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मंगलवार, 7 अगस्त 2012

दयाकी दृष्टी.सदाही रखना ! 7

बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूल मे भेजकर , अमरीका जानेकी इजाज़त देकर कोई गलती तो नही की,बार,बार उसके मनमे आने लगा। अब बहुत  देर हो चुकी थी।
उसने हताश निगाहों से मिसेस सेठना को देखा। बच्चों को उच्च  शिक्षण उपलब्ध कर देने मे उनकी कोई भी खुदगर्ज़ी नही थी । आशा ये अच्छी तरह जानती थी। मिसेस सेठना आगे आयी,उसके हाथ थामे,कंधे थपथपाए, धीरज दिया... राजू चला गया.... सात समंदर पार.... अपनी माँ  की पहुँच  से बहुत  दूर।

आशा और उसका पति  फिर एकबार अपनी झोपडी मे एकाकी जीवन जीने लगे। दिन मे स्कूल का काम, मुख्याधापिका के घर के बर्तन-कपडे,फिर खुद् के घरका काम.... उसके पति को उसके मन की दशा दिखती थी । गराजसे घर आते समय कभी कभार वो उसके लिए गजरा लाता,कभी बडे, तो कभी ब्लाऊज़ पीस।

दो साल बाद संजू भी अमरीका चला गया । आशा और उसके पती की दिनचर्या वैसीही चलती रही। कभी कभी कोई ग्राहक खुश होके उसे टिप देता तो वो आशाके लिए साडी ले आता। भगवान् की दयासे उसे कोई व्यसन नही था। एक बार बहुत  दिनों तक वो कुछ नही लाया। दीवाली पास थी। थोडी बहुत  मिठाई,नमकीन बनाते समय आशाको छोटे,छोटे राजू-संजू याद आ रहे थे। लड्डू, चकली,चेवडा,गुजिया बनाते समय कैसी ललचाई निगाहोंसे इन सब चीजों को देखते रहते, उससे चिपक कर बैठे रहते।

आँचल से आँसू पोंछते ,पोंछते वो यादों मे खो गयी थी । पती कब पीछे आके खड़ा हो गया, उसे पता भी नही चला। उसने हल्केसे आशाके हाथोंमे एक गुलाबी कागज़ की पुडिया दी तथा एक थैली पकडाई। पुडियामे सोनेका मंगलसूत्र था, थैलीमे ज़री की साडी.......!
आशा बेहद खुश हो उठी! मुद्दतों बाद उसके चेहरेपे हँसी छलकी!! वो भी उठी..... उसने एक बक्सा खोला.... उसमेसे एक थैली निकली, जिसमे अपनी तन्ख्वाह्से बचाके अपने पति के लिए खरीदे हुए कपडे थे.... टीचर्स ने समय,समय पे दी हुई टिप्स्मे से खरीदी हुई सोनेकी चेन थी.....
पतिको भी बेहद ख़ुशी हुई। एक अरसे बाद दोनो आपसमे बैठके बतियाते रहे, वो अपने ग्राह्को के बारेमे बताता रहा, वो अपने स्कूलके बारेमे बताती रही।

समय बीतता गया। बच्चे शुरुमे मिसेस सेठनाके पतेपे ख़त भेजते रहते थे। आहिस्ता,आहिस्ता खतोंकी संख्या कम होती गयी और फिर तकरीबन बंद-सी हो गयी। फ़ोन आते, माँ-बापके बारेमे पूछताछ होती। एक बार मिसेस सेठ्नाने आशाको घर बुलवाया और उसके हाथमे एक लिफाफा पकडा के कहा," आशा ये पैसे है,तेरे बच्चों ने मेरे बैंक मे तेरे लिए ट्रान्सफर किये थे। रख ले। तेरे बच्चे एहसान फरामोश नही निकलेंगे। तुझे नही भूलेंगे।"

आशा पैसे लेके घर आयी। उसने वो लिफाफा वैसाही रख दिया। बहुओं के लिए कुछ लेगी कभी सोंचके.... इसी तरह कुछ समय और बीत गया। एक दिन सहज ही मिसेस सेठना का हालचाल पूछने वो उनके घर पहुँच        गयी। मिसेस सेठना हमेशा बडे ही अपनेपन से उससे मिलती। तभी उनका फ़ोन बजा, उनकी बातों परसे आशा समझ गयी कि फ़ोन राजूका है।
कुछ समय बाद मिसेस सेठना गंभीर हो गयी और सिर्फ"हूँ,हूँ" ऐसा कुछ बोलती रही। फिर उन्होंने आशा को फ़ोन पकडाया और खुद सोफेपे बैठ गयीं......
मुद्दतों बाद आशा राजूकी आवाज़ सुननेवाली थी। "हेलो " कहते,कह्ते ही उसकी आँखें और गला दोनो ही भर आये.....और फिर वो खबर उसके कानोपे टकराई ........
राजूने शादी कर ली थी, वहीँ की एक हिन्दुस्तानी लड़कीसे........ वहीँ बसनेका निर्णय ले लिया था। वो अपनी माँ को नियमसे पैसे भेजता रहेगा..... । कुछ देर बाद आशाको सुनाई देना बंद हो गया.......
उसने फ़ोन रख दिया। सुन्न-सी होके वो खडी रह गयी। मिसेस सेठना ने उसे अपने पास बिठा लिया। उनकी आँखों मे भी आँसू थे।

"आशा ,मैं तेरी बहुत  बड़ी गुनाहगार हूँ । मैं खुद को कभी माफ़ नही कर पाऊँगी । बच्चे ऐसा बर्ताव करेंगे इसकी मुझे ज़राभी कल्पना होती तो मैं उन्हें परदेस नही भेजती," बोलते,बोलते वो उठ खडी हुई।
" राजूने सिर्फ शादीही नही की बल्की अपनी पत्नी तथा उसके घरवालोंको बताया कि उसके माँ-बाप बचपन मे ही मर चुके हैं! मुझे....मुझे कह रहा था कि मैं.....मैं इस बातमे साझेदार बनूँ!!शेम ऑन हिम!!भगवान् मुझे कभी क्षमा नही करेंगे....!ये मेरे हाथोंसे क्या हो गया?"

वो अब ज़ोर ज़ोर से रो रही थीं। चीखती जा रही थीं।आशाका सारा शरीर बधीर हो गया था। वो क्या सुन रही थी? उसके बेटेने उसे जीते जी मार दिया था??उसे अपने गरीब माँ-बापकी शर्म आती थी??और उसने सारी उम्र उसके इन्तेज़ारमे बिता दी थी? ममताका गला घोंट,घोंटके एकेक दिन काटा था!

अंतमे जब वो घर लौटनेके लिए खडी हुई तो उसकी दशा देख कर मिसेस सेठ्नाने अपनी कारसे उसे बस्तीमे छुड़वा दिया। झोंपडीमे आके वो कहीँ दूर शून्यमे ताकती रही। बाहर बस्तीमे के बच्चे खेल रहे थे। उसका आँगन बरसोंसे सूना था। वैसाही रहनेवाला था........

बस्तीके कितनेही लोग उससे जलते थे, लेकिन वो अपने सीनेकी आग किसे बताती??ज़िंदगी ने कैसे,कैसे मोड़ लेके उसे ऐसा अकेला कर डाला था! उसके कान मे कभी उसके छुटकों  के स्वर गूँजते तो कभी आँखोंसे रिमझिम सपने झरते। उसका पति  जब घर आया तो उसने मनका सारा गुबार निकाला , खूब रोई।
पति  एकदम खामोश हो गया। फिर कुछ देर बाद बोला,"सच!  अगर तेरी बात सुनी होती,हम पढ़ लिख गए होते, तो अपने ही बलबूते पे बच्चे पढे होते... जो भी पढे होते, ये समय आताही नही।"
 आशाने कुछ जवाब दिया नही। उस रात दोनो ही खाली पेट ही सो गए। सो गए केवल कहनेके लिए, आशाकी आँखोंसे नींद कोसों दूर थी।
 क्रमश:





सोमवार, 6 अगस्त 2012

दयाकी दृष्टी.सदाही रखना ! 6


मुख्याध्यापिकाने कहा,"आशा, बच्चों का इसीमे कल्याण है। ऐसा सुनहरा अवसर इन्हें फिरसे नही मिलेगा। तुम दोनो मिलकर इनको कितना पढा लोगे?और मिसेज़ सेठना अगर इसी शहर मे किसी बडे स्कूल मी प्रवेश दिला दें, सारा खर्चा कर दें, फिर भी अगर तुम्हारे बच्चों के मित्रों को असली स्थिती का पता चलेगा तब इनमे बेहद हीनभाव भर जाएगा। ज्यादा सोंचो मत। "हाँ" कर दो। "

आशा ने "हाँ" तो भर दी लेकिन घर आकर वो खूब रोई । बच्चे उससे चिपक कर बैठे रहे। कुछ देर बाद आँसूं की धाराएँ रूक गयी। वो अपलक टपरी के बाहर उड़नेवाले कचरे को देखती रही। उसमे का काफी कचरा पास ही मे बहनेवाली खुली नाली मे उड़कर गिर रहा था........

हाँ!! उसका बंगला,उसका सपनोंका बंगला,उसका अपना बंगला, कभी अस्तित्व मे थाही नही। वो हिना, वो जूही का मंडुआ ,बाम्बू का जमघट, उससे लिपटी मधुमालती, वो बगिया जिसमे पँछी शबनम चुगते थे,जिस बंगले की छतसे वो सूर्योदय निहारती ,कुछ,कुछ्भी तो नही था!

बच्चे गए। उससे पहले मिसेस सेठना ने उनके लिए अंग्रेजी की ट्यूशन लगवाकर बहुत  अच्छी तैय्यारी करवा ली। उनके लिए बढिया कपडे सिलवाये! सब तेहज़ीब सिखलाई। एक हिल स्टेशन पे खुद्की जिम्मेदारी पे प्रवेश दिलवा दिया। वहाँ के मुख्याध्यापक तथा trustees उनके अच्छे परिचित थे। सब ने सहयोग किया।

बच्चों पर शुरू मे खास ध्यान दिया गया। मिसेस सेठना ने पत्रव्यवहार के लिए अपना पता दिया। अपने माँ-बाप देश के  दूसरे  कोने मे रहते हैं, तथा उनकी तबादले की नौकरी है, इसलिए हम सेठना आंटी के घर जाएँगे तथा हमारे ममी-पापा हमे वहीं मिलने आएँगे, यही सब क्लास के बच्चों को कहने की हिदायत दी गयी। शुरुमे बच्चे भौंचक्के से हो गए, लेकिन धीरे,धीरे उन्हें आदत हो गयी।

स्कूलमे साफ-सुथरे स्नानगृह,समयपे खाना (माँ के हाथों का स्वाद न सही),टेबल कुर्सियाँ , सोनेके लिए पलंग, पढाई के  लिए हरेक को स्वतंत्र डेस्क, बिजलीकी सुविधा,अलग,अलग,खेल,पहाडोंका सौंदर्य.....ये सब धीरे,धीरे बच्चों को आकर्षित करने लगा।


पहली  बार छुट्टीयों मे बच्चे मिसेस सेठना के पास आये और फिर वहाँ से माँ के पास मिलने गए तो ,क्या क्या कहे क्या न कहें,ऐसी उनकी हालत हो गयी थी। लेकिन रातमे सेठना आंटी के घर पे  रहनेका हठ करने लगे। वहाँ बाथरूम कितने साफ-सुथरे हैं,कमरेसे लगे हैं, गरम पानी जब चाहो नलकेमे आ जाता है। फिर आंटी  सोनेके लिए कमरा भी अलग देंगी,नरम,नरम गद्दे होंगे, टी.वी.होगा,कार्टून देखने को मिलेंगे, हम कल फिर आएंगे ना....आदि  कारण बता कर बच्चे रात मे लौट  गए। आशा का दिल छलनी हो गया। उनका विश्व बदल जाएगा,इस बातकी उसको एक झलक मिल गयी।


छुट्टियाँ समाप्त होने आयीं तब उसने बच्चों के लिए लड़दो,चकली,चिवडा आदी चीज़ें बनाईं। पाकेट बनाकर मिसेस सेठना के घर ले गयी। बच्चों ने खोलके देखा तो कहने लगे,माँ,आंटी ने हमे बहुत  कुछ दिया है। ये देखो,केक,बिस्किट और ना जाने क्या,क्या!!"


इतनेमे मिसेस सेठना वहाँ पहुँच गयी और आशा का उदास -सा चेहरा और उसके हाथ की पुडियाँ देखकर जान गयी। तुंरत अन्दर जाके कुछ डिब्बे ले आयीं और बोलीं," ये चीज़ें तुम्हारे लिए तुम्हारी माँ  ने अपने हाथोंसे बनाई हैं। ये बहुत अच्छी होंगी । रख लो इन्हें। "

स्कूलमे साफ-सुथरे स्नानगृह,समयपे खाना (माँ के हाथों का स्वाद न सही),टेबल कुर्सियाँ , सोनेके लिए पलंग, पढ़ईके लिए हरेक को स्वतंत्र डेस्क बिजलीकी सुविधा,अलग,अलग,खेल,पहाडोंका सौंदर्य,ये सब धीरे,धीरे बच्चों को आकर्षित करने लगा।


पहली बार बार छुट्टीयों मे बच्चे मिसेस सेठना के पास आये और फिर वहाँसे माँ के पास मिलने गए तो ,क्या क्या कहे क्या न कहें,ऐसी उनकी हालत हो गयी थी। लेकिन रातमे सेठना आंटी के घर रहनेका हठ करने लगे। वहाँ बाथरूम कितने साफ-सुथरे हैं,कमरेसे लगे हैं, गरम पानी जब चाहो नलकेमे आ जाता है। फिर आंटी  सोनेके लिए कमरा भी अलग देंगी,नरम,नरम गद्दे होंगे, टी.वी.होगा,कार्टून देखने को मिलेंगे, हम कल फिर आएंगे ना....आदि  कारण बता कर बच्चे रात मे लौट  गए। आशा का दिल छलनी हो गया। उनका विश्व बदल जाएगा,इस बातकी उसको एक झलक मिल गयी।


छुट्टियाँ समाप्त होने आयीं तब उसने बच्चों के लिए लड़दो,चकली,चिवडा आदी चीज़ें बनाईं। पाकेट बनाकर मिसेस सेठना के घर ले गयी। बच्चों ने खोलके देखा तो कहने लगे,माँ,आंटी ने हमे बहुत  कुछ दिया है। ये देखो,केक,बिस्किट और ना जाने क्या,क्या!!"


इतनेमे मिसेस सेठना वहाँ पहुँच  गयी और आशा का उदास -सा चेहरा और उसके हाथ की पुडियाँ देखकर जान गयी। तुंरत अन्दर जाके कुछ खाली  डिब्बे ले आयीं और बोलीं," ये चीज़ें तुम्हारे लिए तुम्हारी माँ  ने अपने हाथोंसे बनाई हैं। ये बहुत  अच्छी होंगी । रख लो इन्हें। "


ऐसी कितनीही छुट्टियाँ आयी और गयी। आशा बच्चों का साथ पाने के लिए तरसती रही और बच्चे उसे तरसाते रहे। माँ का त्याग उनके समझ मे आया ही नही,बल्कि माँ-बापने अपनी जिम्मेदारी झटक के सेठना आंटी पे डाल दी,यही बात कही उनके मनमे घर कर गयी। बारहवी के बाद राजीव मेडिकल कॉलेज मी दाखिल हो गया। मिसेस सेठना सारा खर्च उठाती रही। बादमे संजूभी मेडिकल कॉलेज मी दाखिल हो गया।
पोस्ट ग्राजुएशन के लिए पहले राजू और फिर संजू इस तरह दोनो ही अमेरिका चले गए। मिसेस सेठ्नाने फिर उनपे बहुत  खर्च किया।

राजू के एअरपोर्ट चलने से पहले दोनो पती-पत्नी राजूको विदा करने मिसेस सेठना के घर गए। आशाकी आँखों से पानी रोके नही रूक रहा था।
 राजूको गुस्सा आया,बोला,"माँ लोगों के बच्चे परदेस जाते हैं तो वे मिठाई बाँटते हैं, और यहाँ तुम हो कि रोये चली जा रही हो!!अरे मैं हमेशाके लिए थोडेही जा रहा हूँ??लौट  कर आऊँगा!! एक बार कमाने लगूँगा तो अच्छा घर बना सकेंगे, और कितनी सारी चीजे कर सकेंगे। ज़रा धीरज रखो।"
"बेटा,अब तुम्हारीही राह तकती रहूँगी अपने बच्चों से बिछड़ कर एक माँ के कलेजे पे क्या गुज़रती है,तुम नही समझोगे ,"आशा आँचल से आँसू पोंछते हुए बोली।
क्रमश: 




शनिवार, 7 जनवरी 2012

उसकी मौत का ज़िम्मेदार कौन?

चंद वाक़यात लिखने जा रही हूँ...जो नारी जीवन के एक दुःख भरे पहलू से ताल्लुक़ रखते हैं....ख़ास कर पिछली पीढी के, भारतीय नारी जीवन से रु-ब-रु करा सकते हैं....

हमारे मुल्क में ये प्रथा तो हैही,कि, ब्याह के बाद लडकी अपने माता-पिता का घर छोड़ 'पति 'के घर या ससुराल में रहने जाती है...बचपन से उसपे संस्कार किए जाते हैं,कि, अब वही घर उसका है, उसकी अर्थी वहीँ से उठनी चाहिए..क्या 'वो घर 'उसका होता है? क़ानूनन हो भी, लेकिन भावनात्मक तौरसे, उसे ऐसा महसूस होता है? एक कोमल मानवी मन के पौधेको उसकी ज़मीन से उखाड़ किसी अन्य आँगन में लगाया जाता है...और अपेक्षा रहती है,लडकी के घर में आते ही, उसे अपने पीहर में मिले संस्कार या तौर तरीक़े भुला देने चाहियें..! ऐसा मुमकिन हो सकता है?

जो लिखने जा रही हूँ, वो असली घटना है..एक संभ्रांत परिवार में पली बढ़ी लडकी का दुखद अंत...उसे आत्महत्या करनी पडी... वो तो अपने दोनों बच्चों समेत मर जाना चाह रही थी..लेकिन एक बच्ची, जो ५ सालकी या उससे भी कुछ कम, हाथसे फिसल गयी..और जब इस महिलाने १८ वी मंज़िल से छलाँग लगा ली,तो ये 'बद नसीब' बच गयी... हाँ, उस बचने को मै, उस बच्ची का दुर्भाग्य कहूँगी....

जिस हालमे उसकी ज़िंदगी कटती रही...शायद उन हालत से पाठक भी वाबस्ता हों, तो यही कह सकते हैं..
ये सब, क्यों कैसे हुआ...अगली किश्त में..



मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

क्या करूँ कैसे करूँ?

पिछली  बार अपनी माँ की देखभाल के बारे में मैंने लिखा था और अपने blogger दोस्तों से सलाह पूछी थी. माँ को अपने पास लाने की पूरी कोशिश कर चुकी हूँ. सभी ने यही सलाह दी थी.   अपनी बेटी की सलाह से सहमत तो मै भी नही. हालाँकि  अपने लिए मै वही चाहूँगी.  मै अपने पती से बार,बार कहती हूँ,की, मुझे नलियों में जकड के मत ज़िंदा रखना. पर हमारे अपने चाहने से क्या होता है? होगा वही जो क़िस्मत में लिखा होगा.

माँ को अपने पास लानेकी कोशिश नाकामयाब हो चुकी है. वो तैयार नही मेरे पास आनेके लिए क्योंकि पिताजी आना नही चाहते और माँ पिताजी को छोडके आ नही सकतीं. पिताजीको मेरे घर रहना बिलकुल नही सुहाता. उनका फ्लैट में दम घुटता है.

परेशान हूँ की अब माँ की बीमारी और बुढापे से सामने आये सवालों से कैसे निपटा जाये?

सभी दोस्तों की,जिन्हों ने टिप्पणी  के ज़रिये मुझे सलाह दी बहुत,बहुत शुक्र गुज़ार हूँ. अब फिर से एक सवाल लेके आयी हूँ. कैसे मनाऊं माँ को? कैसे मनाऊं अपने पिता को? खेत पे रह के उनकी देख भाल करने वाला कोई नही. nurse  को वो रखना नही चाहते. मेरे भाई का बेटा उनके साथ रहता है लेकिन उसकी कोई भी सहायता नही. उसे उनकी property हड़प ने के अलावा और किसी चीज़ में रुची नही. जो एक बहुत प्यारा बच्चा था बचपन में, आज क्या से क्या हो गया.....फिरभी माँ की आँखें खुलती नही. जबकि उसकी खुदगर्जी ज़ाहिर है. भाई -भाभी कोई ज़िम्मेदारी उठाने को राजी नही. नाही वो अपने बेटे से कुछ कहते हैं. भाई यहीं पुणे में रहता है. क्या करूँ कैसे करूँ? दिन-b- दिन मै डिप्रेशन शिकार होती जा रही हूँ.


बुधवार, 3 अगस्त 2011

कौन सही है ,कौन गलत ?

कई बार सोचती हूँ...मैंने क्या लिखना चाहिए? क्या लिखना चाहती हूँ? मैंने सामाजिक दायित्व निभाना है? या बिखरते परिवारों के बारेमे लिखना है?अंदरसे कोई आवाज़ नहीं आती....एक खालीपन का एहसास मात्र रह जाता है.

बरसों बीत गए इस बात को. mai    अपने नैहर गयी थी. शाम को बगीचे में टेबल लगाके mai ,दादी अम्म्मा और दादा बैठे हुए गप लगा रहे थे. अचानक दादा को नमाज़ के समय का ख्याल आया. वो दादी अम्मासे  बोले," चलो,नमाज़ का वक़्त हो गया है."
दादी अम्मा बोलीं," अरे यही बच्चे तो मेरी नमाज़ हैं....यही तो मेरी दुनिया हैं....आप जाईये,पढ़िए....mai इसी के साथ बातें करती बैठुंगी. इसने कहाँ बार बार आना है!"
दादी अम्मा का ये जवाब मुझे बेहद पसंद आ गया और ज़ेहन में  बैठ  गया.
और बरस बीते. मेरी बेटी विद्यालय  के आखरी साल में पढ़ रही थी. mai उसके लिए जलपान ले गयी और उसके सरपे हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से कहा," तुम्ही बच्चे तो मेरी दुनिया  हो!"
बिटिया ने झट से अपने सरपर से मेरा हाथ हटाया और कहा," माँ! तुम अपनी दुनिया  अलग बनाओ. हमारी दुनिया से अलग.....हमें अलग से जीने दो!"
मुझे लगा जैसे किसी ने एक तमाचा जड़ दिया हो. mai अपनी पलकों पे आंसूं तोलते हुए अपने कमरे में चली गयी और जी भर के रो ली. गलत कौन था....मेरी समझ में नहीं आया...माँ या बेटी? या दोनों अपनी,अपनी जगह पे  सही थे?मुझे भीतर तक कुछ कचोट गया था...
मेरे छंद तो बहुत से थे. लेकिन जीवनका अधिकतर समय घरकी देखभाल,रसोई,खानपान,सफाई,फूल पौधे,बागवानी, कमरों में फूल सजाना,बच्चों की पढ़ाई,पति  के अति व्यस्त जीवन के साथ मेलजोल....इसी में व्यतीत होता रहा...अचानक से इन सभी से भिन्न mai अपनी अलग एक दुनिया कैसे बना लेती?
कौन  सही  है ,कौन  गलत ?है किसी के पास जवाब?

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

दीपा 10

( गतांक : नरेंद्र ने मुझे आश्वस्त किया!वक़्त इतना बेरहम नही हो सकता! हमें बार,बार मिलाके जुदा नही कर सकता!हमारा भविष्य अब एक दूजे से जुदा नही था! उसने मुझे पूरा यक़ीन दिलाया!
कितने महीनों बाद मुझे एक निश्चिन्तता भरी नींद  आयी!बस अब कुछ ही रोज़ का फासला था,मुझमे और मेरे सुनहरे,हँसते भविष्य में!मैंने अपने भयावह वर्तमान पे,नरेंद्र के सहारे विजय पा ली थी....!!".....अब आगे.)

दीपा के लिए वो दिन बड़े ही स्वप्निल थे! नशीले थे! नरेंद्र का संबल जो प्राप्त था! पर क़िस्मत को ये खुशियाँ मंज़ूर नही थीं! दीपा के पती ने बच्चों को हथिया लिया! और दीपा बच्चों के बिना रह नही सकती थी....बच्चे उसकी प्राथमिकता थे! अगर उसका पति एक अच्छा बाप होता तो भी और बात होती. वो तो बेहद सख्त,बेदर्द और बेज़िम्मेदार पिता था. पिता की दहशत के कारण बच्चों का क्या भविष्य होता,ये तो दीपा सोच भी नही सकती थी!

नरेंद्र का ख़याल छोड़ बेरहम यथार्थ को स्वीकार करने के अलावा उसके पास कोई चारा नही बचा. नरेंद्र फिरभी अपनी ज़िद पे अटल था..."मै इंतज़ार करुँगा...!" बार,बार दीपा को वो यही कहता रहता. लेकिन अब दीपा का निश्चय हो चुका था. उसने भी नरेंद्र को अपना अलग  भविष्य बनाने के लिए गुहार लगाना जारी किया!

अब दीपा का जीवन उसी नरक में सिमट के रह गया. वही मारपीट,वही मानसिक छल. पर दीपा अपने मक़सद से हिली नही. बच्चों की पढ़ाई और उनकी परवरिश....इसके अलावा अब जीवन में कुछ शेष नही था.

बच्चों को कई बार अपनी माँ के खिलाफ भड़काया जाता....कमरेमे बंद किया जाता,ताकि वो माँ से मिल न सकें....बच्चे हालात को खूब समझते थे. वो छुप-छुपके माँ का जनम दिन मनाते! मात्रु-दिवस मनाते!दीपा के लिए अब यही काफ़ी था.

एक बार दीपा को उसके पतिने लोहे की सलाख से  इतनी बेरहमी से पीटा,की,वो खूना खून हो गयी. उस वक़्त बच्चों ने अपनी माँ से कहा," माँ! हमें तुम्हारी ज़िंदगी प्यारी है! तुम्हारा ज़िंदा रहना हमारे लिए सब से अधिक मायने रखता है! हमारी पढ़ाई की चिंता किये बिना तुम चुपचाप,रात को यहाँ से भाग निकालो!"

उसी रात, दीपा, छिपते छिपाते घर से निकल गयी. वो रात उसने अपने एक दूर के रिश्तेदार के घर गुज़ारी. वो लोग उसे डॉक्टर के पास ले गए. टिटनस का इंजेक्शन लगवाया,तथा ज़ख्मों का इलाज कराया. बातों बातों में दीपा ने कहा:
" अडोस-पड़ोस के लोग कई बार मुझे ही दोषी पाते! उन्हें लगता, ये आदमी परिवार को इतना घुमाने फिराने ले जाता है! त्योहारों पे पत्नी को गहनों से लाद देता है! इतना शौकीन है! गाडी है,बंगला है,नौकर चाकर हैं...किसी बात की कमी नही है! ज़रूर कोई तो अंदरूनी बात होगी,जो ये आदमी इतना गुस्सा खा जाता है! कहीँ तो दीपा का क़ुसूर होगा!
लोगों को असलियत क्या पता? और मै किसे बताने जाती? कौन विश्वास रखता? मेरे दो बच्चे जो हो चुके थे!"

ऐसी ही नीरस ज़िंदगी बीतती गयी. चंद हफ्ते दीपा घर से दूर रहती,फिर बच्चों की ख़ातिर लौट आती. उसकी अपनी कोई आमदनी तो थी नही! ना कोई नौकरी करने की इजाज़त उसे देता!दीपा ने आगे बताया:
" इसी तरह एक बार बहुत पिटने के बाद मै माँ के घर चली गयी. एकाध माह हो चुका था,की, ख़बर मिली,मेरे पति बहुत बीमार हैं. अस्पताल में भरती कराया गया है. अब के बच्चे भी डर गए. बच्चों ने मुझे बुला लिया. मै चली गयी.
जिस रोज़ अस्पताल पहुँची,उसी रोज़ डॉक्टर ने मुझे अपने केबिन में बुलाया. ....ये कह के की उन्हें मुझ से कुछ बहुत ज़रूरी बात अकेले  में करनी है.पति की गंभीर हालत तो मुझे दिख ही रही थी. पैसा पानी की तरह बह रहा था. मै केबिन में गयी तो डॉक्टर बोले, मै बिना किसी लागलपेट के सीधी बात कह रहा हूँ.तुम्हारे  पति को AIDS है. उसके बचने की उम्मीद नही है. लेकिन तुम्हें तथा तुम्हारे बच्चों को तुरंत अपना चेकअप कराना होगा.HIV positive होने की शक्यता नकारी नही जा सकती...'
" मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी!  हे भगवान्! बस इतनाही होना बचा था? जाते,जाते हमें ये आदमी  क्या तोहफा दे चला??"
क्रमश:


मंगलवार, 25 जनवरी 2011

दीपा 7

इस कड़ी की देरीके लिए शर्मिंदा हूँ....तहे दिल से माफी चाहती हूँ.बेटे का ब्याह था...उसमे दिन रात का कोई होश नही रहा.
(गतांक: अबतक मुझे उसपे विश्वास हो गया था और मैंने अपने हालात उसके सामने खुलके बता दिए.

एक रोज़ हम चारों सिनेमा देखने गए थे. फिल्म के दौरान अचानक से उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया. मै रोमांचित हो उठी! फिल्म ख़त्म होने के बाद जब हम घर लौटे तो उसने मुझ से कहा,मै तुम से शादी करना चाहता हूँ. तुम्हारे बच्चों में भी मेरा मन रम गया है.....
मै दंग रह गयी!"......अब आगे.)

दीपा बता रही थी और मै सुन रही थी. आगे की बातें जान लेने का कौतुहल था...जिज्ञासा थी.
मै: "ओह! तो ?"
दीपा: " मै सुन के ख़ुश तो बहुत हुई. हम दोनों तथा बच्चे जब कभी इकट्ठे घूमने जाते या फिल्म देखने जाते तो मुझे एक सम्पूर्ण परिवार होने का एहसास हुआ करता. सिनेमा हॉल में वो घंटो मेरा हाथ पकडे रखता और मै रोमांचित हो उठती. एक पुरुष का स्पर्श कैसा होता है,इसका मैंने पहली बार अनुभव किया. हम बहुत करीब आ रहे थे. वो भी मेरे तथा बच्चों के साथ पूरी तरह घुलमिल गया था. मेरे जीवन की खलने वाली,अखरने वाली और फिर निराश करनेवाली कमी उसने दूर कर दी थी. मुझे अपने स्त्रीत्व का एहसास हो रहा था.
उसी साल ज़िद करके मैंने अजय को ब्याह के लिए राज़ी कर लिया था. उसने मेरी बात मान के ब्याह तो कर लिया लेकिन भावनात्मक तौर से वो अब भी मुझसे जुड़ा हुआ महसूस किया करता. उसके ब्याह के बाद  स्वयं मुझे बेहद अकेलापन महसूस हुआ.....एक नितांत खाली पन,जिसे नरेंद्र ने अपने वजूद से भर दिया. अजय की विरह वेदना मै भूल चली. "

मै:" लेकिन उसके सवाल का क्या जवाब दिया?"

दीपा:" बहुत मोह हुआ.होना कुदरती भी था.इस बंदी शाला से मुक्ती की एक हल्की-सी उम्मीद किरन बनके चमकने लगी.  मैंने उस दिशामे सोचना शुरू कर दिया. मेरे पति महोदय कभी कबार आ जाया करते. उन्हें किसी बात की भनक नही पडी. लेकिन एक साल होने के पश्च्यात उन्हों ने हमें वापस पुणे ले जानेका निर्णय ले लिया.
मै मनही मन उनसे डिवोर्स लेनेकी दिशामे विचार करना शुरू किया. नरेंद्र के प्यार में एक मदहोशी थी. मुझे हर मुश्किल आसान लग रही थी.बड़े दुखी मन से नरेंद्र से विदा ली. मैंने उसे विश्वास दिलाया की,मै उस दिशामे ठोस क़दम उठा लूँगी."

मै:" और तुम लोग पुणे लौट आए...उफ़! फिर उसी नरक में!!"

दीपा :" तो और क्या कर सकते थे?फिलहाल तो मै अपने पति की बंधक ही थी! लेकिन पुणे पहुँच के हम दोनों में बहुत अनबन हुई. वही मार पीट. मै अपने बच्चों समेत अहमदनगर चली आयी,जहाँ मेरे पिता की पोस्टिंग थी. पिताजी ने बच्चों का वहीँ के स्कूल में दाखिला करवा दिया. नरेंद्र से खतोकिताबत जारी थी. उसके फोन भी आया करते. वो हमेशा मेरा धाडस बंधाता. हमारे रिश्ते को दो साल हो गए थे. अहमदनगर में रहते,रहते एक साल बीत गया. और पारिवारिक ज़ोर ज़बरदस्ती के कारण मुझे दोबारा पुणे लौटना पडा.

अब मै निराश होने लगी. इस जीवन को छोड़ नरेंद्र के साथ उर्वरित ज़िंदगी बिताना मुश्किल नज़र आने लगा. सब से अधिक चिंता मुझे बच्चों की होती...खासकर बिटिया की. बच्चों को समाज में ताने सुनने पड़ेंगे...स्कूल में अपमानित होंगे. बड़े होने बाद बिटिया के ब्याह में मुश्किलें आ सकती थीं. समाज को किस मूह से असलियत बताती? और जहाँ जनम देनेवालों ने विश्वास नही किया वहाँ समाज क्या विश्वास करता? मै बदचलन कहलाती. लोगों ने कहना था,ये अपनी हवस का शिकार हो गयी...बच्चों के बारेमे भी नही सोचा...कलको शायद मेरे बच्चे भी यही कहते!!क्या करूँ? क्या न करूँ??

और फिर नरेंद्र से बात होती. उसके ख़त मुझे एक सहेली के पते पे आते. उन्हें पढ़ती...उसकी बातें सुनती,तो सारा डर...अनिर्णय की अवस्था हवा हो जाती...लगता,उसके प्यार में वो शक्ती है,जिसके सहारे मै कठिन से कठिन समय का, मुसीबतों का मुकाबला कर सकती हूँ....यही आभास,यही विश्वास मेरे जीने का सहारा बन रहा था. नरेंद्र से दूर रहते हुए भी ज़िंदगी नरेंद्र से जुड़ गयी थी. नरेंद्र मेरा इंतज़ार कर रहा था....और कहता,की,ता-उम्र करेगा! और मुझे उसपे पूरा विश्वास था!उसका ख़याल आते ही मनसे सारी दुविधा दूर हो जाती. एक नयी फुर्ती नस नसमे दौड़ जाती...."
क्रमश:

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

दीपा 6

(गतांक: मेरे बारे में ये बात मेरी उस सहेली ने मेरे बचपन के दोस्त,अजय को भी बता दी. अजय ने ब्याह नही किया था. वो अचानक एक दिन मेरे पास पहुँचा और कहने लगा, तुम अपने बच्चों को लेके इस घर से निकल पड़ो. छोड़ दो ऐसे आदमी को...अलग हो जाओ...मै तुम से ब्याह करूँगा....अब तो मेरे पास अच्छी खासी नौकरी भी है. तुम्हारे बच्चों को पिता का प्यार भी मिलेगा....!"
मै:" ओह! अजय ने तो सच्चा प्यार निभाया! तुम्हारे साथ  को परे कर खड़ा हो गया! आगे क्या हुआ?"
दीपा:" बताती हूँ...बताती हूँ...!"
अब आगे....)

दीपा प्रसंगों का नाट्यमय रीती से बयान कर रही थी.  मै एकाग्रता से सुन रही थी. कैसी अजीबोगरीब ज़िंदगी थी....!
दीपा: " अजय ने मुझ से बहुत इसरार किया की,मै उसके साथ चल पडूँ.  अजीब मन:स्थिती हो रही थी मेरी! एक ओर मोह हो रहा था की,सबकुछ छोड़,अपने बच्चों के साथ चली जाऊं. दूसरी ओर ये भी समझ में आ रहा था,की, ये सब इतना आसान नही.
अजय ने अपने घर पे केवल उसकी भाभी को बताया था,पर भाभी ने अन्य सदस्यों को आगाह कर दिया. अजय की माँ ने उधम मचा दिया. अजय को इन सब बातों का पता फोन के ज़रिये चल रहा था. उसकी माँ का रक्तचाप बढ़ गया और उसे अस्पताल में भरती कराया गया. अजय उसका सब से लाडला बेटा था. अजय को भी माँ बहुत प्यारी थी. अंत में अजय ने मुझे और दो तीन साल रुकने के लिए इल्तिजा की और चला गया.
इधर मेरे पती को लगातार ये शक हो रहा था की मैंने बहुत से लोगों को उस घटना के बारेमे बताया होगा या बताने का इरादा होगा. उस ने मेरी और ज़्यादा मार पिटाई शुरू कर दी. घर से बाहर निकलने पे पाबंदी लगा दी. घर में सास ससुर थे. सब तमाशबीन बने बैठे रहे. बात क्या हुई थी,ये तो किसी को नही पता था. लेकिन मेरी पिटाई होना कोई नयी बात तो थी नही! बच्चे डरे सहमे रहते.
एक दिन छिपते छुपाते मैंने अजय को एक ख़त लिखा और पोस्ट करने के लिए मेरी उसी सहेली के पास दे दिया. मैंने लिखा,
"प्रिय अजय,
मैंने तुम्हारी बातों पे काफ़ी गौर किया. सब छोड़ छाड़ के, बच्चों समेत तुम्हारे पास रहने आना बेहद मुश्किल है. मेरा पती मुझे डिवोर्स तो देगा नही. हम लोगों को न जाने समाज के कितने ताने सुनने पड़ें! साथ बच्चों को भी लोग ताने मारेंगे! दुनिया ऐसे मामलों में बड़ी बेरहम होती है. उनका तो भविष्य बिगड़ जायेगा.
तुम अपना ब्याह कर लो और ख़ुश रहो. "

मै:" वैसे तो तुमने ठीक निर्णय लिया. गर डिवोर्स मुमकिन होता  तो बात फर्क थी.  अजय को दुःख तो हुआ होगा!"
दीपा:" हाँ! अजय को दुःख हुआ. उस ने शादी नही की.उसे हरवक्त मेरा इंतज़ार रहता. उस के ख़त मुझे बाकायदगी से मिलते रहे. सहेली के पते पे वो ख़त लिखता था.
इन्हीं सब बातों के चलते मेरे पती ने हमें अहमदाबाद ले जाके रखने का फैसला कर लिया. किसी को बताने की इजाज़त नही थी मुझे,लेकिन मैंने अपने माता-पिता को बता दिया. वो लोग मिलने आए. इतनी तसल्ली हुई की,कमसे कम उन्हें तो पता है!इस इंसान का तो कतई विश्वास नही था. कुछभी कर सकता था!

कुछ ही दिनों में हम अहमदाबाद रहने चले गए. बच्चों को वहाँ स्कूल में दाखिल किया. पती अहमदाबाद आते जाते रहते. जब भी आते,मेरी किसी न किसी बात पे पिटाई हो जाती.हमारे सामने वाला परिवार बहुत अच्छा था. उनका बड़ा बेटा ऐसे में मेरे बच्चों को स्कूल छोड़ आया करता.
ऐसे ही एक दिन पती महाशय मुझे मारपीट के चल दिए. उस दिन पड़ोस में कुछ धार्मिक कार्यक्रम था. अचानक से मेरे दरवाज़े पे एक अजनबी आवाज़ सुनायी दी. आवाजमे बेहद कशिश थी. कुछ पल मै असंजस में पड़ गयी.कौन हो सकता है? इतने में उस व्यक्ती ने कहा, मुझे तुम्हारे पड़ोसी रंजन ने भेजा है! आज उसे बच्चों को स्कूल ले जाने का समय नही है...मै ले जाता हूँ! आप डरिये मत और दरवाज़ा खोल दीजिये!
मैंने दरवाज़ा खोला. एक विलक्षण आकर्षक व्यक्तिमत्व का आदमी सामने खड़ा था!उस ने मेरे बच्चों को स्कूल पहुँच भी दिया और लेके भी आ गया. साथ,साथ मेरे चोटों पे लगाने के लिए मरहम भी ले आया. मुझे इतनी चोट आयी कैसे ये बात उसकी समझ के परे थी और मै बताने में अपनी तौहीन समझती थी!
लेकिन उस दिन के बाद से हम दोनोमे दोस्ती हो गयी जो धीरे,धीरे घनिष्टता  में परिवर्तित होने लगी.  मुझे उसका सहवास अच्छा लगने लगा. बच्चे भी उसके साथ हिलमिल गए. वो उनकी पढ़ाई भी ले लेता....हम सब को घुमाने भी ले जाया करता.
अबतक मुझे उसपे विश्वास हो गया था और मैंने अपने हालात उसके सामने खुलके बता दिए.

एक रोज़ हम चारों सिनेमा देखने गए थे. फिल्म के दौरान अचानक से उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया. मै रोमांचित हो उठी! फिल्म ख़त्म होने के बाद जब हम घर लौटे तो उसने मुझ से कहा,मै तुम से शादी करना चाहता हूँ. तुम्हारे बच्चों में भी मेरा मन रम गया है.....
मै दंग रह गयी!"

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

दीपा 4

( गतांक: पती को अपना न्यूनगंड खलता था और इस बात को छुपा के रखने की चाहत में वो दीपा पे बात बेबात बरस पड़ता. उस के लिए  ऐसा करना मर्दानगी थी....उस के इसी न्यूनगंड ने एक बार उससे बड़ी ही भयानक बात करवा  दी. कम से कम दीपा के पास" उस " घटना के स्पष्टीकरण के लिए और कोई पर्याय नही. उस घटना का विवरण मै दीपाके शब्दों  में देना चाहूँगी.
अब आगे पढ़ें. देरी के लिए माफी चाहती हूँ. व्यस्तता कुछ ज़्यादाही बढ़ गयी है.)

मेरी तथा दीपा की एक दिन बड़ी अन्तरंग बातें चल रहीं थीं. उसी दौरान उसने मुझे इस घटना के बारेमे बताया.उसी के शब्दों में बता रही हूँ.
दीपा: " एक बार हमलोग बच्चों को लेके गोआ घूमने गए. वापसी  पे रत्नागिरी रुकना था. बस से सफ़र कर रहे थे. मै दोनों बच्चों के साथ सब से पिछली सीट पे बैठी थी. मेरे पती अलगसे,दो सीट छोड़ के बैठे थे. देखने वाले सहजही अनुमान लगा सकते होंगे की, हम पती-पत्नी में कुछ ख़ास लगाव नही है. खैर.

मेरी साथवाली सीट पे एक आदमी आके बैठ गया. मुझसे ज़रुरत से ज़्यादा सटके. मुझे उसकी हरकत बड़ी घिनौनी लगी. मैंने मेरे बेटे को अपनी जगह बिठाया और उसकी सीट पे मै बैठ गयी.
एक जगह बस रुकी तो मेरे पती ने उस आदमी से बड़े दोस्ताना तरीकेसे बातचीत शुरू कर दी. मन ही मन मुझे बेहद गुस्सा आया. लगा,कैसा इंसान है! देख रहा था,की, वो आदमी मुझसे कैसे सटके बैठा था,फिरभी उस पे इतना प्यार उमड़ रहा था!
मैंने बच्चों को कुछ खिलाया पिलाया और हमारा सफ़र जारी रहा. अब के वो आदमी मेरे पती के साथ बैठ गया.

हम रत्नागिरी पहुँच के एक होटल में ठहरे. वो आदमी भी उसी होटल में रुका. शाम को वो तथा मेरे पति एक साथ घूमने भी गए. होटल कुछ ख़ास आरामदेह नही था. लेकिन मुझे इस बात की अधिक परवाह नही रहती,क्योंकि नयी,नयी जगहें देखना मुझे खुद को बड़ा भाता था.

अगले दिन रात को जब हम चारों हमारे कमरेमे सो रहे थे तो अचानक से मेरी आँख खुली. मुझे लगा मानो मेरे बिस्तरपे कोई है! जब तक मै सम्भलती तब तक वो व्यक्ती मेरे जिस्म पे औंधा लेट गया. मै चीखना नही चाह रही थी. डर था की  ,कहीँ बच्चे उठ गए तो बेहद घबरा जायेंगे. मैंने अपना पूरा ज़ोर लगा के उस व्यक्ती को धक्का लगाया. उसी हडबडी में मेरे सिरहाने रखा हुआ पानी का घडा धडाम से गिर पडा. उस पे स्टील का ढक्कन तथा ग्लास था. उसका भी काफ़ी ज़ोरसे आवाज़ हुआ. तभी कमरे के बाहर के गलियारे में maneger   ने बत्ती जलाई और पूछा, सब ठीक तो है?

वो आदमी छलांग लगा के हट गया और दरवाज़े के पासवाली दीवार को सटके खड़ा हो गया . फिर दरवाज़ा खोलके बाहर निकल गया. मै बच गयी. जानती थी,की,ये बात मेरे पती को उसी समय बताने से क़तई फायदा नही. और ऐसा हो नही सकता था,की, घड़े की आवाज़ से वो जग ना गए हों! मै हैरान हुई की,बच्चे कैसे सोते रहे!
वो रात मेरी आँखों ही आँखों में गुज़री. डर,सदमा,गुस्सा....सब कुछ इतना था की, बता नही सकती. सुबह जब मैंने मेरे पतिसे रातवाली घटना के बारे में कहना चाहा तो जनाब ने कहा," अरे! वो तो मैही था! तुम्हें इतनी भी अक्ल नही?"
मैंने अपना सर पीट लिया!! ज़ाहिरन,उस आदमी को मेरे पति की शह थी. उसकी मर्ज़ी के बिना वो आदमी ऐसा क़दम उठाने की हिम्मत नही कर सकता था! "

किस्सा सुन मै दंग रह गयी! उफ़! कैसा पति था? और ये सब करने करवाने की वजह हम दोनों की  समझ के परे!!
क्रमश:

रविवार, 12 दिसंबर 2010

दीपा2

सबसे पहले माफी चाहती हूँ की इतने दिनों तक दूसरा भाग नही लिखा. ख़राब नेट और तबियत के चलते ये खाता हुई है!

( गतांक:" तो इतनी जल्दी शादी क्यों कर दी गयी तुम्हारी? ऐसी क्या परेशानी आन पडी थी तुम्हारे घरवालोंको?"...मैंने पूछ ही लिया..
"हाँ...बात कुछ ऐसी ही थी..."
दीपा ने सिलसिलेवार बताना शुरू कर दिया....
अब आगे).

दीपा बताने लगी तो अपने बचपन में खोती चली गयी. या यूँ कहूँ,बचपने में!!स्कूल के दिनों में उसका परिवार ऐसी जगह पे रहता था,जहाँ मकान से मकान जुड़े हुए थे...उनके आँगन भी जुड़े हुए थे. बच्चे हर समय पड़ोसियों के आते जाते रहते. माहौल ऐसा रहता जैसे एक बड़ा-सा परिवार इकट्ठे रह रहा हो.गरमी की रातों में सब के बिस्तर आँगन में लगते और एक दूसरे से गप लड़ाते हुए सब नींद की आगोश में चले जाते!

१० वी क्लास तक तो लड़के लड़कियाँ सब इकट्ठे   खेलते ,इकट्ठे स्कूल जाते,पुस्तकालय जाते. आपस में किताबों का आदान प्रदान चलता. लेकिन १० वी क्लास में आते ही दीपाकी माँ ने इकट्ठे खेलने कूदने पे बंदिश लगा दी.

दीपाके पड़ोस में एक लड़का रहता था,जो था उसी क्लास में लेकिन पढता किसी अन्य शहरमे. १० वी क्लास के बाद जब गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हुई तो पुस्तकालय से किताबें लाने का ,आपस में बाँट के पढने का सिलसिला शुरू हो गया. तब ये लड़का भी पड़ोस में आया हुआ था. दीपा की सहेली ने दीपाकी एक किताब उस लड़के को दे रखी थी. दीपा ने जब वो वापस चाही तो सहेली ने कहा,पड़ोस से ले लो.
दीपा डर गयी. माँ ने लड़कों से बोलचाल मेलजोल बंद जो कर रखा था. सहेली ने दीपाके घर से उस लड़के को आवाज़ लगा के पूछा ," किताब कब तक पढके ख़त्म होगी?'
लड़का:" हो गयी...ले जाओ चाहो तो...!"
सहेली:" बड़ी जल्दी हो गयी?"
लड़का:" हाँ! हो गयी...ले जाओ और दीपा को दे दो.लेकिन उसे कहो बाद में फिर  एक बार मुझे ही दे दे!!"

दीपा जब किताब पढने बैठी तो कुछ पन्ने पलटने के बाद उसमे से एक चिट्ठी निकली. उस पे लिखा हुआ था," दीपा,मै तुम से बहुत प्यार करता हूँ! जवाब ज़रूर देना. किताब मुझे ही लौटाना. किसी और के हाथ ना लगे!"

दीपा रोमांचित हो उठी,क्योंकि लड़का उसे भी बहुत पसंद था! पर अब क्या किया जाये? उस लड़के के साथ, जिसका नाम अजय था, वो खुद तो मिल बोल सकती नही थी. माँ की पैनी निगाह रहती! उसने अपनी एक सहेली को विश्वास में लेके बताया की, माजरा क्या है. सहेली ने उनकी किताबें एक दूजे को पहुँचाने का ज़िम्मा स्वीकार कर लिया. छुट्टियों के दौरान वो उनकी थोड़ी बहुत मुलाक़ातें भी करवा देती. जब वो अपने स्कूल के शहर लौट जाता तो उसके ख़त उसी सहेली के घर पे आया करते.

इस तरह दो साल बीत गए. दीपा खतों को घर में रखने से डरा करती,लेकिन फाड़ के फ़ेंक देने का भी दीपा का मन  नही करता! ऐसे में इन मकानों के पीछे वाले कूएमे वो ख़त डाल दिया करती!१२ वी क्लास में जब वो दोनों आए तो दीपा की माँ के  हाथ एक ख़त पड़ गया. और इम्तेहानों के ख़त्म होते ही झट मंगनी पट ब्याह! दीपाको समझ में आने से पहले वो परिणीता बन गयी! लड़के के बारे में किसी ने ख़ास खोज बीन की नही. पैसेवाला घर था,इसी में सब ख़ुश थे. वैसे भी लडकी के लक्षण ठीक नही थे !!अगर बाहर के लोग जान जाते तो और मुसीबत होती!

अजय बेहद निराश हो गया. लेकिन उम्र एक ही होने के कारण वह  नौकरी भी नही कर सकता था! उसकी तो पूरी पढ़ाई होनी थी! पर उसने आनेवाले सालों में दीपाका बेहद अच्छा साथ निभाया! उसे हमेशा महसूस कराया की उसकी जद्दोजहद में वो अकेली नही है.

क्रमश: