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शनिवार, 15 दिसंबर 2012

शमा बुझनेको है

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
मैंने खुदको जला लिया,
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
पर सुना, चंद राह्गीरोंको
थोड़ा-सा हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

वैसे तो इस ब्लॉग पे मै  अपनी पद्य रचनाएँ नही  डालती,लेकिन आज डाल  रही हूँ।वो भी एक पुरानी रचना।