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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

बेहद  खराब सेहत के   कारन ब्लॉग जगत से मेरा तकरीबन संपर्क छूट-सा गया है! आप सभी की दुआएं चाहती हूँ,कि ,अब इस दर्द से मुझे किसी तरह निजात मिल जाये .डॉक्टर्स को कहके हार गयी हूँ,कि इतना दर्द सहने के लिए मुझे जिंदा न रखें।कोई सुनता नहीं।ये सबके चलते टूटते रिश्तों का दर्द सहती जा रही हूँ।
आप सभी को भविष्य के लिए ढेरों शुभ कामनाएं।
आपकी क्षमा
मैंने लिखा  था :
अब सेहर होनेको है,
ये शमा बुझने को  है,
जो रात में जलते हैं,
वो सेहर कब देखते हैं?

गुरुवार, 16 जून 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार..

चंद साल पूर्व मै rediffconnexion की मेम्बर बनी. स्क्रैप पे जो प्रोफाइल था वहाँ मैंने अपना वर्क प्रोफाइल डाला. जिन विषयों में मेरी रुची थी....जो मेरे रोज़गार के भी ज़रिये थे,मैंने उन सभी के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी.हफ्ते भर के अन्दर मै निराश हो गयी. मुझसे दोस्ती के लिए सब हाथ बढ़ा रहे थे,मेरे कामकाज में किसी को रुची नहीं थी. 

मैंने जल्द ही जो मालूमात ज़रूरी नहीं थी,तुरंत हटा दी. अपना सेल नंबर भी हटा दिया.गर कोई पूछता," आप कहा रहती हैं,तो मेरा जवाब होता,"हिंदी हैं हम,वतन है हिन्दोस्तान हमारा!"

खैर ! ऐसे ही निराशा के दौर में कुछ अच्छे दोस्त मिले. खासकर दो महिलाएँ थीं,जो मुझसे बड़े प्यारसे पेश आतीं...अर्चना जो एक डॉक्टर थी और विवाहिता.आयुषी,जो अपनी पढाई पूरी कर चुकी थी. जॉब के तलाश में थी. अर्चना और आयुषी की  मुझसे पहलेही आपस में जानपहचान थी.मतलब कुछ चंद माह पूर्व.मेल मिलाप नहीं.
मैंने अपने प्रोफाइल पे अपनी एक फोटो लगा रखी थी,जिसमे मैंने बडाही पारंपरिक पोशाख पहना था.सर चुनर से ढंका हुआ था. अन्य सदस्यों  की तरह,इन दोनोको भी इस तस्वीर ने आकर्षित किया.
आयुषी तथा अर्चनाने अपनी कोई तस्वीर नहीं लगाई थी. 

खैर समय बीतता रहा.एक दिन किसी अन्य सदस्य ततः आयुषी के बीच हुआ सम्वाद मैंने उन्हीं के स्क्रैप पे पढ़ा. मै अचानक सजग हो गयी. कुछ तो कहीं गड़बड़ है.....यहाँ पे एक तीसरे,बेहद सुदर्शन युवक का पदार्पण हुआ.नाम था उसका ,सौगात.और इसी के साथ,साथ,कुछ रिश्तों  की गुत्थियाँ बनी और धीरे,धीरे सुलझने भी लगीं.सुलझी....मतलब मेरे सामने कुछ अधिक स्पष्ट होता गया.इस गुत्थी में जो किरदार फंसे थे,वो तो फंसे ही रहे.ये एक अनजान दुनियामे क़दम रखने की फिसलन थी.....उसकी कीमत चुकानी थी,या दर्द सहना था....जोभी हो....इन सबसे निपटना और खुशी,खुशी बाहर निकलना ना -मुमकिन-सा लग रहा था...

मेरा किरदार यहाँ क्या था? मैंने कौनसा रोल निभाया....या निभाने की कोशिश की,ये अगली बार....बड़े ही फ़िल्मी ढंगसे यहाँ प्रेम का एक त्रिकोण बनता जा रहा मुझे नज़र आ रहा था...
क्रमश:






मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

रहीमा 7( antim)

( गतांक: इन बातों के चंद रोज़ बाद रहीमा ,ज़ाहिद और बच्चे कहीँ  घूमने निकल गए. गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गयीं थीं और इन्हीं दिनों हमारा सोलापूर के बाहर तबादला हो गया. हमने सोलापूर छोड़ दिया और  नासिक चले आए. रहीमा से मेरी फोन पे बातचीत होती रहती.
शायद दो या तीन माह बीते होंगे की एक दिन सोलापूर से हमारे एक परिचित का फोन आया:" ज़ाहिद का बड़े अजीब ढंग से हादसा हुआ है......उसे पुणे ले गए हैं...कोमा में है...हालत गंभीर है...पटवर्धन अस्पताल में ....ICU में है....रहीमा बहुत चाहती है की,आप उसे मिलने जाएँ...!"

