सोमवार, 20 अगस्त 2012

रोई आँखें मगर... 3

दादीअम्मा जब ब्याह करके अपनी ससुराल आई,तो ज्यादा अंग्रेज़ी पढी-लिखी नही थी, लेकिन दादाके साथ रहते,रहते बेहद अच्छे-से ये भाषा सीख गयीं। इतनाही नही, पूरे विश्वका इतिहास-भूगोलभी उन्होंने पढ़ डाला। हमे इतने अच्छे से इतिहास के किस्से सुनाती मानो सब कुछ उनकी आँखोंके सामने घटित हुआ हो!
उनके जैसी स्मरण शक्ती विरलाही होती है। उर्दू शेरो-शायरीभी वे मौका देख, खूब अच्छे से कर लेती। दादा-दादी मे आपसी सामंजस्य बहुत  था। वे एकदूसरे का पूरा सम्मान करते थे और एक दूसरेकी सलाह्के बिना कोई निर्णय नही लेते।

जब मैने आंतर जातीय ब्याह करनेका निर्णय लिया तो, एक दिन मेरे भावी पति  के रहते दादा ने  मुझे अपने पास लेकर सरपे हाथ फेरा और सर थपथपाया........ मानो कहना चाह रहे हों, काँटा भी ना चुभने पाये कभी, मेरी लाडली तेरे पाओंमे.... और तब मैने चुनी राह पर कितने फूल कितने काँटें होंगे,ये बात ना वो जानते थे ना मैं! फ़िर उन्होंने इनका  हाथ अपने हाथोंमे लिया और देर तक पकड़े रखा, मानो उनसे आश्वासन माँग रहे हों कि, तुम इसे हरपल नयी बहार देना........

मेरी दादी badminton और लॉन टेनिस दोनों खेलती थीं। एक उम्र के बाद उन्हें गठियाका दर्द रहने के  कारण ये सब छोड़ना पडा। मेरे ब्याह्के दो दिन पहले मैने हमारे पूरे खेतका एक चक्कर लगाया था। वहाँ उगा हर तिनका, घांसका फूल, पेड़, खेतोंमे उग रही फसलें,मैं अपने ज़हन  मे सदाके लिए अंकित कर लेना चाहती थी। लौटी तो कुछ उदास-उदास सी थी। दादीअम्माने मेरी स्थिती भांप ली। हमारे आँगन मे badminton कोर्ट बना हुआ था। मुझसे बोलीं,"चल हम दोनों एकबार badminton खेलेगे।"
उस समय उनकी उम्र कोई चुराहत्तर सालकी रही होगी। उन्होंने साडी खोंस ली, हम दोनोने racket लिए और खेलना शुरू किया। मुझे shuttlecock जैसे नज़रही नही आ रहा था। आँखोके आगे एक धुंद -सी छा गयी थी।हम दोनोने कितने गेम्स खेले मुझे याद नही, लेकिन सिर्फ़ एक बार मैं जीती थी।

उनमे दर्द सहकर खामोश रहने की  अथाह शक्ती थी। उनके ग्लौकोमा का ऑपेरशन  कराने हम पती-पत्नी उन्हें हमारी पोस्टिंग की जगाह्पे ले आए। वहाँ औषध -उपचार की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थी। दादी की उम्र तब नब्बे पार कर चुकी थी, इसलिए सर्जन्स उन्हें जनरल अनेस्थिशिया नही देना चाहते थे। केवल लोकल अनेस्थेशिया पे सर्जरी की गयी। मेरे पतीभी ऑपेरशन  थिअटर मे मौजूद थे। दादीअम्माने एक दो बार डॉक्टर से पूछा ,"और कितनी देर लगेगी?"
डॉक्टर हर बार कहते,"बस, और दस मिनिट्..."
अंत मे वो बोली,"आप तो घंटें भरसे सिर्फ़ दस मिनिट कह रहे हैं!!"

खैर, जब ऑपरेशन पूरा हुआ तो पता चला कि , लोकल अनेस्थिशिया का उनपे कतई असर नही हुआ था!सर्जन्स भी उनका लोहा मान गए। जब दूसरी आँख की सर्जरी थी तब भी वे मुझसे सिर्फ़ इतना बोली,"बेटा, इस बार जनरल अनेस्थिशिया देके सर्जरी हो सकती है क्या? पहली बार मुझे बहुत  दर्द हुआ था"!
बस, इसके अलावा उनको हुई किसी तकलीफ का उन्होंने कभी किसी से ज़िक्र नही किया।

क्रमश:

8 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

दादी के सशक्त चरित्र का चित्रण हुआ है। रोचकता बनी हुई है। अगले अंक का इंतज़ार।

शालिनी कौशिक ने कहा…

bahut achchhi thi aapki dadi.aur aapki sabhi baten bahut pyari hain.good presentation.kshma ji aap bharatiy nari v world woman bloggar association se juden hame khushi hogi. janpad nyayadheesh shamli:kairana upyukt sthan

शारदा अरोरा ने कहा…

dil ki uha poh aur dadi ka charitr bhi prabhavshali...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कमाल की हैं दादी तो.... बहुत अच्छा लग रहा है पढ़ के.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कमाल की हैं दादी तो.... बहुत अच्छा लग रहा है पढ़ के.

शालिनी कौशिक ने कहा…

YOU SHOULD GIVEN YOUR E.MAIL ID AS COMMENT ON GIVEN LINKS -
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Ramakant Singh ने कहा…

बुजुर्गों का जीवन और उनकी जीवन शैली साथ ही तब का परिवेश खानपान सब अलग था .सुन्दर संस्मरण

आशा जोगळेकर ने कहा…

पुराने लोग और उनकी बातें । गजब की सहन शक्ती थी उनकी ।सहना तो सहना और कहना भी नही । संस्मरण बढिया जा रहा है ।