मंगलवार, 10 अगस्त 2010

बिखरे सितारे: गला क्यों न घोंटा?


(गतांक: केतकी,किसी अन्य शहर  अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई  को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...

हर हँसी  की  कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू  हैं  कि थमते नही!
अब आगे:)

मै होश में तो आ गयी उस समय,पर यह कुछ दिनों के लिए एक सिलसिला-सा बन गया. जब मानसिक तनाव बरदाश्त के परे हो जाता तो मै होश खो बैठती. माँ वैसे ही चिंतित रहती,मेरे कारण,अब और अधिक चिंतित हो गयीं.

केतकी गौरव के पास ही थी उन दिनों. एक शाम उसका फोन आया:" माँ, आप इस वक़्त अकेली हैं या आस पास कोई है?"
मै:" इस समय तो कोई नही है..कहो,क्या बात है?"
केतकी:" माँ, पापा,अमन और मै कल दिन में वहाँ पहुँच रहे हैं...."
मै:" लेकिन तुम लोग तो तीन चार दिनों के लिए ऊटी जानेवाले थे न? उसका क्या?"
केतकी:" नही जा रहे अब..पापा कहते हैं,की,अब वो आपके साथ क़तई नही निबाह सकते. वह अमन और मेरे सामने कुछ बातें कहना चाहते हैं...जैसे की,आपको प्रतिमाह क्या दिया जाय...तथा आप कहाँ रहेंगी.."

कुछ देर तो मेरे मूह से अलफ़ाज़ ही नही निकले...शायद आँखें भर आयीं थीं....गला रूंध रहा था. अंत में मैंने कहा:" ठीक है बेटे..जो तुम लोग ठीक समझो..इस समय और कह भी क्या सकती हूँ?"

कैसा तमाशा बना रखा था क़िस्मत ने मेरा! चार दिन भी चैन नही मिल रहा था..गौरव और बच्चे आए. गौरव ने काफ़ी बहकी,बहकी बातें की...

उनकी मुखालिफ़त करना मैंने मौज़ूम न समझा. पत्थर पे सर फोड़ने वाली बात होती वह तो..उसने एक घर मेरे नाम से करने की बात कही. और प्रतिमाह कुछ रक़म. कितनी,यह बात मुझे अब याद नही. वो सब कुछ कागज़ात पे लिख लाया था. एक प्रत  मुझे पकड़ा दी गयी. अगले दिन वह और अमन,दोनों लौट गए. उनके वहाँ रहते मै तीन चार बार बेहोश हो कर ,पता नही क्या बडबडाती रही. अमन ने तो अपने आपको इन सब बातों से अलग थलग कर लिया था.


इसी दौरान एक रोज़ केतकी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा:" पापा अब तुम्हारे नाम मकान नही करना चाहते..उनका कहना है,की,तुम अपना संतुलन खो बैठी हो.."
यह अलफ़ाज़ मै हज़म कर ही रही थी,की,केतकी रोते हुए उठ खड़ी हुई और तमतमाती हुई बोली:" माँ! तुमने पैदा होते ही मेरा गला क्यों न घोंट दिया? आप लोगों ने मेरी ज़िंदगी नरक बना रखी है..." उस बच्ची की नन्हीं,मासूम सूरत मेरे आखों के पानी में तैर गयी...जिसे उसके परिवार ने धुतकारा था...मै ही उसकी रक्षक थी..या मेरा खुदा..लगा,काश, मेरी ही माँ ने मेरा गला घोंट दिया होता!

मै दंग रह गयी ! कभी न सोचा था की,मुझे अपनी लाडली संतान के मूह से यह अलफ़ाज़ सुनने होंगे! पल भर लगा,गर मेरे दादा-दादी कहीँ से  सुन रहे हों,तो उनपे क्या बीतेगी? जिस पूजा तमन्ना,यानी मुझे, पाके उन्हें लगा था,आसमान का सितारा मिल गया..उसी को, उनकी लाडली पोती को,उसकी औलाद यह अलफ़ाज़ सुना रही थी? यह क़िस्मत की कैसी विडम्बना थी? मै,उनकी आखों का सितारा,टूट  टूट के बिखर रही थी..और वो दोनों कुछ न कर सक रहे थे!

मैंने कमरे से बाहर निकल जाना चाह,लेकिन केतकी मानो चंडिका का रूप धारण कर चुकी थी...उसने मेरी बाँह पकड़ दोबारा कमरे में खींच लिया...उसकी आँखों में आग थी...जिसे मेरे आँसूं चाहकर  भी बुझा न पा रहे थे..

क्रमश:

इस कड़ी को भी निजी वजूहात से काफ़ी डिलीट कर दिया गया है...क्षमा करें!

9 टिप्‍पणियां:

रचना दीक्षित ने कहा…

आपकी हर पोस्ट कुछ न कहने को मजबूर करती है दर्द का कहीं अंत नहीं दीखता है

ali ने कहा…

पिछली बार भी मैं केतकी के रिएक्शन के लिए ठहर सा गया था !

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मंजुला ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति ....दर्द को मैंने अपने अन्दर महसूस किया

arvind ने कहा…

aapki kaahaaniyon me kafi dard chhipa hota hai....bahut hi acchhi kahaani.

Dr.Bhawna ने कहा…

आप विश्वास नहीं करेंगी लेकिन ये सच है आज आपकी कड़ी देखी , तो जानने की उत्सुकता हुई कि पहले क्या हुआ था, तो पिचहे जाते २ पहली कड़ी पर गई और बिना उठे, बिना रूके अंतिम कड़ी तक पढ डाला, हर कड़ी ने इतना महसूस कराया कि हर पात्र इतने पास नज़र आया कि बयां नहीं कर सकती, बहुत दुखी लम्हें बीते, पात्र से इतना स्नेह हो गया जैसे कि कोई मेरा ही नज़दीकी हो, ये पूरी व्यथा सच्ची है या कुछ काल्पनिक भी,अगर पूरी सच्चाई से भरी है तो वास्तव में बहुत सुखद है, समाज, व्यक्ति, परिवार इतना दर्द कैसे सहे कोई, जब अपने ही इतना बड़ा सदमा दें तो कोई कैसे खुद को संभाले

निर्मला कपिला ने कहा…

ांभी पिछली कडी नही पढी कल दोनो पढने आती हूँ आभार।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

रुचिपूर्ण ।

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

कैसा कैसा जहर भरा है गौरव ने केतकी के मन में ।
उसे जन्मदात्री माँ पर विश्वास नही । कहानी दिल की गहराई तक उतर रही है ।