बुधवार, 22 अगस्त 2012

रोई आँखें मगर.....4


मेरे ब्याह्के कई वर्षों बाद एक बार मैं अपने मायके आई थी कुछ दिनोके लिए। शयनकक्ष से बाहर निकली तो देखा बैठक मे दादाजी के साथ एक सज्जन बैठे हुए थे। दादा ने झट से कहा,"बेटा, इन्हे प्रणाम करो!'
मैंने किया और दादाजी से हँसके बोली,"दादा अब मेरी उम्र चालीस की हो गई है! आप ना भी कहते तो मैं करती!"
दादा कुछ उदास,गंभीर होके बोले,"बेटा, मेरे लिए तो तू अब भी वही चालीस दिनकी है, जैसा कि  मैंने तुझे पहली बार देखा था, जब तुझे लेके तेरी माँ अपने मायके से लौटी थी....!!"

मेरे दादा -दादी गांधीवादी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम मे भाग लिया था तथा जब गांधीजी ने युवा वर्ग को ललकारा की वे ग्राम सुधार मे तथा ग्राम जागृती मे लग जाएं, तो दोनों मुम्बई का मेहेलनुमा,संगेमरमर का पुश्तैनी मकान छोड़ गाँव आ बसे और खेती तथा ग्राम सुधार मे लग गए। गाँव मे कोई किसी भी किस्म की सुविधा नही थी। दोनों को जेलभी आना जाना पड़ता था, इसलिए उन्होंने उस ज़मानेमे परिवार नियोजन अपनाकर सिर्फ़ एकही औलाद  को जन्म दिया, और वो हैं मेरे पिता। मुझे मेरे दादा-दादी पे बेहद गर्व रहा है। उन्हें लड़कीका बड़ा शौक़ था। मेरे जन्म की ख़बर सुनके उन्हों ने टेलेग्राम वालेको उस ज़मानेमे, खुश होके १० रुपये दे दिए!!वो बोला ,आपको ज़रूर पोता हुआ होगा!!

उनके अन्तिम दिनोंके दौरान एकबार मैं अपने पीहर गयी हुई थी। अपनी खेती की जगह जो एकदम बंजर थी(उसके छायाचित्र मैंने देखे थे),उसको वाकई उन्होंने नंदनवन मे परिवर्तित कर दिया था। एक शाम उन्होंने अचानक मुझसे एक सवाल किया,"बेटा, तुझे ये जगह लेनेका मेरा निर्णय कैसा लगा?"
ना जाने मेरे दिलमे उस समय किस बातकी झुन्ज्लाहट थी,मैं एकदमसे बोल पडी,"निर्णय कतई अच्छा नही लगा, हमे स्कूल आने जाने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ते थे, और...."ना जाने मैंने क्या-क्या बक दिया। वे बिलकूल खामोश हो गए। मुझे तुरंत उनकी क्षमा मांगनी चाहिए थी, लेकिन मैंने ऐसा नही किया।दूसरे दिन मैं वापस लौट गयी। उन दिनों हमलोग मुम्बई मे थे। बादमे मैंने सोचा, उन्ह्ने एक माफी का ख़त लिख दूंगी। लिखा भी। लेकिन पोस्ट लिया उसी दिन उनके देहान्तकी ख़बर आयी। जिस व्यक्ती ने मेरे लिए इतना कुछ किया था, उसी व्यक्ती को मैंने उनके अन्तिम समयमे ऐसे कटु शब्द सुना दिए! क्या हासिल हुआ मुझे!मैं अपनी ही निगाहोंमे ख़ुद गिर गयी।

जबतक हमलोग मेरे पीहर पहुँचे , उनकी अर्थी उठ चुकी थी। वे बेहद सादगी से अपना अन्तिम कार्य करना चाहते थे। अपने लिए खादी  का कफ़न दोनोहीने पहलेसे लेके रखा हुआ था। पर जब शहर  और गाँव वालों को उनके निधन की वार्ता मिली, तो सैकडों लोग इकट्ठा हो गए। हर जाती-पाती के लोगोंने कान्धा दिया। एक नज्म है,"मधु" के नामसे लिखनेवाले शायर की, जो दादी सुनाया करती थी,"मधु"की है चाह बहुत , मेरी बाद वफात ये याद रहे,खादीका कफ़न हो मुझपे पडा, वंदेमातरम आवाज़ रहे,मेरी माता के सरपे ताज रहे"।
उनकी मृत्यु जिस दिन हुई, वो उनकी शादी की ७२वी वर्ष गाँठ थी। जिस दिन उन दोनों का सफर साथ शुरू हुआ उसी दिन ख़त्म भी हुआ।

मेरी दादी के मुंह से मैंने अपनी जिन्दगीके बारेमे कभी कोई शिकायत नही सुनी। मेहेलसे आ पहुँची  एक मिट्टी के घरमे, जहाँ पानी भी कुएसे भरके लाना होता था,ना वैद्यकीय सुविधाएँ,ना कोई स्कूल,ना बिजली....अपने इकलौते बेटेको सारी पढाई होने तक दूर रखना पड़ा। उन्हें राज्यसभाका मेंबर बननेका मौक़ा दिया गया,लेकिन उन्होंने अपने गाँव मे ही रहना चाहा।

दादाजी के जानेके बाद दो सालके अन्दर-अन्दर दादी भी चल बसी। जब वे अस्पतालमे थी, तब एकदिन किसी कारण, ५/६ नर्सेस उनके कमरेमे आयी। उन्होंने दादी से पूछा," अम्मा आपको कुछ चाहिए?"
दादी बोली," मुझे तुम सब मिलके 'सारे जहाँसे अच्छा,हिन्दोस्ताँ हमारा',ये गीत सुनाओ!"

सबने वो गीत गाना शुरू किया। गीत ख़त्म हुआ और दादी कोमा मे चली गयी। उसके बाद उन्हें होश नही आया।

इन दोनोने एक पूरी सदी देखी थी। अब भी जब मैं पीहर जाती हूँ तो बरामदेमे बैठे वो दोनों याद आते हैं। एक-दूजे को कुछ पढ़ के सुनाते हुए, कभी कढाई करती हुई दादी, घर के पीतल को पोलिश करते दादा.....मेरी आँखें छलक उठती हैं....जीवन तो चलता रहता है....मुस्कुराके...या कभी दिलपे पत्थर रखके,जीनाही पड़ता है....
पर जब यादें उभरने लगती हैं,बचपनकी,गुज़रे ज़मानेकी तो एक बाढ़ की तरह आतीं हैं.....अब उन्हें रोक लगाती हूँ, एक बाँध बनाके।
समाप्त 
 
इसी पोस्ट के साथ मै  अपने ब्लॉगर दोस्तों की बिदा लेती हूँ।...ये मेरी शायद आखरी पोस्ट होगी।

28 टिप्‍पणियां:

अली सैयद ने कहा…

आखिरी पोस्ट क्यों ?

आप संस्मरण और कहानियां बेहद शानदार तरीके से लिखती हैं ! ऐसी क्या वज़ह है जो इसे आख़िरी पोस्ट कह रही हैं आप !

उम्मीद करता हूं कि आप हमेशा लिखती रहेंगी !

शारदा अरोरा ने कहा…

nahi Kshma ji , aakhiri post hargij n kahen...lekhni si sakhi aur nirasha..ye to koi bat nahi hui...yoon gulshan se muh n moden...

sangita ने कहा…

इतनी खूबी से अपने संस्मरण संजोए जाने की विधा से बिदा ?????????//

Ramakant Singh ने कहा…

ये क्या बात हुई . ये तो नाइंसाफी है

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

आप बनी रहें हमारे साथ हम आपके संस्मरण पढ़ना चाहतें हैं ,कोई आप पर लिखे वह नहीं ....कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
बुधवार, 22 अगस्त 2012
रीढ़ वाला आदमी कहलाइए बिना रीढ़ का नेशनल रोबोट नहीं .
What Puts The Ache In Headache?

Rahul Singh ने कहा…

''ये मेरी शायद आखरी पोस्ट होगी।'' के शायद पर पूरा भरोसा है.

भावना ने कहा…

ऐसा मत कहिये ...

भावना ने कहा…

ऐसा मत कहिये ..हे

mark rai ने कहा…

जीवन तो चलता रहता है....मुस्कुराके..

आखिरी पोस्ट क्यों ?

सतीश सक्सेना ने कहा…

ऐसा ना कहें ...
हो सकें तो साझा करें !
आशा है लिखती रहेंगी !

आशा जोगळेकर ने कहा…

क्षमा जी आपका लिखा पढना अच्छा लगता है । ऐसा निर्णय ना लें ।

Mrityunjay Kumar Tripathi ने कहा…

बिखरे सितारे को समेट लेने की कला आप बहुत अच्‍छी तरह जानती हैं। आपका यह ब्‍लॉग बिखर रहे यादों को समेट लेने का पन्‍ना है। बहुत अच्‍छा लिखा है आपने...।
एक बार और, हमारे ब्‍लॉग पर नियमित रूप से आने और टिप्‍पणी के लिए आपका शुक्रिया। क्षमा जी। भई हम तो आपकी प्रतिक्रियाओं के मुरीद हैं। कुछ ही पंक्तियों में बहुत कुछ कह जाती हैं और बहुत कुछ कहने-सोचने के लिए प्रेरित कर जाती हैं। हम हर पोस्‍ट को प्रकाशित करने के पूर्व यह सोचते हैं कि आपका कमेंट तों आएगा ही...।

boletobindas ने कहा…

ये आखरी क्यों.....

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बहुत दिन बाद इस कहानी के मंच पर आया ..वाकई फिर से वही पुराणी ताजगी ...सुन्दर कहानी और प्रभावशाली शब्द...धन्यवाद क्षमा ji

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

shuru se ab tak ke ye sansmaran aur pichhli kahani ki maine 9 kadiyan padi. apka likhne ki shaily pathak ko bandhe rakhne ki kala me saksham hai. iske dwara ham apke bare me bhi kafi kuchh jaan paye.

lekin ant ki lines ki ye apki antim post hai jan kar dukh hua. aisa kyu ? khud hi jawad dhoondhne ki koshish kar rahi hun. aur ummeed karti hun ki ye bat sach n ho.

शोभना चौरे ने कहा…

क्षमाजी
बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा |दादा दादी के इन अमूल्य संस्मरणों के खजाने से आप कैसे विदा ले सकती है ?
अभी तो बहुत कुछ लेना है इस खजाने से हमें |

Pradeep Kumar ने कहा…

वाह जी वाह . आपने तो मुझे भी रुला दिया . रोई आँखे मगर .... बहुत कुछ मुझे भी याद दिला गई . क्या लिखा है आपने ? दिल को छू गया. सच में कभी कभी हम ज़रा सा चूक जाते हैं . और फिर ज़िन्दगी भर पछताते रहते हैं. मुझे भी याद है कि मेरी बहन की सास यानी मेरी मावसी (सच में माँ जैसी ही बल्कि माँ से भी बढ़कर). मैं कक्षा ८ से उनके पास ही पढ़ा इसलिए माँ से जयादा उनका साथ रहा. अपने अंतिम दिनों में वो सबको याद करती थी और सब उनसे मिल लिए लेकिन नहीं जा सका तो मैं . उन दिनों बहुत व्यस्त था लेकिन इतना भी नहीं कि किसी अपने से मिलने ही ना जा सकूं. सोचा एक दो दिन ठहर जाता हूँ रविवार को चला जाऊंगा . खैर वो रविवार कभी नहीं आया. आज आपकी यादें पढ़कर मेरी भी आँखें भर आई. और यही याद रह गया कि जो मन में आये तुरंत कर लेना चाहिए वरना गया वक़्त फिर लौट के नहीं आता. जैसे आप दादाजी से माफ़ी नहीं मांग सकी मैं अपनी मावसी से आखिरी बार नहीं मिल सका.
खैर आया तो था आपको टिपण्णी के लिए धन्यवाद् देने लेकिन सोचा कुछ पढ़ भी लूं और देखिये पढ़ा क्या आपने तो रुला दिया .
अब तो अपनी यही लाइन याद आ रही हैं ----
दर्द आँखों में सिमट आया है .
जाने कौन मुझे याद आया है .

मनोज कुमार ने कहा…

‘विदा लेती हूं’ सुनकर अच्छा नहीं लगा।

Sriprakash Dimri ने कहा…

बेहद भाव पूर्ण सस्मरण पूज्य दादाजी ओर दादीजी की राष्ट्र प्रेम में ओतप्रोत आत्माओं को कोटि कोटि नमन...बहुत प्रवाहमयी जीवंत अभिव्यक्ति है आपकी...विदा लेती हूँ या अंतिम रचना है सुनकर अच्छा नहीं लगा...आगे भी ऐसे ही लिखती रहिएगा...शुभ शुभ...
सादर !!

mahendra mishra ने कहा…

abhi vidai n len .. aap bahut badhiya achchh likhati hai ... abhar

अभिषेक मिश्र ने कहा…

आपके पास यादों की अद्भुत विरासत है और उनके प्रस्तुतीकरण का सुन्दर अंदाज भी. आपके लेखन के अन्य पहलुओं को भी ब्लॉग के माध्यम से देखने की अपेक्षा रखता हूँ...

बेनामी ने कहा…

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डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

क्षमा जी,
आपको पढ़ना सदैव सुखद लगता है और मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन से मन प्रसन्न होता है. लिखना जारी रखिये, आपकी लेखनी को पढ़ने का इंतज़ार रहता है. दादा दादी के साथ आपका आत्मीय रिश्ता और उनसे मिली प्रेरणा आपकी लेखनी में दिखता है. बहुत अच्छी तरह संस्मरण को लिखा है. शुभकामनाएँ.

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

आपके ब्लॉग पर टिप्पणी प्रकाशित नहीं हो रही, ज़रा देखेंगी. मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद.

Minakshi Pant ने कहा…

वाह बेहद खूबसूरत अंदाज़ से बीते लम्हों का चित्रण , यही तो है जिन्दगी खट्टी मीठी यादों का संसार कुछ लम्हें साथ हैं चल रहे कुछ हाथ छुडाकर आगे हैं बढ़ रहे बहुत खूबसूरत प्रस्तुति |

आशा जोगळेकर ने कहा…

क्षमा जी वापिस आइये आपकी कमी खल रही है ।

Sriprakash Dimri ने कहा…

आपकी पोस्ट की प्रतीक्षा है ..शुभ कामनाएं !!

मैं और मेरा परिवेश ने कहा…

आपके चारों संस्मरण पढ़कर आपसे मिलने की इच्छा हो रही है। ऐसा लग रहा है कि आपके पास बैठ कर आपसे वे सारे किस्से सुनुँ जो आपने छोड़ दिए हैं।