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गुरुवार, 1 अगस्त 2013

बिखरे सितारे : वो दिनभी क्या दिन थे!

धीरे, धीरे चलती बैलगाडी, तकरीबन एक घंटा लगाके घर पहुँची...दादी उतरी...बहू की गोद से बच्ची को बाहों में भर लिया...दादा भी लपक के ताँगे से उतरे...दोनों ताँगों को हिदायत थी कि,एक आगे चलेगा,एक बैलगाडी के पीछे...आगे नही दौड़ना..! तांगे वालों को उनकी भेंट मिल गयी...दोनों खुशी,खुशी, लौट गए...

बच्ची को दादी ने तैयार रखी प्राम में रखा...और दादा ने अपने पुरातन कैमरा से उसकी दो तस्वीरें खींच लीं...उसने हलकी-सी चुलबुलाहट की,तो दादी ने तुंरत रोक लगा दी..वो भूखी होगी...बाहर ठंड है...उसे अन्दर ले चलो...अच्छे -से लपेट के रखो...

बहू बच्ची को दूध पिला चुकी,तो दादी,अपनी बहू के पास आ बैठीं...बोलीं," तुम अब आराम करो..जब तक ये सोती है,तुम भी सो जाना..और इसे जब भूख लगे,तब दूध पिला देना..जानती हो, बाबाजानी तो ( उनके ससुर ) घड़ी देख के मेरे बच्चे को मेरे हवाले करते..अंग्रेज़ी नियम...बच्चे को बस आधा घंटा माँ ने अपने पास रखना होता..बाद में उसे अलग कमरे में ले जाया जाता..और चाहे कितना ही रोये,तीन घंटों से पहले मेरे पास उसे दिया नही जाता...अंतमे मेरा दूध सूख गया..जब ससुराल से यहाँ लौटी तो हमने एक माँ तलाशी, जिसे छोटा बच्चा था...हमारे पास लाके रखा..उसकी सेहत का खूब ख़याल रखते...वो अपने और मेरे,दोनों बच्चों को दूध पिला देती...तुम अपना जितना समय इस बच्ची को देना चाहो देना.."

और इस तरह,उस नन्हीं जान के इर्द गिर्द जीवन घूमने लगा..दादा-दादी उसे सुबह शाम प्राम में रख, घुमाने ले जाया करते...उन्हें हर रोज़ वो नयी हरकतों से रिझाया करती...कभी वो चम्पई कली लगती तो, तो कभी चंचल-सी तितली...! उसके साथ कब सुबह होती और कब शाम,ये उस जोड़े को पता ही नही चलता...

गर उसे छींक भी आती तो दादा सबसे अधिक फिक्रमंद हो जाते...एक पुरानी झूलती कुर्सी थी...दादी उसे उस कुर्सी पे लेके झुलाती रहती...और पता नही कैसे, लेकिन उस बच्ची को एक अजीब आदत पड़ गयी...झूलती कुर्सी पे लेते ही उसपे छाता खोलना होता ...तभी वो सोती...! उस परिवार में अब वो कुर्सी तो नही रही, लेकिन वो वाला..दादी वाला, छाता आज तलक है...

दिन माह बीतते गए...और साथ,साथ साल भी...

बच्ची जब तीन साल की भी नही हुई थी, तो उसके पिता को आंध्र प्रदेश में कृषी संशोधन के काम के लिए बुलाया गया..वहाँ दो साल गुज़ारने के ख़याल से युवा जोड़ा अपनी बच्ची के साथ चला गया...दादा-दादी का तो दिल बैठ गया...

बच्ची का तीसरा साल गिरह तो वहीँ मना..दादी ने एक सुंदर-सा frock सिलके पार्सल द्वारा उसे भेज दिया..उस frock को उस बच्ची ने बरसों तक सँभाले रखा...उसके बाद तो कई कपड़े उसके लिए उसकी माँ और दादी ने सिये..लेकिन उस एक frock की बात ही कुछ और थी...

इस घटना के बरसों बाद, दादी ने एक एक बड़ी ही र्हिदय स्पर्शी याद सुनाई," जब ये तीनो गए हुए थे,तो एक शाम मै और उसके दादा अपने बरामदे में बैठे हुए थे...एकदम उदास...कहीँ मन नही लगता था..ऐसे में दादा बोले...'अबके जब ये लौटेंगे तो मै बच्ची को मैले पैर लेके चद्दर पे चढ़ने के लिए कभी नही रोकूँगा...ऐसी साफ़ सुथरी चादरें लेके क्या करूँ? उसके मिट्टी से सने पैरों के निशाँ वाली एक चद्दर ही हम रख लेते तो कितना अच्छा होता....' और ये बात कहते,कहते उनकी आँखें भर, भर आती रहीँ..."

जानते हैं, वो बच्ची इतनी छोटी थी,लेकिन उसे आजतलक उन दिनों की चंद बातें याद हैं...! कि उसकी माँ के साथ आंध्र में क्या,क्या गुजरा...वो लोग समय के पूर्व क्यों लौट आए...और उसके दादा दादी उसे वापस अपने पास पाके कितने खुश हो गए...! वो दिन लौटाए नही लौटेंगे..लेकिन उन यादों की खुशबू उस लडकी के साँसों में बसी रही...बसा रहा उसके दादा दादी का प्यार...

क्रमश:

इस के बाद ये मालिका अधिक तेज़ी पकड़ लेगी...तस्वीरें scan नही हो पा रही हैं..इसलिए क्षमा चाहती हूँ..जैसे ही scanner ठीक होगा, वो पोस्ट कर दूँगी..हासिल हो गयी हैं,इतना बताते चलती हूँ..




जीवन ,पूजा,हिंदी,संस्मरण

सोमवार, 9 जनवरी 2012

उसकी मौत का ज़िम्मेदार कौन?२


हम रानी पद्मिनी को 'सती' मान के उसका गौरव करते हैं ! इतिहास उन 'हजारों पद्मिनिओं ' का गौरव करता है..लेकिन जब एक साधारण -सी औरत, दूसरों को कष्ट न पहुँचे, इसलिए अपने जीवन का अंत कर लेती है,तो उसे क्यों दोषी समझा जाता है? एक तो उसने अपने जीवन हाथ धो लिए, और उसीपे इल्ज़ाम? ऐसा क्यों?

तो आईये,आपको हालातों से वाबस्ता करा दूँ।

ये लडकी एक खुले विचारों वाले परिवार में पली बढ़ी। माँ एक दक्षिण भारतीय ब्रह्मिण परिवार से थी..पिता मुस्लिम।

भाई का ब्याह जिस लडकी से हुआ था, वो लडकी भी इसी तरह, दो भिन्न परिवेश से आए माता -पिता की कन्या थी/है। माँ अँगरेज़। पिता पाकिस्तानी मुस्लिम।

जिस महिला ने खुदकुशी की उसे हम तसनीम नाम से बुला लेते हैं। तसनीम का ब्याह एक इंजिनियर से हुआ जो, तसनीम के पिता की ही कंपनी में कार्यरत था। उसे तसनीम की पारिवारिक पार्श्व भूमी से अच्छे तरह वाबस्ता कराया गया। तसनीम के पिता की अच्छी जायदाद थी।

ब्याह के बाद लड़केने जिस भारतीय कंपनी में वो कार्यरत था( एक मशहूर टाटा कंपनी थी), वहाँ से नौकरी छोड़ दी और सउदी अरेबिया चला गया। कुछ माह वहाँ काम किया, और फिर अमेरिका चला आया। वहाँ उनकी एक बेटी का जनम हुआ। शादी के तुंरत बाद, तसनीम पे ये तोहमत लगना शुरू हो गयी,कि, वो तो 'सही मायनेमे' मुस्लिम हैही नही..माँ जो हिंदू परिवार से थी....!

तसनीम पे ज़बरदस्ती होने लगी,कि, वो दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़े। केवल साडी पहने तथा, घरसे बाहर निकलते समय एक मोटी चद्दर ओढ़ के निकले। उसने येभी करना शुरू किया, लेकिन ताने देना, मानसिक छल और साथ ही साथ शारीरिक छल जरी रहा।

तसनीम अपने पिता के घर आयी तब उसने ये बातें अपने परिवार को बता दी। उसे समझा बुझा के वापस भेज दिया गया..ऐसा होता है..ठीक हो जाएगा..अदि,अदि..उसकी भाभी,( सुलताना), जिसकी अपनी माँ अँगरेज़ थी, घबरा गयी,कि, कहीँ ननद भारत में ही रहने आ गयी,तो मेहमानों वाले कमरेमे वो रहेगी...जब उसके पीहर वाले आएँगे तो उन्हें कहाँ रुकाया जाएगा?

सुलताना का रवैय्या अपनी ननद के प्रती बेहद कटु हो गया। ये सब मै क़रीब से देख रही थी...बलिक,सुलताना ने ये तक कह दिया,कि , गर, तसनीम उस घर में रहेगी तो वो अपने माँ-बाप के घर चली जायेगी!

तसनीम की माँ बेहद समझदार, सुलझी हुई महिला थी। उसने एक बार भी अपनी बहू को उलाहना नही दी...विडम्बना देखिये..सुलताना जिस घरमे रह रही थी, वो घर उसके ससुर का। उसकी ननद का मायका..गर एक लडकी, मानसिक तथा शारीरिक परेशानी में अपने माँ बाप के पास नही आयेगी तो कहाँ जायेगी? और ख़ुद सुलताना ने भी तो वही करनेकी घरवालों को धमकी देदी...! अपने ख़ुद के माँ-बाप के घर चले जानेकी...! तसनीम ने यहाँ तक कहा,कि, उसे अगर, उसी शहर में, दूसरा, घर ले दिया जाय तो वो वहाँ चली जायेगी। नौकरी कर लेगी...

इन सब हालातों के चलते, तसनीम ने एक और बच्चे को जन्म दे दिया। अबके पुत्र था। उसे परिवार यहीँ पे रोकना था,लेकिन, पतिदेव राज़ी नही हुए ! तसनीम पे अत्याचार जारी रहे..वो ४ बार भारत लौटी, लेकिन चारों बार उसपे दबाव डाला गया,और वापस भेज दिया गया..वो जब भारत भी आती,तो, मुंबई की तपती, उमस भरी गरमी में एक मोटी चद्दर लेके बाहर निकलती।

आख़री बार जब वो आयी तो, बच्चों को मुंबई की एक स्कूल में दाखिला दिलाया गया। बेटा तो मानो एक फ़रिश्ता था..उसकी माँ जब उसे स्कूल से लेने आती तो उसे चूम के कहता," अम्मा तुम को मेरे लिए इतनी गरमी में आना पड़ता है,हैना? "

ये आँखों देखा क़िस्सा सुना रही हूँ। बच्चों के आगे खाने के लिए जो रखा जाता,चुपचाप खा लेते। लेकिन, भाभी को किसी भी तरह से ननद का उस घर में रहना बरदाश्त नही हो रहा था। तसनीम हर तरह से घरमे हाथ बटाती...अपने तथा अपने भाई के बच्चों को स्कूल से लाना ले जाना उसी के ज़िम्मे था। उसने ये तक कहा,कि, गर उसकी कहीँ और शादी कर सकते हैं,तो उसके लिए भी राज़ी हूँ...

इसपे भाभी ने कह दिया," दो बच्चों की माँ के साथ कौन ब्याह करेगा"?

तसनीम डिप्रेशन में जाती रही। उसने ये भी सुझाया कि, उसे किसी मनो  वैज्ञानिक के पास भेजा जाय तो ठीक रहेगा...लेकिन, ये सब, उस परिवार के बड़ों को ( माँ को तो था), मंज़ूर नही था। ख़ास कर, भाई भाभी को...लोग क्या कहेंगे? अलावा, पैसे खर्च होंगे...जबकि, पैसे तो तसनीम के पिता देते!

उसके बच्चों को कोई प्यार करता या तोह्फ़ा देता, पर साथ ही साथ, सुलताना के बच्चों को नही देता,तो घरमे कुहराम मच जाता..तसनीम इसी मे बेहतरी समझती, कि, तोह्फ़ा चुपचाप अपने भाई के बच्चों को पकड़ा दिया जाय..उसके अपने बच्चे इतने समझदार थे,कि, कभी चूँ तक नही करते...! तसनीम की मानसिक स्थिती की गंभीरता समझने को जैसे कोई तैयार ही ना था..

क्रमश:

अगली किश्त मे क़िस्सा पूरा कर दूँगी। विषय की गहराई मे गयी, ताकि, तसनीम को आत्म हत्या करने पे मजबूर करने वाले हालात सामने रख सकूँ..


रविवार, 25 सितंबर 2011

नाम में बहुत कुछ है!

बड़े दिनों बाद लिख रही हूँ. सोचती रहती थी,की,लिखूं तो क्या लिखूं? फिर अचानक कुछ अरसा पूर्व मराठी अखबार पढी हुई एक खबर दिमाग में कौंध गयी. वो खबर जब से पढी थी,तब से मन अशांत था.

खबर एक लडकी की थी. जो १०वी क्लास में पढ़ती है. नाम 'नकोशा'.उसकी स्कूल में एक शिबिर चल रहा था,उस दौरान एक समाज सेविका ने  उसका नाम पढ़ा तो चौंक गयी. उन्हों ने लडकी से पूछा," क्या तुम अपने नाम का मतलब जानती हो?"
लडकी: नहीं! 
समाज सेविका: यहाँ पे तुम्हारे साथ कोई आया है?
लडकी: मेरी दादी है.

जब दादी से बात हुई थी,तो उस लडकी के नाम और जनम की राम कहानी बाहर  आयी. नकोशा के पहले  उसके माँ-बाप   को एक लडकी हुई थी. इस बार सब को लड़के की उम्मीद थी. लडकी हुई तो सब ने उसे 'नकोशी'(unwanted )कर के बुलाना शुरू कर दिया. वो ३ माह की हुई तब उसकी माँ भी चल बसी. लडकी की  चाहत  किसी को भी न थी,इसलिए 'नकोशी' परसे  'नकोशा ' ये नाम उसे चिपक  गया. 

जब नकोशा को ये बात पता चली तो  पूरा दिन  उसने रो के काटा.' मुझे और किसी भी नाम से बुलाओ, लेकिन ये नाम हटा दो', कह के वो बिलखती रही. पाठशाला के बच्चों ने तथा शिक्षकों ने उसे shrawanee  कह के बुलाना शुरू किया. लेकिन  नाम बदलने की प्रक्रिया लम्बी है.

 शिक्षित,अमीर खानदानों में जहा लडकी नहीं चाहिए होती है,वहां नकोशा के अनपढ़ परिवार को कोई क्या कहे?नकोशा का ये किस्सा मुझसे भुलाये नहीं भूलता.



सोमवार, 10 अगस्त 2009

बिखरे सितारे ! ५) और दिन गुज़रते रहे...

जो जीवन अनगिनत घटनाओं से भरा हुआ हो...उन लम्हों को कैसे चुनूँ?? एक माला पिरोना चाहती हूँ, उनमे कौन से मोती शामिल करूँ..कौनसे छोड़ दूँ...?

तूफानों की शुरुआत तो शायद उस नन्हीं जान के इस दुनिया में आने के पहलेही हो चुकी थी..अब तक तो वह अपनी माँ की बाहोँ में..अपने दादा दादी की छत्र में महफूज़ थी...उसे इन तूफानों का मतलब तो समझ नही आता था..थपेडे चाहे लगते हों...

कोई, किसी दूसरे को, चाहे वो अपनी औलाद ही क्यों न हो, कितना महफूज़ रख सकता है...और कबतक? ये सवाल मेरे मनमे जब जब उभरेगा, शायद पाठकों के मन में भी उभरेगा...

तमन्ना की, ..जैसे कि, उसके दादा-दादी, माँ पिता कभी बुलाया करते, उसी गाँव में, पढाई शुरू कर दी गयी..एक मास्टर जी गाँव से घर आते और उसे प्रादेशिक भाषा में पढाते......तीन साल के बाद ये पढाई शुरू हुई..जब पूजा-तमन्ना, अपने माँ पिता के साथ निज़ामाबाद से लौट आयी...

उसे तो वो रटना रटाना क़तई नही भाता..लेकिन और कोई तरीक़ा तो नही था...फिर जब वो छ: सालकी हुई तो पास के एक छोटे-से शहर की पाठशाला में उसका दाखिला कराया गया..अन्य बच्चे जैसे, पाठशाला के पहले कुछ दिन रोते हैं, येभी खूब रोई...उसके दादा या पिता, स्कूल के बाद उसे लेने आते..गर देर हो जाती,तो इसका दिल बैठ ही जाता..उसके गुरूजी बड़े ही अच्छे थे..बेचारे उसको खूब मानते रहते..

अबतक एक और बच्ची परिवार में आ गयी थी..उसकी छोटी बहन...वह भी दादा दादी की बेहद लाडली थी..पर पूजा की बात ही उन दिनों अलग थी..उस परिवारकी पहली पोती...! शैतानी भी कर जाती...अपनी बहन के आगे,वो स्वयं को खूब बड़ा समझती....!

जब वह चौथे वर्ग में आ गयी,तो वहाँ उसके गुरूजी बड़े ही बदमिज़ाज निकले...उन्हें बच्चों को जाती परसे पुकारने की आदत थी...इतनी छोटी थी पूजा..लेकिन उसको उन दिनों भी ये बात बड़ी ही अखरती...

एक दिन गुरूजी ने एकेक बच्चे को खड़ा करके बताना शुरू किया," हाँ..तो तुम कल दोपहर में सड़क पे क्या कर रहे थे? मैंने देखा तुम्हें!"
वो बच्चा,अपनी गर्दन लटकाए खड़ा रहा..किसी बच्चे ने ये नही कहा कि, मै तो वहाँ था ही नही या थी ही नही...पूजा को भी खड़ा किया गया..और गुरूजी बोले," हाँ..तो तुम्हें मैंने तुम्हारे दादा के साथ दुकान में जाते देखा..तुम क्यों उनको परेशान कर रही थी? अपने बड़ों ऐसे परेशान करते हैं?"
सारा वर्ग ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा..अन्य बच्चों को डांट मिल रही देख,अक्सर बच्चे मज़ा लेते हैं...! पूजा को बेहद अपमानित महसूस हुआ...!

वह हैरान भी हो गयी....! उसने कहा,
"लेकिन कल तो मै पूरा दिन घर पे थी.....कल तो इतवार था...! मै तो कहीँ नही गयी..और दुकान में तो मुझे दादा ले जाते हैं..मै नही कहती ले जाने को...!"

बस..इतना कहना था,कि, गुरूजी उसपे बरस पड़े," मै झूठ बोल रहा हूँ? तू सही बोल रही है? ये मजाल तेरी....? तुझे घर पे ऐसा सिखाया है? कि गुरूजी का अपमान करे..?चल,निकल वर्ग के बाहर...जा खड़ी हो जा, उस खंभे के पास..धूप में.."

अप्रैल माह की चिलचिलाती धूप थी..और पूजा, अपने आँसू चुपचाप बहाते हुए, धूप में जाके खड़ी हो गयी...उसे दोपहर का खाना खाने की इजाज़त भी नही मिली...उसे अपने तीसरे वर्ग के गुरूजी बड़े याद आए...वो कितना प्यार से समझाया करते थे..जब वो कुछ गलती कर जाती...और पूरा वर्ग उसपे हँस पड़ता,तो गुरूजी पूरे वर्ग को डांट के चुप करते..वैसे भी, पूजा सुंदर थी, नाज़ुक थी..और कई लड़कियाँ उसपे जलती भी थीं..

बच्ची ने घर जाके यह बात अपने दादा को बताई..दादा तो सत्य के पुजारी थे..उन्हों ने तुंरत इस घटना का ब्योरा मुख्याध्यापक को दे दिया...उसके बात तो गुरूजी ने उसपे और अधिक खुन्नस पकड़ ली...उसके दिमाग़ से बरसों ये बात निकल नही पायी,कि, आख़िर वो गुरूजी उससे झूठ क्यों बुलवाना चाहते थे?

क्रमश:

आगे,आगे, पूजा की माँ,मासूमा, के बारे में बातेँ होंगी..कि उनके बचपन का, पूजाके बचपन पे , जीवन पे कैसे असर हुआ...