सोमवार, 10 अगस्त 2009

बिखरे सितारे ! ५) और दिन गुज़रते रहे...

जो जीवन अनगिनत घटनाओं से भरा हुआ हो...उन लम्हों को कैसे चुनूँ?? एक माला पिरोना चाहती हूँ, उनमे कौन से मोती शामिल करूँ..कौनसे छोड़ दूँ...?

तूफानों की शुरुआत तो शायद उस नन्हीं जान के इस दुनिया में आने के पहलेही हो चुकी थी..अब तक तो वह अपनी माँ की बाहोँ में..अपने दादा दादी की छत्र में महफूज़ थी...उसे इन तूफानों का मतलब तो समझ नही आता था..थपेडे चाहे लगते हों...

कोई, किसी दूसरे को, चाहे वो अपनी औलाद ही क्यों न हो, कितना महफूज़ रख सकता है...और कबतक? ये सवाल मेरे मनमे जब जब उभरेगा, शायद पाठकों के मन में भी उभरेगा...

तमन्ना की, ..जैसे कि, उसके दादा-दादी, माँ पिता कभी बुलाया करते, उसी गाँव में, पढाई शुरू कर दी गयी..एक मास्टर जी गाँव से घर आते और उसे प्रादेशिक भाषा में पढाते......तीन साल के बाद ये पढाई शुरू हुई..जब पूजा-तमन्ना, अपने माँ पिता के साथ निज़ामाबाद से लौट आयी...

उसे तो वो रटना रटाना क़तई नही भाता..लेकिन और कोई तरीक़ा तो नही था...फिर जब वो छ: सालकी हुई तो पास के एक छोटे-से शहर की पाठशाला में उसका दाखिला कराया गया..अन्य बच्चे जैसे, पाठशाला के पहले कुछ दिन रोते हैं, येभी खूब रोई...उसके दादा या पिता, स्कूल के बाद उसे लेने आते..गर देर हो जाती,तो इसका दिल बैठ ही जाता..उसके गुरूजी बड़े ही अच्छे थे..बेचारे उसको खूब मानते रहते..

अबतक एक और बच्ची परिवार में आ गयी थी..उसकी छोटी बहन...वह भी दादा दादी की बेहद लाडली थी..पर पूजा की बात ही उन दिनों अलग थी..उस परिवारकी पहली पोती...! शैतानी भी कर जाती...अपनी बहन के आगे,वो स्वयं को खूब बड़ा समझती....!

जब वह चौथे वर्ग में आ गयी,तो वहाँ उसके गुरूजी बड़े ही बदमिज़ाज निकले...उन्हें बच्चों को जाती परसे पुकारने की आदत थी...इतनी छोटी थी पूजा..लेकिन उसको उन दिनों भी ये बात बड़ी ही अखरती...

एक दिन गुरूजी ने एकेक बच्चे को खड़ा करके बताना शुरू किया," हाँ..तो तुम कल दोपहर में सड़क पे क्या कर रहे थे? मैंने देखा तुम्हें!"
वो बच्चा,अपनी गर्दन लटकाए खड़ा रहा..किसी बच्चे ने ये नही कहा कि, मै तो वहाँ था ही नही या थी ही नही...पूजा को भी खड़ा किया गया..और गुरूजी बोले," हाँ..तो तुम्हें मैंने तुम्हारे दादा के साथ दुकान में जाते देखा..तुम क्यों उनको परेशान कर रही थी? अपने बड़ों ऐसे परेशान करते हैं?"
सारा वर्ग ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा..अन्य बच्चों को डांट मिल रही देख,अक्सर बच्चे मज़ा लेते हैं...! पूजा को बेहद अपमानित महसूस हुआ...!

वह हैरान भी हो गयी....! उसने कहा,
"लेकिन कल तो मै पूरा दिन घर पे थी.....कल तो इतवार था...! मै तो कहीँ नही गयी..और दुकान में तो मुझे दादा ले जाते हैं..मै नही कहती ले जाने को...!"

बस..इतना कहना था,कि, गुरूजी उसपे बरस पड़े," मै झूठ बोल रहा हूँ? तू सही बोल रही है? ये मजाल तेरी....? तुझे घर पे ऐसा सिखाया है? कि गुरूजी का अपमान करे..?चल,निकल वर्ग के बाहर...जा खड़ी हो जा, उस खंभे के पास..धूप में.."

अप्रैल माह की चिलचिलाती धूप थी..और पूजा, अपने आँसू चुपचाप बहाते हुए, धूप में जाके खड़ी हो गयी...उसे दोपहर का खाना खाने की इजाज़त भी नही मिली...उसे अपने तीसरे वर्ग के गुरूजी बड़े याद आए...वो कितना प्यार से समझाया करते थे..जब वो कुछ गलती कर जाती...और पूरा वर्ग उसपे हँस पड़ता,तो गुरूजी पूरे वर्ग को डांट के चुप करते..वैसे भी, पूजा सुंदर थी, नाज़ुक थी..और कई लड़कियाँ उसपे जलती भी थीं..

बच्ची ने घर जाके यह बात अपने दादा को बताई..दादा तो सत्य के पुजारी थे..उन्हों ने तुंरत इस घटना का ब्योरा मुख्याध्यापक को दे दिया...उसके बात तो गुरूजी ने उसपे और अधिक खुन्नस पकड़ ली...उसके दिमाग़ से बरसों ये बात निकल नही पायी,कि, आख़िर वो गुरूजी उससे झूठ क्यों बुलवाना चाहते थे?

क्रमश:

आगे,आगे, पूजा की माँ,मासूमा, के बारे में बातेँ होंगी..कि उनके बचपन का, पूजाके बचपन पे , जीवन पे कैसे असर हुआ...

12 टिप्‍पणियां:

'अदा' ने कहा…

जी हां आपने सही कहा, गुरुओ में ये बिमारी है, गलत होते हैं लेकिन स्वीकारना, वो भी छात्र के सामने असंभव...
मुझे याद है मेरे बेटे ने dictation में pencil लिखा था teacher ने उसे pencile कर दिया. और नंबर भी काट दिया, मेरे बेटे ने जब आपत्ति जताई तो उसे ही सजा मिली थी.....ये तो काफी नयी बात है पुराने ज़माने में तो बात ही कुछ और थी.....
गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूँ पाँव
शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
बहुत अच्छा लिखा है...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

AAJ TO AISAA JYAADATAR NAHI HOTA......HAA....PURAANE SAMAY MEIN AISAA JAROOR HOTA THA JAB TEACHER BINAA BAAT KE BHI SAJAA DETE THE BAS APNI BAAT MANVAANE KI LIYE....

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

bahut he gehraayi waali baat kahi hai aapne...
acha laga padh kar...
ati uttam...
carry on ji...
congrats....

manoj tiwari ने कहा…

aap bahut accha likhte ho jaise taslima nassrine

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

shayad pahali baar aaya hoon aapke blog par par bahut achha laga..
aap ki yah kahani bade sundar bhav jagati hai...

nirantarta banaye rakhe..dhanywaad

ज्योति सिंह ने कहा…

sachmuch bahut sundar, man ram gaya isme .guru stya aur gyan ki rah dikhate hai ,aesi harkat se apni ijjat kho jate .bachche chup bhi rahe magar chhavi to bigar jati hai .

योगेश स्वप्न ने कहा…

sunder bhavpurn kahani.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

हकीकत भी ,कहानी भी बोले तो जीवनी भी

जब हम पढ़ते थे तब हमें मुर्गा बनाया जाता था ,बेंच पर या धुप में खडा किया जाता था कान उमेठे जाते थी खजूर की संटी और रोल की पिटाई से हाथ लाल हो जाते थे |antr इतना था की हम घर walon को यह baten नहीं batate थे कभी batayen भी ghaar वाले dhyan ही नहीं देते थे कहते थे galtee teree ही hogee में बात\ sn 1955 की कर रहा हूँ उस wqt तो आपका janm भी n हुआ होगा

गर्दूं-गाफिल ने कहा…
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गर्दूं-गाफिल ने कहा…
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Manoj Bharti ने कहा…

स्कूल के दिन याद गए । अच्छी अभिव्यक्ति । आज भी स्कूलों में आएदिन ऐसी घटनाएँ पढ़ने को मिल जाती हैं ।

अच्छा लिखा है ।

गौतम राजरिशी ने कहा…

पूजा-तमन्ना के संग-संग मैं भी स्कूल पहुँच गया अपने...और तो अब तमन्ना की छोटी बहन भी आ गयी? उसका नाम, शायद आगे आयेगा...