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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

उसकी मौत का ज़िम्मेदार कौन?3अंतिम


पिछली किश्त में मैंने बताया की , तसनीम की दिमागी हालत बिगड़ती जा रही  थी...लेकिन उसकी गंभीरता मानो किसी को समझ में नही आ रही थी...

उसे फिर एकबार अपने पती के पास लौट जाने के लिया दबाव डाला जा रहा था..जब कि, पतिदेव ख़ुद नही चाहते थे कि,वो लौटे...हाँ..बेटा ज़रूर उन्हें वापस चाहिए था..!

हम लोग उन दिनों एक अन्य शहर में तबादले पे थे। दिन का समय था...मेरी तबियत ज़रा खराब थी...और मै , रसोई के काम से फ़ारिग हो, बिस्तर पे लेट गयी थी...तभी फोन बजा....लैंड लाइन..मैंने उठा लिया..दूसरी ओर से आवाज़ आयी,
" तसनीम चली गयी..." आवाज़ हमारे एक मित्र परिवार में से किसी महिला की थी...
मैंने कहा," ओह ! तो आख़िर अमेरिका लौट ही गयी..पता नही,आगे क्या होगा...!"

उधर से आवाज़ आयी," नही...अमेरिका नही..वो इस दुनियाँ से चली गयी और अपने साथ अपने बेटे को भी ले गयी...बेटी बच गयी...उसने अपने बेटे के साथ आत्महत्या कर ली..."
मै: ( अबतक अपने बिस्तर पे उठके बैठ गयी थी)" क्या? क्या कह रही हो? ये कैसे...कब हुआ? "

मेरी मती बधीर-सी हो रही थी...दिल से एक सिसकती चींख उठी...'नही...ये आत्महत्या नही..ये तो सरासर हत्या है..आत्महत्या के लिए मजबूर कर देना,ये हत्या ही तो है..'

खैर! मैंने अपने पती को इत्तेला दे दी...वे तुंरत मुंबई के लिए रवाना हो गए...
बातें साफ़ होने लगीं..तसनीम ने एक बार किसी को कहा था,' मेरी वजह से, मेरे भाई की ज़िंदगी में बेवजह तनाव पैदा हो रहे हैं..क्या करूँ? कैसे इन उलझनों को सुलझाऊँ? '

तसनीम समझ रही थी,कि, उसकी भाभी को वो तथा उसके बच्चों का वहाँ रहना बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था...उसके बच्चे भी, अपनी मामी से डरे डरे-से रहते थे..जब सारे रास्ते बंद हुए, तो उसने आत्म हत्या का रास्ता चुन लिया..पिता कैंसर के मरीज़ थे..माँ दिल की मरीज़ थी..तसनीम जानती थी,कि, इनके बाद उसका कोई नही..कोई नही जो,उसे समझ सकगा..सहारा दे सकेगा..और सिर्फ़ अकेले मर जाए तो बच्चे अनाथ हो,उनपे पता नही कितना मानसिक अत्याचार हो सकता है????

उसने अपने दोनों बच्चों के हाथ थामे,और १८ मंज़िल जहाँ , उसके माँ-पिता का घर था, छलांग लगा दी...दुर्भाग्य देखिये..बेटी किंचित बड़ी होने के कारण, उसके हाथ से छूट गयी..लेकिन उस बेटी ने क्या नज़ारा देखा ? जब नीचे झुकी तो? अपनी माँ और नन्हें भाई के खून से सने शरीर...! क्या वो बच्ची,ता-उम्र भुला पायेगी ये नज़ारा?

अब आगे क्या हुआ? तसनीम की माँ दिल की मरीज़ तो थी ही..लेकिन,जब पुलिस उनके घर तफ्तीश के लिए आयी तो इस महिला का बड़प्पन देखिये..उसने कहा," मेरी बेटी मानसिक तौर से पीड़ित थी..मेरी बहू या बेटे को कोई परेशान ना करना...."

