सेहर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सेहर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

शमा बुझनेको है

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
मैंने खुदको जला लिया,
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
पर सुना, चंद राह्गीरोंको
थोड़ा-सा हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

वैसे तो इस ब्लॉग पे मै  अपनी पद्य रचनाएँ नही  डालती,लेकिन आज डाल  रही हूँ।वो भी एक पुरानी रचना।


गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

युगों पहले...युगों बाद....! 2 अंतिम

( गतांक: तरूणी की हालात अब मुझसे देखी नही जाती...दृश्य की चौखट बदलनी होगी. उसके प्रियतम को कोई नाम देना होगा. तभी तो वो उसे खोज सकेगी!!क्या नाम होगा उसका??...अब आगे पढ़ें.)


                              सिर्फ नाम नही...उसे एक चेहरा भी देना होगा! आदित्य ...उसका नाम आदित्य होगा...होगा नही,था...है! चेहरा?
अब वो युवती समंदर के किनारे खड़ी है. फिर रेत पे बैठ जाती है. तर्जनी उठाके वो एक चेहरा गीली रेत पे चित्रित करती है. मुझे साफ़ नज़र नही आता. फिर वो चेहरा एक शरीर बनता है. अब एक पुरुष का बुत दिखाई दे रहा है. नही...ये बुत नही,जीता जागता पुरुष है! उस लडकी की परस्तिश ने उस बुत में जान डाल दी!! उस महजबीं  ने अपने दिलरुबा के आगे सजदा किया और करती चली गयी. बंदगी का हक़ वो निभाती गयी...उसकी आरज़ू रंग लाई..अब हिज्र की सदी मुख़्तसर हुई... पूरब में सूरज का लाल गोला निकल रहा है,जिससे पश्चिमा भी रक्तिम हो रही है. उस पार्श्वभूमी पे उस तरुण तरूणी की कया काली-सी परछाई की भांती नज़र आ रही है.


ये मिलन की घड़ी है! एक परछाई ने बाहें फैलाई...दूसरी उसमे खो गयी! तरूणी की कोख से अब गर्भ के जनम का समय आ गया है..सेहर होते,होते,उष:काल के साथ साथ एक नए युग की शुरुआत होगी.


मै तृप्त हूँ! मैंने आँखें मूँद ली हैं...! अपने बालों में साजन की उंगलियाँ महसूस कर रही हूँ...आदित्य मेरे बालों में उंगलियाँ पिरो रहा है...कानों में शहद घोलता,मेरा नाम पुकार रहा है...एक नाम नही...कई नाम! बिछड़े युगों की याद दिलाते हुए...आनेवाली सदियों का एहसास करानेवाले!! मेरे नामों में कितना संगीत है,ये जब तुम उच्चारण   करते हो तो आभास  होता है! ये संगीत भैरवी बनेगा! नया आगाज़ होगा! नए जन्मे जीवन के लिए सुबह लोरी गायेगी! शबनम होंट चूमेगी! लेकिन जब किसी का जन्म होगा तब और कोई बिदा लेगा! लडकी का इस दुनिया से पुनश्च बिदा होने का समय आ गया है!वो प्रकृती है..वो चिरयौवना है...वो रात है..उसका विनाश नही होता...सिर्फ रूप बदलता है..


हाँ ! मै रात हूँ! नीरवता में  मेरा बसर होता है...नीरवता से रहगुज़र करती हूँ! सन्नाटा सुनती हूँ,जीती हूँ...पल,पल,पहर,पहर गुज़रती जाती हूँ!मेरे मुक़द्दर में सेहर है...क्योंकि मेरे गर्भ में दिन है....दिन है,क्योंकि आदित्य है. जब पूरब में लालिमा छाती है...खिरामा,खिरामा रंग बिखरता है,तो मुझे समर्पण करना ही होता है. स्याह अंधेरों में सितारे मेरा सिंगार हैं! चाँदनी रातों में चाँद मेरे माथे का झूमर! चिरयौवना दुल्हन हूँ,फिरभी मर मिटती आयी हूँ युगों से! रूप बदलती हूँ...सदियों से!


समाप्त

( मुझे ये सपना आया था,जिसे मैंने नींद खुलते ही शब्दांकित किया! सपना क्या था,एक अजीब, जीवंत अनुभव था!)