शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

इन सितारों से आगे..२

बसंता जी हर कड़ी के साथ जुड़े रहे और अपनी अनमोल टिप्पणी देते रहे..हालांकि वो नेपाली भाषा में ब्लॉग लिखते हैं,और वही भाषा बेहतर जानते हैं,वो वो मेरे हिन्दी लेखन की  हरेक बारीकी समझते रहे!

डॉक्टर रूपचंद शाश्त्री जी की," कथा बहत रोचक है और इस में लयबद्धता बनी रही है," जैसी टिप्पणी हौसला अफज़ाई करती रही.

योगेश जी स्वप्न की टिप्पणी," पढ़ना शुरू किया तो पढता ही गया, अक्सर लेख पढता नही हूँ. बहुत दिल को छू लेनेवाली लगी कहानी. कभी बहुत पहले पढी मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की याद आ गयी," ज़र्रानवाज़ी नही तो और क्या थी?

शारदा अरोरा जी अंत तक जुडी रहीं.."लगती तो ये आप बीती है. शानदार उपन्यास का लुत्फ़ देती है"....इस में उनका बड़प्पन नज़र आता है.

दिगंबर नासवा जी  जुड़े रहे..."बच्चे की किल्कारिया तो किसी को भी आनंद में ले जाती हैं...फिर दादा-दादी की तो बात ही क्या..आपका आगे का सफ़र भी सुन्दर  होगा !"..ये सद्भावना   हमेशा   साथ रही.

सुरेन्द्र  'मुल्हिद 'शुरू से जुड़े रहे और हौसला अफज़ाई करते रहे...शायद अंत में कुछ मसरूफ़ हो गए!

गर्दू गाफिल जी ने लिखा," सुनेंद्र जी आपको जादूगर कह रहे हैं...किन्तु मुझे तो संवेदनाओं का सागर लगती हैं...!
क्या खूब नज़्म लिखी है! आपके वाक़यात पढ़ते हुए मुझे शिवानी और मीना कुमारी याद आ गयीं...शिवानी की तरह शब्द चित्र और मीना कुमारी की तरह दर्द का दरिया..
ये कैसा अद्भुत संयोग है! आपकी लेखनी मन्त्र मुग्ध करती है""
भला ऐसी टिप्पणी कोई भुला सकता है?

मुकेश कुमार तिवारी जी लिखते हैं,

"अब तो कथानक के साथ रिश्ता जुड़ता महसूस हो रहा है। सांस रोक के पढना होता है एकबार में।

बहुत ही अच्छा और सधा हुआ लेखन।"
महफूज़  अली  कभी  जुड़े  कभी  बच  निकले !

निर्मला कपिला जी की बड़ी उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ रहीं!एक  में  लिखा,
"बहुत दिल्चस्प मोड पर कहानी को छोडा है अगली कडी के लिये उत्सुकत और् बढ गयी है।"...अब बताईये की,अगली कड़ी कैसे न लिखती?

'मुमुक्ष की रचनाएँ, से टिप्पणी रही(अनेकों में से एक),
"आगे, आगे क्या अंजाम हुए ?? क़िस्मत ने क्या रंग दिखाए?

श्रवण कुमार ने शाप तो महाराजा दशरथ को दिया..लेकिन किस, किस ने भुगता?

पूजा के जीवन के दर्दनाक मोड़ तो उसी दागी गयी गोली के साथ शुरू हों गए...

कहानी रोचक होती ही जा रही है. पढने की ललक बढती ही जा रही है."

ज्योति  सिंह   जी एक जगह कहती हैं,
"दो   बार  आकर  लौट  गयी .. इतनी  बढ़िया  रचना  को  पढ़कर  टिपण्णी  न  देने  का  अफ़सोस  हो  रहा  था  पर  आज  सफलता  मिलने  पर  ख़ुशी  हुई  .पूजा  की  कहानी  दिल  को  छूने  वाली  अवं  रोचक  बनती  जा  रही  है  .आगे  पढने  फिर  आउंगी  ."

BrijmohanShrivastava ने कहा… १४वी कड़ी पढने के बाद आज ऐसा लग रहा है दोबारा शुरू से पढना शुरू करुँ| बात ये है कि अभी तक कहानी /उपन्यास की द्रष्टि से पढ़ रहा था अब साहित्य की द्रष्टि से पढ़ा जायेगा |आज जब इस ओर मेरा ध्यान गया तो यह विचार आया ""सितारों जडी रात चूनर लेकर उसके जिस्म पर पैरहन डालने वाली थी ""तथा ""कपोलों पे रक्तिमा छा गई "" और ""फिजायें महकने लगीं चहकने लगीं जिस्म को वादे सबा छू गई एक सिरहन सी दे गई ""और भी "" वो आँखों का सितारा सुबह का तारा "

बाद में कहीँ खो गए ब्रिजमोहन जी....!

भाग्यश्री, दीपक 'मशाल','अदा'जी,ललित मोहन त्रिवेदी...इन सभी की बेहद उत्साह वर्धक टिप्पणियाँ रहीं!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…" पूजा की तरह ही मैं भी इन्तज़ार करती हूं इस श्रृंखला की हर कडी का, लेकिन इन्तज़ार जितना लम्बा होता है, पढने में उतना ही कम समय लगता है. लगता है जैसे अभी तो पढना शुरु किया था और कडी खत्म भी हो गई?"
कितनी प्यारी-सी टिप्पणी है ये!
विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
प्यार का दर्द सचमुच बहुत कठिन होता है बेहद संवेदनशील कहानी ..पूजा के हालत इस कदर होना स्वाभाविक है क्योंकि आदमी जब किसी को चाहे और वो किसी प्रकार दूर होता प्रतीत हो तो तकलीफ़ तो होती ही है..और ऐसे में दादा दादी का भी इस प्रकार प्यार करना और सहारा देना कुछ पल के लिए एक सुखद एहसास देता है..बढ़िया कहानी आगे के कड़ियों का इंतज़ार है..




Dipak 'Mashal' ने कहा…
Is qalam ke kamaal ko bhala main kya naam doon? adbhut ya manmohak.... Jai हिंद 'अदा' ने कहा… "ये गौरव भी ना.. पता नही किसी की उतरन ले आया है " बहुत ही सहजता से आपने सबकुछ कह डाला.... आप ..लिखती रहे हम आते रहते हैं.... बस ये है कि कभी-कभी टिपण्णी नहीं दे पाते..... बहुत अच्छा...वाह ..कहके चले जाना हमें अच्छा नहीं लगता.. लेकिन ये बताना चाहते हैं कि आपको पढ़ते हमेशा ही हैं..... और आपकी लेखनी को सलाम भी करते हैं.... बहुत ही सरलता से सीधी सच्ची बात कहतीं हैं आप... आज भी अच्छा लगा पढ़ना आपको.....हमेशा की तरह....!! "
आप सभी का शुक्रिया! क्षमा क्रमश:

13 टिप्‍पणियां:

ali ने कहा…

अरे आपने तो सभी टिप्पणीकारों को बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ में थैक्स कह डाला :)

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अरे ! आज तो यूं लगा जैसे एक अच्छी फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी लोग सिनेमा हाल में अपनी सीट नहीं छोड़ते...नंबरिंग चल रही होती है तो उसे भी इत्मिनान से पढ़ रहे होते हैं :)

रचना दीक्षित ने कहा…

धन्यबाद का भी अंदाज़ मुख्तलिफ है.

'अदा' ने कहा…

क्षमा जी,
आपकी लेखनी की सादगी ने हमेशा ही प्रभावित किया है...
एक पवित्रता का आभास होता है...
आपने धन्यवाद किया है...जबकि हमें धन्यवाद करना चाहिए था...
सच में बहुत अच्छा लगा ..सबकुछ , आपका लेखन, तसवीरें और आप..!!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

खूब शुक्रिया अदा कर रही हैं दी... टिप्पणी करते समय तो ये सोचा भी नही था कि पोस्ट का सामान बन जाउंगी :)

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

अगली कहानी की प्रतीक्षा में ।

vikram7 ने कहा…

achchii prastuti

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

शमा जी,

मैं ऐसा मानता हूँ कि जब शब्द अपने साथ भावों का संचार करने लगे तो जीवंत हो उठते हैं, नही तो आँखों के सामने आने वाला हर अक्षर शब्द नही होता बस किसी आकृति में ही सिमट कर रह जाता है।

इस पूरे कथानक को कोई साहित्य, कोई कल्पना, कोई जीवनवृत को रूप में देखें लेकिन मैण्ने हर पल मह्सूस किया शब्दों को जीवित होते।

वन्दना जी ने बिल्कुल सही कहा है कि टिप्पणियाँ भी कभी पोस्ट बन जायेंगी ऐसा सोचा भी नही था। बहुत अच्छा लगा अपनी टिप्पणियों को पुनः पढ़ते हुये।


सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

PKSingh ने कहा…

bahut hi nirala andaj...

शारदा अरोरा ने कहा…

अरे धन्यवाद का नया अन्दाज़ । पिछली दो कड़ियाँ पहले पढीं नहीं थीं , आज पढीं ..बरबस वही दो पंक्तियाँ मन में कौंध गईं ...
अबला जीवन हाय तुम्हारी वही कहानी
आँचल में है ममता और आँखों में पानी ।
समीक्षा मांग रहा है , कड़ी दर कड़ी ये उपन्यास।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपका शुक्रिया .... मुझे याद रखने का ... दरअसल ये आपकी कहानी की रोचकता और संवेदना ही थी की इस कहानी ने बाँधे रक्खा शुरू से ............

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

kshma ji mai aapke blog par pahle bhi aayi thi padhi inhe par koi tippani net slow hone ki vajh se nahi de payi, aapki rachnayen kisi ke bhi man ko ander tak chhu le bahut hi marmik bhvnao ka varnan hua hai isme ............. likhte rahe ...aur hum padhte rahe....sukriya

Basanta ने कहा…

Nice way to thank your readers!

Thank you very much for mentioning me too. I am waiting for your new stories.