ज़िंदगी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज़िंदगी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

बेहद  खराब सेहत के   कारन ब्लॉग जगत से मेरा तकरीबन संपर्क छूट-सा गया है! आप सभी की दुआएं चाहती हूँ,कि ,अब इस दर्द से मुझे किसी तरह निजात मिल जाये .डॉक्टर्स को कहके हार गयी हूँ,कि इतना दर्द सहने के लिए मुझे जिंदा न रखें।कोई सुनता नहीं।ये सबके चलते टूटते रिश्तों का दर्द सहती जा रही हूँ।
आप सभी को भविष्य के लिए ढेरों शुभ कामनाएं।
आपकी क्षमा
मैंने लिखा  था :
अब सेहर होनेको है,
ये शमा बुझने को  है,
जो रात में जलते हैं,
वो सेहर कब देखते हैं?

शनिवार, 18 अगस्त 2012

रोयीं आँखें मगर.....

मई महीने की गरमी भरी दोपहर थी। घर से कही बाहर निकलने का तो सवाल ही नही उठता था। सोचा कुछ दराजें साफ कर लूँ । कुछ कागज़ात  ठीकसे फाइलो मे रखे जाएं तो मिलने मे सुविधा होगी।
 मैं फर्शपे बैठ गई और अपने टेबल की सबसे निचली दराज़ खोली। एक फाइलपे लेबल था,"ख़त"। उसे खोलके देखने लग गई और बस यादोंकी नदीमे हिचकोले खाने लगी।वो दिन १५ मई का था .......दादाजी का जन्म दिन....!!!

पहला ही ख़त था मेरे दादाजी का बरसों पहले लिखा हुआ!!!पीलासा....लगा,छूनेसे टूट ना जाय!!बिना तारीख देखे,पहली ही पंक्ती से समझ आया कि  ये मेरी शादीके तुरंत बाद उन्होंने अपनी लाडली पोति को लिखा था!! कितने प्यारसे कई हिदायतें दी थी!!!"खाना बनते समय हमेशा सूती साड़ी पहना करो...."!"बेटी, कुछ ना कुछ व्यायाम ज़रूर नियमसे करना....सेहेतके लिए बेहद ज़रूरी है....."!
मैंने इन और ऐसी कई अन्य  हिदायतोको बरसों टाल दिया था। पढ़ते,पढ़ते मेरी आँखें नम होती जा रही थी.....और भी उनके तथा दादीके लिखे ख़त हाथ लगे...बुढापे के कारन कांपते हाथोसे लिखे हुए, जिनमे प्यार छल-छला रहा था!! ये कैसी धरोहर अचानक मेरे हाथ लग गई,जिसे मैं ना जाने कब भुला बैठी थी!!ज़हन मे सिर्फ़ दो शब्द समा गए ..."मेरा बाबुल"..."मेरा बचपन"!!

बाबुल.....इस एक लफ्ज्मे क्या कुछ नही छुपा? विश्वास,अपनत्व,बचपना,और बचपन,किशोरावस्था और यौवन के सपने,अम्मा-बाबाका प्यार, दादा-दादीका दुलार,भाई-बेहेनके खट्टे मीठे झगडे,सहेलियों के साथ बिताये निश्चिंत दिन, खेले हुए खेल, सावनके झूले, रची हुई मेहँदी, खट्टी इमली और आम, सायकल सीखते समय गिरना, रोना, और संभालना, बीमारीमे अम्मा या दादीको अपने पास से हिलने ना देना, उनसे कई बार सुनी कहानियाँ बार-बार सुनना, लकडी के चूल्हेपे बना खाना और सिकी रोटियां, लालटेन के उजालेमे की गई पढाई, क्योंकि मेरा नैहर तो गाँव मे था...बल्कि गांवके बाहर बने एक कवेलू वाले घरमे ,जहाँ मेरे कॉलेज जानेके बाद किसी समय बिजली की सुविधा आई थी। सुबह रेहेट्की आवाज़से आँखें खुलती थी। रातमे पेडोंपे जुगनू चमकते थे और कमरोंमे भी घुस आते थे जिसकी वजहसे एक मद्धिम-सी रौशनी छाई रहती।


दादा मेरे साथ खूब खेला करते थे। वो मेरे पीछे दौड़ते और हम दोनों आँखमिचौली खेलते। मैं पेडोंपे चढ़ जाया करती और वो हार मान लेते। सायकल चलाना उन्ह्नोनेही मुझे सिखाया और बादमे कार भी।और सिखाई वक्त की पाबंदी, बडोंकी इज्ज़त करना और हमेशा सच बोलना, निडरता से सच बोलना। बाकी घरवालोने भी यही सीख दी। हम गलती  भी कर बैठते, लेकिन उसे स्वीकार लेते तो डांट नही बल्कि पीठ्पे थप-थपाहट मिलती। निडरता से सच बोलनेकी सीखपे चलना मुश्किल था। कई बार क़दम डगमगा जाते, झूठ बोलके जान बचा लेनेका मोह होता, लेकिन हमेशा दादा याद आते,उनके बोल याद आते की जब कोई इंसान मृत्युशय्या पे हो तो उसके दिलमे कोई पश्चाताप नही होना चाहिए।
 इसी बातपे मुझे बचपन की एक घटना याद आयी। हम तीनो भाई-बेहेन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से स्कूल आया जाया करते थे। एक दिन माँ ने हिदायत देके स्कूल भेजा मुझे की शामको शायद हमारी कार शहर  आयेगी। अगर एक विशिष्ट जगह् पे कार दिखे तो छोटे भाई को बस स्टेशन पे ठीक से देख लेना तथा उसे साथ लेके आना। ना जाने क्यों, उस भीड़ भरी जगह् पे मैंने बहुत ही  सरसरी तौरसे नज़र दौडाई और कारमे बैठ के घर आ गयी। माँ के पूछ्ने पे कहा कि , मैंने तो ठीकसे देखा, राजू वहाँ नही था। माँ को शंका हुई की कहीँ  बेटा किसी बुरी संगत मे तो नही पड़ गया??जब देर शाम भाई बस से घर लौटा तो माँ ने उससे सवाल किया की वो शाम को बस स्टेशन पे नही था ...कहाँ गया था??उसने बताया कि , वो तो बस स्टेशन पे ही था। माँ ने  उसे चांटा लगाया। उसने माँ से  कहा,"माँ तुम चाहो तो मुझे मारो,लेकिन मैं वहीं पे था...बल्कि मैंने दीदी को देखा भी....इससे पहले कि  मैं उनतक जाता,वो चली गयी...."।
माँ ने  मेरी तरफ़ मुखातिब होके कहा,"तुमने राजूको ठीकसे देखा था?"
मेरी निगाहें झुक गयी। मुझे अपने आपपे बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई। आज भी जब वो घटना याद आती है तो मेरी आँखें भर आती हैं।

एकबार दादा से रूठ्के मैं पैदलही स्कूल निकल पडी। तब मेरी उम्र होगी कुछ दस- ग्यारह सालकी। स्कूल तकरीबन आठ किलोमीटर दूर था। दादाजी ने अपनी सायकल उठायी और मेरे साथ-साथ चलने लगे। क़रीब दो-तीन किलोमीटर चल चुके तो एक बस आयी। बसका चालक दादाजी को जानता था। उसने मुझसे बसमे बैठने के लिए खूब मनुहार की ,लेकिन मैं थी की रोती जा रही थी,और अपनी ज़िद्पे अडी हुई थी। अन्तमे दादाजीने उसे जानेके लिए कह दिया। मैं पैदल चलकेही स्कूल पहुँची ।जब शाम मे स्कूल छूटी तो मैं बस स्टेशन के लिए निकल पडी। थोडीही दूरपे एक छोटी-सी पुलियापर दादाजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे!!दिनभर के भूके-प्यासे!!बोले,"अब तुझे बसमे बिठाके मैं सायकल से घर आऊँगा।"
 मुझे आजतक इस बातपे ग्लानी होती है....काश.....काश,मैं इतनी जिद्दी ना बनी होती....!
क्रमश:


गुरुवार, 29 मार्च 2012

रिश्ते निभाऊं कैसे?

अजित गुप्ता जी का आलेख पढ़ा....रिश्तों में एक खुशबू होती है...उसे पढने के पहले ही मेरे मनमे सवाल था....मेरे घरके रिश्तों को किसकी नज़र लगी हुई है? जब पारिवारिक रिश्तों को देखती हूँ तो अपने आप को हरा हुआ महसूस करती हूँ. मेरे ब्याह के बाद आजतक रिश्तों को संजोये रखने में मेरी उम्र बीत गयी लेकिन घरमे शांती नसीब नहीं हुई. असर ये हो गया है की   बिलकुल खामोश हो गयी हूँ...गुमसुम.

पिछले पंद्रह दिन पूर्व हुए एक वाकये से मुझे लिखने का मन किया. बहुत सोचा....लिखूं या न लिखूं? जब मुझे बेटी हुई तब मेरे ससुराल वाले नाराज़ हुए क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए था. मुझे हर समय अपनी बेटी को लेके चिंता लगी रहती. उसकी ज़रूरतें  छुप के पूरी करती रही. बाप बेटी में हरदम तनाव रहता. शादी होने तक तो बेटी बाप से ज़बान नहीं लड़ाती थी लेकिन शादी के बाद उसका मिज़ाज बहुत गुस्सैल हो गया. अब जब कभी आती है तो मुझे बेहद तनाव महसूस होता है. और उस दिन तो हद हो गयी....वो अपने काम से भारत आयी हुई थी/है...बाप बेटी में ऐसा झगडा हुआ की बाप  ने बिटिया को घरसे निकल जाने को कह दिया...मुझे कुछ ही दिन पहले दिलका दौरा  पडा  था....उन दोनोका झगडा सुन मेरा दिल दहल गया! उस झगडे को किसी तरह निबटाया तो चार रोज़ पहले भाई बहन में ऐसा झगडा हुआ की मेरे बेटे ने गुस्से में  आके बहन का सामान घरके बहार फेंकना शुरू कर दिया!बिटिया ने भी  अपने भाई को कटु अलफ़ाज़ कहने में कोई कमी नहीं छोडी थी. वैसे ताउम्र कोशिश करने के बावजूद दोनों में आपसी प्यार नहीं था....लेकिन इस हदतक बिटिया के मन में ज़हर होगा मुझे कल्पना नहीं थी. बिटिया ने फोन करके अपने पति को हमारे घर आने से मना  कर दिया.

अपने पति तथा सास का गुस्सैल मिज़ाज तो  सारी उम्र बर्दाश्त करती रही....सिरदर्द और डिप्रेशन शिकार तो बरसों से हूँ....अब तो मेरे मनमे हर समय आत्महत्या करने का विचार रहने लगा है....जानती हूँ,आप सब कहेंगे ये कायरता है,लेकिन बर्दाश्त की भी एक हद होती है....दिलके दौरे के कारन डिप्रेशन की दवाई भी नहीं ले सकती....नाही  सर दर्द की..ज़िंदगी में बिटिया ने मेरा साथ भी बहुत निभाया है,लेकिन मेरे साथ भी बहुत बदतमीज़ हो गयी है....उसके आगे भी खामोश रहती हूँ.....आप सभी से पूछती हूँ,इस दौर से बाहर  निकलूं तो कैसे? रिश्ते निभाऊं  कैसे?

शनिवार, 25 जून 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार! 2

( गतांक:मेरा किरदार यहाँ क्या था? मैंने कौनसा रोल निभाया....या निभाने की कोशिश की,ये अगली बार....बड़े ही फ़िल्मी ढंगसे यहाँ प्रेम का एक त्रिकोण बनता जा रहा मुझे नज़र आ रहा था...अब आगे...)

मै अक्सर अपने स्क्रैप पे कोई कविता या नज़्म  लिखती  रहती. कई लोग उसे पसंद करते,उनमे से अर्चना एक थी. उसने मुझसे एक दिन पूछा," क्या मै तुम्हारी रचनाओं संकलन कर सकती हूँ?"
मैंने जवाब में कहा," क्यों नहीं? खुशी से करो!"
जब अर्चना को समय नहीं मिलता तो ये काम उसके लिए आयुषी कर दिया करती.

 एक दिन मैंने हमारी एक common सहेली के स्क्रैप पे आयुषी का कमेन्ट पढ़ा," क्या तुमने देखा सौगात दोबारा rediffconnxions पे लौटा है...उसने अपनी फोटो भी लगाई है और अर्चना के लिए मेसेज भी छोड़ा है?"
उस महिला का जवाब पढने मै आयुषी के स्क्रैप पे गयी. वहाँ उसने लिखा था," हाँ देखा और पढ़ा...जिसमे अर्चना को खुशी मिले ,सौगात वही कर रहा है तो करने दो....दोनों खुश रहें...god bless them both !"

मै उत्सुकतावश अर्चनाके स्क्रैप पे गयी. वहाँ सौगात का मेसेज था," तुम्हें सालगिराह बहुत,बहुत मुबारक हो! आज सुबह मुमानी जान के यहाँ कई तरीकों से तुम्हें बधाई देने के बाद, तुम्हारी इच्छा के अनुसार मै स्क्रैप पे भी तुमसे  अपने दिलकी बात कह रहा हूँ...आय  लव यू....आय लव यू,आय लव यू!"


अर्चना शादीशुदा थी और सौगात इतने खुलेआम अपने प्यार का इज़हार उससे कर रहा था? बात मुझे ज़रा अटपटी तो लगी! मै लिंक लेके सौगात के स्क्रैप पे गयी....देखना चाह रही थी,की,अर्चना ने उसका क्या जवाब दिया! 
अर्चना ने लिखा था," I adore you & will always adore you!"
 एक तरह से इतना निडर होके अपने प्यार का इज़हार करना....सौगात की ये बात मुझे अच्छी भी लगी. मैंने पर्सनल मेसेज बॉक्स में अर्चना को एक ख़त लिखा," अर्चना! ज़िंदगी हर किसी को खुश रहने का दोबारा मौक़ा नहीं देती. गर तुम्हें ये मौक़ा मिल रहा है तो मै तुम्हारे साथ हूँ....गँवाना नहीं...तुम ने मेरी कहानी," आकाशनीम" पढी ना?"

अर्चना का जवाब आया," सौगात को मै बचपन से जानती हूँ...उसके दिलकी हर बात मुझे पता रहती है......ऐसा नहीं की,मेरी शादी के लिए मैंने कम तकलीफें उठाई. ये शादी भी मेरी मर्ज़ी से हुई है...मेरी ज़िद से हुई है...बस .....! शायद ज़िंदगी में कई लोगों को कुछ हासिल हो जाने के बाद उसकी कद्र नहीं रहती.....शायद मेरे शौहर को भी वो कद्र नहीं रही... वैसे भी सब कुछ छोड़ देना इतना आसान नहीं...हाँ! कभी,कभी जी करता है,घंटों बैठ के रोती रहूँ! वो तो मेरी मसरूफियत है,जो मुझे रोने धोने का समय नहीं देती...!
वैसे मैंने "नीले पीले फूल" भी तो पढी...शायद मेरी ज़िंदगी इन दोनों कहानियों का मिश्रण है!"

मैंने लिखा," भगवान करे,तुम हमेशा इतनी मसरूफ़ रहो की,रोने धोने का तुम्हें मौक़ा  ही न मिले!"

इन सब बातों के चलते मैंने गौर किया की,आयुषी बड़े दिनों से स्क्रैप पे कुछ लिख नहीं रही है. ना मेरे पूछने पर ही कुछ जवाब दे रही है! इसे क्या हो गया? ये जो मेरे तथा अर्चना के लिए कहती थी," तुम दोनों मेरे लिए दो नायाब रत्न हो....!"कहाँ खो गयी है? 


क्रमश:




सोमवार, 21 मार्च 2011

दीपा १३


( गतांक: ब्याह अच्छे से हो गया...लडकी बिदा हो गयी...उसी शहरमे...और दीपा भयानक depression में चली गयी. उसका nervous breakdown ही हो गया!  बरसों उसने अपनेआप को सहेजे रखा था...अब वो बिखर,बिखर गयी..
अब आगे पढ़ें.)
 
अब दीपा को लगने लगा जैसे उसके जीवन का मकसद ख़त्म हो गया! एक भयानक अकेलेपन ने उसे घेर लिया. एक खालीपन,जिसे वो किसी के साथ चाहकर भी बाँट नहीं सक रही थी...क्योंकि कोई थाही नहीं उसके जीवन में! अब उसे एक साथी की कमी बेहद खलने लगी. अपना समाज इतना परम्परावादी है,की, औरत की इस ज़रुरत को समझना उसके परे है.
 
अब उसे अजय याद आता जो बहुत संजीदा था. अगर दीपा उसके पीछे लग उसका ब्याह न करवाती तो शायद वो अबतक रुका रहता! शायद नरेंद्र भी रुक जाता! लेकिन वो हालात अलग थे. बेटी का भविष्य उसके लिए अपनी हर निजी खुशी से बढ़के मायने रखता था! जब बेटी की ज़िम्मेदारी से वो फारिग हो गयी तो ज़िंदगी अचानक नीरस,बेमक़सद बन गयी. 
 
ऐसे समय में बच्चों ने काफी समझदारी और परिपक्वता का दर्शन दिया. दोनों ने माँ को दोबारा ब्याह करने की सलाह दी. इस तरह की संस्थाओं में उसका नाम भी दर्ज कराया. इस कारण दीपाका संकुचित दायरा थोडा विस्तारित   होने लगा.  चंद सज्जन मर्दों से उसका नेट की सहायता से परिचय हुआ. वो स्वयं अपने आप को टटोल रही थी. उसे खुद नहीं पता था की,आखिर जीवन में वो चाहती क्या है?शादी चाहती है या केवल दोस्ती?शायद ऐसी दोस्ती,जिसमे समर्पण हो,ज़िम्मेदारी हो,लेकिन बंधन का बोझ न हो! कई विधुर और विभक्त हुए लोगों ने उसके आगे शादी के प्रस्ताव रखे. वो कुछ लोगों से मिली भी. पर सच तो ये था,की,शादी के ख्याल से उसे डर लगता! 
और इन्हीं दिनों उसका परिचय प्रसाद से हुआ. वो डिवोर्सी था. पर उससे उम्र में करीब १० साल छोटा. बहुत दिनों तक तो दीपा ने उसे टाल दिया. अंत में जाके दोस्ती स्वीकार की. दोनों का ईमेल तथा फ़ोन के ज़रिये आपस में ख़यालों का आदान प्रदान शुरू हुआ. प्रसाद तो पूरी तरह से उसके प्यार में डूब गया था. उसके हर ख़त में," मै तुमसे बेहद प्यार करता हूँ," ये वाक्य कुछ नहीं तो दस बार होता! प्रसाद अहमदाबाद का बाशिंदा था. अंत में दीपा ने अहमदाबाद जाके उससे मिलने का फैसला किया और वो गयी. वो खुद अब किसी किशोरी की तरह उसे मिलने के लिए बेताब हो उठी थी.
 
क्रमश: 







मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

दीपा 10

( गतांक : नरेंद्र ने मुझे आश्वस्त किया!वक़्त इतना बेरहम नही हो सकता! हमें बार,बार मिलाके जुदा नही कर सकता!हमारा भविष्य अब एक दूजे से जुदा नही था! उसने मुझे पूरा यक़ीन दिलाया!
कितने महीनों बाद मुझे एक निश्चिन्तता भरी नींद  आयी!बस अब कुछ ही रोज़ का फासला था,मुझमे और मेरे सुनहरे,हँसते भविष्य में!मैंने अपने भयावह वर्तमान पे,नरेंद्र के सहारे विजय पा ली थी....!!".....अब आगे.)

दीपा के लिए वो दिन बड़े ही स्वप्निल थे! नशीले थे! नरेंद्र का संबल जो प्राप्त था! पर क़िस्मत को ये खुशियाँ मंज़ूर नही थीं! दीपा के पती ने बच्चों को हथिया लिया! और दीपा बच्चों के बिना रह नही सकती थी....बच्चे उसकी प्राथमिकता थे! अगर उसका पति एक अच्छा बाप होता तो भी और बात होती. वो तो बेहद सख्त,बेदर्द और बेज़िम्मेदार पिता था. पिता की दहशत के कारण बच्चों का क्या भविष्य होता,ये तो दीपा सोच भी नही सकती थी!

नरेंद्र का ख़याल छोड़ बेरहम यथार्थ को स्वीकार करने के अलावा उसके पास कोई चारा नही बचा. नरेंद्र फिरभी अपनी ज़िद पे अटल था..."मै इंतज़ार करुँगा...!" बार,बार दीपा को वो यही कहता रहता. लेकिन अब दीपा का निश्चय हो चुका था. उसने भी नरेंद्र को अपना अलग  भविष्य बनाने के लिए गुहार लगाना जारी किया!

अब दीपा का जीवन उसी नरक में सिमट के रह गया. वही मारपीट,वही मानसिक छल. पर दीपा अपने मक़सद से हिली नही. बच्चों की पढ़ाई और उनकी परवरिश....इसके अलावा अब जीवन में कुछ शेष नही था.

बच्चों को कई बार अपनी माँ के खिलाफ भड़काया जाता....कमरेमे बंद किया जाता,ताकि वो माँ से मिल न सकें....बच्चे हालात को खूब समझते थे. वो छुप-छुपके माँ का जनम दिन मनाते! मात्रु-दिवस मनाते!दीपा के लिए अब यही काफ़ी था.

एक बार दीपा को उसके पतिने लोहे की सलाख से  इतनी बेरहमी से पीटा,की,वो खूना खून हो गयी. उस वक़्त बच्चों ने अपनी माँ से कहा," माँ! हमें तुम्हारी ज़िंदगी प्यारी है! तुम्हारा ज़िंदा रहना हमारे लिए सब से अधिक मायने रखता है! हमारी पढ़ाई की चिंता किये बिना तुम चुपचाप,रात को यहाँ से भाग निकालो!"

उसी रात, दीपा, छिपते छिपाते घर से निकल गयी. वो रात उसने अपने एक दूर के रिश्तेदार के घर गुज़ारी. वो लोग उसे डॉक्टर के पास ले गए. टिटनस का इंजेक्शन लगवाया,तथा ज़ख्मों का इलाज कराया. बातों बातों में दीपा ने कहा:
" अडोस-पड़ोस के लोग कई बार मुझे ही दोषी पाते! उन्हें लगता, ये आदमी परिवार को इतना घुमाने फिराने ले जाता है! त्योहारों पे पत्नी को गहनों से लाद देता है! इतना शौकीन है! गाडी है,बंगला है,नौकर चाकर हैं...किसी बात की कमी नही है! ज़रूर कोई तो अंदरूनी बात होगी,जो ये आदमी इतना गुस्सा खा जाता है! कहीँ तो दीपा का क़ुसूर होगा!
लोगों को असलियत क्या पता? और मै किसे बताने जाती? कौन विश्वास रखता? मेरे दो बच्चे जो हो चुके थे!"

ऐसी ही नीरस ज़िंदगी बीतती गयी. चंद हफ्ते दीपा घर से दूर रहती,फिर बच्चों की ख़ातिर लौट आती. उसकी अपनी कोई आमदनी तो थी नही! ना कोई नौकरी करने की इजाज़त उसे देता!दीपा ने आगे बताया:
" इसी तरह एक बार बहुत पिटने के बाद मै माँ के घर चली गयी. एकाध माह हो चुका था,की, ख़बर मिली,मेरे पति बहुत बीमार हैं. अस्पताल में भरती कराया गया है. अब के बच्चे भी डर गए. बच्चों ने मुझे बुला लिया. मै चली गयी.
जिस रोज़ अस्पताल पहुँची,उसी रोज़ डॉक्टर ने मुझे अपने केबिन में बुलाया. ....ये कह के की उन्हें मुझ से कुछ बहुत ज़रूरी बात अकेले  में करनी है.पति की गंभीर हालत तो मुझे दिख ही रही थी. पैसा पानी की तरह बह रहा था. मै केबिन में गयी तो डॉक्टर बोले, मै बिना किसी लागलपेट के सीधी बात कह रहा हूँ.तुम्हारे  पति को AIDS है. उसके बचने की उम्मीद नही है. लेकिन तुम्हें तथा तुम्हारे बच्चों को तुरंत अपना चेकअप कराना होगा.HIV positive होने की शक्यता नकारी नही जा सकती...'
" मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी!  हे भगवान्! बस इतनाही होना बचा था? जाते,जाते हमें ये आदमी  क्या तोहफा दे चला??"
क्रमश:


बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

दीपा 8

( गतांक: और फिर नरेंद्र से बात होती. उसके ख़त मुझे एक सहेली के पते पे आते. उन्हें पढ़ती...उसकी बातें सुनती,तो सारा डर...अनिर्णय की अवस्था हवा हो जाती...लगता,उसके प्यार में वो शक्ती है,जिसके सहारे मै कठिन से कठिन समय का, मुसीबतों का मुकाबला कर सकती हूँ....यही आभास,यही विश्वास मेरे जीने का सहारा बन रहा था. नरेंद्र से दूर रहते हुए भी ज़िंदगी नरेंद्र से जुड़ गयी थी. नरेंद्र मेरा इंतज़ार कर रहा था....और कहता,की,ता-उम्र करेगा! और मुझे उसपे पूरा विश्वास था!उसका ख़याल आते ही मनसे सारी दुविधा दूर हो जाती. एक नयी फुर्ती नस नसमे दौड़ जाती...." अब आगे)

जो भी था,दीपा कश्मकश में ज़रूर थी. अहमदनगर में रहते हुए उसे सोचने का खूब समय मिला.......और  वो भी स्थिती से बाहर निकलके सोचने का...कौनसा पलड़ा भारी पड़ने वाला था? नरेंद्र के प्यार का या सारासार विचार शक्ती का? क्या सही था?

जितना अधिक गहराई  में जाके दीपा सोचती गयी, उतना अधिक दिलो-दिमाग चकराता गया...........

दीपा : " इन्हीं सब बातों के चलते मैंने डिवोर्स केस फ़ाइल कर दिया. माँ और पिता का वैसे तो विरोध था,लेकिन मै रोज़ रोज़ के पिटने से तंग आ चुकी थी. आखिर बरदाश्त की भी एक सीमा होती है. मुझे एक आस की किरन नज़र आ रही थी. शायद नरेंद्र के साथ जीवन बेहतर हो......!
केस चलता रहा महीनों...और अंत में जब फैसला सुनाया गया तो मै दंग रह गयी......मुझे मेरे पतिकी ओरसे केवल ३००/- माहवार मिलनेवाला था! मै और दो बच्चे उसमे कैसे गुज़ारा करते?"

मै: " लेकिन बच्चों की ज़िम्मेदारी तो नरेंद्र निभाने के लिए तैयार था! "

दीपा:" हाँ! तैयार था....पर ज़िंदगी का क्या भरोसा? गर भविष्य में हमारे रिश्तेमे खटास पड़ जाए तो? गर हमें और बच्चें हों और नरेंद्र के मन में तब पछतावा हो ,फिर क्या??मेरा लोगों परसे, रिश्तों परसे,जीवन परसे विश्वास उठता जा रहा था....कमसे कम अपने बच्चों के लिए मै एक सुरक्षित भविष्य चाहती थी..."

मै:" तो फिर?? हमें कहीँ तो विश्वास करना ही पड़ता है! जीवन में कुछ पाने के लिए कुछ दाँव पे भी लगाना पड़ता है!"

दीपा:" ये सब किताबी बातें हैं! हक़ीक़त की धरातल पे आके देखो तो मेरे बच्चे अपनी पिता की जायदाद से महरूम रह जाते,गर मै न्यायालय का फैसला मान लेती....उनका भविष्य, उनकी पढ़ाई लिखाई....इन सब बातों की मुझे सब से अधिक फ़िक्र थी.उनका क्या दोष था??मै अकेली उन्हें वो सब देनेमे समर्थ नही थी,जिसके वो हक़दार थे! "

मै:" तो क्या निर्णय लिया तुमने?"

दीपा:" मैंने डिवोर्स  लेने से इनकार कर दिया. और चाराही नही था...!"

मै:" और नरेंद्र?? उसे क्या कहा??"

दीपा:" दिल पे पत्थर रख के मुझे उसे इनकार करना पडा....जहाँ तक बच्चों का सवाल था,मै भावावेग में कोई भी निर्णय लेना नही चाहती थी..."

मै:" ओह! तो नरेंद्र की क्या प्रतिक्रया हुई?"

दीपा:" नरेंद्र ने कहा,मै इंतज़ार करुँगा!"
क्रमश:


मंगलवार, 4 जनवरी 2011

दीपा 6

(गतांक: मेरे बारे में ये बात मेरी उस सहेली ने मेरे बचपन के दोस्त,अजय को भी बता दी. अजय ने ब्याह नही किया था. वो अचानक एक दिन मेरे पास पहुँचा और कहने लगा, तुम अपने बच्चों को लेके इस घर से निकल पड़ो. छोड़ दो ऐसे आदमी को...अलग हो जाओ...मै तुम से ब्याह करूँगा....अब तो मेरे पास अच्छी खासी नौकरी भी है. तुम्हारे बच्चों को पिता का प्यार भी मिलेगा....!"
मै:" ओह! अजय ने तो सच्चा प्यार निभाया! तुम्हारे साथ  को परे कर खड़ा हो गया! आगे क्या हुआ?"
दीपा:" बताती हूँ...बताती हूँ...!"
अब आगे....)

दीपा प्रसंगों का नाट्यमय रीती से बयान कर रही थी.  मै एकाग्रता से सुन रही थी. कैसी अजीबोगरीब ज़िंदगी थी....!
दीपा: " अजय ने मुझ से बहुत इसरार किया की,मै उसके साथ चल पडूँ.  अजीब मन:स्थिती हो रही थी मेरी! एक ओर मोह हो रहा था की,सबकुछ छोड़,अपने बच्चों के साथ चली जाऊं. दूसरी ओर ये भी समझ में आ रहा था,की, ये सब इतना आसान नही.
अजय ने अपने घर पे केवल उसकी भाभी को बताया था,पर भाभी ने अन्य सदस्यों को आगाह कर दिया. अजय की माँ ने उधम मचा दिया. अजय को इन सब बातों का पता फोन के ज़रिये चल रहा था. उसकी माँ का रक्तचाप बढ़ गया और उसे अस्पताल में भरती कराया गया. अजय उसका सब से लाडला बेटा था. अजय को भी माँ बहुत प्यारी थी. अंत में अजय ने मुझे और दो तीन साल रुकने के लिए इल्तिजा की और चला गया.
इधर मेरे पती को लगातार ये शक हो रहा था की मैंने बहुत से लोगों को उस घटना के बारेमे बताया होगा या बताने का इरादा होगा. उस ने मेरी और ज़्यादा मार पिटाई शुरू कर दी. घर से बाहर निकलने पे पाबंदी लगा दी. घर में सास ससुर थे. सब तमाशबीन बने बैठे रहे. बात क्या हुई थी,ये तो किसी को नही पता था. लेकिन मेरी पिटाई होना कोई नयी बात तो थी नही! बच्चे डरे सहमे रहते.
एक दिन छिपते छुपाते मैंने अजय को एक ख़त लिखा और पोस्ट करने के लिए मेरी उसी सहेली के पास दे दिया. मैंने लिखा,
"प्रिय अजय,
मैंने तुम्हारी बातों पे काफ़ी गौर किया. सब छोड़ छाड़ के, बच्चों समेत तुम्हारे पास रहने आना बेहद मुश्किल है. मेरा पती मुझे डिवोर्स तो देगा नही. हम लोगों को न जाने समाज के कितने ताने सुनने पड़ें! साथ बच्चों को भी लोग ताने मारेंगे! दुनिया ऐसे मामलों में बड़ी बेरहम होती है. उनका तो भविष्य बिगड़ जायेगा.
तुम अपना ब्याह कर लो और ख़ुश रहो. "

मै:" वैसे तो तुमने ठीक निर्णय लिया. गर डिवोर्स मुमकिन होता  तो बात फर्क थी.  अजय को दुःख तो हुआ होगा!"
दीपा:" हाँ! अजय को दुःख हुआ. उस ने शादी नही की.उसे हरवक्त मेरा इंतज़ार रहता. उस के ख़त मुझे बाकायदगी से मिलते रहे. सहेली के पते पे वो ख़त लिखता था.
इन्हीं सब बातों के चलते मेरे पती ने हमें अहमदाबाद ले जाके रखने का फैसला कर लिया. किसी को बताने की इजाज़त नही थी मुझे,लेकिन मैंने अपने माता-पिता को बता दिया. वो लोग मिलने आए. इतनी तसल्ली हुई की,कमसे कम उन्हें तो पता है!इस इंसान का तो कतई विश्वास नही था. कुछभी कर सकता था!

कुछ ही दिनों में हम अहमदाबाद रहने चले गए. बच्चों को वहाँ स्कूल में दाखिल किया. पती अहमदाबाद आते जाते रहते. जब भी आते,मेरी किसी न किसी बात पे पिटाई हो जाती.हमारे सामने वाला परिवार बहुत अच्छा था. उनका बड़ा बेटा ऐसे में मेरे बच्चों को स्कूल छोड़ आया करता.
ऐसे ही एक दिन पती महाशय मुझे मारपीट के चल दिए. उस दिन पड़ोस में कुछ धार्मिक कार्यक्रम था. अचानक से मेरे दरवाज़े पे एक अजनबी आवाज़ सुनायी दी. आवाजमे बेहद कशिश थी. कुछ पल मै असंजस में पड़ गयी.कौन हो सकता है? इतने में उस व्यक्ती ने कहा, मुझे तुम्हारे पड़ोसी रंजन ने भेजा है! आज उसे बच्चों को स्कूल ले जाने का समय नही है...मै ले जाता हूँ! आप डरिये मत और दरवाज़ा खोल दीजिये!
मैंने दरवाज़ा खोला. एक विलक्षण आकर्षक व्यक्तिमत्व का आदमी सामने खड़ा था!उस ने मेरे बच्चों को स्कूल पहुँच भी दिया और लेके भी आ गया. साथ,साथ मेरे चोटों पे लगाने के लिए मरहम भी ले आया. मुझे इतनी चोट आयी कैसे ये बात उसकी समझ के परे थी और मै बताने में अपनी तौहीन समझती थी!
लेकिन उस दिन के बाद से हम दोनोमे दोस्ती हो गयी जो धीरे,धीरे घनिष्टता  में परिवर्तित होने लगी.  मुझे उसका सहवास अच्छा लगने लगा. बच्चे भी उसके साथ हिलमिल गए. वो उनकी पढ़ाई भी ले लेता....हम सब को घुमाने भी ले जाया करता.
अबतक मुझे उसपे विश्वास हो गया था और मैंने अपने हालात उसके सामने खुलके बता दिए.

एक रोज़ हम चारों सिनेमा देखने गए थे. फिल्म के दौरान अचानक से उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया. मै रोमांचित हो उठी! फिल्म ख़त्म होने के बाद जब हम घर लौटे तो उसने मुझ से कहा,मै तुम से शादी करना चाहता हूँ. तुम्हारे बच्चों में भी मेरा मन रम गया है.....
मै दंग रह गयी!"

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

रहीमा 7( antim)

( गतांक: इन बातों के चंद रोज़ बाद रहीमा ,ज़ाहिद और बच्चे कहीँ  घूमने निकल गए. गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गयीं थीं और इन्हीं दिनों हमारा सोलापूर के बाहर तबादला हो गया. हमने सोलापूर छोड़ दिया और  नासिक चले आए. रहीमा से मेरी फोन पे बातचीत होती रहती.
शायद दो या तीन माह बीते होंगे की एक दिन सोलापूर से हमारे एक परिचित का फोन आया:" ज़ाहिद का बड़े अजीब ढंग से हादसा हुआ है......उसे पुणे ले गए हैं...कोमा में है...हालत गंभीर है...पटवर्धन अस्पताल में ....ICU में है....रहीमा बहुत चाहती है की,आप उसे मिलने जाएँ...!"

मेरे ना जाने का सवाल ही नही उठता था...मै दौड़ी,दौड़ी पुणे पहुँच गयी...अब आगे पढ़ें.)

नाशिक से पुणे के सफ़र के दौरान,ना जाने कैसे,कैसे ख़यालों ने मेरे दिमाग शोर मचाये रखा....क्या कहूँगी मै रहीमा से? किस हाल में होगी वो? साथ,साथ दुआ भी करती जा रही थी...हे ईश्वर! तेरे सदके जाऊं...ज़ाहिद को ठीक कर दे! गर उसे अब कुछ हो गया तो रहीमा पागल ही ना हो जाये...या मेरे खुदा! तू तेरे बन्दों के कैसे,कैसे इम्तिहान लेता रहता है? और क्यों? रहीमा को अभी, अभी तो कुछ चैन और प्यार मिला था...और कितना दर्द रहीमा के क़िस्मत में लिखा है?? वो पाँच, छ: घंटों का सफ़र बेहद तनाव में कटा.

मै सीधे अस्पताल पहुँची. ICU के बाहर रहीमा मिली. रहीमा क्या,मानो उसका अक्स था. मेरे गले लिपट गयी और मेरे कंधों पे उसके आँसूं मुझे महसूस हुए...मै उसे सांत्वना भी देती तो क्या देती? "सब ठीक हो जायेगा...सब्र करो", के अलावा मै और क्या कह सकती थी? और ये अलफ़ाज़ भी कितने बेमायने थे!

तभी डॉक्टर,जिनकी देखभाल में ज़ाहिद था,वहाँ पहुँचे. रहीमा ने मेरा उनसे परिचय कराया. मेरा उनसे पुराना परिचय निकल आया. मैंने उनसे दो मिनट अलग से बात करने की बिनती की.वो मुझे एक ओर ले गए.

मैंने पूछा:" डॉक्टर, आप मुझे सही हालात से वाबस्ता कर सकते हैं?"
डॉक्टर:" हाँ! करनाही होगा...वैसे तो ईश्वर की दया अगाध होती है..हम लोग उसके आगे कोई नही...लेकिन ज़ाहिद के बचनेकी मुझे कोई उम्मीद नही. गर बच भी जाये तो वो ना कभी चल पायेगा ना तो उसका अपने जिस्म पे कोई नियंत्रण ही रहेगा...कोमा की स्थिती में वो कितने दिन काट सकता है,ये तो मै नही कह सकता...उसकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह से चूर,चूर हो गयी  है...मस्तिष्क में गहरी चोटें हैं...इस के अलावा पसलियाँ और अन्य हड्डियाँ टूटी हुई हैं..."

शायद डॉक्टर ने और भी कुछ कहा,पर मुझे सुनायी देना बंद हो गया था. उधर रहीमा मेरी तरफ निगाहें गडाए  बैठी थी. कहीँ से कोई उम्मीद की किरन नज़र आ जाये...कोई उससे कह दे,की,ज़ाहिद मौत के द्वार से सही सलामत लौट आयेगा...मैंने उसे क्या कहना चाहिये ऐसे समय में?

मैंने उस के पास जाके कहा: " रहीमा...खुदा पे भरोसा रखो...अब जो होना है उसी के हाथ में है...डॉक्टर तो अपनी तरफ से कोशिश कर रहे हैं...ये हादसा हुआ कैसे,ये तुम मुझे बता सकती हो?"
रहीमा:" हाँ...यही मै तुम्हें बताना चाह रही थी...पिछले चंद हफ़्तों के हालात से तुम वाबस्ता नही हो...ज़फर ने हम दोनों को बहुत तंग करना शुरू कर दिया था. उसे,हम जिस घरमे रह रहे थे,वो चाहिए था. मै और ज़ाहिद,मेरे वालिद के एक अन्य मकान में रहने चले गए. वो मकान आधा अधूरा बना हुआ है. तीन कमरे छोड़ बाकी घरपे छत नही नही है. खैर! बात इसी पे आके रुक जाती तो ठीक था. उसने पेट्रोल पम्प पे भी कब्ज़ा जमाना चाहा. मेरे वालिद की वसीयत में पम्प मेरे नाम पे है. ज़ाहिद ने तो कहा की, छोडो,जाने दो..हमें क्या करना है? दे दो उसे जो चाहिए. "
मै:" तो ? तुम क्या कहना चाह रही हो? क्या ज़ाहिद के हादसे के पीछे कोई साज़िश थी? ज़फर की साज़िश? मेरा विश्वास नही हो रहा....!"
रहीमा:" जिस शाम हादसा हुआ,उस शाम ज़फर का धमकी भरा एक फोन आया. उसने ज़ाहिद से बात की. शायद ज़फर ने कुछ ज्यादा ही पी रखी थी. उस ने ज़ाहिद से कहा की वो तुरंत पम्प पे आ जाये और पम्प के कागज़ात उसके नाम करने की प्रक्रिया शुरू करे. उसे लग रहा था,की,मै शायद न मानूँ.
"ज़ाहिद घर से निकलता इससे पहले पम्प पर से हमारे एक पुराने वफादार नौकर का फोन आया की,ज़फ़र तो पम्प को तबाह करने के मंसूबे बना रहा है...ज़ाहिरन,ये केवल तमाशा था..उसे तो पम्प से मिलने वाली आमदनी चाहिए थी...क़र्ज़ में डूब जो  रहा था...या शायद उसे पम्प अपने नाम करके बेच देना था...कह नही सकती...मैंने ज़ाहिद को घर से बाहर जाने से रोकना चाहा,लेकिन ज़ाहिद ने मुझे भरोसा दिलाया की,इस तरह  कायरों की भांती  डरना और घरमे घुसे रहना ठीक नही...मै उसे मिलके इत्मिनान दिला देता हूँ,की,उसे जो चाहिए,वैसाही होगा...हमें बस अब अमन चैन चाहिए...कोई लडाई झगडा नही...."
मै :" तो ?"
रहीमा :" ज़ाहिद अपनी मोबाइक पे निकल पडा. घर के पास से जो रास्ता सोलापूर क्लब के साथ से गुज़रता है,वो वहाँ तक पहुँचा ,तो देखा पीछे से ज़फर तेज़ जिप्सी चलाता हुआ उसके पीछे आ रहा था. गली संकड़ी थी. ज़ाहिद ने अपनी बाईक  रास्ते से हटा लेनी चाही,लेकिन उसे मौक़ा ही नही मिला. ज़फर ने पीछे से ज़ोरदार टक्कर लगा दी. ज़ाहिद दूर जाके पटकाया. "

मै:" रहीमा! तुम्हें ये सब किसने बताया? किसी ने इस हादसे को होते हुए देखा? कोई चश्मदीद गवाह है?"
रहीमा:" हमारे पम्प का ही  एक मुलाजिम वहाँ से साइकल पर से गुज़र रहा था. उसने सब कुछ देखा...! ज़फ़र तो टक्कर मार के उड़न छू हो गया. इस आदमी  ने रास्ते पर से एक रिक्शा बुलाई. ज़ाहिद को लेके अस्पताल पहुँचा और मुझे वहाँ से फोन किया. "
मै :" ओह! तो कोई तो गवाह है! वो रिक्शावाला भी बता सकता है की,वो किस हाल में ज़ाहिद को अस्पताल लेके गया...! क्या तुम्हारे मुलाज़िम ने उस रिखे का नंबर लिख लिया था?"
रहीमा :" उस ने नंबर तो लिखा था,लेकिन वो किसी काम का नही.....ज़फर ने बहुत चालाकी की...वो रिक्शा  वाला गायब है..! ना जाने ज़फर ने उसे कहाँ भेज दिया...कितने रुपये पकड़ा दिए! "
मै :" और वो मुलाज़िम? जिस ने ये सब होते हुए देखा? उसका क्या? वो तो मूह खोलेगा या नही?"
रहीमा:" वो भी दूसरे दिन से गायब है...और तो और ज़फर का रूसूक़ इतना है,की, पुलिस ने FIR तक दर्ज नही कराया है..! सतारा के DSP बड़ी मेहेर नज़र है ज़फर पे...उनके रहते ज़फर का एक बाल भी बांका नही हो सकता...!"
मै:"  गज़ब है! और इस वक़्त ज़फर कहाँ है?"
रहीमा :"वो तो फ़र्ज़ी पास पोर्ट पे कनाडा पहुँच चुका है...उसका तो अब वैसे भी कोई कुछ नही बिगाड़ सकता. हमारे पुश्तैनी मकान का तो सौदा होही गया था...वो सारा पैसा तो उसे मिल गया...यहाँ के लोगों से जो उसने पैसे लिए थे,वो तो सब डुबो दिए....हाँ....! जल्द बाज़ी में पेट्रोल पम्प से हाथ धो बैठा. अब वो डर के मारे कभी नही लौटेगा..."

कैसा अजीब इत्तेफ़ाक़ था! जिस दिन ज़ाहिद का हादसा हुआ,या करवाया गया,वो रक्षाबंधन का दिन था!
मै दो दिन पुणे में रुकी. जब लौटी तो ज़ाहिद के हालत में कोई तबदीली नही थी. 
मेरे नाशिक लौटने के दूसरे ही दिन ज़ाहिद दुनिया से चल बसा. मुझे ख़बर तीसरे दिन मिली. मै जनाज़े में तो शामिल हो ना सकी, लेकिन सोलापूर के लिए निकल पडी. रहीमा के आधे अधूरे मकान पे पहुँची. अजीब-सी मनहूसियत छाई हुई थी.

मकान के सहन  में कुछ लोग बैठे हुए थे. रहीमा एक कमरेमे थी. मुझे देखते ही लिपट गयी. बोली:" मै ज़ाहिद की मौत के लिए ज़िम्मेदार हूँ...ना हमारी शादी होती ना उसकी जान जाती...मेरे प्यार ने उसकी जान लेली....मै अपराधी हूँ...!"
मै :" ऐसा ना कहो रहीमा! तुम्हें लगता है,इन बातों से ज़ाहिद की रूह को चैन मिलेगा? "
रहीमा:" हमारी शादी को एक साल भी नही हुआ...फिरभी इन चंद दिनों में मुझे ज़ाहिद ने ज़िंदगी भर का प्यार दे दिया...लतीफ़ ने दिया हर दर्द  मै भूल गयी...कैसे विश्वास कर लूँ की ज़ाहिद नही रहा?"
मै:" रहीमा! बहुत कम लोगों को ऐसा प्यार नसीब होता है...ये तुम्हारे लिए पूरे जीवन भर का तोहफा है...इन्हीं पलों से तुम्हें अब एक उम्र चुरानी है...बच्चों को बड़ा करना है...पढ़ाना लिखाना है...ज़ाहिद तुम्हें,जहाँ भी होगा हर पल देखेगा...!"

और रहीमा की उम्र बसर होती रही. आफताब बड़ा होके पुलिस अफसर बनना चाहता  था,की वो अपने मामा का बदला ले सके! खैर पुलिस अफसर तो नही बना..लेकिन बच्चों ने माँ की मेहनत सार्थक कर दी. दोनों काबिल बन गए. अपने,अपने पैरों पे खड़े हैं. रहीमा ने वो आधा अधूरा मकान ठीक करवा लिया. पेट्रोल पम्प ही उसकी रोज़ी रोटी का ज़रिया बना रहा.

समाप्त