मंगलवार, 3 अगस्त 2010

Bikhare sitare:17 जा, उड़ जा रे पँछी..!


( गतांक : ओह! बिटिया को मै हर दिन का ब्यौरा लिखती..एक दिन उसने लिखा," अब बस भी करो माँ!"
मैंने कहा, जीवन में यह पल बार बार आनेवाले नही.." जोभी है,बस यही इक  पल है..कर ले तू पूरी आरज़ू...." कल किसने देखा है? कलकी किसको खबर?
और कितना सच था...आनेवाले कलमे क़िस्मत ने मेरे लिए क्या परोसा था? मुझे कतई अंदाज़ नही था...
अब आगे पढ़ें..)

देखते ही देखते वो दिन भी आ गया ,जब बिटिया राघव के साथ भारत पहुँच गयी..और पंख लगा के दिन उड़ने लगे..उन्हें नए सिरेसे वीसा बनवाना था..वह भागदौड़...राघव  अपने घर जाय उससे पहले उसका सूट सिलना था..नाप देने थे...बिटिया की चोलियाँ सिलनी थी..और मेहंदी..यह सब तीन दिनों के भीतर..

चौथे दिन हम बिटियाके ससुराल पहुँच गए..हमारा इंतज़ाम हमने चंद अतिथि गृह बुक करके किया था..एकेक विधि संपन्न होते,होते ३ दिन तेज़ीसे गुज़र गए..विवाह सपन्न होते  ही मेरे आँसूं बह निकले..मै अपनी माँ के गले लग रो पडी...माँ की आँखों में भी झड़ी लगी हुई थी...बोलीं :" यही तो जगरीती है...तू भी ऐसे ही एक दिन विदा हुई थी..हाँ...फ़र्क़ यह है,की, केतकी सात समंदर पार जा रही है..तू इसी देश में थी..पर फिर भी तेरे लिए मन तरस जाता था.."

बिटियाके साथ हम घर लौटे..अब हमारी ओरसे स्वागत समारोह की तैय्यारी..मेहमानों की व्यवस्था..बिटिया के ससुराल के लोगों की ठहरने की व्यवस्था..स्वागत समारोह के एक दिन पूर्व, राघव और उसका परिवार आदि आ गए..समारोह के ३ रे दिन केतकी और राघव ने अमरीका वापस लौटना था..वो शाम भी आही गयी..

रात की उड़ान थी..गौरव और अमन हवाई अड्डे पे उन्हें बिदा करने जा रहे थे..मै बेहद थकी हुई थी..मुझे सब ने रोक लिया...वैसे भी क्या फ़र्क़ पड़ता? दोनों एक बार अन्दर प्रवेश कर लेते ... हमें तो बाहर से ही लौट जाना होता..

गौरव ने आवाज़ लगाई:" चलो सामान नीचे लाने लगो...!"
केतकी की आँखें सूखी थीं...उनकी गाडी निगाहों से परे होने तक मैंने अपने आँसूं रोक रखे..भीगा मन, भीगी आँखें उसे आशीष दे रहीं थीं..जा, उड़ जा रे पँछी..! खुले आसमाँ में उड़ जा..! अपना घोंसला बना ले..अब तो तेरे मेरे क्षितिज भी भिन्न हो गए..जब तेरे आशियाँ को  सुबह की किरने  चूमेंगी, मेरी सूनी-सी शाम रात में तबदील होगी...

माँ तो एक दिन पहले ही जा चुकी थीं..मै अपनी जेठानी के गले लग रो पडी..आए हुए महमान लौटने लगे..और दो तीन दिनों के भीतर घर खाली हो गया..

गौरव के retirement का दिन करीब आ गया..इस घरकी,सजी सजाई  दीवारें खाली होने लगीं.. दरवाज़े खिड़कियाँ बेपर्दा...बंजारों का डेरा उठा..हम तीन माह पूर्व लिए अपने फ्लैट में रहने चले आए..

यह घर भी लग गया..ज़िंदगी में अचानक से एक खालीपन,एक ठहराव महसूस हुआ...मै अपने छंदों में मन  लगाने की कोशिश में जुट गयी..एक कला प्रदर्शनी की..पर अब महसूस हुआ,की,दस साल पूर्व की और अबकी बात फ़र्क़ थी..अब malls बन जाने के कारण लोग, वहाँ जाना अधिक पसंद करते थे..जिन्हों ने मेरी कला तथा डिज़ाइन के तरीके देखे ही नही थे,वो प्रदर्शनी में क्या होगा इसका अंदाज़ नहीं लगा सकते थे..अब मै अपने समय का इस्तेमाल कैसे करूँ? यह परेशानी मेरी थी, लोगों की नही..

गौरव भी बैठे रहना तो पसंद नही कर रहे थे..उन्हें काम मिल गया,लेकिन हमारे शहरसे काफ़ी दूर..अमन भी दूसरे शहर में ही था..बाद में जहाँ गौरव था वहाँ आ गया..

इस घर में मै एकदम अकेली पड़ गयी..तभी माँ को कैंसर होने का निदान हुआ..वो मेरे पास आ गयीं...उनकी आनन् फानन में शस्त्र क्रिया कराई गयी..हम भाई बहनों को सदमा तो बहुत लगा था..कुछ ठीक महसूस करने पर वो अपने घर लौट गयीं..उनकी सेहत देखते हुए मैंने तय कर लिया..मै ऐसा कोई काम शुरू नही करुँगी,जिसे छोड़ ना सकूँ..माँ को किसी भी समय मेरी ज़रुरत महसूस हो सकती थी..और गाँव में,मेरे नहैर में, वैद्यकीय  सुविधाएँ बहुत कम थीं..

बैठे,बैठे एक दिन मैंने किसी नेट वर्क पे अपना वर्क प्रोफाइल डाल दिया...मै जो कुछ करती,वो सब लिखा..और मेरा contact नंबर  भी दिया ....सोचा, गर फ्री lancing का तरीका अपना के काम किया जाय तो ठीक रहेगा..नही पता था,की, मुझे इसके क्या परिणाम भुगतने पड़ेंगे..ख्वाबो-ख़याल में जो नही सोची थी, ऐसी परेशानियों का एक सिलसिला मेरे इंतज़ार में था... 
क्रमश: 
(अगली किश्त से इस जीवनी का तीसरा और अंतिम अध्याय आरम्भ होगा. गौरव के रिटायर्मेंट  के बाद से  पूजा के  आजतलक के  जीवन की यह दास्ताँ होगी .)

6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

पोस्ट पढ़कर अच्छा लग रहा है!

ज्योति सिंह ने कहा…

bichhadne aur milne ka bhi silsila azeeb hai ,poori kahani padhkar sochti rahi ,jindagi roj naye rang me dhal jaati hai ,kabhi dushman to kabhi dost najar aati hai .bas chal rahe chal rahe aapke saath .

ali ने कहा…

खुशियों और सोग की लहरों पर झूलते रहना ही जिंदगी है,बिटिया का घर बसा ,वो खुश है!बेटा अपने पैरों पर खडा है, इस तसल्ली के बाद अपने दुःख को बर्दाश्त करने माद्दा बढ़ जाना चाहिये , आपका !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

har baar lagti hai NOvel ab ant ki aur hai........lekin badhti ja rahi hai............:)

waise interesting hai.....:)

मनोज कुमार ने कहा…

यह अंक भी अच्छा लगा।

रचना दीक्षित ने कहा…

जाने अब परेशानियों का क्या सिल सिला शरू होने वाला है