शनिवार, 15 दिसंबर 2012

शमा बुझनेको है

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
मैंने खुदको जला लिया,
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
पर सुना, चंद राह्गीरोंको
थोड़ा-सा हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

वैसे तो इस ब्लॉग पे मै  अपनी पद्य रचनाएँ नही  डालती,लेकिन आज डाल  रही हूँ।वो भी एक पुरानी रचना।


6 टिप्‍पणियां:

Ramakant Singh ने कहा…

अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

सन्देश देती रचना

रचना दीक्षित ने कहा…

क्षमा जी बहुत सुंदर नज़्म. पहली बार ही आपकी नज़्म से रूबरू हुई. बहुत बढ़िया और भावपूर्ण.

sushma 'आहुति' ने कहा…

behtreen....

मैं और मेरा परिवेश ने कहा…

आपकी हर कविता गहरे भावों से भरी होती है और आपको जानने के बारे में हमारी राहें अधिक रौशन करती हैं।

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सुंदर नज़्म. बेमिसाल

शारदा अरोरा ने कहा…

नज्म सुन्दर है ...मगर ये कह रही है ...कोई जान से जाता है तभी क्या उजाला होता है ...