शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

bikhare sitare-Bikharne lage saare taare-21

( पिछली कड़ी में बताया था, की, माँ तथा पूजा किशोर के परिवार   से  मिलने दिल्ली गए..और वहाँ धर्मांतर सवाल उठाया गया, जो माँ को मंज़ूर नही था, और पूजा भी उसका गाम्भीर्य  देख परेशान हो उठी...अब आगे पढें..)

आज ,मै पूजा, खुद आप से रु-b -रु हो रही हूँ...जिन हालातों से गुज़री...जिस मोड़ पे ये दास्ताँ हैं...उस गहराई तक, मुझे ही जाना होगा....अपने मन को टटोल  खंगाल के लिखना होगा...
मेरे प्रीतम ने जब पहली बार प्यार का इज़हार किया तब एक कविता लिखी थी, जिसे दोहरा रही हूँ...और उसका अंतिम चरण आज बयाँ करती हूँ...

सूरज की किरने ताने में,
चांदनी के तार बानेमे,
इक चादर बुनी सपनों में,
फूल भी जड़े,तारे भी टाँके,
क़त्रये शबनम नमी के लिए,
कुछ सुर्ख टुकड़े भरे,
बादलों के, उष्मा के लिए,
कुछ रंग ऊषा ने दिए,
चादर बुनी साजन के लिए...

पहली फुहार के गंध जिस में,
साथ संदली सुगंध उसमे,
काढे कई नाम जिस पे,
जिन्हें पुकारा मनही मनमे,
कैसे थे लम्हें इंतज़ार के?
बयाने दास्ताँ थी  आँखें,
खामोशी लिखी लबों पे,
चादर बुनी सपनों में,

क्यों बिखरे सितारे इसके?
क्यों उधडे ताने इसके?
कहाँ गए बाने इसके?
कैसे जोडूँ तुकडे इसके?
रंग  औ नमी, लाऊं कहाँ से?
रौशनी लाऊं किधर से?
चांदनी की ठंडक आए कैसे?
दोबारा इसे बुनूँ कैसे?

सोच, सोच के मन बिखरता जा रहा था...जब दिल्ली से माँ और मै लौटे तो दादा-दादी से आँखें चुराने का मन हो रहा था...क्या बताती उन से? हादसे वाली बात तो कहने से रही..बाकी बातें बताते हुए माँ को सुन लिया...

मै घंटों घरके पिछवाडे की सीढियों  पे बैठी रहती...या फिर नीम पे लगे झूले पे झूलती रहती..जानती थी की, मेरे घरवालों से मेरा दर्द देखा नही जा रहा था...दादा कभी चुपके-से  आते और मेरे सर पे हाथ फेर जाते..मन भी और जीवन भी किसी झूले की तरह झूल रहा था...मेरा वर्तमान ज़्यादा दुःख दाई था या मेरा अनागत? क्या लिखा गया था  विधी के विधान में?या ये विधान मैंने लिखना था? मेरे भाग्य में क्या अटल था?

'उन्हें' मन ही मन कई ख़त लिख डाले...कागज़ पे भी लिखे..और फाड़ के फ़ेंक दिए...मेरे किस जवाब में सभी की भलाई थी? गरिमा थी? मेरा उत्तर दायित्व क्या था? मेरी अपनी अस्मिता...उसका क्या?

एक उत्तर धीरे, धीरे स्पष्ट होने लगा....धर्मान्तरण के लिए नकार..चाहे जो हो....मै हर वो तौर तरीके अपना लेने के वास्ते  तैयार थी, लेकिन, कागजात पे धर्मांतर? एक गांधीवादी परिवार में जनम लेके? मै तो ना हिन्दू थी ना मुस्लिम...थी तो केवल एक हिन्दुस्तानी..उसपे कैसे आँच आने देती?

मैंने तथा माँ ने 'उन्हें' तथा उनकी माँ को अलग अलग ख़त लिखे...जिस में स्पष्ट  कर दिया की , ब्याह के लिए ये शर्त मंज़ूर नही..सब रीती रिवाज निबाह लूँगी...लेकिन ब्याह के बाद..हर काम ,हर सेवा के लिए  तैयार हूँ...लेकिन ये शर्त मंज़ूर नही..और खतो किताबत एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया...खतों के इंतज़ार का...कई बार ख़त पहुँच ने में एक माह तक लगता...पोस्टल खाते की स्ट्राइक भी हुई और रेल की भी...हमने शहर में रहने वाले हमारे फॅमिली डॉक्टर का पता दे रखा.. वरना शहर से गाँव ख़त आने में २/३ दिन और लग जाते...

प्यार की डगर कितनी कठिन है, मन समझने लगा...हे ईश्वर...! ए मेरे अल्लाह!  ये दर्द किसी  को नसीब ना हो..किसी के जीवन में ऐसा दौर ना आए...ऐसी कठिन स्थिती...अपना दर्द सह लूँ  लेकिन मेरे अपनों का???जिन्हें मै जान से प्यारी थी उनका...जिनकी आँखों का सितारा थी...जिनकी तमन्ना थी , उनका? नही नही....

क्रमश:

20 टिप्‍पणियां:

raj ने कहा…

क्यों बिखरे सितारे इसके?
क्यों उधडे ताने इसके?
कहाँ गए बाने इसके?
कैसे जोडूँ तुकडे इसके?
रंग औ नमी, लाऊं कहाँ से?
रौशनी लाऊं किधर से?
चांदनी की ठंडक आए कैसे?
दोबारा इसे बुनूँ कैसे?...esliye apke blog ka naam bikhre sitare hai.....very toching story...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सूरज की किरने ताने में,
चांदनी के तार बानेमे,
इक चादर बुनी सपनों में,
फूल भी जड़े,तारे भी टाँके,
क़त्रये शबनम नमी के लिए,
कुछ सुर्ख टुकड़े भरे,
बादलों के, उष्मा के लिए,
कुछ रंग ऊषा ने दिए,
चादर बुनी साजन के लिए

कविता जैसे लहू बन के नसों में उतर गई है..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

संस्मरण के साथ-साथ कविता भी सुन्दर है।

महफूज़ अली ने कहा…

sansmaran ke saath kavita bhi bahut sunder hai...... bahut hi touchy sansmaran hai....

Basanta ने कहा…

I admire your decision of refusing to convert!
Great Sansmaran, waiting to read the next part.

Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर कविता लिखा है आपने ! मेरे इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कविता बहोत ही गहरे एहसास लिए है ......... अओके संस्मरण ने एक नया मोड़ ले लिया है ......... अपने आप से होती जुस्तुजू की दास्ताँ है ........... आगे की प्रत्किक्षा रहेगी ......

गौतम राजरिशी ने कहा…

हैलो पूजा जी, कई दिनों से इस दास्तान के साथ जुड़ा हुआ हूँ...और अब अचानक ये मोड़।

अगली कड़ी में क्या होगा, बेसब्री है।

शोभना चौरे ने कहा…

ab jaldi se agli kadi ka intjar

R. Ramesh ने कहा…

hey friend thanks 4 passing by yar..yours blogs r gr8..how i wish i could read hindi faster..i can speak naturally becz i spend 2 dacades in amchi mumbai..but reading..hey splash some english words yar..plzzzz...take care best wishes

गौतम राजरिशी ने कहा…

पूजा जी को नमस्कार,
आपका हमसे मुखातिब होना सुखद आश्चर्य था। हौसलाअफ़जाई का शुक्रिया। वैसे क्षमा जी हमसे वादा कर चुकी हैं कि हम जब भी पुणे आयेंगे, वो हमें आपसे मिलवायेंगी। तब तक तो ये कहानी भी पूरी हो जायेगी...और मैं यूं ही सोचने लगा कि इस कहानी के बाद इस ब्लौग का क्या होगा?

अरे हाँ, आपने पूछा तो बता देता हूं कि हास्पिटल से डिस्चार्ज हो गया हूं। अभी अपने बेस हेडक्वार्टर में हूं और तीन दिन बाद घर जा रहा हूं।

आपके सवाल ने कहा…

har khyaal ka jawaab hai humare paas.... just visit http://yourquestionanswer.blogspot.com/

अर्शिया ने कहा…

आपकी शैली की प्रवाहता मन को बांध लेती है। यह चर्चा चलाए रखें, हमें अच्छालगा।
--------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक।
चार्वाक: जिसे धर्मराज के सामने पीट-पीट कर मार डाला गया।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

प्यार का दर्द सचमुच बहुत कठिन होता है बेहद संवेदनशील कहानी ..पूजा के हालत इस कदर होना स्वाभाविक है क्योंकि आदमी जब किसी को चाहे और वो किसी प्रकार दूर होता प्रतीत हो तो तकलीफ़ तो होती ही है..और ऐसे में दादा दादी का भी इस प्रकार प्यार करना और सहारा देना कुछ पल के लिए एक सुखद एहसास देता है..बढ़िया कहानी आगे के कड़ियों का इंतज़ार है..

Dipak 'Mashal' ने कहा…

Is qalam ke kamaal ko bhala main kya naam doon? adbhut ya manmohak....
Jai Hind

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

क्ष्मा जी
मोहब्बत की हर किताब के हर हर्फ़ पर
खिलखिलाती खनकती हंसी के साथ
आंसुओं की नमी भी रहती है
मोहब्बत वो नदी है
जो चाँद के पहाड़ से
दूधिया उतरती है
और जिंदगी की अंजुरी में
भरते ही हो जाती है
बे रंग पानी
है तो ये सरासर बे मानी
पर क्या करे कोई
आँख हर बार अपनी बेबसी पे रोई


बहुत ही सुन्दर ढग से कही जा रही है एक दास्ताँ एक हकीकत
बस यही गम है की गम अपने भी रूबरू होने लगते हैं
माजी से बड़ी मुश्किल में छूटा था साथ

ज्योति सिंह ने कहा…

सूरज की किरने ताने में,
चांदनी के तार बानेमे,
इक चादर बुनी सपनों में,
फूल भी जड़े,तारे भी टाँके,
क़त्रये शबनम नमी के लिए,
कुछ सुर्ख टुकड़े भरे,
बादलों के, उष्मा के लिए,
कुछ रंग ऊषा ने दिए,
चादर बुनी साजन के लिए
kitni sachchai aur gahraai bhari hai in panktiyon me aur saath me umeed me .

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत दिन से गैर हाजिर रहा हूं ,पिछला क्रम टूट गया ,अब जहां से पढ्ना बन्द किया है वहीं से दुबारा पढ कर ही कुछ निवेदन कर पाऊंगा

satish kundan ने कहा…

main to jase aapki lekhni me dub sa gaya...aap bahut achha likhti hain..ek ke bad ek post padhta hi chala gaya...abhi kuch post aapki nahi padh paya samy milne par jarur padhunga..mere blog par aapka swagat hai...

Vikas G ने कहा…

कविता और गद्य के माध्यम से एक बेहतरीन प्रस्तुति.
बहुत अच्छा.
जारी रखें.


विकास गुप्ता
E-mail: vforvictory09@gmail.com
mob. 09584233595