मंगलवार, 7 अगस्त 2012

दयाकी दृष्टी.सदाही रखना ! 7

बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूल मे भेजकर , अमरीका जानेकी इजाज़त देकर कोई गलती तो नही की,बार,बार उसके मनमे आने लगा। अब बहुत  देर हो चुकी थी।
उसने हताश निगाहों से मिसेस सेठना को देखा। बच्चों को उच्च  शिक्षण उपलब्ध कर देने मे उनकी कोई भी खुदगर्ज़ी नही थी । आशा ये अच्छी तरह जानती थी। मिसेस सेठना आगे आयी,उसके हाथ थामे,कंधे थपथपाए, धीरज दिया... राजू चला गया.... सात समंदर पार.... अपनी माँ  की पहुँच  से बहुत  दूर।

आशा और उसका पति  फिर एकबार अपनी झोपडी मे एकाकी जीवन जीने लगे। दिन मे स्कूल का काम, मुख्याधापिका के घर के बर्तन-कपडे,फिर खुद् के घरका काम.... उसके पति को उसके मन की दशा दिखती थी । गराजसे घर आते समय कभी कभार वो उसके लिए गजरा लाता,कभी बडे, तो कभी ब्लाऊज़ पीस।

दो साल बाद संजू भी अमरीका चला गया । आशा और उसके पती की दिनचर्या वैसीही चलती रही। कभी कभी कोई ग्राहक खुश होके उसे टिप देता तो वो आशाके लिए साडी ले आता। भगवान् की दयासे उसे कोई व्यसन नही था। एक बार बहुत  दिनों तक वो कुछ नही लाया। दीवाली पास थी। थोडी बहुत  मिठाई,नमकीन बनाते समय आशाको छोटे,छोटे राजू-संजू याद आ रहे थे। लड्डू, चकली,चेवडा,गुजिया बनाते समय कैसी ललचाई निगाहोंसे इन सब चीजों को देखते रहते, उससे चिपक कर बैठे रहते।

आँचल से आँसू पोंछते ,पोंछते वो यादों मे खो गयी थी । पती कब पीछे आके खड़ा हो गया, उसे पता भी नही चला। उसने हल्केसे आशाके हाथोंमे एक गुलाबी कागज़ की पुडिया दी तथा एक थैली पकडाई। पुडियामे सोनेका मंगलसूत्र था, थैलीमे ज़री की साडी.......!
आशा बेहद खुश हो उठी! मुद्दतों बाद उसके चेहरेपे हँसी छलकी!! वो भी उठी..... उसने एक बक्सा खोला.... उसमेसे एक थैली निकली, जिसमे अपनी तन्ख्वाह्से बचाके अपने पति के लिए खरीदे हुए कपडे थे.... टीचर्स ने समय,समय पे दी हुई टिप्स्मे से खरीदी हुई सोनेकी चेन थी.....
पतिको भी बेहद ख़ुशी हुई। एक अरसे बाद दोनो आपसमे बैठके बतियाते रहे, वो अपने ग्राह्को के बारेमे बताता रहा, वो अपने स्कूलके बारेमे बताती रही।

समय बीतता गया। बच्चे शुरुमे मिसेस सेठनाके पतेपे ख़त भेजते रहते थे। आहिस्ता,आहिस्ता खतोंकी संख्या कम होती गयी और फिर तकरीबन बंद-सी हो गयी। फ़ोन आते, माँ-बापके बारेमे पूछताछ होती। एक बार मिसेस सेठ्नाने आशाको घर बुलवाया और उसके हाथमे एक लिफाफा पकडा के कहा," आशा ये पैसे है,तेरे बच्चों ने मेरे बैंक मे तेरे लिए ट्रान्सफर किये थे। रख ले। तेरे बच्चे एहसान फरामोश नही निकलेंगे। तुझे नही भूलेंगे।"

आशा पैसे लेके घर आयी। उसने वो लिफाफा वैसाही रख दिया। बहुओं के लिए कुछ लेगी कभी सोंचके.... इसी तरह कुछ समय और बीत गया। एक दिन सहज ही मिसेस सेठना का हालचाल पूछने वो उनके घर पहुँच        गयी। मिसेस सेठना हमेशा बडे ही अपनेपन से उससे मिलती। तभी उनका फ़ोन बजा, उनकी बातों परसे आशा समझ गयी कि फ़ोन राजूका है।
कुछ समय बाद मिसेस सेठना गंभीर हो गयी और सिर्फ"हूँ,हूँ" ऐसा कुछ बोलती रही। फिर उन्होंने आशा को फ़ोन पकडाया और खुद सोफेपे बैठ गयीं......
मुद्दतों बाद आशा राजूकी आवाज़ सुननेवाली थी। "हेलो " कहते,कह्ते ही उसकी आँखें और गला दोनो ही भर आये.....और फिर वो खबर उसके कानोपे टकराई ........
राजूने शादी कर ली थी, वहीँ की एक हिन्दुस्तानी लड़कीसे........ वहीँ बसनेका निर्णय ले लिया था। वो अपनी माँ को नियमसे पैसे भेजता रहेगा..... । कुछ देर बाद आशाको सुनाई देना बंद हो गया.......
उसने फ़ोन रख दिया। सुन्न-सी होके वो खडी रह गयी। मिसेस सेठना ने उसे अपने पास बिठा लिया। उनकी आँखों मे भी आँसू थे।

"आशा ,मैं तेरी बहुत  बड़ी गुनाहगार हूँ । मैं खुद को कभी माफ़ नही कर पाऊँगी । बच्चे ऐसा बर्ताव करेंगे इसकी मुझे ज़राभी कल्पना होती तो मैं उन्हें परदेस नही भेजती," बोलते,बोलते वो उठ खडी हुई।
" राजूने सिर्फ शादीही नही की बल्की अपनी पत्नी तथा उसके घरवालोंको बताया कि उसके माँ-बाप बचपन मे ही मर चुके हैं! मुझे....मुझे कह रहा था कि मैं.....मैं इस बातमे साझेदार बनूँ!!शेम ऑन हिम!!भगवान् मुझे कभी क्षमा नही करेंगे....!ये मेरे हाथोंसे क्या हो गया?"

वो अब ज़ोर ज़ोर से रो रही थीं। चीखती जा रही थीं।आशाका सारा शरीर बधीर हो गया था। वो क्या सुन रही थी? उसके बेटेने उसे जीते जी मार दिया था??उसे अपने गरीब माँ-बापकी शर्म आती थी??और उसने सारी उम्र उसके इन्तेज़ारमे बिता दी थी? ममताका गला घोंट,घोंटके एकेक दिन काटा था!

अंतमे जब वो घर लौटनेके लिए खडी हुई तो उसकी दशा देख कर मिसेस सेठ्नाने अपनी कारसे उसे बस्तीमे छुड़वा दिया। झोंपडीमे आके वो कहीँ दूर शून्यमे ताकती रही। बाहर बस्तीमे के बच्चे खेल रहे थे। उसका आँगन बरसोंसे सूना था। वैसाही रहनेवाला था........

बस्तीके कितनेही लोग उससे जलते थे, लेकिन वो अपने सीनेकी आग किसे बताती??ज़िंदगी ने कैसे,कैसे मोड़ लेके उसे ऐसा अकेला कर डाला था! उसके कान मे कभी उसके छुटकों  के स्वर गूँजते तो कभी आँखोंसे रिमझिम सपने झरते। उसका पति  जब घर आया तो उसने मनका सारा गुबार निकाला , खूब रोई।
पति  एकदम खामोश हो गया। फिर कुछ देर बाद बोला,"सच!  अगर तेरी बात सुनी होती,हम पढ़ लिख गए होते, तो अपने ही बलबूते पे बच्चे पढे होते... जो भी पढे होते, ये समय आताही नही।"
 आशाने कुछ जवाब दिया नही। उस रात दोनो ही खाली पेट ही सो गए। सो गए केवल कहनेके लिए, आशाकी आँखोंसे नींद कोसों दूर थी।
 क्रमश:





10 टिप्‍पणियां:

रचना दीक्षित ने कहा…

आशा की अंतर्व्यथा को बहुत खूबसूरती से उकेरा है कहानी में.

बहुत सुंदर जा रही है यह कथा. अगली कड़ी का इन्तेज़ार रहेगा.

भावना ने कहा…

dukhiyari maa ka dukh akathya hi rahata hai magar jis tarah se aapne unko shabdo se darshaya hai ya kahun mahsoos karaya hai use main shabdon me sahi se nahin likh paungi itana hi ki agali kadi me maa ke liye koi khushi hogi is ummeed ke saath intazaar krungi

मनोज कुमार ने कहा…

अहली कड़ी का इंतज़ार रहेगा।

शालिनी कौशिक ने कहा…

beech ki kuchh kadiyan chhot gayi hain isliye nahi padh rahi hoon poori padhne ke bad hi comment karoongi.

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

डॉलर की चमक में गरीब माँ-बाप पैबंद की तरह लगेंगे, इसलिए राजू ने अध्याय की ही इति कर दी होगी|

शारदा अरोरा ने कहा…

dil vythit ho uthha...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aage dekhte hain kya hota hai...

Ramakant Singh ने कहा…

क्यों होता है ऐसा

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

आज जाकर सारी कड़ियाँ.. सॉरी आपके शब्दों में मालिका पढ़ पाया.. आपसे सीखना है बहुत कुछ.. कहानी के बारे में नहीं, बल्कि कहानी कहने की कला के बारे में.. एक बेहतरीन स्क्रीनप्ले कैसे लिखा जाता है यह कोई आपसे सीखे.. छोटी छोटी मालिका और कहानी पर कभी न ढीली पडती पकड़, जिज्ञासा का तत्व अंत तक बरकरार और अंत में कहानी का एक नया ट्विस्ट.. कहानी प्रेडिक्टेबल होते हुए भी रोचक लगती है.. और यही सारी बातें मुझे यह कहने पर मजबूर करती हैं कि आपसे बहुत कुछ सीखना है मुझे!!
परमात्मा आपको सेहत बख्शे!! आमीन!!

वाणी गीत ने कहा…

पंख लगते ही पक्षी आसमान छोने की होड़ में घरोंदा भूल जाएँ , आशा के लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता था !
अगली कड़ी का इन्तजार !