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गुरुवार, 30 सितंबर 2010

रहीमा 6

(गतांक: रहीमा और  ज़ाहिद ने मुंबई में निकाह कर लिया और  सोलापूर रहने आ गए. सब से पहले दोनों मुझे मिलने आए. रहीमा की आँखें भर,भर आतीं रहीं...बेहद ख़ुश थी वो...उस के लिहाज़ से एक दो बातें बहुत बढ़िया थीं...अव्वल तो वो अपने पिता के मकान में थी...पती के छोड़ने के बाद उसे कहीँ और मकान तलाशना नही था. दूसरा,चूंकि वह अपने ही पुश्तैनी मकान में थी, ज़ाहिद के घरवालों के मोहताज भी नही थी. वैसे ज़ाहिद ने नया मकान बनाने या खरीद ने का इरादा ज़ाहिर कर ही दिया था...

क्रमश:

किसे पता था,की,वहशत और दहशत किस भेस में छुप मौक़ा तलाश रही थी??अब आगे पढ़ें.)

मेरी, रहीमा और ज़ाहिद से मुलाक़ातें  होती रहीं. रहीमा के बच्चे तो ज़ाहिद से बेहद घुलमिल गए थे. उन्हें पिता का ऐसा प्यार शायद ही कभी मिला था.

एक दिन रहीमा ने ख़बर सुनाई:" लतीफ़ का देहांत हो गया. उसका लिवर शराब के  अती सेवन  के कारण, पूरी तरह से बरबाद हो चुका था. मैंने बच्चों से पूछा की क्या वो जनाज़े में शामिल होना चाहेंगे? लेकिन उनका तो साफ़ इनकार था. उसके परिवार ने मुझे तो पहले ही अलग थलग कर दिया था. मेरे जाने की कोई तुकही नही बनती थी. चलो,उसकी जान छूटी. "

कुछ दिनों बाद रहीमा का जनम दिन था जो ज़ाहिद और बच्चों ने मिलके बडेही अपनेपन से मनाया. रहीमा को कानोकान ख़बर न होने दी और सारा घर सजा डाला. केक ,मिठाईयाँ, नमकीन, सब हाज़िर हो गया ! रहीमा का कई बार खुद की क़िस्मत पे विश्वास नही होता! उसे अपने बचपन का प्यार इतने बरसों बाद मिल गया था और इसतरह,जैसे कभी वो जुदा हुए ही न हों! बच्चों को उसने कभी इतना ख़ुश नही देखा था!   उनके स्कूल के साथियों  के साथ ज़ाहिद पूरी तरह घुलमिल गया. उन्हें ये महसूस ही नही हुआ की उनके जीवन में एक बड़ा तूफ़ान आके गुज़रा है.

दिन बीतते रहे. बातों ही बातों में रहीमा ने उसके भाई की,ज़फर की,एक ख़बर सुनायी:" ज़फर ने उस नीग्रो औरत को छोड़ दिया और अब किसी तीसरी लडकी के साथ चक्कर चल रहा है!"
मै: "ओह! अब ये कौन है? "
रहीमा:" अरे तुम विश्वास नही करोगी! उसके अपने जिगरी दोस्त की मंगेतर. लडकी हिन्दू है इसलिए दोनों घरों से इजाज़त नही मिल रही थी. लडकी को इसके दोस्तने भगाकर हमारे घर रखा और इधर इन दोनों ने अलगही चक्कर चला लिया! लडकी को अब ज़फर ने कनाडा भेज दिया है!!"
मै:"उफ़! क्या कमाल है! ऐसाभी होता है! जीवन में दोस्त   दोस्तपे भरोसा ना कर सके! उस लड़के पे क्या बीती होगी?"
रहीमा:" हाँ सच! मुझे खुद इतनी शर्मिन्दगी  महसूस हुई,लेकिन उससे कौन क्या कहता? उसने तो अब अपना पैंतरा ही बदल दिया है! उसकी निगाहों में तो लतीफ़ 'बेचारा' बन गया है और मै और ज़ाहिद फरेबी!
"उसने हमारे वालिद के नाम का भी बड़ा नाजायज़ फ़ायदा उठाया है. सोलापूर में कम्प्यूटर के पार्ट्स बनाने की फैक्ट्री का ऐलान कर,यहाँ के कई रईसों से उसने पार्टनर शिप के नाम से पैसा इकट्ठा किया है. मुझे तो कुछ फैक्ट्री बनती नज़र नही आती. "
ज़फरका ये बड़ा ही घिनौना चेहरा मेरे सामने आ गया. खैर!

इन बातों के चंद रोज़ बाद रहीमा ,ज़ाहिद और बच्चे कहीँ  घूमने निकल गए. गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गयीं थीं और इन्हीं दिनों हमारा सोलापूर के बाहर तबादला हो गया. हमने सोलापूर छोड़ दिया और  नासिक चले आए. रहीमा से मेरी फोन पे बातचीत होती रहती.
शायद दो या तीन माह बीते होंगे की एक दिन सोलापूर से हमारे एक परिचित का फोन आया:" ज़ाहिद का बड़े अजीब ढंग से हादसा हुआ है......उसे पुणे ले गए हैं...कोमा में है...हालत गंभीर है...पटवर्धन अस्पताल में ....ICU में है....रहीमा बहुत चाहती है की,आप उसे मिलने जाएँ...!"

मेरे ना जाने का सवाल ही नही उठता था...मै दौड़ी,दौड़ी पुणे पहुँच गयी...

क्रमश:

शनिवार, 7 अगस्त 2010

बिखरे सितारे भाग ३:क्या करूँ?क्या करूँ?


( गतांक:शाम के साढ़े चार पाँच बजे के करीब दरवाज़े पे बज रही घंटी से मेरी आँख खुली...कमरे से बाहर निकलते ही मैंने ड्राइवर को आवाज़ दी..वह भी सो गया था...जब तक आया तब तक मैंने दरवाज़ा खोल दिया..और अपने सामने खड़े लोगों को देख हैरान रह गयी...! लोग क्या, अब जब सोचती हूँ,तो एक भयानक तूफ़ान मेरे द्वार पे खडा था...मेरा द्वार? मेरा अपना कोई द्वार या घर था?
अब आगे...)

दरवाज़ा खोला तो दंग रह गयी..सामने खड़े थे,गौरव तथा मेरे भाई   और बहन...! कुछ आकलन हो उससे पहले और कुछ लोग अन्दर आए..कुछ गौरव के सह्कर्मी,कुछ हम लोगों के दोस्त, कुछ पुलिस विभाग के लोग...बातों और घटनाओं का सिलसिला, सही क्रम से तो याद नही...कोई कुछ कह रहा था..कोई कुछ कर रहा था..मेरी संवेदनाएँ,मानो नष्ट हुए जा रहीं थीं..

गौरव :" मै तुम दोनों को अनैतिक संबंधों के तहत गिरफ्तार  करवा दूँगा...(अवि की ओर मुड़ के)गर मेरे पास बंदूक होती तो मैंने इस पे गोली दाग दी होती..."
बमुश्किल मेरा मूह खुला:" गोली दागनी हो तो मुझ पे दाग दो..यह लड़का बिना इजाज़त के अन्दर नही आया है.."
किसी ने अवी से उसके कागज़ात छीन लिए...मैंने गौरव को अपने मोबाइल से उसकी तस्वीरें लेते देखा..
पता नही किस वक़्त मै अपने भाई बहन के साथ कमरे में गयी...चिल्लाने की आवाज़ सुनी तो बाहर निकली..देखा एक व्यक्ती अवि को चाटें मार रहा था..मैंने टोकने की कोशिश की...उनमे से एक अवि को बाहर ले गया..बाद में पता चला,उसे ट्रेन में बिठा दिया गया..

गौरव कमरेमे आया...कुछ फूल मेरे जुड़े से निकल सिरहाने पड़े थे...
गौरव: " देखा..दुल्हन की तरह सज के बैठी थी...और यह sms देखो..every time you  see this sms , consider that you are being hugged a thousand times .."
मैंने कहना चाहा की,वह sms उन्हीं की भांजी का है..महिला दिवस के दिन भेजा हुआ..वो मुझे अपनी माँ की जगह देती रही है...पता नही,मुह से अल्फाज़ निकले या नही..
फिर गौरव ने एक डायरी  उठायी,जिसे वो किताब समझ रहा था...उस पे लिखा हुआ था,"Love,live & laugh"...
गौरव :" इसी  में  से  यह  औरत  एक  दिन  किसी  को  फोन  पे  पढ़  के  सुना  रही  थी ...बेहयाई  की  इन्तेहा  है .."

वह डायरी मुझे मेरे भांजे ने दी थी...उसमे स्त्री भ्रूण ह्त्या को लेके मैंने एक कविता लिखी थी...मैंने कईयों को सुनाई थी...किसे कहती? किसे समझाती? कौन सुनने वाला था उस वक़्त? शायद मै अपनी वाचा भी खो बैठी थी...
गौरव की कमरे के बाहर से आवाज़ आयी:" मै जा रहा हूँ..." फिर तुरंत मेरी बहन और भाई को मुखातिब होके बोला" तुम लोग भी जाओ..रहने दो इसे रंगरलियाँ  मनाने के लिए अकेली!"
खैर वो दोनों तो रुके रहे...गौरव चला गया...दिमाग में इतना दर्ज हो रहा था,की,बहन-भाई,दोनों पूरी तरह ,गौरव के बहकावे में आ गए हैं...दोनों को मेरे बर्ताव पे शर्मिन्दगी महसूस हो रही है...वो रात भी गुज़र गयी...मुझे अपने लिए कोई और ठिकाना ढूंढना होगा,यह बात मुझे कही गयी..

अगले दिन माँ भी पहुँच गयीं...डॉक्टर के आने का वो दिन नही था,पर वो भी पहुँच गए...
डॉक्टर:" तुम्हारे पती को अवि के बारे में ख़बर किसने दी?"
मै खामोश रही...मन में आया, शायद जो गोल्फ सेट लेने आया था उसने दी होगी...डॉक्टर चले गए...मै फिर एक कटघरे में खड़ी रह गयी...माँ,बहन,भाई...सब मेरी तफ्तीश में जुड़  गए...सवालों की बौछार...इन्हीं बातों के चलते मुझे बताया गया की,वह ड्रायवर,जो मेरे नैहर से आया था, अपने गाँव भाग निकला..गौरव से बहुत डर गया था..

देर रात केतकी का फोन,मेरी बहन के मोबाईल पे आया....उसने पूछा:" माँ,क्या हालचाल हैं?"
मै:" सब ठीक है, बेटे..."
केतकी:" मैंने सुना,कल बड़ा हंगामा हुआ...!"
मै :' ओह..! तो तुझे किसने बताया?"
केतकी:" मुझे पता चल गया..."
अब मै रो पडी...हे भगवान् ! इसका मतलब बात मेरे बेटी-दामाद तक पहुँचा दी गयी? क्या करूँ? क्या करूँ?
केतकी:" रो मत माँ...! हम दोनों आपके साथ हैं...उस लड़के का क्या हुआ..?"
मै :" उसकी पिटाई हुई..."..मुझे बीच ही में टोक के केतकी ने कहा:" क्या? क्या कह रही हो? उसे पीटा..?"
उसकी आवाज़ में हैरत के सिवा अब बेहद गुस्सा भी था...वो अमरीका से अगले हफ्ते भारत आनेवाली थी..

जब पहुँची,तो सारी कहानी की कुछ कड़ियाँ जुड़ने लगीं...जब गौरव ने मुझ से मोबाइल छीना था,तब मुझे आए हुए सब sms बहुतों को फॉरवर्ड किये थे...उसने मुझ से कहा था की,वह मेरे सेट में उपलब्ध सुविधाएँ देख रहा है....मेरी बहन और केतकी की फोन पे बात चीत भी हुई थी..बहन ने केतकी से कहा था" खबरदार,जो तूने माँ का साथ दिया..वह धोकेबाज़ है..."
जिस ड्रायवर को मैंने काम से हटा दिया था...अब समझ में आने लगा...मेरे मोबाइल का उसने बेहद गलत इस्तेमाल किया था...जूली का झूट भी इसमें शामिल था....
सब से भयानक बात जो सामने आयी वो यह थी...मेरे डॉक्टर ने मुझे ज़बरदस्त धोखा दिया था....एक डॉक्टर की शपथ को कूड़े में फेंक दिया था...क्यों? क्यों किया उसने ऐसा? एक जासूस का किरदार निभाते हुए, उसने हर तरह की झूटी बातें हर किसी से कहीँ थीं..यह कैसा विश्वास घात था...?जो पूरे एक साल से चल रहा था...
क्रमश: