शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

दयाकी दृष्टी.सदाही रखना !9


रोज़ शामको आशा लीलाबाई से पूछती,"अभीतक राजू-संजू,माया- शुभदा, कोयी भी नही आया???बच्चों की आवाजें नही आ रही???"फिर ,"अस्मिता,अस्मिता,आजा तो...देख मैं लड्डू दूँगी तुझे,"इसतरह पुकारती रहती....

माया-शुभदा,अस्मिता....ये सब उसकी ज़िन्दगीमे कभी आयी ही नही,इसका होश कब था उसे???कभी वो अपने आपसे ही बुदबुदाती,हाथ जोड़कर प्रणाम करती,तथा लीलाबाई से कहती,"ईश्वरकी कितनी कृपा है मुझपे! माँगा हुआ सब मिला,जो नही माँगा वो भी उस दयावान ने दे दिया। ऐसे जान न्योछावर करने वाले बच्चे, ऐसी हिलमिलके रहनेवाली बहुए, इतने प्यारे पोते-पोती....बता ऐसा सौभाग्य कितने लोगोको मिलता है??"

कई बार लीलाबाई अपने पल्लूसे आँखे पोंछती। उसके तो बच्चे ही नही थे। उसके मनमे आता, इस दुखियारी के जीवन से तो मेरा जीवन कहीं बेहतर!बच्चे होकर इसने क्या पाया??और वो भी उन्हें इतना पढा लिखाकर??

और एक दिन मिसेस सेठना के घर संजू अचानक आ धमका...!!उनके पैरोपे पड़ गया। सिसक सिसक कर रोने लगा। मिसेस सेठना अब काफी बूढी हो गयी थी। उन्हें संजूको पहचानने मे समय लगा।

"आंटी, मुझसे बहुत  बड़ी भूल हो गयी.... माफीके काबिल नही हूँ,फिर भी माफी माँगता हूँ। मैं भारत लौट  आया हूँ.... अब माँ बापके साथ ही रहूँगा उन्हें सुखी रखूँगा,कमसे कम कोशिश करूँगा," संजू रो-रोके बोल रहा था।
मिसेस सेठना ने उसे बीच मे घटी सारे घटनाओका ब्योरा सुनाया,फिर पूछा,"तुम्हारी भूल तुम्हारे ध्यान मे कैसे आयी?"
"आंटी, वहाँ पर एक वृद्धाश्रम मे मुझे विज़िट पे बुलाया था। वहाँ ऐसे कई जोड़े रहते हैं । दोनो साथ,साथ होते हैं  तब तक खुश भी होते है। उस दिन एक भारतीय स्त्री मुझे मिली। माँ के उम्र की होगी। पगला-सी गयी थी। मेरा हाथ छोड़ने को तैयार नही थी।
"मेरे बच्चो को मरे पास ले लाओ। ये देखो, ये पता है। यहाँ के लोग उन्हें बुलाते ही नही। कोई मेरी बात ही नही सुनता है....बेचारी रो-रोके बोल रही थी।
मैंने आश्रम मे तलाश की तो पता चला कि उसके बच्चे आना ही नही चाहते। पैसे भेज देते है। वीक एंड पे घूमने चले जाते हैं । मेरी आखोंके सामने मेरी माँ आ गयी। मुझ पर मानो बिजली-सी बरस पडी। मैंने उसी पल भारत लौटने का निर्णय ले लिया। ब्याह तो किया ही नही था, इसलिए किसीके सलाह मश्वरेकी ज़रूरत नही थी। आंटी मुझे अभी,इसीवक्त माँ के पास ले चलिए....! "

दोनो निकल ही रहे कि आश्रमसे फ़ोन आया,आशाकी तबियत बहुत  खराब है। वो लोग पहुंचे  तबतक मुख्याध्यापिका भी पहुँच  गयी थी। डाक्टर भी वहीं  थे। संजू को किसीने पहचाना नही। मिसेस सेठना ने परिचय करवाया। लीलाबाई आँखे पोंछते हुए बोली,"आज सुबह्से कुछ नही खाया पिया। बस,राजू-संजू आएँगे तभी लूँगी, यही कहती रहती हैं... ।"
मिसेस सेठना अपने साथ मोसंबी लाईं थीं ..... लीलाबाई को झट से रस निकालने को कहा। ड्रिप लगी हुई थी। मिसेस सेठना ने डाक्टर से धीमी आवाज़ मे कुछ कहा ......उन्होने गर्दन हिलाई...... संजूकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने माँ का एक हाथ पकडा, दूसरा डाक्टर ने।
"माँ! देख हम आ गए है। अब ये रस ले ले, वो बोला। आशाने संजूके हाथों रस ले लिया। उसके होंठ कुछ बुदबुदाने लगे। सबने एक दूसरेकी तरफ  प्रश्नार्थक दृष्टी से देखा। लीलाबाई बोली ,"वो कह रही है,'दयाकी दृष्टी सदाही रखना,'जो हमेशा गाती रहती हैं ।"
आसपास खडे लोगो की आँखे भर आयीं........ संजू तो लौट ही आया था, डाक्टर के रूपमे राजू भी मिल गया।

समाप्त ।


6 टिप्‍पणियां:

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut samvedansheel hai ...personal savaal hai aapne ye kahani kahan se li...sach ke bilkul kareeb si lagti hai...

alka sarwat ने कहा…

बहुत प्यारी कहानी है .

अली सैयद ने कहा…

अब पूरे नौ अंक एक आठ पढ़कर देखता हूं !

आशा जोगळेकर ने कहा…

बीच में आ नही पाई थी पर आज सारे भाग पढ लिये कहानी के । आशा को अपने बच्चे (बच्चा) मिले पर कितनी देर से ।
आपका लेखन प्रभावी है ।

Ramakant Singh ने कहा…

सुबह का भुला शाम को आ जाये तो क्या बुरा है ..

mark rai ने कहा…

Dil ko chhu lene wali kahani....aisa lagta hai ki abhi bhi dimaag me saari baaten ghum rahi hai...