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बुधवार, 22 दिसंबर 2010

दीपा 4

( गतांक: पती को अपना न्यूनगंड खलता था और इस बात को छुपा के रखने की चाहत में वो दीपा पे बात बेबात बरस पड़ता. उस के लिए  ऐसा करना मर्दानगी थी....उस के इसी न्यूनगंड ने एक बार उससे बड़ी ही भयानक बात करवा  दी. कम से कम दीपा के पास" उस " घटना के स्पष्टीकरण के लिए और कोई पर्याय नही. उस घटना का विवरण मै दीपाके शब्दों  में देना चाहूँगी.
अब आगे पढ़ें. देरी के लिए माफी चाहती हूँ. व्यस्तता कुछ ज़्यादाही बढ़ गयी है.)

मेरी तथा दीपा की एक दिन बड़ी अन्तरंग बातें चल रहीं थीं. उसी दौरान उसने मुझे इस घटना के बारेमे बताया.उसी के शब्दों में बता रही हूँ.
दीपा: " एक बार हमलोग बच्चों को लेके गोआ घूमने गए. वापसी  पे रत्नागिरी रुकना था. बस से सफ़र कर रहे थे. मै दोनों बच्चों के साथ सब से पिछली सीट पे बैठी थी. मेरे पती अलगसे,दो सीट छोड़ के बैठे थे. देखने वाले सहजही अनुमान लगा सकते होंगे की, हम पती-पत्नी में कुछ ख़ास लगाव नही है. खैर.

मेरी साथवाली सीट पे एक आदमी आके बैठ गया. मुझसे ज़रुरत से ज़्यादा सटके. मुझे उसकी हरकत बड़ी घिनौनी लगी. मैंने मेरे बेटे को अपनी जगह बिठाया और उसकी सीट पे मै बैठ गयी.
एक जगह बस रुकी तो मेरे पती ने उस आदमी से बड़े दोस्ताना तरीकेसे बातचीत शुरू कर दी. मन ही मन मुझे बेहद गुस्सा आया. लगा,कैसा इंसान है! देख रहा था,की, वो आदमी मुझसे कैसे सटके बैठा था,फिरभी उस पे इतना प्यार उमड़ रहा था!
मैंने बच्चों को कुछ खिलाया पिलाया और हमारा सफ़र जारी रहा. अब के वो आदमी मेरे पती के साथ बैठ गया.

हम रत्नागिरी पहुँच के एक होटल में ठहरे. वो आदमी भी उसी होटल में रुका. शाम को वो तथा मेरे पति एक साथ घूमने भी गए. होटल कुछ ख़ास आरामदेह नही था. लेकिन मुझे इस बात की अधिक परवाह नही रहती,क्योंकि नयी,नयी जगहें देखना मुझे खुद को बड़ा भाता था.

अगले दिन रात को जब हम चारों हमारे कमरेमे सो रहे थे तो अचानक से मेरी आँख खुली. मुझे लगा मानो मेरे बिस्तरपे कोई है! जब तक मै सम्भलती तब तक वो व्यक्ती मेरे जिस्म पे औंधा लेट गया. मै चीखना नही चाह रही थी. डर था की  ,कहीँ बच्चे उठ गए तो बेहद घबरा जायेंगे. मैंने अपना पूरा ज़ोर लगा के उस व्यक्ती को धक्का लगाया. उसी हडबडी में मेरे सिरहाने रखा हुआ पानी का घडा धडाम से गिर पडा. उस पे स्टील का ढक्कन तथा ग्लास था. उसका भी काफ़ी ज़ोरसे आवाज़ हुआ. तभी कमरे के बाहर के गलियारे में maneger   ने बत्ती जलाई और पूछा, सब ठीक तो है?

वो आदमी छलांग लगा के हट गया और दरवाज़े के पासवाली दीवार को सटके खड़ा हो गया . फिर दरवाज़ा खोलके बाहर निकल गया. मै बच गयी. जानती थी,की,ये बात मेरे पती को उसी समय बताने से क़तई फायदा नही. और ऐसा हो नही सकता था,की, घड़े की आवाज़ से वो जग ना गए हों! मै हैरान हुई की,बच्चे कैसे सोते रहे!
वो रात मेरी आँखों ही आँखों में गुज़री. डर,सदमा,गुस्सा....सब कुछ इतना था की, बता नही सकती. सुबह जब मैंने मेरे पतिसे रातवाली घटना के बारे में कहना चाहा तो जनाब ने कहा," अरे! वो तो मैही था! तुम्हें इतनी भी अक्ल नही?"
मैंने अपना सर पीट लिया!! ज़ाहिरन,उस आदमी को मेरे पति की शह थी. उसकी मर्ज़ी के बिना वो आदमी ऐसा क़दम उठाने की हिम्मत नही कर सकता था! "

किस्सा सुन मै दंग रह गयी! उफ़! कैसा पति था? और ये सब करने करवाने की वजह हम दोनों की  समझ के परे!!
क्रमश:

रविवार, 13 जून 2010

बिखरे सितारे: ६: और भी सिलसिले...

( गतांक:केतकी ने अंत में इस बात की इत्तेला मेरे जेठ जेठानी को दी..उनको गौरव ने नही बताया था..सगे भाई जो नही थे..लेकिन जेठानी ने गौरव को तुरंत फोन किया..और कह दिया:' तुम गर हमारी बहू को घर से निकालोगे,तो,मेरा मरा मूह देखोगे..हम दोनों को उसके चरित्र पे किंचित भी शंका आ नहीं सकती.."
यह बात सुन,गौरव ना जाने क्यों सकपका गया..और उसने उन्हें कहा," ठीक है भाभी,आपकी बात रख  लेता हूँ.."
इस के पश्च्यात वो दोनों मेरे पास पहुँच गए...अब आगे पढ़ें...)

भाभी-भैया आ गए. मुझे अच्छा भी बहुत लगा,की,वो दोनों आए तो..मेरे साथ तो खड़े रहे. लेकिन मेरे समझ से परे था,की,गौरव ने उनकी बात कैसे रख ली?

माँ को भी इसी बात का अचरज था. और माँ ने जो अंदाज़ लगाया,वो भी एकदम सही था. मुझे छोड़ देना गौरव के अहम को ठेस थी. इसके अलावा वह यह भी जताना चाह रहा था,की, पत्नी ने किये छल के बावजूद उसने,बड़ा दिल कर के माफ़ कर दिया..और कोई होता,तो घर से धक्के मार के निकाल देता..भविष्य में मैंने यह अलफ़ाज़ गौतम के मुख से अनगिनत बार सुने.गर मेरे पास एक भी पर्याय मौजूद होता,तो शायद मै स्वयं उस घर में नही ठहरती. यही हमारे समाज की विडम्बना है.खैर!
भाभी-भैया कुछ रोज़ रुक के लौट गए.

माँ के मन से भी अविश्वास धुंद हट गयी. भाई ने भी इतना तो कह दिया: मै आपा    के चरित्र पर शक कर ही नही सकता. और यह भी सच है,की, उन्हों ने जीजा जी से इजाजात भी माँगी होती,तो वो कौन देनेवाले थे!"
काश! मेरी बहन का भी यही रवैय्या रहता!
इस घटना के कुछ ही दिन पूर्व,मुझे एक सहेली ने दो चित्र नेट पे फॉरवर्ड किये थे. माँ पास ही खड़ी थीं. मैंने उन्हें पहला चित्र दिखाया और पूछा: आपको क्या नज़र आ रहा है इस चित्र में?"
माँ:" किसी बगीचे में एक बेंच है. उसपे एक लड़का, किसी सुनहरी बालवाली लडकी के गले में हाथ डाले बैठा है".
मै: " अच्छा! यह तो जो पीछे से दिख रहा है,वो है....अब इसी तसवीर को सामने से देखिये!"
मैंने अगली तसवीर पे क्लिक किया और माँ हँस ने लगीं! सामने से देखा तो समझे,की,वो सुनहरे बालवाली लडकी नही,बल्कि,एक कुत्ता था!
क्या ख़बर थी,की,मेरे साथ यही होगा? के तसवीर की एक ही बाज़ू देखी जायेगी?

केतकी अब मेरे पीछे पड़ गयी,की,मैंने कुछ ना कुछ अपना काम शुरू करना ही चाहिए. चाहत मेरी भी यही थी. लेकिन हम चाहें,और तुरंत वैसा हो जाये....जीवन में ऐसा तो होता नही. मैंने अपने दिमाग के दरवाज़े पूरी तरह खोल दिए.

केतकी वैसे बेहद चिड चिडी हो गयी थी. बात बात पे उलझ पड़ती. इतनी,की,मेरी माँ,जो उसे अपनी जान से बढ़ के प्यार करतीं,उनसे भी वह कई बार बड़ी बदतमीज़ी से पेश आती. माँ और मै,दोनों ही उसकी इस मानसिक अवस्था को समझ रहे थे. बरसों उस पे ना इंसाफी हुई थी. मुझ पे भी हुई थी,जिसकी वह गवाह थी. और जैसे भी हो,उसने मेरा साथ निभाया था. अवि के समय भी वह और उसका पति,दोनों मेरे साथ खड़े रहे. वरना मै ज़लालत से ही मर जाती.
चंद दिनों बाद केतकी लौट गयी.

फिल्म मेकिंग के दौरान चंद लोगों से परिचय हुआ. बड़ा मन करता की,समाज की ज्वलंत समस्याओं पे छोटी,छोटी फ़िल्में बनाऊं . आर्थिक हालत तो ऐसी न थी,की,बना सकूँ. तलाश में थी की,कोई producer या distributer मिले.

मै भी एक कोष में चली गयी थी. अपने आप से सवाल करती,क्या सच में मुझे,इतनी सहजता से,अपना मन पसंद काम मिल गया है? शायद कोई आंतरिक  शक्ती होती है,जो हमें आगाह कराती है.लेकिन किस बात से मैंने आगाह होना था? हर क़दम फूँक  फूँक के उठा रही थी...!

केतकी दोबारा आनेवाली थी. उसे कुछ अपने काम के लिहाज़ से assignments मिले थे. वह पहले गौरव के पास पहुँची. बाद में मेरे पास. उसका मिज़ाज कुछ और अधिक चिडचिडा महसूस हुआ मुझे....

किसी अन्य शहर वो अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई  को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...

हर हँसी  की  कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू  हैं  कि थमते नही!

क्रमश:

इस कड़ी का काफ़ी मौलिक अंश डिलीट कर दिया गया है...क्षमा करें!