(गतांक: लतीफ़ की धमकी सुन,मैंने हमारे गेट पे तैनात पहरे को इत्तेला दी,की,गर कोई बंदूक लेके घर के परिसर में घुसना चाहे तो रोक देना...चाहे वो कोई भी हो और कुछ भी कहे. बंदूक ना भी तो भी, गेट से अन्दर,बिना मेरी इजाज़त के कोई घुस ना पाए. "...अब आगे पढ़ें).
दिनभर लतीफ़ के इस तरह धमकी बहरे फोन आते रहे. मैंने अपने मकान के बाहर खुलने वाले तक़रीबन सब दरवाज़े बंद रखे.
ज़रा देर शाम जनाब घर के गेट पे पहुँच ही गए. मुझे इत्तेला दी गयी. बंदूक तो साथ नही थी. मैंने intercom पे बात करते हुए लतीफ़ से कहा," आप रहीमा से बात कर सकते हैं,लेकिन मै ग्रिल के दरवाज़े बंद रखूँगी. वो अन्दर रहेगी. आपको बाहर से जो कहना कह देना."
जनाब ने थोड़ी अड़ियल बाज़ी तो की लेकिन मै अपने कहेपे अडिग रही.
बातचीत का सारांश यह था,की,रहीमा किसी तरह घर लौट आए. कभी कुरआन की कसमे खा रहे थे तो कभी बच्चों के सरकी. शराब तो चढी हुई थी ही.
कुछ देर बाद मैंने अन्दर से दरवाज़ा बंद कर लिया और उन्हें जाने के लिए कह दिया. अब अगले दिनका हमें इंतज़ार था जब रहीमा के बहनोई और भाई पहुँचने वाले थे. वो लोग दोपहर २ बजे पहुँचे.
बातचीत के दौरान मैंने उन तीनों को एक कमरेमे छोड़ दिया और वहाँ से हट गयी. कुछ देर बाद रहीमा बाहर आयी तो मैंने उससे नतीजे के बारे में जानना चाहा.
रहीमा ने कहा," जीजा जी के ख़याल से तो औरत ने हर हाल में अपने शौहर के साथ रहना चाहिए...चाहे वो उसे मारे या पीटे! चाहे जहन्नुम जैसे हालात में रखे!"
मै दंग रह गयी! ये आदमी अमरीका जैसे देश से उठके केवल ये बात कहने आया था? उसी रात वो मुंबई लौट रहा था. उसे रहीमा के घरमे न तो रुकना था,न उसकी सुरक्षा की कोई ज़िम्मेदारी उठानी थी.अब जो कुछ दारोमदार था वो ज़फर, रहीमा के भाई पे था.
उसने मुझ से कहा," मेरे रहते लतीफ़ उसे मार पीट तो नही सकता!"
मै:" लेकिन इस तरह कबतक चलेगा? मेरे विचार से तो अब पानी सर से गुज़र चुका है. रहीमा और बच्चे उसके साथ महफूज़ नही. आपने अब लतीफ़ पे तलाक़ का ज़ोर डालना चाहिए!"
ज़फर:" वो इतनी आसानी से माननेवाला नही. कुछ हिकमत ही काम आ सकती है."
मै:" तो तबतक रहीमा और बच्चों को यहाँ से कहीँ और ले जाना चाहिए. "
ज़फर:" आप ठीक कहती हैं...लेकिन लतीफ़ बहुत उधम उठा देगा. ये बात उससे छुप के करनी पड़ेगी."
मै खामोश हो गयी. इनके लौटने का समय भी करीब आ रहा था. रहीमा ज़फर के साथ अपने घर लौट गयी.
इन सब दिनों में एक बात जिसने रहीमा को सब्र दे रखा था वो था ज़ाहिद का उसके लिए प्यार. रहीमा अब कोई नवयुवती या सुन्दरी तो नही रही थी, अच्छा खासा ८० किलो से ऊपर उसका वज़न हो गया था. लेकिन ज़ाहिद का वही बचपन वाला प्यार बरक़रार था. इतनी दुःख तकलीफ़ में भी उसका प्यार था जो रहीमा के होटों पे मुस्कान खिलाये हुए था.
खैर! मैंने रहीमा के साथ अपना संपर्क जारी रखा. दिन में दो तीन बार उसे फोन करही लिया करती. जिस दिन ज़फर ने मुंबई लौटना था,उस दिन लतीफ़ ने उससे वादा किया की,वो ज़ाहिद के साथ सुलह कर लेगा. उसे घर बुलाके माफी माँग लेगा. ज़ाहिद ने भी सोचा होगा की बच्चों को मद्दे नज़र रखते हुए शायद यही ठीक था. लतीफ़ एक और मौक़ा देना. दरअसल बच्चों को तो अपने पिता से कोई लगाव नही था,लेकिन स्कूल में ये बातें गलत असर कर देतीं हैं.
जो भी हो,दूसरे दिन रहीमा से मेरा संपर्क नही हो पाया. तीसरे दिन जब उसने फोन उठाया तो कहा," तुम अगर घर आ सकती हो तो अच्छा हो."
मै उसके घर चली गयी. रहीमा मुझे बच्चों के ऊपरवाले कमरेमे ले गयी और लतीफ़ और ज़ाहिद के मुलाक़ात का किस्सा बताने लगी,"ज़ाहिद मेरी ख़ातिर हर बात करने के लिए राज़ी था. शाम को वो जैसे ही हॉल के अन्दर प्रवेश करने लगा,लतीफ़ ने उसके सर और मूह पे ज़ोर से hockey स्टिक दे मारी और उसे खूना खून कर दिया. अब वो बेचारा साथवाले अस्पताल में पड़ा है. मै उसे मिलने भी नही जा सकती. इस जानवर का वहशीपन ना जाने हमें कहा ले जायेगा??"
अब के रहीमा के आँखों से आँसू निकल पड़े. मै खुद दंग रह गयी..ज़ाहिद का तो पूरा घर वैसे ही रहीमा के खिलाफ हो गया था. रहीमा को राहत मिले तो आखिर कैसे?
क्रमश:
अगली किश्त में मै रहीमा की एक या दो तसवीरें ज़रूर पोस्ट कर दूँगी.
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बुधवार, 22 सितंबर 2010
शुक्रवार, 4 जून 2010
बिखरे सितारे भाग ३:क्या करूँ?क्या करूँ?
( गतांक:शाम के साढ़े चार पाँच बजे के करीब दरवाज़े पे बज रही घंटी से मेरी आँख खुली...कमरे से बाहर निकलते ही मैंने ड्राइवर को आवाज़ दी..वह भी सो गया था...जब तक आया तब तक मैंने दरवाज़ा खोल दिया..और अपने सामने खड़े लोगों को देख हैरान रह गयी...! लोग क्या, अब जब सोचती हूँ,तो एक भयानक तूफ़ान मेरे द्वार पे खडा था...मेरा द्वार? मेरा अपना कोई द्वार या घर था?
अब आगे...)
दरवाज़ा खोला तो दंग रह गयी..सामने खड़े थे,गौरव तथा मेरे भाई और बहन...! कुछ आकलन हो उससे पहले और कुछ लोग अन्दर आए..कुछ गौरव के सह्कर्मी,कुछ हम लोगों के दोस्त, कुछ पुलिस विभाग के लोग...बातों और घटनाओं का सिलसिला, सही क्रम से तो याद नही...कोई कुछ कह रहा था..कोई कुछ कर रहा था..मेरी संवेदनाएँ,मानो नष्ट हुए जा रहीं थीं..
गौरव :" मै तुम दोनों को अनैतिक संबंधों के तहत गिरफ्तार करवा दूँगा...(अवि की ओर मुड़ के)गर मेरे पास बंदूक होती तो मैंने इस पे गोली दाग दी होती..."
बमुश्किल मेरा मूह खुला:" गोली दागनी हो तो मुझ पे दाग दो..यह लड़का बिना इजाज़त के अन्दर नही आया है.."
किसी ने अवी से उसके कागज़ात छीन लिए...मैंने गौरव को अपने मोबाइल से उसकी तस्वीरें लेते देखा..
पता नही किस वक़्त मै अपने भाई बहन के साथ कमरे में गयी...चिल्लाने की आवाज़ सुनी तो बाहर निकली..देखा एक व्यक्ती अवि को चाटें मार रहा था..मैंने टोकने की कोशिश की...उनमे से एक अवि को बाहर ले गया..बाद में पता चला,उसे ट्रेन में बिठा दिया गया..
गौरव कमरेमे आया...कुछ फूल मेरे जुड़े से निकल सिरहाने पड़े थे...
गौरव: " देखा..दुल्हन की तरह सज के बैठी थी...और यह sms देखो..every time you see this sms , consider that you are being hugged a thousand times .."
मैंने कहना चाहा की,वह sms उन्हीं की भांजी का है..महिला दिवस के दिन भेजा हुआ..वो मुझे अपनी माँ की जगह देती रही है...पता नही,मुह से अल्फाज़ निकले या नही..
फिर गौरव ने एक डायरी उठायी,जिसे वो किताब समझ रहा था...उस पे लिखा हुआ था,"Love,live & laugh"...
गौरव :" इसी में से यह औरत एक दिन किसी को फोन पे पढ़ के सुना रही थी ...बेहयाई की इन्तेहा है .."
वह डायरी मुझे मेरे भांजे ने दी थी...उसमे स्त्री भ्रूण ह्त्या को लेके मैंने एक कविता लिखी थी...मैंने कईयों को सुनाई थी...किसे कहती? किसे समझाती? कौन सुनने वाला था उस वक़्त? शायद मै अपनी वाचा भी खो बैठी थी...
गौरव की कमरे के बाहर से आवाज़ आयी:" मै जा रहा हूँ..." फिर तुरंत मेरी बहन और भाई को मुखातिब होके बोला" तुम लोग भी जाओ..रहने दो इसे रंगरलियाँ मनाने के लिए अकेली!"
खैर वो दोनों तो रुके रहे...गौरव चला गया...दिमाग में इतना दर्ज हो रहा था,की,बहन-भाई,दोनों पूरी तरह ,गौरव के बहकावे में आ गए हैं...दोनों को मेरे बर्ताव पे शर्मिन्दगी महसूस हो रही है...वो रात भी गुज़र गयी...मुझे अपने लिए कोई और ठिकाना ढूंढना होगा,यह बात मुझे कही गयी..
अगले दिन माँ भी पहुँच गयीं...डॉक्टर के आने का वो दिन नही था,पर वो भी पहुँच गए...
डॉक्टर:" तुम्हारे पती को अवि के बारे में ख़बर किसने दी?"
मै खामोश रही...मन में आया, शायद जो गोल्फ सेट लेने आया था उसने दी होगी...डॉक्टर चले गए...मै फिर एक कटघरे में खड़ी रह गयी...माँ,बहन,भाई...सब मेरी तफ्तीश में जुड़ गए...सवालों की बौछार...इन्हीं बातों के चलते मुझे बताया गया की,वह ड्रायवर,जो मेरे नैहर से आया था, अपने गाँव भाग निकला..गौरव से बहुत डर गया था..
देर रात केतकी का फोन,मेरी बहन के मोबाईल पे आया....उसने पूछा:" माँ,क्या हालचाल हैं?"
मै:" सब ठीक है, बेटे..."
केतकी:" मैंने सुना,कल बड़ा हंगामा हुआ...!"
मै :' ओह..! तो तुझे किसने बताया?"
केतकी:" मुझे पता चल गया..."
अब मै रो पडी...हे भगवान् ! इसका मतलब बात मेरे बेटी-दामाद तक पहुँचा दी गयी? क्या करूँ? क्या करूँ?
केतकी:" रो मत माँ...! हम दोनों आपके साथ हैं...उस लड़के का क्या हुआ..?"
मै :" उसकी पिटाई हुई..."..मुझे बीच ही में टोक के केतकी ने कहा:" क्या? क्या कह रही हो? उसे पीटा..?"
उसकी आवाज़ में हैरत के सिवा अब बेहद गुस्सा भी था...वो अमरीका से अगले हफ्ते भारत आनेवाली थी..
जब पहुँची,तो सारी कहानी की कुछ कड़ियाँ जुड़ने लगीं...जब गौरव ने मुझ से मोबाइल छीना था,तब मुझे आए हुए सब sms बहुतों को फॉरवर्ड किये थे...उसने मुझ से कहा था की,वह मेरे सेट में उपलब्ध सुविधाएँ देख रहा है....मेरी बहन और केतकी की फोन पे बात चीत भी हुई थी..बहन ने केतकी से कहा था" खबरदार,जो तूने माँ का साथ दिया..वह धोकेबाज़ है..."
जिस ड्रायवर को मैंने काम से हटा दिया था...अब समझ में आने लगा...मेरे मोबाइल का उसने बेहद गलत इस्तेमाल किया था...जूली का झूट भी इसमें शामिल था....
सब से भयानक बात जो सामने आयी वो यह थी...मेरे डॉक्टर ने मुझे ज़बरदस्त धोखा दिया था....एक डॉक्टर की शपथ को कूड़े में फेंक दिया था...क्यों? क्यों किया उसने ऐसा? एक जासूस का किरदार निभाते हुए, उसने हर तरह की झूटी बातें हर किसी से कहीँ थीं..यह कैसा विश्वास घात था...?जो पूरे एक साल से चल रहा था...
क्रमश:
अब आगे...)
दरवाज़ा खोला तो दंग रह गयी..सामने खड़े थे,गौरव तथा मेरे भाई और बहन...! कुछ आकलन हो उससे पहले और कुछ लोग अन्दर आए..कुछ गौरव के सह्कर्मी,कुछ हम लोगों के दोस्त, कुछ पुलिस विभाग के लोग...बातों और घटनाओं का सिलसिला, सही क्रम से तो याद नही...कोई कुछ कह रहा था..कोई कुछ कर रहा था..मेरी संवेदनाएँ,मानो नष्ट हुए जा रहीं थीं..
गौरव :" मै तुम दोनों को अनैतिक संबंधों के तहत गिरफ्तार करवा दूँगा...(अवि की ओर मुड़ के)गर मेरे पास बंदूक होती तो मैंने इस पे गोली दाग दी होती..."
बमुश्किल मेरा मूह खुला:" गोली दागनी हो तो मुझ पे दाग दो..यह लड़का बिना इजाज़त के अन्दर नही आया है.."
किसी ने अवी से उसके कागज़ात छीन लिए...मैंने गौरव को अपने मोबाइल से उसकी तस्वीरें लेते देखा..
पता नही किस वक़्त मै अपने भाई बहन के साथ कमरे में गयी...चिल्लाने की आवाज़ सुनी तो बाहर निकली..देखा एक व्यक्ती अवि को चाटें मार रहा था..मैंने टोकने की कोशिश की...उनमे से एक अवि को बाहर ले गया..बाद में पता चला,उसे ट्रेन में बिठा दिया गया..
गौरव कमरेमे आया...कुछ फूल मेरे जुड़े से निकल सिरहाने पड़े थे...
गौरव: " देखा..दुल्हन की तरह सज के बैठी थी...और यह sms देखो..every time you see this sms , consider that you are being hugged a thousand times .."
मैंने कहना चाहा की,वह sms उन्हीं की भांजी का है..महिला दिवस के दिन भेजा हुआ..वो मुझे अपनी माँ की जगह देती रही है...पता नही,मुह से अल्फाज़ निकले या नही..
फिर गौरव ने एक डायरी उठायी,जिसे वो किताब समझ रहा था...उस पे लिखा हुआ था,"Love,live & laugh"...
गौरव :" इसी में से यह औरत एक दिन किसी को फोन पे पढ़ के सुना रही थी ...बेहयाई की इन्तेहा है .."
वह डायरी मुझे मेरे भांजे ने दी थी...उसमे स्त्री भ्रूण ह्त्या को लेके मैंने एक कविता लिखी थी...मैंने कईयों को सुनाई थी...किसे कहती? किसे समझाती? कौन सुनने वाला था उस वक़्त? शायद मै अपनी वाचा भी खो बैठी थी...
गौरव की कमरे के बाहर से आवाज़ आयी:" मै जा रहा हूँ..." फिर तुरंत मेरी बहन और भाई को मुखातिब होके बोला" तुम लोग भी जाओ..रहने दो इसे रंगरलियाँ मनाने के लिए अकेली!"
खैर वो दोनों तो रुके रहे...गौरव चला गया...दिमाग में इतना दर्ज हो रहा था,की,बहन-भाई,दोनों पूरी तरह ,गौरव के बहकावे में आ गए हैं...दोनों को मेरे बर्ताव पे शर्मिन्दगी महसूस हो रही है...वो रात भी गुज़र गयी...मुझे अपने लिए कोई और ठिकाना ढूंढना होगा,यह बात मुझे कही गयी..
अगले दिन माँ भी पहुँच गयीं...डॉक्टर के आने का वो दिन नही था,पर वो भी पहुँच गए...
डॉक्टर:" तुम्हारे पती को अवि के बारे में ख़बर किसने दी?"
मै खामोश रही...मन में आया, शायद जो गोल्फ सेट लेने आया था उसने दी होगी...डॉक्टर चले गए...मै फिर एक कटघरे में खड़ी रह गयी...माँ,बहन,भाई...सब मेरी तफ्तीश में जुड़ गए...सवालों की बौछार...इन्हीं बातों के चलते मुझे बताया गया की,वह ड्रायवर,जो मेरे नैहर से आया था, अपने गाँव भाग निकला..गौरव से बहुत डर गया था..
देर रात केतकी का फोन,मेरी बहन के मोबाईल पे आया....उसने पूछा:" माँ,क्या हालचाल हैं?"
मै:" सब ठीक है, बेटे..."
केतकी:" मैंने सुना,कल बड़ा हंगामा हुआ...!"
मै :' ओह..! तो तुझे किसने बताया?"
केतकी:" मुझे पता चल गया..."
अब मै रो पडी...हे भगवान् ! इसका मतलब बात मेरे बेटी-दामाद तक पहुँचा दी गयी? क्या करूँ? क्या करूँ?
केतकी:" रो मत माँ...! हम दोनों आपके साथ हैं...उस लड़के का क्या हुआ..?"
मै :" उसकी पिटाई हुई..."..मुझे बीच ही में टोक के केतकी ने कहा:" क्या? क्या कह रही हो? उसे पीटा..?"
उसकी आवाज़ में हैरत के सिवा अब बेहद गुस्सा भी था...वो अमरीका से अगले हफ्ते भारत आनेवाली थी..
जब पहुँची,तो सारी कहानी की कुछ कड़ियाँ जुड़ने लगीं...जब गौरव ने मुझ से मोबाइल छीना था,तब मुझे आए हुए सब sms बहुतों को फॉरवर्ड किये थे...उसने मुझ से कहा था की,वह मेरे सेट में उपलब्ध सुविधाएँ देख रहा है....मेरी बहन और केतकी की फोन पे बात चीत भी हुई थी..बहन ने केतकी से कहा था" खबरदार,जो तूने माँ का साथ दिया..वह धोकेबाज़ है..."
जिस ड्रायवर को मैंने काम से हटा दिया था...अब समझ में आने लगा...मेरे मोबाइल का उसने बेहद गलत इस्तेमाल किया था...जूली का झूट भी इसमें शामिल था....
सब से भयानक बात जो सामने आयी वो यह थी...मेरे डॉक्टर ने मुझे ज़बरदस्त धोखा दिया था....एक डॉक्टर की शपथ को कूड़े में फेंक दिया था...क्यों? क्यों किया उसने ऐसा? एक जासूस का किरदार निभाते हुए, उसने हर तरह की झूटी बातें हर किसी से कहीँ थीं..यह कैसा विश्वास घात था...?जो पूरे एक साल से चल रहा था...
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