इतना कहना भर था,और उसे दिलका दौरा पड़ गया..जिस स्ट्रेचर पे से बेटी की लाश ऊपर लाई गयी,उसी पे माँ को अस्पताल में भरती कराया गया..तीसरे दिन उस माँ ने दम तोड़ दिया...उसके आख़री उदगार, उसकी, मृत्यु पूर्व ज़बानी( dying declaration)मानी गयी..घर के किसी अन्य सदस्य पे कोई इल्ज़ाम नही लगा...!

इस बच्ची का क्या हुआ? यास्मीन के नाम पे उसके पिता ने अपनी एक जायदाद कर रखी थी..ये जायदाद, एक मशहूर पर्वतीय इलाकेमे थी...पिता ने इस गम के मौक़े पे भी ज़हीन संजीदगी दिखायी..उन्हीं के बिल्डिंग में रहने वाले मशहूर वकील को बुला, तुंरत उस जायदाद को एक ट्रस्ट में तब्दील कर दिया, ताकि,दामाद उस पे हक ज़माने ना पहुँच जाय..
और कितना सही किया उन्हों ने...! दामाद पहुँच ही गया..उस जायदाद के लिए..बेटी को तो एक नज़र भर देखने में उसे चाव नही था...हाँ..गर बेटा बचा होता तो उसे वो ज़रूर अपने साथ ले गया होता..

उस बेटी के पास अब कोई चारा नही था..उसे अपने मामा मामी के पासही रहना पड़ गया..घर तो वैसे उसके नाना का था...! लेकिन इस हादसे के बाद जल्द ही, तसनीम के भाई ने अपने पिता को मुंबई छोड़, एक पास ही के महानगर में दो मकान लेने के लिए मजबूर कर दिया..अब ना इस बच्ची को उनसे मिलने की इजाज़त मिलती..नाही उनके अपने बच्चे उनसे मिलने जाते..उनके मनमे तो पूरा ज़हर भर दिया गया..इस वृद्ध का मानसिक संतुलन ना बिगड़ता तो अजीब बात होती..जिसने एक साथ अपनी बेटी, नवासा और पत्नी को खोया....

इस बच्ची ने अपने सामने अपनी माँ और भाई को मरते देखा..और तीसरे दिन अपनी नानी को...! इस बात को बीस साल हो गए..उस बच्ची पे उसकी मामा मामी ने जो अत्याचार किए, उसकी चश्मदीद गवाह रही हूँ..इतनी संजीदा बच्ची थी..इस असुरक्षित मौहौल ने उसे विक्षप्त बना दिया..वो ख़ुद पर से विश्वास खो बैठी...कोई घड़ी ऐसी नही होती, जब वो अपनी मामी या मामा से झिड़की नही सुनते..ताने नही सुनती....अपने मामा के बच्चे..जो उसके हम उम्र थे...वो भी, इन तानों में, झिड़कियों में शामिल हो जाते...

ये भी कहूँ,कि, आजतलक,उस बच्ची के मुँह से किसी ने उस घटना के बारेमे बात करते सुना,ना, अपनी मामा मामी या उनके बच्चों के बारेमे कुछ सुना...जैसे उसने ये सारे दर्द,उसने अपने सीनेमे दफना दिए....

ट्रस्ट में इस बात का ज़िक्र था कि, जब वो लडकी, १८ साल की हो जाय,तो उस जायदाद को उसके हवाले कर दिया जाय..वो भी नही हुआ..

मामाकी,अलगसे कोई कमाई नही थी...अपने बाप की जायदाद बेच जो पैसा मिला, उसमे से उसने,अलग,अलग जायदाद,तथा share खरीदे...और वही उन सबका उदर निर्वाह बना..और खूब अच्छे-से...बेटा बाहर मुल्क में चला गया..तसनीम की माँ के बैंक लॉकर में जो गहने-सोना था, बहू ने बेच दिया...ससुर के घर में जो चांदी के बर्तन थे, धीरे,धीरे अपने घर लाती गयी...और परदेस की पर्यटन बाज़ी उसी में से चलती रही...

अब अगर मै कहूँ,कि, काश वो बद नसीब बच्ची नही बचती तो अच्छा होता,तो क्या ग़लत होगा? उसकी पढ़ाई तो हुई..क्योंकि,अन्यथा, मित्र गण क्या कहते? इस बात का डर तो मामा मामी को था..लेकिन पढाई के लिए पैसे तो उस बच्ची के नाना दे रहे थे! उस बच्ची को बारह वी के बाद सिंगापूर एयर लाइन की शिष्य वृत्ती मिली..उसे बताया ही नही गया..ये सोच कि,वहाँ न जाने क्या गुल खिलायेगी...! जो गुल उसने नही खिलाये, वो इनकी अपनी औलाद ने खिला दिए..इनकी अपनी बेटी ने क्या कुछ नही करतब दिखाए?

इन हालातों में तसनीम के पास आत्म हत्या के अलावा क्या पर्याय था? वो तो अपने भाई का घर बिखरने से बचाना चाह रही थी...! गर उसकी मानसिक हालत को लेके,उसके सगे सम्बन्धियों सही समय पे दक्षता दिखायी होती,तो ये सब नही होता...पर वो अपने पती के घर लौट जाय,यही सलाह उसे बार बार मिली...और अंत में उसने ईश्वर के घर जाना पसंद कर लिया...मजबूर होके!

उस बच्ची का अबतक तो ब्याह नही हुआ..आगे की कहानी क्या मोड़ लेगी नही पता..लेकिन इस कहानी को बयाँ किया..यही सोच,कि, क्यों एक औरत को हर हाल में समझौता कर लेने के लिए मजबूर किया जाता है? इस आत्महत्या को न मै कायरता समझती हूँ,ना गुनाह..हाँ,एक ज़ुल्म,एक हत्या ज़रूर समझती हूँ...ज़ुल्म उस बच्ची के प्रती भी...जिसने आज तलक अपना मुँह नही खोला..हर दर्द अंदरही अन्दर पी गयी...

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

बिखरे सितारे :भाग २: सैलाबे दर्द...

पिछले  भाग  में  पढ़ा :मकान मालकिन चाभी ले गयी, और पूजा पर गौरव औरभी गरज पडा..पूजा से बोला ना गया..बोलती भी तो उसकी कौन सुनता? उसने अपनी सास तथा जेठानी के मुखपे एक कुटिल -सी मुस्कान देखी.
और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..
अब आगे:


पूजा इन हालातों में अपने आपको बेहद अकेला महसूस करने लगी...पलकों पे आँसूं तैरते रहते और वो उन्हें अन्दर  ही अन्दर पी जाती..किसे कहे..किसे सुनाये..जिसके साथ वो दो बातें प्यारकी करना चाहती, जिससे दो बातें प्यारकी सुनना चाहती, वो बडाही बेदर्द निकला...पूजा को विश्वास नही होता की,गौरव इस तरह का बर्ताव करेगा...दिन गुज़रते रहे..वो मुरझा-सी गयी...


ब्याह को तीन माह होने आए और उसके पैर भारी हो गए...एक अतीव आनंद उसके मनमे समाया...खुदके माँ बन्ने से अधिक उसे इस बात की खुशी हुई, की, उसकी माँ नानी बनेगी..उसकी दादी परनानी बनेगी...वो लोग कितने ख़ुश होंगे...और खुशी का ज़रिया उनकी लाडली पूजा तमन्ना  होगी..लेकिन विधीका विधान कुछ और था...उसे रक्त स्त्राव  शुरू हो गया, और गर्भ पात हो गया..उसके मनमे आया,काश, उसने अपने नैहर ख़त न लिखा होता..! उसके पीहर में सब कितने निराश हो जायेंगे  जब ये खबर  सुनेंगे!.सभी को पूजा की चिंता होगी..की उसका स्वस्थ तो ठीक है...


जब पूजा को  ऑपरेशन के लिए ले गए तो उसे लोकल अनेस्थेशिया  देने का भी  उस महानगर  के doctors को ध्यान नही रहा...जैसे साग सब्ज़ी  काटनी हो उस तरह से वो ऑपरेशन कर दिया गया..पूजा चींख चींख के कहती रही,की, उसे बेहद दर्द है, और डॉक्टर ने डांट दिया," इतना दर्द तो सहनाही पडेगा..."
इतना अमानवीय बर्ताव उसने कहीँ न देखा था ना  सुना था..! जब कमरेमे आयी तो पीली फक्क पड़ गयी थी..गर उसके दादी दादा उसकी ये हालत देखते तो उनपे क्या गुज़रती?


गौरव का उसके साथ बर्ताव उन्हें कितना दर्द पहुँचाता? उसने क्या करना चाहिए? चुपचाप सहना चाहिए या....?गौरव और उसके परिवारवालों को समय देना चाहिए? फिलहाल उसे चुपही रहना चाहिए...नैहर में कुछ नही बताना चाहिए,उसके मनने उसे गवाही दी...किसे पता था,की, इतनी कोमल लडकी शारीरिक मानसिक दर्द का ऐसा सैलाब थाम सकती थी?


ब्याह के छ: माह बाद उसे अपने नैहर जाने का मौक़ा मिला..उसके पिता उसे लेने आए..


क्रमश:

शनिवार, 12 सितंबर 2009

बिखरे सितारे १३) सितारों से आगे.....!

( पूजाकी ज़िंदगी पे उड़ एक चली गोली के दूरगामी असर हुए: अब आगे पढ़ें।)

जिस बच्चे को गोली लगी उसका क्या हुआ? उसे जाँघ पे गोली लगी। दादा जी ने निशाने बाज़ी में सिखा रखा था,वो काम आ गया...वरना लड़का जानसे जाता... पूजाके दादा जी ने उसे सही वक़्त पे अस्पताल पहुँचाया। वो बच गया। लेकिन उसके बापने सारी उम्र पूजाके परिवार को black मेल किया। हालाँकि,क़ानूनन ऐसी कोई ज़िम्मेदारी नही बनती थी, लेकिन वो १२ बच्चों का परिवार था। बाप तो शराबी थाही..पूजाके परिवार ने बरसों उन्हें साल भरका अनाज, दूध कपड़े आदि दिए। तीज त्यौहार पे पैसे भी देते रहे। चंद सालों बाद वो निकम्मा लड़का एक सड़क हादसे का शिकार होके मारा भी गया। परिवार मे से किसी बच्चे को काम करना ही नही होता...ये भी एक अजूबा था...!

एक बार लड़केका बाप उस लड़के को लेके, पूजाके तथा परिवार के फॅमिली डॉक्टर के पास पहुँचा। शिकायत ये कि, जबसे गोली लगी, लड़के को एक कान से सुनायी देना कम हो गया...! तबतक तो हादसे को छ: साल बीत चुके थे। डॉक्टर की शहर में बेहद इज्ज़त थी..गरीबों के डॉक्टर कहलाते थे।

इन डॉक्टर ने उस लड़के के गाल पे एक थप्पड़ लगाई और कहा," अब दूसरे कान को बहरा कर दिया मैंने...भाग जा..!"

खैर! पूजाके जीवन पे लौट चलती हूँ। पूजा छुट्टीयों में घर आने से पूर्व , दादा जी ने उस IAS के लड़के को एक पारिवारिक तस्वीरों का अल्बम दिखाया और,पूजाकी मंगनी की तस्वीरें भी दिखा दीं।

पूजा अन्यमनस्क स्थिती में छात्रावास से अपने घर पहुँची । अपनी मंगनी को लेके ज़्यादा समय वो अपने मंगेतर के परिवार को अंधेरे में नही रखना चाह रही थी। वैसे एक बात उसने मंगनी के पूर्व साफ़ कर दी थी...गर मंगनी और ब्याह के दौरान उसे एहसास हो की, क़दम सही नही है तो वो मंगनी तोड़ भी सकता है। मंगेतर की माँ, पूजाकी माँ की बचपन की सहेली थी। लड़का रईस घरका होनेके अलावा , commercial पायलट भी था। घरका अछा खासा व्यापार था। दिखने में काफ़ी अच्छा था। कई परिवार उस लड़के के लिए रुके थे। लेकिन विधिलिखित घटना होता है,तो, घटके रहता है।

पूजाने अपने परिवार को विश्वास में ले के मंगनी तोड़ दी। लड़के की माँ का दिल टूट गया। इस बहू को लेके बड़े सपने बुने थे। पूजा थी भी सरल स्वाभाव की और साफ़ मनकी। माँ, मासूमा ने भी, एक अलग से चिट्ठी लिख दी। पूजा के मनसे एक बोझ तो उतरा।

एक दिन पूजा के साथ उसके परिवारवाले उस डेप्युटी कलेक्टर के घर गए। पूजा पे जैसे जादू चल गया। एक दर्द से छूटी तो और एक दर्द सामने आ खड़ा हुआ...

लड़के की बातचीत परसे पता चल रहा था की, उसका परिवार काफ़ी पुराने ख़यालात का है....अपनी माँ की वो हमेशा तारीफ़ करता...उनके अन्य लोगों को लेके सख्त मिज़ाज की बातें भी करता, लेकिन काफ़ी इतराके, अभिमान पूर्वक करता।

पूजा को उससे मिले २ माह भी नही हुए थे,कि, उसका तबादला मध्यवर्ती सरकार में हो गया। अन्न तथा कृषी मंत्रालय में...उसे देहली जाना था...पूजा के दादा का केस तो अबतक अटका ही था,लेकिन लड़के ने अधिकतर काम कर दिया था।

जैसे ही उस लड़के की तबादले की बात सुनी, पूजा टूट-सी गयी...माँ, मासूमा ने अपनी बेटी की मन की बात भाँप ली थी ..पूजा अपने आपको ना जाने कितने कामों में लगाये रखने लगी...एक दिन माँ ने उससे कहा....और जो कहा,वो एक अलग कहानी बन गयी....उस हादसे से आगे चलती हुई....

क्रमश:

पूजा के परिवार की कुछ अन्य तस्वीरों के लिए रुकी हूँ..

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

बिखरे सितारे ४)कहाँ ले चली ज़िंदगी ?

नन्हीं पूजा को आंध्र के, निज़ामाबाद शहर ले जाया गया...उसे क्या ख़बर थी,कि, वो अपने दादा-दादी से दूर चली जा रही है? जब निज़ामाबाद पहुँचे,तो उसने कुछ देर बाद अपने घर वापस लौटने के बारेमे पूछना शुरू किया...ट्रेन में तो सोयी रही थी..फिर उसे लगा,अब चंद लोगों से मिल भी लिए..अब वहीँ रुक जानेका क्या मतलब? लेकिन, उसे समझाया गया,कि, कुछ रोज़ यहीँ रुकना होगा...

जिस परिवार के साथ वो लोग रुके थे,उनका एक out house था..इन तीनों का इन्तेजाम वहीँ किया गया था..पूजा के पिता तो दिन में फलों के बगीचों में निकल पड़ते..लेकिन ,अपनी माँ पे क्या बीतती रहती ये नन्हीं पूजा आजतलक नही भूली..वो तो तब केवल ढाई सालकी थी...

वो देखती रहती,कि, उसकी माँ जब कभी उस घरकी रसोई में जाती, उस घरकी गृहिणी उनके साथ बेहद बुरा बर्ताव करती..गर माँ पूजा के लिए दूध बनाना चाहती,तो वो औरत चीनी हटा देती....

एक दिन की बात ,उसके दिलपे ऐसा नक्श बना गयी,कि, वो बेहाल हो गयी..आदम क़द आईने में देखी अपनी ही शक्ल उसे ताउम्र याद रह गयी...माँ के आँसू देख उदास,घबराया हुआ उसका अपना चेहरा,उसकी अपनी निगाहोंसे कभी नही हटा..

उस घरकी गृहिणी ने उसकी माँ के हाथ से बच्ची का खाना छीन लिया था...और माँ को रसोई से बाहर निकल जाना पड़ा..अपनी माँ के आँखों में भरे आँसू देख,बौखलाई बच्ची उसके पीछे,पीछे चली गयी..कमरेमे प्रवेश करते ही उसे अपनी माँ और अपनी ख़ुद की सूरत, आईने में दिखी..बच्ची का निहायत डरा-सा संजीदा चेहरा ...उसे उस 'चाची पे आया घुस्सा..असहायता ..सब कुछ एक चित्र की भाँती अंकित हो गया..माँ कमरेमे जाके,नीचे बिछे गद्दे पे बैठ गयी,और आखोँ से झर झर आँसू झरने लगे..पूजा उनकी गोद में जा बैठी...उसे अपने होंठ काँपते -से महसूस हुए...कुछ देर रुक वो बोली," हम दादा दादी के पास क्यों नही जाते...हम यहाँ क्यों रह रहे हैं? "
ये कहते हुए,उन छोटी,छोटी उँगलियों ने माँ के आँसू पोंछे...
फिर बोली," क्यों कि मै हेमंत के साथ खेलती हूँ,इसलिए हम यहाँ से नही जाते ? तो मै उसके साथ नही खेलूँगी...मुझे यहाँ नही रहना है..."

हेमंत उस परिवार का बच्चा था, पूजा से कुछ साल भर बड़ा..

वो महिला बेहद विक्षिप्त थी..पूजा की माँ, मासूमा , से बहद जलन थी उसे...मासूमा सुंदर थी..सलीक़ेमन्द थी...और उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी पढी लिखी भी...खाने के मेज़ पे वो महिला , सामने नही आती..तो मासूमा खाना खा सकती..क्योंकि घरके बड़े,पूजाके पिता,तथा मासूमा, एक साथ खाना खाने बैठते...लेकिन,दिन में जैसे ही घर के पुरूष चले जाते, उस महिला का बर्ताव ऐसा हो जाता मानो, मासूमा उसकी कोई दुश्मन हो..सौतन हो...बेचारी पूजा को बात समझ में नही आती,कि, आख़िर उसकी माँ के साथ ये चाची ऐसी हरकत क्यों करती हैं...?

पूजा को आज भी याद है,उसका तीसरा जनम दिन...जिस समय उसकी दादी ने उसके लिए एक निहायत खूबसूरत frock सीके भेजा..काश उस frock का चित्र उपलब्ध होता...!
इन सब बातों के चलते, पूजा ,अपने माँ और पिता के साथ, निज़ामाबाद में कुल छ: माह गुज़ार लौट आयी...अपने दादा दादी को इतना खुश देखा उसने...समझ नही पायी,कि, उन्हें छोड़ उसे जन ही क्यों पड़ा?

लेकिन, ये भी सच धीरे,धीरे उसके आगे उजागर होने लगा कि, उसकी माँ, इस घर में भी ख़ुश नही थी...आँसू तो उसे यहाँ भी बहाने पड़ते ..मासूम पूजा , अपनी उम्र से अधिक संजीदा होती चली गयी...एक ओर भोला, मासूम बचपन...दूसरी ओर अपनी माँ का कई बार दर्द की परछाइयों से धूमिल होता चेहरा...

और समय बीतता गया..उसके पढ़ने लिखने के दिन भी आ गए..उसे तीसरी क्लास तक तो घर में ही पढाया लिखाया गया..उसके बाद गाँव से कुछ दूर,एक पाठशाला में दाखिल कराया गया...कैसे गुज़रे उसके वो दिन? दादा दादी का प्यार तो बरक़रार था ही...पर उसके अलावा भी बचपन की, कुछ मधुर , कुछ डरावनी यादें, उसके जीवन में शामिल होती रहीँ.....

क्रमश: