बुधवार, 25 अगस्त 2010

इन सितारों से आगे..

२३ जून के बाद मैंने इस ब्लॉग पे नही लिखा...हाँ..पुनः प्रकाशन ज़रूर कर दिया. स्वयं नही सोचा था,की,पूजा की जीवनी ख़त्म होने के बाद मै आगे क्या लिखूँगी..एक और जीवनी के अलावा और क्या लिखा जा सकता था? दिमाग में कुछ रोज़ पूर्व लिया हुआ एक साक्षात्कार घूम रहा है...पर लगता है,अभी पूजा की जीवनी दिमाग पे बहुत अधिक हावी है. मै गर इस वक़्त कुछ और लिखूँ तो उसे न्याय नही दे पाऊँगी . दीपा,जिसका साक्षात्कार लिया,वो इंतज़ार में है,की,अब मै उसके बारे में कब लिखना शुरू करुँगी! और मुझे शर्मिन्दगी महसूस होती है जब मै उसे कहती हूँ...अभी नही...रुक जाओ ज़रा-सा की,'बिखरे सितारे'के अपने आप पे पड़े प्रभाव से उभर जाऊँ !अपने खुद के लेखन का प्रभाव नही ! जानती हूँ,की,लेखन में कई कमियाँ रह गयीं. खुद को तसल्ली दे देती हूँ,की,मै वैसे भी लेखक या लेखिका तो हूँ नही! यहाँ बात कर रही हूँ, एक जीवन से उसके अतीत में जाके जुड़े रहने का प्रभाव.
मुख पृष्ठ   से शायद पूजा  की तसवीर अब हटानी चाहिए. लेकिन दीपा की कोई मौज़ूम तसवीर फिलहाल उपलब्ध नही.दो तीन ब्लॉगर दोस्तों से मैंने उस तसवीर को हटा देने के बारे में बात कही तो सभी ने निषेध कर कहा,की,वो तसवीर अब इस ब्लॉग की पहचान है! सवाल ये भी है,की,दीपा की कहानी,जो इतनी लम्बी निश्चित ही नही,का शीर्षक क्या होना चाहिए? दिमाग में उहापोह जारी है.

इस अंतराल में पूजा के जीवन में चंद घटनाएँ और घटीं..क्या उन्हें लिखना चाहिए या जहाँ मालिका रोक दी,वहीँ अब रुक जाना चाहिए? तय नही कर पा रही हूँ.
इस सफ़र में अनेक पाठक जुड़े. उनकी टिप्पणियाँ पढना अपने आप में मुझे एक सफ़र पे ले जाता है. पहले प्रकाशन के समय जिनकी हर किश्त पे टिप्पणी आती रही वो हैं हम  सब के चहेते मेजर गौतम राजरिशी. मै स्वयं हैरान हूँ,की इतना व्यस्त इंसान इस तरह एक साल भर किसी मालिका से जुड़ के ,इतने नियम से,हरेक लफ्ज़ पढ़ के कैसे टिप्पणी दे सका? कुछ टिप्पणियाँ तो उन्हों ने अस्पताल के बिस्तर परसे की हुई हैं! उनका जितना शुक्रिया अदा करूँ,कम है. गौतमजी, आपने बेहद हौसला अफज़ाई की. कई बार दो कड़ियों के बीछ दो हफ़्तों तक का अंतराल पड़ जाता था,और मुझे लगता की,शायद अब आगे बढना मुमकिन नही. तभी ख़याल आता की,ये ऐसे पाठकों के साथ नाइंसाफी है जो इतने मन से और नियम से इस श्रीन्खलाके साथ जुड़े हैं.
वंदना अवस्थी दुबे,वंदना गुप्ता, ज्योति सिंह, इन सभी की हरेक कड़ी के बाद टिप्पणियाँ हैं. अगली बार इन सभी के बारे में लिखना चाहूँगी. अपने प्रथम प्रकाशन के बाद जब दोबारा प्रकाशन  किया तो कुछ और पाठक मित्र जुड़े. उनकी भी टिप्पणियाँ पढके लगता है,की,लेखन सफल हो गया.
क्रमशः ( ज़्यादा नही,और दो या तीन किश्तें...आप सभी के साथ जुड़े रहने का एक सुखद संस्मरण!)

13 टिप्‍पणियां:

ali ने कहा…

अगर दीपा के इंटरव्यू के इन्साफ किया जाना है तो बिखरे सितारे से पूजा की स्मृतियों को कहीं घड़ी करके रखना बेहतर होगा ! फोटो भी !

मुझे नहीं लगता कि पूजा की फोटो के साथ मैं दीपा को तटस्थ तरीके से देख सकूंगा !

सवाल ब्लॉग की पहचान का नहीं ,वो तो आपकी कलम से है , सवाल नए कैरेक्टर की अस्मिता और स्वतंत्र आईडेंटिटी का है !

बाकी आप जो बेहतर समझें !

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

इस बार मुझे भी जोड़ लो अपने साथ. :)

यहाँ नहीं तो मेल से....इंतज़ार रहेगा.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

दी, पहले पूजा की जिन्दगी में जो घटनाएं घटीं, उन्हें लिखें, अभी हम सबके दिलों में भी पूजा ही हाबी है.
दीपा के बारे में बाद में. उनका साक्षात्कार भी हम पढेंगे ही.
और हां, ये मेरा नाम क्यों चमक रहा है पोस्ट में?
मैने क्या किया? आप भी न....

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

*** हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र की उन्नति।

pragya ने कहा…

पूजा के साथ जो अन्य घटनाएँ हुई हैं उन्हें जानने का इंतज़ार दीपा जी को जानने से अधिक है...

arvind ने कहा…

blog ki pahachaan to aapse hai....photo change kare our ab pujaa ke badale deepa ki jeevani likhe ye mera request hai....

गौतम राजरिशी ने कहा…

मेरे ख्याल से "बिखरे सितारे" को हम पाठकगण पूजा/तमन्ना से कुछ इस कदर जोड़ चुके हैं कि कहीं ऐसा न हो कि गीता के साथ पाठक न्याय न कर पायें। शेष तो आखिरी निर्णय आपका ही होगा। लेकिन गीता की चर्चा शुरू होने पर पूजा की तस्वीर मुखपृष्ट पे रखना भी तर्क-संगत नहीं होगा। या तो इस हेडर को दो भागों में बांटते हुये गीता की तस्वीर भी लगा दी जाये....

मेरे लिये आपका स्नेह अभिभूत करता है। पूजा/तमन्ना की कहानी में ही कुछ ऐसी बात थी की शुरू से ऐसा जुड़ा रह कि फिर छोड़ ही नहीं पाया। उन्हें मेरा सलाम कहियेगा।

JHAROKHA ने कहा…

shama ji ,
main aapki post hmesh se hi padhti aai hun. han, idhar kuchhparisthitiyo vash nahi padh paai thi vo maine aapko pahle bhi likha tha. aaj punh aapki post padh rahi hun .ab deepa se mulakaat karva hi dijiye.iske purv ki saari kishte bahut hi achhi lagin.
poonam

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

hame bhi judna achchha lagega....ek bhai ke roop me......:)

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

hame bhi judna achchha lagega....ek bhai ke roop me......:)

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

hame bhi judna achchha lagega....ek bhai ke roop me......:)

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आपने! अब तो अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है और देखते हैं की दीपा के बारे में अब अगली कड़ी में क्या लिखते हैं!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

आपकी कहानी अपने आप ही पाठक को खींच लेती है.. इसमें बेचारे पाठक का क्या दोष.. :) इसबार पुनर्पठन था इसलिए अकादमिक व्यस्तताओं की वजह से नियमित नहीं रहा फिर भी आपने इस नाचीज़ को याद रखा आभार मैम..