मेरे ना जाने का सवाल ही नही उठता था...मै दौड़ी,दौड़ी पुणे पहुँच गयी...अब आगे पढ़ें.)

नाशिक से पुणे के सफ़र के दौरान,ना जाने कैसे,कैसे ख़यालों ने मेरे दिमाग शोर मचाये रखा....क्या कहूँगी मै रहीमा से? किस हाल में होगी वो? साथ,साथ दुआ भी करती जा रही थी...हे ईश्वर! तेरे सदके जाऊं...ज़ाहिद को ठीक कर दे! गर उसे अब कुछ हो गया तो रहीमा पागल ही ना हो जाये...या मेरे खुदा! तू तेरे बन्दों के कैसे,कैसे इम्तिहान लेता रहता है? और क्यों? रहीमा को अभी, अभी तो कुछ चैन और प्यार मिला था...और कितना दर्द रहीमा के क़िस्मत में लिखा है?? वो पाँच, छ: घंटों का सफ़र बेहद तनाव में कटा.

मै सीधे अस्पताल पहुँची. ICU के बाहर रहीमा मिली. रहीमा क्या,मानो उसका अक्स था. मेरे गले लिपट गयी और मेरे कंधों पे उसके आँसूं मुझे महसूस हुए...मै उसे सांत्वना भी देती तो क्या देती? "सब ठीक हो जायेगा...सब्र करो", के अलावा मै और क्या कह सकती थी? और ये अलफ़ाज़ भी कितने बेमायने थे!

तभी डॉक्टर,जिनकी देखभाल में ज़ाहिद था,वहाँ पहुँचे. रहीमा ने मेरा उनसे परिचय कराया. मेरा उनसे पुराना परिचय निकल आया. मैंने उनसे दो मिनट अलग से बात करने की बिनती की.वो मुझे एक ओर ले गए.

मैंने पूछा:" डॉक्टर, आप मुझे सही हालात से वाबस्ता कर सकते हैं?"
डॉक्टर:" हाँ! करनाही होगा...वैसे तो ईश्वर की दया अगाध होती है..हम लोग उसके आगे कोई नही...लेकिन ज़ाहिद के बचनेकी मुझे कोई उम्मीद नही. गर बच भी जाये तो वो ना कभी चल पायेगा ना तो उसका अपने जिस्म पे कोई नियंत्रण ही रहेगा...कोमा की स्थिती में वो कितने दिन काट सकता है,ये तो मै नही कह सकता...उसकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह से चूर,चूर हो गयी  है...मस्तिष्क में गहरी चोटें हैं...इस के अलावा पसलियाँ और अन्य हड्डियाँ टूटी हुई हैं..."

शायद डॉक्टर ने और भी कुछ कहा,पर मुझे सुनायी देना बंद हो गया था. उधर रहीमा मेरी तरफ निगाहें गडाए  बैठी थी. कहीँ से कोई उम्मीद की किरन नज़र आ जाये...कोई उससे कह दे,की,ज़ाहिद मौत के द्वार से सही सलामत लौट आयेगा...मैंने उसे क्या कहना चाहिये ऐसे समय में?

मैंने उस के पास जाके कहा: " रहीमा...खुदा पे भरोसा रखो...अब जो होना है उसी के हाथ में है...डॉक्टर तो अपनी तरफ से कोशिश कर रहे हैं...ये हादसा हुआ कैसे,ये तुम मुझे बता सकती हो?"
रहीमा:" हाँ...यही मै तुम्हें बताना चाह रही थी...पिछले चंद हफ़्तों के हालात से तुम वाबस्ता नही हो...ज़फर ने हम दोनों को बहुत तंग करना शुरू कर दिया था. उसे,हम जिस घरमे रह रहे थे,वो चाहिए था. मै और ज़ाहिद,मेरे वालिद के एक अन्य मकान में रहने चले गए. वो मकान आधा अधूरा बना हुआ है. तीन कमरे छोड़ बाकी घरपे छत नही नही है. खैर! बात इसी पे आके रुक जाती तो ठीक था. उसने पेट्रोल पम्प पे भी कब्ज़ा जमाना चाहा. मेरे वालिद की वसीयत में पम्प मेरे नाम पे है. ज़ाहिद ने तो कहा की, छोडो,जाने दो..हमें क्या करना है? दे दो उसे जो चाहिए. "
मै:" तो ? तुम क्या कहना चाह रही हो? क्या ज़ाहिद के हादसे के पीछे कोई साज़िश थी? ज़फर की साज़िश? मेरा विश्वास नही हो रहा....!"
रहीमा:" जिस शाम हादसा हुआ,उस शाम ज़फर का धमकी भरा एक फोन आया. उसने ज़ाहिद से बात की. शायद ज़फर ने कुछ ज्यादा ही पी रखी थी. उस ने ज़ाहिद से कहा की वो तुरंत पम्प पे आ जाये और पम्प के कागज़ात उसके नाम करने की प्रक्रिया शुरू करे. उसे लग रहा था,की,मै शायद न मानूँ.
"ज़ाहिद घर से निकलता इससे पहले पम्प पर से हमारे एक पुराने वफादार नौकर का फोन आया की,ज़फ़र तो पम्प को तबाह करने के मंसूबे बना रहा है...ज़ाहिरन,ये केवल तमाशा था..उसे तो पम्प से मिलने वाली आमदनी चाहिए थी...क़र्ज़ में डूब जो  रहा था...या शायद उसे पम्प अपने नाम करके बेच देना था...कह नही सकती...मैंने ज़ाहिद को घर से बाहर जाने से रोकना चाहा,लेकिन ज़ाहिद ने मुझे भरोसा दिलाया की,इस तरह  कायरों की भांती  डरना और घरमे घुसे रहना ठीक नही...मै उसे मिलके इत्मिनान दिला देता हूँ,की,उसे जो चाहिए,वैसाही होगा...हमें बस अब अमन चैन चाहिए...कोई लडाई झगडा नही...."
मै :" तो ?"
रहीमा :" ज़ाहिद अपनी मोबाइक पे निकल पडा. घर के पास से जो रास्ता सोलापूर क्लब के साथ से गुज़रता है,वो वहाँ तक पहुँचा ,तो देखा पीछे से ज़फर तेज़ जिप्सी चलाता हुआ उसके पीछे आ रहा था. गली संकड़ी थी. ज़ाहिद ने अपनी बाईक  रास्ते से हटा लेनी चाही,लेकिन उसे मौक़ा ही नही मिला. ज़फर ने पीछे से ज़ोरदार टक्कर लगा दी. ज़ाहिद दूर जाके पटकाया. "

मै:" रहीमा! तुम्हें ये सब किसने बताया? किसी ने इस हादसे को होते हुए देखा? कोई चश्मदीद गवाह है?"
रहीमा:" हमारे पम्प का ही  एक मुलाजिम वहाँ से साइकल पर से गुज़र रहा था. उसने सब कुछ देखा...! ज़फ़र तो टक्कर मार के उड़न छू हो गया. इस आदमी  ने रास्ते पर से एक रिक्शा बुलाई. ज़ाहिद को लेके अस्पताल पहुँचा और मुझे वहाँ से फोन किया. "
मै :" ओह! तो कोई तो गवाह है! वो रिक्शावाला भी बता सकता है की,वो किस हाल में ज़ाहिद को अस्पताल लेके गया...! क्या तुम्हारे मुलाज़िम ने उस रिखे का नंबर लिख लिया था?"
रहीमा :" उस ने नंबर तो लिखा था,लेकिन वो किसी काम का नही.....ज़फर ने बहुत चालाकी की...वो रिक्शा  वाला गायब है..! ना जाने ज़फर ने उसे कहाँ भेज दिया...कितने रुपये पकड़ा दिए! "
मै :" और वो मुलाज़िम? जिस ने ये सब होते हुए देखा? उसका क्या? वो तो मूह खोलेगा या नही?"
रहीमा:" वो भी दूसरे दिन से गायब है...और तो और ज़फर का रूसूक़ इतना है,की, पुलिस ने FIR तक दर्ज नही कराया है..! सतारा के DSP बड़ी मेहेर नज़र है ज़फर पे...उनके रहते ज़फर का एक बाल भी बांका नही हो सकता...!"
मै:"  गज़ब है! और इस वक़्त ज़फर कहाँ है?"
रहीमा :"वो तो फ़र्ज़ी पास पोर्ट पे कनाडा पहुँच चुका है...उसका तो अब वैसे भी कोई कुछ नही बिगाड़ सकता. हमारे पुश्तैनी मकान का तो सौदा होही गया था...वो सारा पैसा तो उसे मिल गया...यहाँ के लोगों से जो उसने पैसे लिए थे,वो तो सब डुबो दिए....हाँ....! जल्द बाज़ी में पेट्रोल पम्प से हाथ धो बैठा. अब वो डर के मारे कभी नही लौटेगा..."

कैसा अजीब इत्तेफ़ाक़ था! जिस दिन ज़ाहिद का हादसा हुआ,या करवाया गया,वो रक्षाबंधन का दिन था!
मै दो दिन पुणे में रुकी. जब लौटी तो ज़ाहिद के हालत में कोई तबदीली नही थी. 
मेरे नाशिक लौटने के दूसरे ही दिन ज़ाहिद दुनिया से चल बसा. मुझे ख़बर तीसरे दिन मिली. मै जनाज़े में तो शामिल हो ना सकी, लेकिन सोलापूर के लिए निकल पडी. रहीमा के आधे अधूरे मकान पे पहुँची. अजीब-सी मनहूसियत छाई हुई थी.

मकान के सहन  में कुछ लोग बैठे हुए थे. रहीमा एक कमरेमे थी. मुझे देखते ही लिपट गयी. बोली:" मै ज़ाहिद की मौत के लिए ज़िम्मेदार हूँ...ना हमारी शादी होती ना उसकी जान जाती...मेरे प्यार ने उसकी जान लेली....मै अपराधी हूँ...!"
मै :" ऐसा ना कहो रहीमा! तुम्हें लगता है,इन बातों से ज़ाहिद की रूह को चैन मिलेगा? "
रहीमा:" हमारी शादी को एक साल भी नही हुआ...फिरभी इन चंद दिनों में मुझे ज़ाहिद ने ज़िंदगी भर का प्यार दे दिया...लतीफ़ ने दिया हर दर्द  मै भूल गयी...कैसे विश्वास कर लूँ की ज़ाहिद नही रहा?"
मै:" रहीमा! बहुत कम लोगों को ऐसा प्यार नसीब होता है...ये तुम्हारे लिए पूरे जीवन भर का तोहफा है...इन्हीं पलों से तुम्हें अब एक उम्र चुरानी है...बच्चों को बड़ा करना है...पढ़ाना लिखाना है...ज़ाहिद तुम्हें,जहाँ भी होगा हर पल देखेगा...!"

और रहीमा की उम्र बसर होती रही. आफताब बड़ा होके पुलिस अफसर बनना चाहता  था,की वो अपने मामा का बदला ले सके! खैर पुलिस अफसर तो नही बना..लेकिन बच्चों ने माँ की मेहनत सार्थक कर दी. दोनों काबिल बन गए. अपने,अपने पैरों पे खड़े हैं. रहीमा ने वो आधा अधूरा मकान ठीक करवा लिया. पेट्रोल पम्प ही उसकी रोज़ी रोटी का ज़रिया बना रहा.

समाप्त

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

इन सितारों से आगे..3

ali ने कहा…
हौलनाक ....ये वक़्त किसी पे ना गुज़रे ! जितनी बार पढता हूँ चोट सी लगती है !
















उफ़ बहुत ही भयानक परिणाम रहा………………ऐसा तो कोई सोच भी नही सकता था…………………………और अभी आगे भी मुश्किलों भरा सफ़र जान दुख हो रहा है…………कोई कैसे इतना सह सकता है।
















काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
बहुत सी बातें हैं जो बिन कहे ही की जाती हैं. सुंदर. rashmi ravija ने कहा… बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ..कहानी में भी कविता का आभास,वो खुला आसमान और चाँद का सफ़र...किसी बीते युग की बात लगती है ..स्मरण दिलाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया शिवराज गूजर. ने कहा… पहली बार आपके ब्लॉग पर आया. सच मानिये पहली बार में ही आपकी कलम का मुरीद हो गया.
Apoorv ने कहा…
बाँध लेने की क्षमता है आपकी कलम मे..अब तो सारे बिखरे सितारे इकट्ठे करने पड़ेंगे एक दिन..और अगली किश्त की प्रतीक्षा भी है..
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…
"उसके मिट्टी से सने पैरों के निशाँ वाली एक चद्दर ही हम रख लेते तो कितना अच्छा होता...." कितनी अच्छी बात कही है - काश यह समझदारी सब में नैसर्गिक ही होती तो दुनिया कितनी खूबसूरत होती!












Manoj Bharti ने कहा…
क्षमा जी ! सादर प्रणाम ! आज तीसरी कड़ी पढ़ी । अच्छा लगी । बड़े-बुजुर्गों का स्नेह भाव और उनकी तन्हाई का सुंदर चित्रण हुआ है । रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा… एक अच्छा सफ़र रहा... आपके साथ ऊपर-नीचे होते रहे.... पर इसे हटाना...यह क्यूं आखिर...? शहरोज़ ने कहा… इतनी सुघड़ भाषा ब्लॉग में तो कम ही देखाई देती है.प्रवाह तो है ही...संवेदनाओं को हौले हौले झक झोरती है धीरे-धीरे बढती कथा.. pragya ने कहा… मन  ही  नहीं  करता  की  ये  कहानी  कहीं  पर  ख़त्म  हो .. 







ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…
क्षमा जी ! कहानी की रोचकता और रहस्यमयता दौनों ही प्रभावित करती हैं ! कभी टिप्पणी चूक जाती है परन्तु रचना पढ़ता अवश्य हूँ !बहुत अच्छा लिख रही हैं आप ! 





रचना दीक्षित ने कहा…
क्या लेखन कला है ?कमाल है ........एकदम बाँध कर रखती है. साँस की लय भी कहानी की लय से बांध जाना चाहती है.अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी. आभार Dr.R.Ramkumar ने कहा… फिर वो दिनभी आ गया जब उसे अमरीका जाना था...हवाई अड्डे पे पूजा ,गौरव और केतकी खड़े थे..पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करगी..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी... अंतस से लिखी प्रभावशाली कहानी। शब्दों में आंतरिक सच लिपटा हुआ आया । दर्द तो फिर आना ही था। समकालीन टूटते बिखरते मजबूर विकास का उम्दा चित्रण। अनुभूतियों की ‘शमा’ मौजूद है, ‘क्षमा’ बनकर। ali ने कहा… क्षमा जी आज फुर्सत से पढ़ा ... लगता है मन रम जायेगा चूंकि यह आलेख धारावाहिक की शक्ल में है इसलिए मुझे आगा पीछा सोचने और प्रतिक्रिया देने का अवसर दीजिये ! आज बस इतना ही कि पढना अच्छा लग रहा है ! शुक्रिया ! अल्पना वर्मा ने कहा… माँ और उसकी ममता भी असहाय हो जाती है..बच्चों के फैसलों के आगे! बहुत भावपूर्ण लिखा है ..आगे के भाग की प्रतीक्षा रहेगी.
अरुणेश मिश्र ने कहा…
पूरा पढने की इच्छा । माँ महान है ।

alka sarwat ने कहा…
बिटिया का ब्याह और मै नही जा सकूँगी... ये पीड़ा अभी कुछ दिन पहले मैंने भोगी है ,इसका दर्द तो बस आसन हिला देता है ऊपर वाले का भी ,सच बहुत गहन पीड़ा है ये ..........

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…
यही होती है माँ, बच्चे चाहे रूठे रहें माँ की ममता बच्चों के लिये छलकती ही रहती है चाहे वे सामने हों या नहों । बिटिया का ब्याह और मै नही जा सकूँगी.....इस वाक्य में आपके दिल का सारा दर्द उभर आया है ।

aruna kapoor 'jayaka' ने कहा…
स्रियां जीवन में कितनी गंभीर समस्याओं से झूझ रही होती है...इसका शब्दों मे सचित्र वर्णन आपने किया है आपने क्षमाजी!.. मीनाक्षी ने कहा… कमाल  है  ...देखते  ही  देखते  पहली   से  अब  2010 मे  की  किश्त  भी  पढ़  ली ....शायद  कथा  के  पात्र  हमारे  में  से  ही  कोई  होता  है  एक  जादुई  प्रवाह  में  बस  पढ़ती  चली  गयी ..... 
 
इस सफ़र की सख्त धूप में आप की टिप्पणियों के घने साए साथ चलते रहे...रहगुज़र आसान होती गयी...बहुत,बहुत शुक्रिया!
अगली दो कड़ियों में सफ़र में अन्य साथी,जिनकी  रहनुमाई न होती तो सफ़र पूरा न होता , उनका ज़िक्र  ज़रूर करुँगी..
क्रमशः

शनिवार, 6 मार्च 2010

बिखरे सितारे:१० बिटिया का तोहफा.

(पूर्व  भाग :वो दिनभी आया जब बिटिया को स्कूल जाना था....उन्हीं दिनों बिटिया ने अनजाने ही अपनी माँ को एक यादगार तोहफा दिया...जिसकी क़द्र बरसों बाद पूजा को हुई...उस का एहसास हुआ,की, वो तोहफा कितना नायाब था...अब आगे पढ़ें)

केतकी ३ साल की हुई तो स्कूल  जाने लग गयी. एक दिन स्कूल से फोन आया की, वापसी पे स्कूल बस बिना उसे लिए निकल गयी है...पूजा जल्दी जल्दी स्कूल पहुँची...बच्ची को दफ्तर में बिठाया गया था..उसके गाल पे एक आँसू लटका हुआ पूजा को नज़र आया...उसने धीरेसे उसे अपनी तर्जनी से पोंछ दिया और बच्ची को  गले लगा लिया..
माँ ने वो एक बूँद पोंछी तो बिटिया बोल उठी: " मुझे डर  लगा,तुम्हें आने में देर होगी,तो, पता नही कहीँ से  ये पानी मेरे गालपे आ गया..!"
बरसों बाद जब पूजा को ये वाक़या याद आया,तो लगा, काश वो उस एक बूँद को मोती में तब्दील कर एक डिबियामे संजो के रख सकती...बिटिया से मिला वो एक बेहतरीन तोहफा था...क्या हालात हुए,जो पूजा को ऐसा महसूस हुआ? अभी तो उस तक आने में समय है...इंतज़ार करना होगा...!
दिन बीतते गए...गौरव के तबादलों के साथ बच्चों के स्कूल बदलते गए...पूजा में हर किस्म का हुनर था..उसने कभी पाक कला के वर्ग लिए तो कभी बागवानी सिखाई...कमाने लगी तो उसमे थोडा आत्म विश्वास जागा..बच्चों का भविष्य, उनकी पढ़ाई...खासकर बिटियाकी, मद्देनज़र रखते हुए, उसने पैसों की बचत करना शुरू कर दी...हर महीने वो थोडा-सा सोना खरीद के रख लेती...गुज़रते वक़्त के साथ पूजा का यह क़दम बेहतरीन साबित हुआ..
एक और बात पूजा को ता-उम्र याद रहेगी...बिटिया ५/६ सालकी थी...बहुत तेज़ बुखार से बीमार पडी..रोज़ सुबह शाम इंजेक्शन लगते...जब डॉक्टर आते तो वो उनसे कहती,: " अंकल, माँ को बोलो दूसरी तरफ देखे..उसे बोलो, मुझे बिलकुल दर्द नही होता..माँ! आँखें  बंद करो या दरवाज़े के बाहर देखो तो..."
पूजा की आँख भर आती...!
जब बच्ची कुछ ठीक हुई तो उसने अपनी माँ से एक कागज़ तथा पेन्सिल माँगी...और अपनी माँ पे एक नायाब निबंध लिख डाला..." जब मै बीमार थी तो माँ मुझे बड़ा गन्दा खाना खिलती थी..लेकिन तभी तो मै अच्छी हो पायी..वो रोज़ गरम पानी और साबुनसे मेरा बदन पोंछती...मुझे खुशबूदार पावडर लगती...बालों में हलके हलके तेल लगाके, धीरे, धीरे मेरे बाल काढ़ती...." ऐसा और बहुत लिखा...पूजा ने वो नायाब प्रशस्ती पत्रक उसकी टीचर को पढ़ने दिया...जो खो गया..बड़ा अफ़सोस हुआ पूजा को...

और दिन बीतते गए....बच्चे समझदार और सयाने होते गए...
क्रमश: