शनिवार, 18 अगस्त 2012

रोयीं आँखें मगर.....

मई महीने की गरमी भरी दोपहर थी। घर से कही बाहर निकलने का तो सवाल ही नही उठता था। सोचा कुछ दराजें साफ कर लूँ । कुछ कागज़ात  ठीकसे फाइलो मे रखे जाएं तो मिलने मे सुविधा होगी।
 मैं फर्शपे बैठ गई और अपने टेबल की सबसे निचली दराज़ खोली। एक फाइलपे लेबल था,"ख़त"। उसे खोलके देखने लग गई और बस यादोंकी नदीमे हिचकोले खाने लगी।वो दिन १५ मई का था .......दादाजी का जन्म दिन....!!!

पहला ही ख़त था मेरे दादाजी का बरसों पहले लिखा हुआ!!!पीलासा....लगा,छूनेसे टूट ना जाय!!बिना तारीख देखे,पहली ही पंक्ती से समझ आया कि  ये मेरी शादीके तुरंत बाद उन्होंने अपनी लाडली पोति को लिखा था!! कितने प्यारसे कई हिदायतें दी थी!!!"खाना बनते समय हमेशा सूती साड़ी पहना करो...."!"बेटी, कुछ ना कुछ व्यायाम ज़रूर नियमसे करना....सेहेतके लिए बेहद ज़रूरी है....."!
मैंने इन और ऐसी कई अन्य  हिदायतोको बरसों टाल दिया था। पढ़ते,पढ़ते मेरी आँखें नम होती जा रही थी.....और भी उनके तथा दादीके लिखे ख़त हाथ लगे...बुढापे के कारन कांपते हाथोसे लिखे हुए, जिनमे प्यार छल-छला रहा था!! ये कैसी धरोहर अचानक मेरे हाथ लग गई,जिसे मैं ना जाने कब भुला बैठी थी!!ज़हन मे सिर्फ़ दो शब्द समा गए ..."मेरा बाबुल"..."मेरा बचपन"!!

बाबुल.....इस एक लफ्ज्मे क्या कुछ नही छुपा? विश्वास,अपनत्व,बचपना,और बचपन,किशोरावस्था और यौवन के सपने,अम्मा-बाबाका प्यार, दादा-दादीका दुलार,भाई-बेहेनके खट्टे मीठे झगडे,सहेलियों के साथ बिताये निश्चिंत दिन, खेले हुए खेल, सावनके झूले, रची हुई मेहँदी, खट्टी इमली और आम, सायकल सीखते समय गिरना, रोना, और संभालना, बीमारीमे अम्मा या दादीको अपने पास से हिलने ना देना, उनसे कई बार सुनी कहानियाँ बार-बार सुनना, लकडी के चूल्हेपे बना खाना और सिकी रोटियां, लालटेन के उजालेमे की गई पढाई, क्योंकि मेरा नैहर तो गाँव मे था...बल्कि गांवके बाहर बने एक कवेलू वाले घरमे ,जहाँ मेरे कॉलेज जानेके बाद किसी समय बिजली की सुविधा आई थी। सुबह रेहेट्की आवाज़से आँखें खुलती थी। रातमे पेडोंपे जुगनू चमकते थे और कमरोंमे भी घुस आते थे जिसकी वजहसे एक मद्धिम-सी रौशनी छाई रहती।


दादा मेरे साथ खूब खेला करते थे। वो मेरे पीछे दौड़ते और हम दोनों आँखमिचौली खेलते। मैं पेडोंपे चढ़ जाया करती और वो हार मान लेते। सायकल चलाना उन्ह्नोनेही मुझे सिखाया और बादमे कार भी।और सिखाई वक्त की पाबंदी, बडोंकी इज्ज़त करना और हमेशा सच बोलना, निडरता से सच बोलना। बाकी घरवालोने भी यही सीख दी। हम गलती  भी कर बैठते, लेकिन उसे स्वीकार लेते तो डांट नही बल्कि पीठ्पे थप-थपाहट मिलती। निडरता से सच बोलनेकी सीखपे चलना मुश्किल था। कई बार क़दम डगमगा जाते, झूठ बोलके जान बचा लेनेका मोह होता, लेकिन हमेशा दादा याद आते,उनके बोल याद आते की जब कोई इंसान मृत्युशय्या पे हो तो उसके दिलमे कोई पश्चाताप नही होना चाहिए।
 इसी बातपे मुझे बचपन की एक घटना याद आयी। हम तीनो भाई-बेहेन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से स्कूल आया जाया करते थे। एक दिन माँ ने हिदायत देके स्कूल भेजा मुझे की शामको शायद हमारी कार शहर  आयेगी। अगर एक विशिष्ट जगह् पे कार दिखे तो छोटे भाई को बस स्टेशन पे ठीक से देख लेना तथा उसे साथ लेके आना। ना जाने क्यों, उस भीड़ भरी जगह् पे मैंने बहुत ही  सरसरी तौरसे नज़र दौडाई और कारमे बैठ के घर आ गयी। माँ के पूछ्ने पे कहा कि , मैंने तो ठीकसे देखा, राजू वहाँ नही था। माँ को शंका हुई की कहीँ  बेटा किसी बुरी संगत मे तो नही पड़ गया??जब देर शाम भाई बस से घर लौटा तो माँ ने उससे सवाल किया की वो शाम को बस स्टेशन पे नही था ...कहाँ गया था??उसने बताया कि , वो तो बस स्टेशन पे ही था। माँ ने  उसे चांटा लगाया। उसने माँ से  कहा,"माँ तुम चाहो तो मुझे मारो,लेकिन मैं वहीं पे था...बल्कि मैंने दीदी को देखा भी....इससे पहले कि  मैं उनतक जाता,वो चली गयी...."।
माँ ने  मेरी तरफ़ मुखातिब होके कहा,"तुमने राजूको ठीकसे देखा था?"
मेरी निगाहें झुक गयी। मुझे अपने आपपे बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई। आज भी जब वो घटना याद आती है तो मेरी आँखें भर आती हैं।

एकबार दादा से रूठ्के मैं पैदलही स्कूल निकल पडी। तब मेरी उम्र होगी कुछ दस- ग्यारह सालकी। स्कूल तकरीबन आठ किलोमीटर दूर था। दादाजी ने अपनी सायकल उठायी और मेरे साथ-साथ चलने लगे। क़रीब दो-तीन किलोमीटर चल चुके तो एक बस आयी। बसका चालक दादाजी को जानता था। उसने मुझसे बसमे बैठने के लिए खूब मनुहार की ,लेकिन मैं थी की रोती जा रही थी,और अपनी ज़िद्पे अडी हुई थी। अन्तमे दादाजीने उसे जानेके लिए कह दिया। मैं पैदल चलकेही स्कूल पहुँची ।जब शाम मे स्कूल छूटी तो मैं बस स्टेशन के लिए निकल पडी। थोडीही दूरपे एक छोटी-सी पुलियापर दादाजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे!!दिनभर के भूके-प्यासे!!बोले,"अब तुझे बसमे बिठाके मैं सायकल से घर आऊँगा।"
 मुझे आजतक इस बातपे ग्लानी होती है....काश.....काश,मैं इतनी जिद्दी ना बनी होती....!
क्रमश:


8 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जीवन के रंग समेटे संस्मरण .....

शालिनी कौशिक ने कहा…

bachpan ki yadein hoti hi aisee hain .aapki sabhi post bhavatmak roop se bahut sashakt hoti hain.padhte padhte man kahin kho sa jata hai.nice.

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

लगातार पढ रहा हूं..
बस अगली कड़ी का इंतजार रहता है..
कुछ कहना बेमानी लगती है... अंतिम कडी का इंतजार

अली सैयद ने कहा…

दिल को छू लेने वाला संस्मरण !

Ramakant Singh ने कहा…

यही यादें हमें जीने कि प्रेरणा देते हैं

S.N SHUKLA ने कहा…


सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति, आभार.

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने की अनुकम्पा करें, आभारी होऊंगा .

भावना ने कहा…

बचपन ...प्यारा बचपन ...अगली कड़ी की प्रतीक्षा में

आशा जोगळेकर ने कहा…

बचपन और उसके सुहाने रंग कभी जिद के कभी प्यार के कभी लडाई के कभी डांट के पर याद सभी की प्यारी होती है ।