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गुरुवार, 29 जुलाई 2010

बिखरे सितारे 13: जुदाई


 (पूजा को हमेशा अपने पती से छुपके केतकी की ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता. और बेचारी की ज़रूरतें ही कितनी-सी थी? कई बार तो उसे भूखे  पेट सो जाना पड़ता! छात्रावास का भोजनालय, केतकी जबतक लौटती, बंद हो जाता और आसपास खान पान की कोई सुविधा नहीं थी.
केतकी वास्तुशास्त्र के ३रे  सालमे आ गयी और...अब आगे पढ़ें...)

.....और अमन बी.कॉम के प्रथम वर्षमे. अमन अपने माता पिताके साथ रहता था. जब गौरव का तबादला हुआ तब अमन १२ वी कक्षा में था. उस साल उसे ३ महाविद्यालय बदलने पड़े! खैर!
वास्तुशाश्त्र के ३ रे वर्ष में जब एक बार केतकी अपने माँ पिता के पास आई हुई थी तब, उसने अपनी माँ को बताया की, उसे एक लड़का पसंद है. लड़का, राघव, इंजीनियरिंग का course कर रहा था और वो भी ३ रे साल में था. वो केतकी की बचपनकी सहेली, मुग्धा के क्लास में था.
केतकी ने एक दिन राघव की मुलाक़ात अपनी माँ तथा पितासे करवा दी. लड़का वाक़ई मेघावी और ख़ुशमिज़ाज था. अपनी माँ बाप की एकलौती औलाद. पहले तो पूजा समझी उसके माता पिता उसी शहरमे रहते हैं. उसकी खुशीका ठिकाना न रहा, क्योंकि पूजा और गौरव ने सेवा अवकाश के बाद उसी शहर में रहने का फैसला कर लिया था. लेकिन ये पूजाकी यह खुशफहमी ज़्यादा दिन टिकी नहीं. राघव छ्त्रवास में रहके पढ़ रहा था तथा, उसके माता पिता हैदराबाद  के बाशिंदे थे. फिरभी पूजा ख़ुश ही हुई की, कमसे कम अपने देशमे तो था!

उस साल पूजा और गौरव के विवाह को २५ साल पूरे होनेवाले थे. पूजा हर प्रकारसे अपनी शादी को खुशगवार  बनाये रखने का यत्न किया करती. उसने उस समय उनके जहाँ जहाँ तबादले हुए थे, वहाँ के सब मित्र परिवारों को न्योता दिया. कुछ उसकी अपनी स्कूलकी सहेलियाँ भी शामिल थीं. भाई  बहन के परिवार भी आए.
शादी की सालगिरह पड़ती इतवारके रोज़ थी,लेकिन शनिवार की रात को मनाने का   तय हुआ, की, बाहर से आनेवाले लोगों को लौटने में सुविधा हो. शनिवारको देर रात ,मतलब रातके एक डेढ़ बजे तक कुछ करीबी दोस्त सहेलियाँ बतियाते रहे. मतलब इतवार का दिन शुरू ही हो गया था. बहन आदि दो दिन रुक के लौटने वाले थे.

सुबह  पूजा को अपने  कमरेमे कुछ जल्दी ही खिटर  पिटर सुनाई दी. उस  ने आँख खोली तो देखा , भाई  उसके पास खड़ा था...बहन के कंधेपे पर्स थी...माजरा कुछ समझमे नही आया...बहन ने पूजा के हाथ में चाय की प्याली थमाई...पूजा फटी फटी आँखों से सबको देखे जा रही थी..!
भाई बोला: "आपा आप चाय तो पियो!"
पूजा ने दो घूँट लिए और बहनसे बोली:" तू पर्स लटकाए क्यों घूम रही है?"
भाई . ने पीछे से अपनी आपा को गले लगते हुए कहा:"आपा, दादी अम्मा नहीं रहीं...सुबह, सुबह गुज़र गयीं...चलिए जाना है.."
कुछ पल तो पूजा की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई...और फिर उसे एहसास हुआ की, उसके जीवन  का एक अध्याय ख़त्म हुआ. उसके दादा तो जिस साल गौरव का यहाँ तबादला हुआ उसी साल चल बसे थे.दादी अम्मा मानो शादी का सालगिरह हो जानेके इन्तेज़ारमे थीं...

वो ज़ारोज़ार रो पडी. चाहे जिस भी उम्र में उसके दादा दादी का निधन हुआ, उन तीनो भाई बहनों के लिए वो एक सपूर्ण अध्याय का समापन था...
जब उनकी गाडियाँ  उनके फ़ार्म हाउस  के गेट से अन्दर पहुँची तो पूजा के लिए उस घरको बिना दादा दादी के देखना असह्य हो उठा..सच का सामना करना ही था...

चंद रोज़ वहाँ रुक, पूजा लौट आई...गौरव और बच्चे तो उसी रोज़ शामको लौट गए.पूजा ने अपने मनको केतकी के ब्याह के विचारों में लगाने की कोशिश की.
सालगिरह के कुछ रोज़ पहले ही पूजा ने अपनी एक सहेली के साथ मिलके अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी की थी,जो बहुत कामयाब हुई थी. पूजा ख़ुश थी,की, अब उसे एक स्थायी काम मिल गया. उनका चाहे कहीं तबादला हो, उसकी सहेली उसी शहरसे देखरेख  करेगी. पूजा ने डिज़ाइन   आदिका ज़िम्मा खुदपे ले लिया था..लेकिन चंद ही रोज़ में सहेली ने अपनी मजबूरी बता दी...इतनी माथा पच्ची उसके बस की नही थी.

इधर पूजा को पता चला की, राघव तो अगले साल आगेकी पढाई के लिए अमरीका जानेवाला था....वहीँ नौकरी भी करनेवाला था...तथा, केतकी ने भी आगेकी  ( M.arch ) . के लिए वहीँ जानेकी सोच रखी थी. पूजा अंदरही अन्दर  टूटने लगी. उसकी लाडली इतनी दूर अपना घोंसला बना लेगी, उसने कभी सोचा ही  नही था...

केतकी का आखरी साल ख़त्म हुआ और उस ने   अमरीका जाने की तैय्यारी शुरू कर दी. उसे शिश्यव्रुत्ती भी मिल रही थी. GRE  की तैय्यारी करने के लिए वो अपने माँ पिता के साथ रहने चली आई.  इनटर्न शिप उसने वहीँ से की. एन दिन कंप्यूटर के  आगे बैठ केतकी कुछ काम रही थी. पूजा  उसके लिए फल काटके ले गयी ..... प्लेट पकडाते हुए  उसने पीछेसे केतकी के गले में बाहें डाली और कहा," तुम्ही बच्चे मेरी दुनिया हो..."
केतकी ने एक झटके से उसे परे करते हुए कह दिया," माँ तुम अपनी दुनिया अब हमसे अलग बनाओ...अपनी दुनिया में हमें मत खींचो...अब मुझे पढाई करने दो प्लीज़.."
पूजा झट से हट गयी और अपने कमरे में जाके खूब रोई...उसका मानो जीने का हर सहारा छिन  रहा था...वो और, और अकेली पड़ती जा रही थी...गौरव तो अपने दफ्तर के काम में व्यस्त रहता...लेकिन वैसे भी औरत के इन कोमल भावों को उसने कब समझा?

  उसी समय गौरव का  फिर एक तबादला हुआ...अबके अमन को भी पीछे छोड़ना पड़ा क्योंकि, उसका M.BA का साल था. इसबार तबादले के पश्चात जो घर मिला वो बेहद बड़ा था...ना अडोस ना पड़ोस...केतकी आती जाती रहती...अब अपनी माँ के साथ उसका बर्ताव बेहद चिडचिडा हो गया था..पूजा का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया था. ...केतकी इन सब बातों को अब बर्दाश्त नही कर पा रही थी. इन सब बातों के लिए उसे उसकी माँ भी उतनीही ज़िम्मेदार लग रही थी जितने के पिता..

जो भी हो माँ तो माँ थी...उसने अपनी जोभी जमा पूंजी गौरव से छुपाके रखी  थी,वो केतकी के अमेरिका जानेके खर्च में लगा दी. और फिर वो दिनभी आ गया जब उसे अमरीका जाना था...हवाई अड्डे पे पूजा ,गौरव और केतकी खड़े थे..पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करेगी ..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी  ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी...
क्रमश:

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

बिखरे सितारे १४: खाली घोंसला!

(गतांक :पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करेगी ..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी  ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी...अब आगे पढ़ें...आज मै,पूजा ,अपने पाठकोंसे मुखातिब होती हूँ...)

हवाई अड्डे से अतिथि गृह  और वहाँ से अपनी पोस्टिंग की जगह गौरव और मै  लौट आए.. तकरीबन छ: एकरों में बना ,छ: हज़ार square फीट से बड़ा घर ....और सिर्फ दो बाशिंदे...पति अपने कामों में व्यस्त..

 मै ऐसे ही,बेमकसद,अमन के कमरे में गयी..कुछ ही दिन पूर्व ,अमन आके लौटा  था....करीने से लगा हुआ, साफ़ सुथरा कमरा..मेरा मन अपने बच्चों के बचपन में विहार करने लगा...अपने नन्हें मुन्नों की आवाजें कानों में गूँजने लगीं   और उनमे मेरी आवाज़ भी शामिल हो गयी..
" माँ, देखो ना...इसने बाथरूम में कितने बाल बिखराएँ हैं...!छी :!इसे हटाने को कहिये न...!" अमन केतकी की शिकायत कर रहा था..
"माँ! इसने मेरे यूनीफ़ॉर्म पे अपना गीला तौलिया लटका दिया है..इसे पहले वो हटाने के लिए कहो ना...!" केतकी ने अपनी शिकायत सामने रखी...
" चुप करो दोनों! मुझे किसी की कोई बात नही सुननी है...!" मै भी खीज उठी..
" माँ! मेरी एकही जुराब है...प्लीज़,मुझे दूसरी वाली खोज  दो न...!" यह अमन बोला..
" खोजो अपने आप...रात को अपनी जगह पे अपना सामान नही रखोगे तो ऐसाही होगा..!"मै भी चिंघाड़ उठी...
" माँ! मेरी कम्पस में रूलर नही है...अमन ने लिया होगा..."केतकी शोर मचा रही थी..
"उफ़ ! अभी स्कूल बस आनेवाली होगी...तुम दोनों ने क्या आफत उठा रखी है...अमन! यह लो तुम्हारी जुराब...और केतकी, यह रहा तुम्हारा रूलर..यहीं तो पड़ा था...चलो,चलो टिफिन और पानी की बोतलें उठाओ..बस आ गयी होगी...",मेरी आवाज़...!

दोनों चले जाने के बाद एक प्याली चाय की फ़ुरसत होती...मुझे तस्वीरों वाले सजे,सजाये कमरे कितने सुन्दर लगते...!
"लो तुम्हारा तस्वीरों वाला कमरा...ख़ुश? अब यहाँ की चद्दर पे एक सिलवट भी नही पड़ेगी...देख लो! डेस्क पे बेतरतीब किताबों का ढेर नही...इस्त्री किये कपड़ों पे गीला तौलिया नही...न कम्पस की खोज न जुराब की...टीवी चैनल परसे झगडा नही...अंत में "कोई कुछ नही देखेगा", ऐसा झल्लाके कहने वाली मै खामोश खड़ी..
" और लेलो फ़ुरसत...", मेरे मनने एक और उलाहना दी..आज मुझे वो सुबह की व्यस्तता याद आ रही थी...पीती रहो चाय...मैंने कैसे कभी सोचा नही,की, घोंसले से एकबार पँछी उड़ गए तो पता नही कब लौटेंगे? मै इंतज़ार करुँगी और वो आकाश में उड़ान भर लेंगे..!
मेरी आँखों से पानी बहने लगा..मै अमन के कमरे से केतकी के कमरेमे आ गयी...किसी के अस्तित्व की कोई निशानी नही...हाँ ! एक कोने में केतकी की कोल्हापुरी  चपलें पडी हुई थी..बस! पलंग फेंका हुआ दुपट्टा नही, अधखुली सूटकेसेस नही, पोर्टफोलियो के कागजात नही...खाली ड्रेसिंग टेबल...वैसे भी केतकी कोई सिंगार नही करती...इतने दिनों से ड्रेसिंग टेबल पे कागज़ात ही बिखरे हुए थे..वहाँ के हलके से अँधेरे  से घबराके मैंने बिजली जला दी..मन फिर एकबार विगत में दौड़ा...

अमन अंगूठा चूसा करता था..मेरे परिवारवाले मेरे पीछे पड़े रहते...'इसकी यह आदत छुडाओ..'दो साल के अमन को मै एक बार अपने बिस्तर पे लेके बैठी...उसने मेरी गोदीमे सर रख दिया..मैंने कहा,
"तुमने देखा बेटे? तुम्हारे पापा अंगूठा नही चूसते, मै नही चूसती, नाना नानी नही चूसते'...और न जाने कितनी लम्बी फेहरिस्त सुना दी..
उसने मूह से अंगूठा निकला..मुझे लगा, वाह! कुछ तो असर हुआ..अगले पल वो बोला," माँ ! इन छब को बोलो अंगूठा चूछ्ने को..", अंगूठा वापस अन्दर..
कई बार सोने से पहले वो काहानी की ज़िद करता और मै हज़ार काम आगे कर, टाल जाती..." देखो, दादी माँ को रोटी देनी है न?."..आदि,आदि...
काश मैंने वो सब छोड़ कहानी सुना ही दी होती...
केतकी को मेरी सहत को लेके हमेशा चिंता रहती...ख़ास कर मेरा मायग्रेन...जब वो होस्टल में थी तो दिल खोल के ख़त लिखती..अंत में हमेशा दो चेहरे अंकित करती...एक चिंतित , ख़त लिखने के पहले का और दूसरा...निश्चिन्त.... ख़त लिख लेने के बाद का..काश मैंने वो ख़त संभाल के रखे होते! अब अपने हस्ताक्षर में केतकी मुझे थोड़े ही ख़त लिखेगी...और वो भी लम्बे,लम्बे..अब तो इ-मेल आ जाया करेगी...चंद शब्दों की ...तबादलों के चक्कर में मैंने सब फेंक दिया था...कहाँ पता था की, ऐसे खाली घर में मुझे रहना पडेगा?

पिछले कई महीनों से उसने मुझसे बस काम की ही बात चीत की थी...मै समझ रही थी की, इतने सालों का दर्द उसपे हावी हो गया है..मेरी ज़िंदगी एक तारपर की कसरत थी, जिस में मेरी बेटी ने मुझे हमेशा सहारा दिया था..अब मुझे उसकी खामोशी या चिडचिड, दोनों बरदाश्त करने ही होंगे...राघव के रूप में उसे मनमीत मिल गया था..जिसके साथ वो अपने सब दुःख दर्द बाँट सकती थी...
आँखों की धारा और तेज़ हो गयी...मैंने उस कमरेसे बाहर निकल फट से टीवी चला दिया...बस इंसानी आवाज़ के खातिर...अब इंतज़ार  के अलावा अन्य चारा नही था...मेरे अनगिनत छंद थे..लेकिन इस वक़्त मुझे, इंसानी सोहबत की चाह थी...
मन में आ रहे विचार मैंने कागज़ पे उतार दिए..और तीन भिन्न भाषाओँ में लिख, अखबारों को भेज दिए...पढने वाले रो पड़े..मुझे अनगिनत ख़त आए..फोन आए..लोग मिलने भी पहुँचे और मेरे पास बैठ अपनी,अपनी कहानी  सुना, ज़रोजार रो गए....तीन अखबारों में अब मेरे साप्ताहिक colunm छपने लगे..लेकिन ,लेकिन..बच्चों की याद..खासकर केतकी की, मुझे रुलाती रही...जीवन में उसे चैन नही हासिल हुआ...और चाहे गलती किसीकी हो...उसकी ज़िम्मेदार,एक माँ की तौरपे मै भी थी..आज माँ की मामता मुझे चैन नही लेने दे रही थी...

क्रमश:

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

bikhare sitare...19)intezaar ke pal.. !

(पिछली कड़ी में लिखा था...वो रात शायद पूजा के जीवन की सब से हसीं रात थी..आगे आने वाले तूफानों से बेखबर!)

पिया ने प्यार का इज़हार तो कर दिया ! पूजा पे मानो एक नशा-सा छा  गया ...पहला प्यार और वो भी हासिल...! कितने ऐसे ख़ुश नसीब होते होंगे...और उसके सभी प्रिय जन भी ख़ुश...!

सितारों भरी रात और आधा चंद्रमा अपना सफ़र तय करता गया..मौसम तो बरसात का ,लेकिन साफ़ आसमान था..ज़बरदस्त क़हत पड़ा हुआ था......

आँगन में सब के बिस्तर बिछे थे...एक ओर दादा-दादी...घरके पिछवाडे  वाले खलिहान में माँ बाबा...और बिना छत के बरामदे में वो और छोटी बहन..कुछ ही दूरीपर छोटा भाई...

दोनों बहने  में एकही बड़े पलग पे थीं......पूजा तो करवट भी नही लेना चाह रही थी,की, बहन कहीँ छेड़ ना दे...! रात भर वो चाँद का सफ़र देखती रही...कल दोपहर एक बार फिर प्रीतम आनेवाले थे...ऐसा खुमार होता है, पहले प्यारका? सुबह पौं फटने वाली थी तब कहीँ जाके कुछ देर उसकी आँख लगी...और फिर सूरज की किरणे आँखों पे पडी...वो उठ गयी...

उसे डर था कहीँ आँखों के नीचे काले घेरे न पड़ जाएँ...लपक के उसने अपनी शक्ल आईने में देखी...नही लाल डोरे तो थे, लेकिन कालिमा नही थी...होठों पे सुर्खी थी...अपनेआप से वो लजा गयी....

कब होगी दोपहरी?? कब आयेंगे 'वो'?? कैसे लेंगे उससे बिदाई...?? वक़्त थमा तो नही...लेकिन इंतज़ार के पल को पूजा थामना चाह रही....और समय रुका तो नही....? ये सवाल भी मन में आ रहा था...इतनी देर हुई और घड़ी के पाँच मिनट ही कटे?

'वो' आए तो फिर एकबार उसने घर के अन्दर का रुख किया लेकिन इस बार 'उन्हें' अन्दर भेज दिया गया...पलकें झुकी रहीं...माँ रसोई में चली गयीं....और पहली बार साजन ने बाहें फैला के उसे अपने पास भीं लिया...उसको चूम लिया...पूजा इतनी नादान थी, की , चुम्बन कैसा होता है, ये उसने किसी अंग्रेज़ी फिल्म में भी नही देखा था...!

कुछ भरमा-सी गयी...उसे लगा यही 'शरीर सम्बन्ध' होता है...कुछ नाराज़गी के साथ उसने 'उन्हें' अपने से दूर किया...बाहों में भरना तो ठीक था... ! ये क्या??लेकिन नशा कम नही था...उसने अपनी  हथेलियों में अपना मुख छुपा लिया...'वो' उसका चेहरा हथेलिओं से छुडाते रहे...कितना समय बीता?

माँ ने खाने के लिए आवाज़ लगाई तो वो 'उन से' खुद को छुडा के , स्नान गृह में भाग गयी...वहाँ के शीशे में देखा तो उस के होटों के आसपास ...? ये क्या लाल दाग?? और सुराही दार गर्दन कैसे छुपाये...? त्वचा पे सूर्ख दाग..? उफ़ ! ये क्या कर दिया उसके साजन ने?? सारा पोल खोल दिया...! अब वो अपने दादा-दादी माँ- बाबा के सामने कैसे जाए??उसे भूख तो बिलकुल नही थी...क्या प्यार में या बिरह में भूख मर जाती है??किताबों में पढ़ा था...फिल्मों में देखा था...आज उसके साथ घट रहा था..

एक बार फिर माँ  की आवाज़ आयी...उसने अपनी साडी दोनों काँधों पर ओढ़ ली...गर्दन तो कुछ छुप गयी...लेकिन कपोलों  का क्या करे? और होंट  ??खानेके मेज़ पे पहुँची तो उसकी स्थिती एक चोर जैसे हो रही थी...वो अपनी निगाहें उठा नही   पा रही थी..और' वो' हर मौके बे मौके उसे देख रहे थे...और वो वक़्त भी गुज़र गया...देखते ही देखते 'उनके' जाने का समय आ गया...और चले गए...

अब उसे अचानक बिरह क्या होता है, ये पता चला...अब ना जाने कब पिया मिलेंगे? ' उन्हों ने' कहा था,की, पूजा तथा उसके माँ बाबा देहली आयें...लेकिन कब??

उसके बडौदा लौट ने के दिन आ गए, परीक्षा का नतीजा लाना था...वहाँ उसे कुछ दिन रुकना था...और वहीँ उसे साजन का पहला ख़त मिला....छात्रावास में अपनी सहेलियों से वो छुपा नही पा रही थी,की, उस ख़त को वह अपने तकिये के नीचे छुपा के सोती थी..पकडी ही गयी....

परिक्षा में वो अच्छी सफलता पा गयी थी...जब लौटी तो अपने घर पे एक और ख़त इंतज़ार कर रहा था...बहन ने बड़ी छेड़ खानी     करते, करते उसे वो ख़त दिया...कैसा पागल पन सवार था...!! उसके बाद आए ख़त में लिखा था, की, किसी सरकारी काम से 'उन्हें' बेलगाम आना था...और पागल पूजा दिन गिनने लगी...अबकी मुलाक़ात कैसी होगी...ना,ना...अब वो अधिक नजदीकियों से रोकेगी...ये बात ठीक नही...लेकिन कैसे?

'वो' आए...पूजा को अपने बाहों में भरते हुए, बस बिदा के पहले कहा.....क्या कहा..? उसी बात ने उसके प्यार की नींव हिला दी...उसे तो बात समझ में नही आयी...लेकिन जब पूजा और माँ, बाद में देहली पहुँचे तो उस बातका गाम्भीर्य सभीके ख्याल में आया....प्यार भरे दिल पे एक चोट का एहसास...प्यार में शर्तें?? क्या शर्त थी?? पूजा को अब क्या निर्णय लेना चाहिए था??क्या हुआ उनकी देहली के वास्तव्य में? क्या बात थी जो पूजा ने अपनी माँ या दादा दादी को नही बताई थी...या उसकी अहमियत उसे समझ नही आयी थी....?क्या भविष्य था उसके प्यार का ??

क्रमश: