सोमवार, 27 सितंबर 2010

रहीमा 5

(गतांक: मै उसके घर चली गयी. रहीमा मुझे बच्चों के ऊपरवाले कमरेमे ले गयी और लतीफ़ और ज़ाहिद के मुलाक़ात का किस्सा बताने लगी,"ज़ाहिद  मेरी ख़ातिर हर बात करने के लिए राज़ी था. शाम को वो जैसे ही हॉल के अन्दर प्रवेश करने लगा,लतीफ़ ने उसके सर और मूह पे ज़ोर से hockey स्टिक दे मारी और उसे खूना खून कर दिया. अब वो  बेचारा  साथवाले अस्पताल में पड़ा है.    मै उसे मिलने भी नही जा सकती. इस जानवर का वहशीपन  ना जाने हमें कहा ले जायेगा??"

अब के रहीमा के आँखों से आँसू निकल पड़े. मै खुद दंग रह गयी..ज़ाहिद का तो पूरा घर वैसे ही रहीमा के खिलाफ हो गया था. रहीमा को राहत  मिले तो आखिर कैसे?...अब आगे पढ़ें.)

मै अपने ख़यालों में डूबी घर लौट आयी. लतीफ़ रहीमा को ज़लील करता रहा.  ऐसे ही चार या पाँच दिन बीते और रहीमा का अचानक से फोन आया:" मै मुंबई से बोल रही हूँ...! "
मै: " अरे! कब? कैसे? और लतीफ़? वो भी साथ है या...?'
रहीमा:" लतीफ़ से पीछा छुडा के भागी हूँ...मेरी एक सहेली मुंबई से एक दिन सोलापूर आयी. उसने ऐसे जताया जैसे उसे मेरे और लतीफ़ के बीछ  के  तनाव के बारे में जैसे कुछ ख़बर ही नही...लतीफ़ ने पी तो रखी थी. ये लडकी ब्युतिशियाँ है. लतीफ़ से बोली, अरे आप तो बहुत थके हुए लग रहे हैं...मुझे मस्तिष्क  की  बहुत बढ़िया मसाज करनी आती है...देखिये आपका सारा तनाव चंद पलों में दूर कर देती हूँ...' लतीफ़ कुछ कहे इससे पहले उसने अपने बैग में से एक तेल की बोतल निकली और लतीफ़ के सिरहाने खड़े हो मालिश करने लगी...लतीफ़ आधे मिनिट में खुर्राटे भरने लगा..इसने इशारा किया," भाग निकालो...जो हाथ लगे लो और मुंबई निकल पड़ो...' इस तरह हम लोग मुंबई निकल पड़े! वोभी लतीफ़ को सोता छोड़ पीछे से अपनी कार में निकल आयी...हमलोग अब उसी के घर रुके हैं..!"
मै:" ओह! ये तो बहुत अच्छी बात सुनायी तुमने...! अब आगे का क्या प्लान है? ?"
रहीमा :" ज़फ़र आज सोपूर जा रहा है. कहता है वो अपने हथकंडे अपना के लतीफ़ से तलाक़ के कागजात पे दस्तखत करवा लेगा..."
मै:" खुदा करे और वो कामयाब हो! ! मुझे ख़बर देती रहना!"

दूसरे ही दिन शाम को रहीमा का फोन आया. बोली:" सुनो....! ज़फर ने लतीफ़ से तलाक़ के कागजात पे दस्तखत करवा लिए हैं...! लतीफ़ ज़फर के डराने धमकाने से घबरा गया..हमलोग वहाँ नही थे,इसलिए ये सब हो सका...!"
मै:" तुम्हारी सहेली का लाख,लाख शुक्रिया की,उसे ये तिकड़म सूझी...वरना तो लतीफ़ से पीछा छुड़ाना मानो नामुमकिन लग रहा था..!"
पाँच  या छ: दिनों बाद रहीमा ने ख़बर दी की,लतीफ़ ने अपना असम में तबादला करा लिया और वो वहाँ के लिए रवाना हो गया है. सब से बढ़िया ख़बर ये थी की,ज़ाहिद ने रहीमा के साथ निकाह कर लेनेका इरादा जताया. रहीमा के बच्चों ने इस बात के बड़ी ही खुशी से रजामंदी दिखा दी. ज़ाहिद को जिस दिन से उन बच्चों ने देखा था,वो उन्हें बेहद पसंद था!

वाह! मेरी खुशी और इत्मिनान की इन्तेहा न थी! दुनिया में ऐसा भी हो सकता है? इतने सालों से बिछड़ा  बचपनका प्यार ऐसे किसी को हासिल  हो सकता है? हे ईश्वर! इनकी खुशियों को नज़र ना लगना!
रहीमा और  ज़ाहिद ने मुंबई में निकाह कर लिया और  सोलापूर रहने आ गए. सब से पहले दोनों मुझे मिलने आए. रहीमा की आँखें भर,भर आतीं रहीं...बेहद ख़ुश थी वो...उस के लिहाज़ से एक दो बातें बहुत बढ़िया थीं...अव्वल तो वो अपने पिता के मकान में थी...पती के छोड़ने के बाद उसे कहीँ और मकान तलाशना नही था. दूसरा,चूंकि वह अपने ही पुश्तैनी मकान में थी, ज़ाहिद के घरवालों के मोहताज भी नही थी. वैसे ज़ाहिद ने नया मकान बनाने या खरीद ने का इरादा ज़ाहिर कर ही दिया था...

क्रमश:

किसे पता था,की,वहशत और दहशत किस भेस में छुप मौक़ा तलाश रही थी??

21 टिप्‍पणियां:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

मुझे पता है कि जब आपकी कहानियों में सब कुछ ठीक ठाक लगने लगे तो किसी न किसी तूफ़ान का अंदेशा होता है..लिहाजा अब कभी मैं आपकी कहानी की हिरोईनों की ख़ुशी में खुश नहीं होता.. और आपने आख़िर में अगले एपिसोड की झलक में बता ही दिया है, लिहजा किसी भी पढने वाले को पता चल जाता है कि खुश होने की बात नहीं है, ऑल इज़ नॉट वेल!!

रचना दीक्षित ने कहा…

चलो कुछ तो अच्छा हुआ उम्मीद है आगे भी अच्छा ही हो

दीपक 'मशाल' ने कहा…

किसे पता था,की,वहशत और दहशत किस भेस में छुप मौक़ा तलाश रही थी?
लगा था कि दुःख भरे दिन बीते रे भैया.. सुख भरे दिन आये रे... लेकिन इस आखिरी पंक्ति ने और भी खौफ पैदा कर दिया.. मन हज़ार बातें सोच रहा है.. कितने अंदेशे लगा रहा है.. शैली बहुत अच्छी है.

Apanatva ने कहा…

mai to mills and boon walee aaj bhee ise umr me hoo....
violence pad nahee saktee koi bhugatata bhee hoga ye soch kar hee rongate khade ho jate hai........happy ending please..........padne walo ka bhee manobal badega.........

sm ने कहा…

beautiful story

Dudhwa Live ने कहा…

किस्सागोई का जवाब नही जी!

उम्मतें ने कहा…

अंदेशे अभी बाकी हैं ! लगता है कि जैसे ईश्वर नें सुखांत कथाएं लिखना जाना ही नहीं !

Urmi ने कहा…

बहुत सुन्दर कहानी! सब कुछ जैसा अच्छा हुआ आगे भी इससे भी अच्छा हो यही उम्मीद करती हूँ!

pragya ने कहा…

मन चाहता है कि खुदा इनपर अब कोई कहर न बरपाए पर मन जानता है कि ऐसा हो न सकेगा....

vandan gupta ने कहा…

पहला भाग पढने के बाद बाकी नही पढ पायी थी सो आज सारे पढ लिये सब कुछ अच्छा होने लगा था मगर ये आखिरी पंक्तियों ने दिल दहला दिया………………पता था,की,वहशत और दहशत किस भेस में छुप मौक़ा तलाश रही थी??
अब क्या होने वाला था?

मंजुला ने कहा…

बहुत अच्छी कहानी है .....आगे का इंतज़ार है......

मंजुला ने कहा…

बहुत अच्छी कहानी है .....आगे का इंतज़ार है......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर और धारा प्रवाह गति से चल रही इस कहानी के अगले अंक का इन्तजार है!

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

मानव मन का विश्लेषण करती हुई कहानी अपने वेग से अग्रसर हो रही है।...उत्सुकता बढ़ गई है।

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
काव्य प्रयोजन (भाग-१०), मार्क्सवादी चिंतन, मनोज कुमार की प्रस्तुति, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

rajesh singh kshatri ने कहा…

बहुत सुन्दर ...

लाल कलम ने कहा…

बहुत सुन्दर

बेनामी ने कहा…

आप ने बहुत अच्छा लिखा है, लेकिन इसमें कहानी का फैलाव कहीं नहीं दिखता, अगर आप कहानी के तौर पर लिख रहें हैं तो|

Asha Joglekar ने कहा…

सुंदर जा रही है कहानी । रहीमा को भी अच्छे दिन देख नो को मि ल ही गये । ऐसा ही सुख मिलता रहे ।

Apanatva ने कहा…

pichalee do teen post se aap kee anupasthitee ?

arvind ने कहा…

bahut dino se aapke post ki prateeksha me thaa....achhi kahanee chal rahee hai....kaafee rochak.