बुधवार, 1 अगस्त 2012

दयाकी दृष्टी सदाही रखना..! 3


ये सुनकर उसका अपनी अशिक्षित माँ के प्रती आदर एकदम से बढ़ गया। कितने धीरज से ज़िंदगी का सामना किया था उस अनपढ़ औरत ने!
आशाके दिन पूरे हो गए। सरकारी अस्पताल मे  उसका प्रसव हुआ। सबकुछ ठीक ठाक हो गया। नामकरण के समय पतीने कहा,"नाम मे कहीं तो 'राजा' होना चाहिए। यथानाम तथा गुण। मन से धन से वो राजा बनेगा। अंत मे "राजीव"नाम रखा और उसका राजू बन गया। सबकुछ कैसा मनमुताबिक चल रहा था। भगवान्! मेरे नसीब को कहीँ नज़र न लग जाये, कभी,कभी आशाके मनमे विचार आता।

राजू दो सालका हुआ न था कि आशाके पैर फिर भारी हुए। उसे फिर लड़काही हुआ। वो थोडी-सी मायूस हुई। लडकी होती तो शायद आगे चलके सहेली बन गयी होती...... इस लड़केका नाम इन लोगोंने संजीव रखा। राजू-संजूकी जोड़ी!
उसने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलमे डाला। बच्चे आज्ञाकारी थे। माँ-बाप तथा दादीका हमेशा आदर करते। समय पर पढाई खेल कभी कभार हठ्भी, जो कभी पूरा किया जाता कभी नही। दिन पखेरू बनके सरकते रहे......

इस बीच उसने बी.एड.भी कर लिया। पतीने बैंकिंग की औरभी परीक्षाएँ दी तथा तरक़्क़ी पाई। राजू दसवी तथा बारहवी कक्षा तक बहुत बोहोत बढिया नमबरोंसे पास होता गया और उसे सहजही मेडिकल कॉलेज मे प्रवेश मिल गया।
जब संजू बारवी मे था तब आशा की माँ गुज़र गयी। सिर्फ सर्दी-खाँसी तथा तेज़ बुखार का निमित्त हुआ और क्या हो रहा है ये ध्यान मे आनेसे पहलेही उसके प्राण उड़ गए। न्युमोनिया का निदान तो बादमे हुआ।

बहुत  दिनो तक माँ की यादों मे उसकी पलके नम हो जाती। आशा स्कूलसे आती तो माँ चाय तैयार रखती। खाना तैयार रखती। सासकी इस चुस्ती पर उसका पतीभी खुश रहता। धीरे,धीरे खाली घरका ताला खोल के अन्दर जानेकी उसे आदत हो गयी।
संजूको भी बारहवी मे  बहुत अच्छे  गुण मिले राजू के बाद वो भी मेडिकल कॉलेज  दाखिल हो गया। देखतेही देखते राजू एम्.बी.बी.एस.हो गया।
internship पूरी करके सर्जन भी बन गया। उसकी प्रगल्भ बुद्धीमत्ता की शोहरत शहरभर मे फ़ैल गयी और एक मशहूर प्राइवेट अस्पताल मे उसे नौकरी भी मिल गयी। इस दरमियाँ पतीके पीछे लगके उसने छतपे दो सुन्दरसे कमरे भी बनवा लिए थे। राजू संजूके ब्याह्के बाद तो ये आवश्यक ही होगा।

क्रमश: 


मंगलवार, 31 जुलाई 2012

दयाकी दृष्टी सदाही रखना...! २


और एक दिन बाप गुज़र जानेकी खबर आयी। उन दिनों वो गर्भवती भी थी। मायके जाकर अपनी माँ को अपने एक कमरे के घर मे ले आयी। पति  को बैंक की ओरसे घर बनवानेके अथवा खरीदनेके लिए क़र्ज़ मिलने वाला था। दोनोने मिलकर घर ढूढ़ ना शुरू किया। शहर के ज़रा सस्ते इलाकेमे मे दो कमरे और छोटी-सी रसोई वाला,बैठा घर उन्हें मिल गया। आगे पीछे थोडी-सी जगह थी। दोनो बेहद खुश हुए। कमसे कम अब अपना बच्चा पत्रे के छत वाले, मिट्टी की दीवारोंवालें , घुटन भरे कमरेमे जन्म नही लेगा!
वो और उसकी माँ , दोनोही बेहद समझदारीसे घरखर्च चलाती । कर्जा चुकाना था। माँ नेभी अडोस पड़ोस के कपडे रफू कर देना,उधडा हुआ सी देना, बटन टांक देना, मसाले बना देना तो कभी मिठाई बना देना, इस तरह छोटे मोटे काम शुरू कर दिए। वो बेटीपर कतई बोझ नही बनना चाहती थी और उनका समयभी कट जाता था।
एक दिन आशाने कुतुहल वश उनसे पूछा,"माँ, मैं तेरी कोख से सिर्फ एकही ऑलाद कैसे हूँ? जबकी आसपास तुझ जैसों को ढेरों बच्चे देखती हूँ?"
माँ धीरेसे बोली,"सच बताऊँ ? मैंने चुपचाप जाके ऑपेरशन  करवा लिया था। किसीको कानोकान खबर नही होने दी थी। तेरा बाप और तेरी दादी"बेटा चाहिए "का शोर मचाके मेरी खूब पिटाई लगाते थे। मेहनत मैं करुँ,शराब तेरा बाप पिए, ज़्यादा बच्चों का पेट कौन भरता?बहुत  पिटाई खाई मैंने,लेकिन तुझे देख के जी गयी। तेरी दादी कहती,तेरे बाप की दूसरी शादी करा देंगी , लेकिन उस शराबी को फिर किसीने अपनी बेटी नही दी। "

क्रमश:

हिंदी,कहानी,शादी,बेटी। 

सोमवार, 30 जुलाई 2012

दयाकी दृष्टी सदाही रखना.....1(Kahani)


शीघ्र सवेरे कुछ साढ़े चार बजे,आशाकी आँखे इस तरह खुल जाती मानो किसीने अलार्म लगाके उसे जगाया हो। झट-से आँखों पे पानी छिड़क वो छत पे दौड़ती और सूर्योदय होनेका इंतज़ार करते हुए प्राणायाम भी करती। फिर नीचे अपनी छोटी-सी बगियामे आती। कोनेमेकी हिना ,बाज़ू मे जास्वंदी,चांदनी,मोतियाकी क्यारी, गेट के कमानपे चढी जूहीकी बेलें,उन्हीमे लिपटी हुई मधुमालती। हरीभरी बगिया। लोग पूछते, क्या डालती हो इन पौधों मे ? हमारे तो इतने अच्छे नही होते? प्यार! वो मुस्कुराके कहती।

हौले,हौले चिडियांचूँ,चूँ करने लगती।पेडों परके पत्तों की शबनम कोमल किरनोमे चमकने लगती! पँछी इस टहनी परसे उस टहनी पर फुदकने लगते। बगियाकी बाड्मे एक बुलबुलने छोटा -सा घोंसला बनाके अंडे दिए थे। वो रोज़ दूरहीसे झाँक कर उसमे देखती। खुदही क्यारियोंमेकी घाँस फूँस निकालती। फिर झट अन्दर भागती। अपनेको और कितने काम निपटाने हैं,इसका उसे होश आता।

नहा धोकर बच्चों तथा पतीके लिए चाय नाश्ता बनाती। पती बैंक मे नौकरी करता था। वो स्वयम शिक्षिका। बच्चे डॉक्टरी की पढाई मे लगे हुए। कैसे दिन निकल शादी होकर आयी थी तब वो केवल बारहवी पास थी बाप शराबी था। माँ ने कैसे मेहनत कर के उसे पाला पोसा था। तब पती गराज मे नौकरी करता था।

शादी के बाद झोपड़ पट्टी मे रहने आयी। पड़ोस की भाभी ने एक हिन्दी माध्यम के स्कूलमे झाडू आदि करने वाली बाई की नौकरी दिलवा थी । बादमे उसी स्कूलकी मुख्याध्यापिकाके घर वो कपडे तथा बर्तन का काम भी कर ने लगी। पढ़ने का उसे शौक था। उसे उन्हों ने बाहर से बी ए करने की सलाह दी। वो अपने पतीके भी पीछे लग गयी। खाली समयमे पढ़ लो,पदवीधर बन जाओ,बाद मे बैंक की परीक्षाएँ देना,फायदेमे रहोगे।
धीरे,धीरे बात उसकी भी समझ मे आयी। कितनी मेहनत की थी दोनो ने! पढाई होकर,ठीक-से नौकरी लगनेतक बच्चों को जन्म न देनेका निर्णय लिया था दोनोने। पती को बैंक मे नौकरी लगी तब वो कितनी खुश हुई थी !

क्रमश:

मेरा कथासंग्रह,"नीले पीले फूल" इस किताब से ये कहानी ली है।


रविवार, 15 जुलाई 2012

कहानी किस किसकी?

पता नहीं मैंने कौनसा बटन दबा दिया कि , इसके पहले की पोस्ट गायब हो गयी! खैर।..

आज मैंने आमिर खान का 'सत्यमेव जयते' ये व्रुद्धों की समस्यायों पे आधारित कार्यक्रम देखा... बड़े दिनों से एक परिवार के बारे में लिखना चाह रही थी पर  उसे लिखने की चाहत खो चुकी थी।...वो चाहत फिर से जागृत हो गयी।

बात मेरे नैहर के एक परिवार की है...महाराष्ट्रियन परिवार...मेरी पाठशाला उस परिवार के पास में थी....दोपहरक का भोजन खाने,मई अपना टिफिन लेके उनके घर जाती थी ....उस परिवार की मुखिया एक 50 वर्षीय बेवा महिला थी...मुझे अचार आदि परोस देतीं....उन्हें मै  'आजी' मतलब दादी कहके बुलाती... मेरी दादी के साथ उनकी अच्छी खासी पटती थी। दादी उन्हें काफी सारे हाथ के हुनर सिखाये। वो महिला उन  हुनर के सहारे थोड़ा बहुत कमा भी लेती थीं।

उनके चार बेटे थे।उनके पति फ़ौज में डॉक्टर थे।सबसे छोटा बेटा जब 2 साल का था,तब उनका देहांत हो गया।इस 4 जमात पास महिला ने अपने बच्चों को बड़ा किया....पढाया लिखाया...उनका घर एक दो मंज़िले इमारत  में था। पहले माले पे...पैखाना नीचे उतर के था.... पूरी इमारत के लिए केवल एक ....!

समय आगे बढ़ता गया...बेटे बड़े होते गए।...पढ़े लिखे.... दो बेटे आयुर्वेदिक डॉक्टर बने....एक बेटे ने अपने पिता  की practice संभाली।( वो  की जगह को इस महिलाने छोड़ा नहीं था). उसका ब्याह उस महिला ने अपने भाई के बेटी के साथ कर दिया..उसे भी दो बेटे हुए ..... मै  अन्य  बेटों के परिवार की बारीकियों में नहीं जाउंगी ,क्योंकि इसी बेटे की पत्नी के बारेमे लिखना चाहती हूँ ...उस वृद्धा के अलावा ...

मेरी दादी अपनी सहेली को हमेशा कहती रहती की,अपनी जायदाद,अपने जीते जी किसी के नाम नहीं करना ....लेकिन उसने ये सलाह नहीं मानी .....बँटवारा कर दिया .....और नतीजा ये की,अंत में चारों ने किनारा कर लिया! वो बेचारी कभी किसी बेटे के घर तो कभी किसी के घर रहतीं ....सभी की गृहस्थी में अपना हाथ बंटाती ....खाना बनाती,सफाई करतीं...बचे हुए समय कढ़ाई बुनाई करतीं ... कुछ साल तो ये सिलसिला थी रहा।लेकिन धीरे,धीरे समय बदलता गया ..बेटों को बूढ़ीमाँ अखरने  लगी।...उनका मिज़ाज भी ज़रा तेज़ था ..पर वो बहू बेटों का ख़याल भी बहुत करतीं .....अपने पोते  पोतियों की देखभाल कर लेतीं..

और एक दिन वो भी आया जब सबसे छोटे बेटे ने उन्हें घरसे धक्का मार निकाल दिया! वो धाम से जा गिरी .....हड्डियाँ टूट गयीं।...अस्पताल में दाखिल कराया गया.....मेरा तो तबतक ब्याह हो चुका था। बाद में उन्हें उस बेटे के घर लाया गया जिसकी पत्नी उनके अपने सगे भाई की बेटी थी।

अब ये वृद्ध अधिकतर बीमार रहने लगीं।...एक बार मई उन्हें मिलने गयी तो बेचारी बिस्तर में पड़े,पड़े बहुत रोने लगीं।...बोलीं," देख मेरा क्या हाल हो गया है! ईश्वर  मुझे उठा क्यों नहीं लेता? मेरा कौनसा इम्तेहान ले रहा है? मै  सीढियाँ  उतरके पैखाने में भी नहीं जा सकती.... "
मै  क्या कहती?उन्हें अपने साथ भी नहीं ले जा सकती ....हम लोग खुद ही बंजारों की-सी ज़िंदगी जी रहे थे ....ना घर का पता रहता न दरका...उनकी देख भाल कैसे करती....? और एक दिन ख़बर  मिली की वो चल बसीं .....उन्हें दर्द से मुक्ती तो मिली पर कई अनसुलझे  सवालात हम सभी के मन में घिर गए।

समय बीतता रहा ....जिस पुत्र ने  अपने पिता  का दवाखाना सँभाला  था ....जिसकी पत्नी उसकी खुद की मुमेरी बहन थी .... उसके बेटों का भी ब्याह हो गया ... बड़े वाला पुणे  में नौकरी करने लगा और छोटे वाला ,जिसने homeopathy पढी( पर सुना  है वो भी पूरी नहीं),अपने पिता  के साथ काम करने लगा ....पिता  की शोहरत बहुत थी ....उसे अपने पिता की शोहरत का लाभ हुआ और इस बेटे को उस के पिता की शोहरत का!

मेक बार मई अपने मायके गयी हुई थी और अचानक खबर सूनी की,उसके पिता  का,जो हमारे परिवार के भी डॉक्टर रहे थे,अचानक निधन हो गया! हम सभी को बहुत दुःख हुआ....उनकी बहू भी homeopath थी।....उन्ही के दवाखाने में अपनी practice करती थी।...मै  एक दो बार जब उससे मुखातिब हुई थी,तो मुझे वो बेहद सडियल लगी थी....

फिर सुननेमे आया ....अपनी आँखों से देखा भी,की इस बहू ने और बेटे ने अपनी माँ के साथ बहुत बुरा सुलूक शुरू किया.. हम लोग भाई बहन उन्हें भाभी कह के बुलाया करते....अब दरबदर भटकने की भाभी की बारी आ गयी! समय ने एक पूरा चक्र घुमा लिया था! मेरी दादी हमेशा कहा करतीं," रानी के साथ भी वही होगा,जो उसने उसकी सास के साथ किया।..देखते रहना!"

कितना सत्य था दादी के वचन में ....लेकिन भाभी ने तो अपने बच्चों के साथ ना अपनी बहुओं के साथ कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं की थी।...उनके साथ ऐसा क्यों? हमारे मन में सवाल ज़रूर था....जवाब ये की उनके अपने पति  ने अपने मृत्यु पत्र  में उनके लिए कोई सुविधा नहीं की थी! जबकि बेटे को एक घर बनवा दिया था ....उनका लड़का उस घर में रहने भी नहीं गया,क्योंकि दवाखाना इस घर के नीचे था।भाभी के नाम कोई जमा पूँजी  नहीं थी ....उनके पति को ये विश्वास था कि ,दो दो कमाऊ बेटे हैं,पोते पोती हैं,जिनकी देखभाल उनकी दादी करती है तो उसे कमी किस बात की होगी?वो ये बात भूल गए कि ,स्वयं उनकी माँ के साथ क्या हुआ था ....!

मेरे बेटे के ब्याह में भाभी आनेवालीं थीं। हमने बहुत राह देखी लेकिन वो नहीं आयीं ....उनके पास तो मोबाईल फोन भी नहीं था,की,हम पता कर पाते  ! सुना  था कि  लैंड लाइन  पे उन्हें बात ही नहीं करने दी जाती है....जब बेटा बहू नीचे अपने दवाखाने  में जाते तो फोन को ताला  लगा के जाते!

कुछ दिनों बाद पता चला ,भाभी मेरे बेटे के ब्याह के लिए जिस दिन हमारे शहर से निकलने वालीं थीं, उन्हें उनकी ईमारत के सामने,किसी स्कूटर वाले ने दे गिराया  .....उनकी कई हड्डियाँ  टूट गयीं .....आनन् फानन में उन्हें पुणे लाया गया और अस्पताल में दाखिल करने से पूर्व उनकी फीस वो खुद देंगी .. किसी बेटे की ज़िम्मेदारी नहीं रहेगी, ये बात भी तय कर ली गयी ! सुनके मेरा दिल दहल गया! बाद में उन्हें उनके बड़े बेटे ने, जो पुणे में कार्यरत था, वापस उन्हें उसी शहर भेज दिया जहाँ पैखाने जाने के लिए उन्हें सीढ़ियाँ  उतरनी पडतीं! इस 'सुपुत्र' को भी उसके पिता ने घर ले दिया था! दोनों बेटों के पास अपने माँ बाप की बदौलत अपने अपने घर थे लेकिन माँ के लिए जगह नहीं थी! जगह उनके मन में नहीं थी ....या है!भाभी ने बाद में अपना सारा ज़ेवर ,जो उन्हें अपने पिता से मिला था,बेच दिया ....इस बात पे भी उन के बेटों ने बहुत नाराज़गी  व्यक्त की ! भाभी ने कहा," आख़िर  मै  अपनी दावा दारु के .....अपनी देखभाल के पैसे कहाँ से लाती? मै  तो अब ठीक से चल भी नही  पाती !"

भाभी आज भी अपने दो बेटों के बीछ बाँट के रहती हैं ....बेचारी इतना सब कष्ट उठा के भी ज़िंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं करतीं ....कहती हैं, "मेरे नसीब में यही लिखा हुआ था ...किसी से क्या शिकायत करूँ? उनका बैंक का सारा काम मेरे भाई का बेटा देखता है ....उन्हें बैंकिंग के बारे में कुछ पता नहीं ....उसने उनके लिए शेयर के द्वारा आमदनी हो,इस बात की सुविधा भी कर दी ...लेकिन सोचती हूँ,ऐसा कब तक चलेगा? भाभी की ज़िंदगी की क्या यही कहानी है? कोई उपाय नहीं?

सोमवार, 18 जून 2012

ऐसी महिला क्या करे?

रविवार के रोज़ आमिर खान का शो देखा। महिलाओं पे होनेवाले शारीरिक तथा मानसिक अत्याचार के बारेमे। मन में सवाल उठा की ऐसी महिलाएं क्या करें जिनपे होनेवाले अत्याचार का कोई गवाह न हो ? शरीर पे ज़ख्म न दिखें इस तरह का शारीरिक अत्याचार हो? जिनके पतियों की बहुत ऊंची पहुँच हो?
 एक ऐसी महिला को जानती हूँ जो तकरीबन सर्वगुण सप्पन्न है। कलाकार है। उसके बच्चे जब छोटे थे तब उसने पति  से दूर जानेकी कोशिश की। उसपे होनेवाले अत्याचारों से तंग आके। पतीने उसे बच्चों का मूह देखने से भी मना  कर दिया। उसकी एक बेटी भी थी,जोकि अनचाही औलाद थी। महिला को पता था की बाप अपनी बेटी को तो मार ही डालेगा। उसका मायका भी पैसेवाला नहीं था। पति  के होनेवाले तबादलों के कारन वो महिला खुदको कहीं स्थापित भी नहीं कर पाई थी। हाथी के दांत दिखाने  के और तथा खाने के और। जो लोग उस महिला पे होनेवाले अत्याचारों को जान गए थे वो मूह नहीं खोलते थे। ऐसे में कानून क्या कर सकता है? पुलिस क्या कर सकती है? कोई संस्था क्या कर सकती है? आज वो महिला जिसने जीवन भर श्रम किये थे, अपने पति  के घरमे एक कैदी की तरह रहती है। है किसी के पास कोई उपाय?


बुधवार, 2 मई 2012

एक छुटकी की कहानी....

एक छुटकी की कहानी सुनाती हूँ। खेतों में पली पढी।...ऊंचे ऊंचे झूले झूलने वाली   और सोने से पहले अपनी माँ या दादी से कहानी सुना करनेवाली!

इमली, कच्चे  आम और बेर हमेशा खाती रहती।....दांत हमेशा खट्टे रहते।धीरे धीरे वो जवान होती गयी। बेहद समझदार लेकिन उतनी ही हंसमुख और चंचल! बड़ी होके भी उसमे एक छुटकी ,नटखट बच्ची ज़िंदा थी .वो कभी गंभीर होही नहीं पाती।

फिर एक खूबसूरत नौजवान उसकी ज़िंदगी में आया। उन्हें प्यार हो गया। नयनों में सपने बसने लगे। उनका ब्याह भी हो गया। ससुरालवाले इस ब्याह से खुश नहीं थे लेकिन उसने तो ठान ली थी की वो अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लेगी। 

अब वो 'बड़े' लोगों के बीछ आ गयी थी....उनके गुस्से और गंभीरता से वो घबरा  ही  गयी। उसपे सभी की हर समय नज़र रहती।...मानो वो नज़र क़ैद में हो!
अब उसने अपने में बसनेवाली उस नटखट लडकी को दबाके रखनेकी कोशिश शुरू कर दी! उसे पता था जीवन क्षणभंगुर होता है! फिर ये परिवार के लोग खुश रहने के बदले मूह लटकाए क्यों घुमते हैं? वो निरागस लडकी समझ नहीं पाती।....

पता नहीं कब उसके अन्दर बसनेवाली वो छुटकी निद्रिस्त हो गयी। अब वो यौवना  माता बन गयी। बच्चे बड़े होते गए वैसे,वैसे वो भी उम्र में बड़ी होती गयी। अबतक तो  उसके भीतर की वो छुटकी कोमा में ही चली गयी। अंतमे मरही गयी।..आज भी वो सड़ी हुई एक लाश अपने कंधों  पे लेके घूमती रहती है! उस लडकी को जो अब औरत बन चुकी थी अपने घरवालों की तरह 'बड़ा' बनना आयाही नहीं। थक चुकी थी  वो! उसने तो सिर्फ एक साथी की चाह की थी। हंसमुख।..रूठे तो झटसे मान जानेवाला! उसे पैसों की लालच नहीं थी। अपने साथी के साथ वो मीलों गर्मी और बरसात में पैदल चलती रही होती।...उसे कब महंगी गाड़ियों की चाहत थी? शायद ऐसा भोलापन उसका पागलपन था! वो अपने सहचर को केवल हंसमुख देखना चाहती थी।...उसका दुःख बाँट लेना चाहती थी।...उसे क्या पता था की खुशी बाज़ार में नहीं मिलती! उसके साथी से अपने आपको उससे इतना दूर कर लिया के उसके हाथ उसतक पहुँच ही नहीं पाए।...वो उसका हाथ कभी पकड़ नहीं पाई।.
उसकी दर्द भरी  आह आसपास के शोर में  किसी ने सूनी  ही नहीं! .

अब बचे हैं कुछ निश्वास......दिल की केवल उसे ही सुनायी देने वाली धड़कन और कृष्णपक्ष की काली रातें......और हाँ।....उसके कंधे परकी उस मृत बालिका की लाश!

 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

हाय रे ये नेट!

एक बड़ा अजीबो गरीब किस्सा लेके आपके सामने आ रही हूँ. अंजली  का. स्वयं  खुद बड़े डिप्रेशन से गुज़र रही हूँ और अंजली भी. इसीलिये शायद उसे समझ पा रही हूँ.

करामात की है नेट ने......अंजली की उम्र है ४५ साल की दो बेटे हैं. दोनों पढ़ते हैं. पति  अपने काम में हमेशा व्यस्त रहते हैं. अंजली  सुन्दर है. नौकरी करती थी लेकिन पति ने छुडवा दी. वो घर में अकेली हो  गयी और उसे इन्टरनेट पे गपशप करने की लत लग गयी. उसने अपनी तस्वीर भी १० साल पहले की लगा दी थी. .  एक ३० साल के लड़के के साथ मजाक ही मजाक में नजदीकियां बढ़ गयीं. उन दोनोने एक बार मिलने का फैसला किया. बात चुम्बन लेने तक बढ़ गयी. लड़का तो केवल दो पल की मौज लूटना चाहता था लेकिन अंजली को उससे प्यार हो गया. अंजली रोज़ उसे फोन करती है. वो कभी कबार ही फोन उठता है. अंजली को उससे मिले डेढ़ साल के ऊपर हो गया. वो मिन्नतें करती रहती है और वो किसी न किसी बहाने मना  कर देता है. हो सकता है उसकी और भी लड़कियां दोस्त हों.अब अंजली बेहद उदास रहने लगी है. इस उदासी से उसे कैसे निकला जाये समझ में नहीं आता. लड़का तो कालको शादी कर लेगा तब तो उससे मिलना भी गलत होगा. किसी सलाहकार के पास भी जाना नहीं चाहती और नाही पति को बताये बिना जा सकती है..समझमे नहीं आता उसकी कैसे मदद करूँ! हाय रे ये नेट!

अंत में सभी दोस्तों से माफी चाहती हूँ की ख़राब तबियत के कारन न ब्लॉग पढ़ पा रही हूँ न टिप्पणी दे पा रही हूँ!