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शनिवार, 7 जनवरी 2012

उसकी मौत का ज़िम्मेदार कौन?

चंद वाक़यात लिखने जा रही हूँ...जो नारी जीवन के एक दुःख भरे पहलू से ताल्लुक़ रखते हैं....ख़ास कर पिछली पीढी के, भारतीय नारी जीवन से रु-ब-रु करा सकते हैं....

हमारे मुल्क में ये प्रथा तो हैही,कि, ब्याह के बाद लडकी अपने माता-पिता का घर छोड़ 'पति 'के घर या ससुराल में रहने जाती है...बचपन से उसपे संस्कार किए जाते हैं,कि, अब वही घर उसका है, उसकी अर्थी वहीँ से उठनी चाहिए..क्या 'वो घर 'उसका होता है? क़ानूनन हो भी, लेकिन भावनात्मक तौरसे, उसे ऐसा महसूस होता है? एक कोमल मानवी मन के पौधेको उसकी ज़मीन से उखाड़ किसी अन्य आँगन में लगाया जाता है...और अपेक्षा रहती है,लडकी के घर में आते ही, उसे अपने पीहर में मिले संस्कार या तौर तरीक़े भुला देने चाहियें..! ऐसा मुमकिन हो सकता है?

जो लिखने जा रही हूँ, वो असली घटना है..एक संभ्रांत परिवार में पली बढ़ी लडकी का दुखद अंत...उसे आत्महत्या करनी पडी... वो तो अपने दोनों बच्चों समेत मर जाना चाह रही थी..लेकिन एक बच्ची, जो ५ सालकी या उससे भी कुछ कम, हाथसे फिसल गयी..और जब इस महिलाने १८ वी मंज़िल से छलाँग लगा ली,तो ये 'बद नसीब' बच गयी... हाँ, उस बचने को मै, उस बच्ची का दुर्भाग्य कहूँगी....

जिस हालमे उसकी ज़िंदगी कटती रही...शायद उन हालत से पाठक भी वाबस्ता हों, तो यही कह सकते हैं..
ये सब, क्यों कैसे हुआ...अगली किश्त में..



रविवार, 17 अप्रैल 2011

दीपा 15

( गतांक: कुछ दिन और बीते....दीपा बेक़रार हो गयी...फिर अचानक से एक दिन प्रसाद का फोन आ गया! दीपा फिर से खिल गयी! लेकिन उस दिन के बाद वो फिर गायब हो गया! और अब के तो बहुत दिन बीत गए! मुझे दीपा को लेकर चिंता होने लगी. पिछली बार तो प्रसाद ने  बहुत माफी माँगी थी...अपनी व्यस्तता बताई थी,और आश्वासन दिया था,की, फिर से ऐसा नहीं होगा! और इसी तरह सप्ताह के बाद सप्ताह बीतते गए....
अब आगे....)
प्रसाद के ऐसे व्यवहार के कारण दीपा बहुत विचलित थी. वो जीवन में एक स्थिरता चाह रही थी. एक मन मीत जिसे वो अपने मन की कह सके....जिस के साथ रोजमर्रा की ज़िंदगी साझा कर सके...वैसे तो दीपा के साथ बहुतों ने संपर्क किया था,लेकिन दीपा अब ब्याह करना नहीं चाह रही थी. किसी का हाथ पकड़ सके, किसी की बाहों में बाहें डाल सके...किसी के साथ खामोश लम्हें बिता सके,या फिर फ़ोन पे खूब बतिया सके....इससे अधिक आगे उसे नही बढ़ाना था. उसे प्रसाद में वैसा व्यक्ती दिखाई दिया था,पर प्रसाद वो नही था...

इसी तररह महीनों बीते. एक दिन शाम हम दोनों मेरी छत पे बैठे बतिया रहे थे. दीपा उदास लग रही थी. बोली: "मेरा प्रसाद से बातें करने का बहुत मन करता है,और वो है की,फोन ही नही उठाता....! क्या करूँ?"
मै:" क्या तुम चाहोगी की,मै अपने फ़ोन से एक बार उसका नंबर मिलाके देखूँ? बता दूँ उसे,गर वो फ़ोन उठाये तो, की तुम कितनी विचलित हो? मै ये नही बताउँगी की तुम मेरे सामने बैठी हो...की उसे फोन करने के बारे में हमने एक दूजे से सलाह की है...सिर्फ इतना कहूँगी,के मै तुम से मिली,और मुझ से तुम्हारी हालत देखी नही गयी...और मैंने तुम से उसका नंबर माँग लिया..."
दीपा ने खुश होकर कहा:" सच? तुम ऐसा करोगी?"
मै:" क्यों नही? ये लो मेरा फ़ोन और घुमा दो उसका नंबर! देखती हूँ,उठाता है या नही!"

दीपा ने तुरंत नंबर घुमा के फ़ोन मुझे पकड़ा दिया....और उधर से प्रसाद ने फ़ोन उठा भी लिया! मैंने अपना परिचय देते हुए कहा,
" देखिये, मुझ से दीपा की हालत देखी नही जाती! आप उसे फ़ोन क्यों नही करते? या उसका फ़ोन आता है,तो क्यों नही उठाते? खैर! जो भी आपके वजूहात हों,आप तुरंत उसे फ़ोन करेंगे तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी और उसे सुकून मिलेगा..."
प्रसाद इनकार नही कर सका. मैंने फ़ोन रखा और दूसरी और दीपा का फोन बजा! दोनों ने बड़ी देरतक बातें कीं. बाद में दीपा ने बड़े इतमिनान से मुझे सारी बातें दोहराके बतायीं . प्रसाद ने उससे वादा किया की अब वो नियम से फ़ोन करेगा...या गर दीपा का फ़ोन होगा तो ज़रूर उठा लेगा...व्यस्त रहा तो बाद में बात कर लेगा! उदास,अस्वस्थ दीपा,अचानक खिल उठी थी!

क्रमश: