दवाखाना इस घर के नीचे था।भाभी के नाम कोई जमा पूँजी  नहीं थी ....उनके पति को ये विश्वास था कि ,दो दो कमाऊ बेटे हैं,पोते पोती हैं,जिनकी देखभाल उनकी दादी करती है तो उसे कमी किस बात की होगी?वो ये बात भूल गए कि ,स्वयं उनकी माँ के साथ क्या हुआ था ....!

मेरे बेटे के ब्याह में भाभी आनेवालीं थीं। हमने बहुत राह देखी लेकिन वो नहीं आयीं ....उनके पास तो मोबाईल फोन भी नहीं था,की,हम पता कर पाते  ! सुना  था कि  लैंड लाइन  पे उन्हें बात ही नहीं करने दी जाती है....जब बेटा बहू नीचे अपने दवाखाने  में जाते तो फोन को ताला  लगा के जाते!

कुछ दिनों बाद पता चला ,भाभी मेरे बेटे के ब्याह के लिए जिस दिन हमारे शहर से निकलने वालीं थीं, उन्हें उनकी ईमारत के सामने,किसी स्कूटर वाले ने दे गिराया  .....उनकी कई हड्डियाँ  टूट गयीं .....आनन् फानन में उन्हें पुणे लाया गया और अस्पताल में दाखिल करने से पूर्व उनकी फीस वो खुद देंगी .. किसी बेटे की ज़िम्मेदारी नहीं रहेगी, ये बात भी तय कर ली गयी ! सुनके मेरा दिल दहल गया! बाद में उन्हें उनके बड़े बेटे ने, जो पुणे में कार्यरत था, वापस उन्हें उसी शहर भेज दिया जहाँ पैखाने जाने के लिए उन्हें सीढ़ियाँ  उतरनी पडतीं! इस 'सुपुत्र' को भी उसके पिता ने घर ले दिया था! दोनों बेटों के पास अपने माँ बाप की बदौलत अपने अपने घर थे लेकिन माँ के लिए जगह नहीं थी! जगह उनके मन में नहीं थी ....या है!भाभी ने बाद में अपना सारा ज़ेवर ,जो उन्हें अपने पिता से मिला था,बेच दिया ....इस बात पे भी उन के बेटों ने बहुत नाराज़गी  व्यक्त की ! भाभी ने कहा," आख़िर  मै  अपनी दावा दारु के .....अपनी देखभाल के पैसे कहाँ से लाती? मै  तो अब ठीक से चल भी नही  पाती !"

भाभी आज भी अपने दो बेटों के बीछ बाँट के रहती हैं ....बेचारी इतना सब कष्ट उठा के भी ज़िंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं करतीं ....कहती हैं, "मेरे नसीब में यही लिखा हुआ था ...किसी से क्या शिकायत करूँ? उनका बैंक का सारा काम मेरे भाई का बेटा देखता है ....उन्हें बैंकिंग के बारे में कुछ पता नहीं ....उसने उनके लिए शेयर के द्वारा आमदनी हो,इस बात की सुविधा भी कर दी ...लेकिन सोचती हूँ,ऐसा कब तक चलेगा? भाभी की ज़िंदगी की क्या यही कहानी है? कोई उपाय नहीं?

19 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

सही कह रही हैं आप .बहुत सुन्दर भावात्मक प्रस्तुति .आभार. अपराध तो अपराध है और कुछ नहीं ...

शारदा अरोरा ने कहा…

aapka kahani lekhan bahut dilchasp hota hai ...to the point ..n ek lafz kam n ek jyada ..aur ye kya ...kshma prarthna post par to kuchh likha hua hi nahi hai...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर...!

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

सच है

कहानी घर घर की

Ramakant Singh ने कहा…

सही कहानी कभी कभी जीवन ऐसे भी रंग दिखा जाता है

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

this is truth..

Sriprakash Dimri ने कहा…

बेहद मार्मिक समाज में आम बात सी हो गयी है
एक पुरानी कहावत है चूल्हे में जलती लकड़ी में आग पीछे की तरफ ही आती है जैसा ब्यवहार हम अपने माता पिता बुजर्गों के साथ करेंगे उसका अनुसरण बच्चे करेंगे.....
आभार एवं शुभ कामनाएं !!!

Pravin Dubey ने कहा…

आमिर का शो वाकई काबिले तारीफ है

ali ने कहा…

इस कहानी को पढ़कर बेहद अफ़सोस हुआ पर क्या किया जाये समाज का जो ऐसा होने देता है! रिश्तों में पैसे ने बड़ी जगह बना डाली है सो यही सब देखा जाएगा आगे भी !

मनोज कुमार ने कहा…

यह एक ऐसा कटु सत्य है जिससे आए दिन हमारा वास्ता पड़ता रहता है। ऐसी ज़िन्दगियां देख के लगता है मानों धरती से मानवता का नाश होता जा रहा है।

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

aisi baaten padh kar ghabrahat si hone lagti hai ,,jis ke upar guzar rahi ho us ka kya hal hota hoga

aur ap ka lekhan to bilkul chitr kheench detya hai

Kailash Sharma ने कहा…

आज यह हालात हर उस बुज़ुर्ग का है जो आर्थिक रूप से आत्म निर्भर नहीं है...दुःख होता है आज की पीढ़ी का यह व्यवहार देख कर..

vinay ने कहा…

समझ नहीं आता समाज का नैतिक पतन क्यों होता जा रहा है ।

रचना दीक्षित ने कहा…

पतन का यह गर्त कहाँ तक जायेगा पता नहीं. सर शर्म से झुक जाता है ऐसे प्रकरण देखकर सुनकर.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

:( मन दुखी हो गया।

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bahut marmik ghatna....dil aisi logo ke liye koi dua nahi karta jo apne bado ko dar-dar ki thokre khane k liye chhod dete hain.

mark rai ने कहा…

aisi ghatnayen to har jagah hoti hi hai...par uspar log dhyaan nahi dete ...hamaari samvedanhinta itni badh gayi hai ...lagta hai ki kuch hone ka intzaar kar rahe hai...

राजेश सिंह ने कहा…

आँखे खोल देने वाला पोस्ट

sm ने कहा…

बहुत ही सुंदर