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बुधवार, 28 अगस्त 2013

बिखरे सितारे:९ ) एक अनजाना मोड़


( इसके पहली किश्त में पूजा की मंगनी की बात बताई थी...अब आगे..)

पूजा ने अपनी मंगनी करवाके बचपना किया...जैसे समय बीतता रहा..उसे अपनी गलती महसूस हो रही थी...जो लड़का उस पे जान निछावर करता था,उसकी इज्ज़त तो करती,लेकिन प्यार या कोई आकर्षण ने दिलके द्वारों पे दस्तक नही दी..लड़के की माँ, पूजा पे वारे न्यारे थी..उसके मुँह से अनजाने में निकला शब्द वो तुंरत झेल लेती...ऐसी सास ढूँढे मिलना मुमकिन नही था..लेकिन गर जिसके साथ जीवन बिताना हो, उसके प्रती कोईभी कोमल भावना न हो तो, दोनों ओरसे जीवन नरक बन सकता था.....जब वो लड़का ३/४ चक्कर काट लेता,तब जाके पूजा उससे मिलने आगे आती...और कुछ ना कुछ बहाना बना, १०/१५ मिनटों मे चल देती...वो एक दोराहे पे आ खड़ी थी ...


मंगनी तकरीबन दो साल टिकी रही..वो लड़का जब कभी पूजाको छात्रावास में मिलने आता,पूजा टाल जाती..कभी,नीचे रखवाल दार को कह देती,मै वाचनालय में हूँ...या और कहीँ......' एक उदासी का आलम उसपे घिर आने लगा...कुछ तो निर्णय लेना ही था..वरना लड़के तथा उसके परिवारपे घोर अन्याय था..
पूजा के दिलो दिमाग़ पे इस बात का विपरीत असर होने लगा...स्नातकोत्तर हुई,पहली सेमिस्टर मे महा विद्यालय का रिकॉर्ड तोड़ने वाली पूजा, सालाना इम्तेहान के समय बीमार रहने लगी...पढ़ा हुआ भूल जाने लगी...

fine आर्ट्स में पोस्ट graduation का एक साल ख़त्म होनेवाला था..माँ उसे परिक्षा के पूर्व मिलने आयी और बताया कि, उनके शहर एक आईएस का लड़का assitant कलेक्टर बनके आया है...परिवार से घुल मिल गया है...



इस लड़के से उनके परिवार का परिचय कैसे हुआ?

यही बताने जा रही हूँ...कारण वही हादसा था...जिस बंदूक से गोली चली थी,दादा जी ने वो बन्दूक तुंरत तहसील के दफ्तर में जमा करा दी थी..उसे जमा करके भी दो साल हो गए थे...दर असल,ये बन्दूक, एक जर्मन डॉक्टर ने उन्हें भेंट दी थी...

परवाने लिए उन्हों ने तहसीलदार के दफ्तर में आवेदन पत्र भी भेज रखा था....और ये आवेदन पत्र  उन्हों ने हादसे के दो वर्ष पूर्व भेजा था...!सरकारी कारोबार था..दादाजी जब भी पता करने जाते, कुछ न कुछ बहाने बनाके उन्हें टाल दिया जाता....उस बंदूक को वापस हासिल करने तथा उसका परवाना चाहने, दादा तथा पूजा के पिता, assistant कलेक्टर से मिलने तहसील के दफ्तर मे चक्क्कर काटते रहते..

इन दो ढाई सालों मे कई अफसर आए और गए...काम नही बना..अबके एक IAS का अफसर आया है, शायद, अधिक ईमानदार होगा सोच, दोनों मिलने गए...और...... और वो लड़का विलक्षण प्रभावित हुआ...पिता पुत्र दोनों इज्ज़त दार लोग हैं,ये उसे तफ़तीश के बाद पता चला..दोनोका अंग्रेज़ी भाषा पे प्रभुत्व देखके भी वो दंग रह गया...इस पिछडे,दूर दराज़ ग्राम मे, oxford मे पढ़े लोग? हैरानी की बात थी......धीरे,धीरे पता चलता गया,कि, दादा दादी ने इस देश के ख़ातिर ,सारा ऐशो आराम छोड़ दिया था....बेलगाम के एक गाँव मे आ बसे थे...वो लड़का कर्नाटक कैडर का था....
यही वजह रही कि,उस परिवार के साथ उस अफसर की नज़दीकियाँ बढीं...वो उनके घर भी आने जाने लगा..अपने अन्य मित्रों कोभी( जो आस पास के इलाकों मे कार्यरत थे), कई बार साथ ले आता... ...ये फिल्मों मे दिखायी जानेवाली ज़मीदारों की कहानी नही थी...बल्कि, जब हादसा हुआ, और दादा जी पुलिस स्टेशन पहुँचे, तो स्थानीय पुलिस, जो दादा जी की बेहद इज्ज़त करते थे,उन्हों ने सलाह दी," आप FIR मे दर्ज करें,कि, जिस बंदूक का आपके पास परवाना था, गोली उसी से छूटी...तथा, पहले वकील बुलाके और फिर कुछ भी दर्ज कराएँ....."
लेकिन दादा जी ने साफ़ इनकार कर दिया...उस बात का भी बयान दूँगी...

उस हादसे के कुछ तपसील देना चाहती हूँ...वो बिना परवानेकी बन्दूक दादाजी हमेशा dismantle करके रखते..कभी कबार अलमारी से बाहर निकाल, उसकी साफ़ सफाई करते,और वापस अन्दर चली जाती...गाँव या बस्ती से दूर बने घरमे सुरक्षाके लिए बन्दूक ज़रूरी थी..बल्कि,एक बार किसीकी चींख सुन उन्हों ने हवा में गोली दाग दी थी...चोर एक औरत का हाथ काटते काटते भाग गए....! उसके हाथ से चांदीके भारी कड़े निकल नही रहे थे,तो हाथ काटने चले थे...


दादा जी वचन और अल्फाज़ के सच्चे थे..बोले," क़तई नही..ये तो मेरे पोते-पोतियों पे कितना ग़लत असर होगा..दादा ने झूठ कहा? सवाल ही नही..जो परिणाम होने वाले हों, सो हों..मै वही कहूँगा,जैसा की घटा.."

घटना कैसे घटी थी? दादा जी ने बन्दूक को साफ़ किया..तभी भैंसे दूधने के खातिर ग्वाला चला आया...दादा अपने सामने दूध निकलवाते...ताकि, ग्वाला एक बूँद भी पानी न मिला सके...और दूध मशहूर था..ऐसी मलाई, ऐसा गाढा दूध और कहीँ नही मिलता था...लोग इस ढूध के खतिर क़तार लगाये रहते..

जो व्यक्ती हमेशा हर चीज़ मे बेहद सतर्क रहता, वो बंदूक को वापस बिना अलमारी मे रखे चला गया..गोलियाँ बाहर निकली हुई हटीं..१२ गोलियां तो उन्हों ने उठाके, मेज़ की दराज़ मे रख दी थीं...
पूजा का छोटा भाई जब बाहर निकला तो बरामदे मे पड़ी बंदूक उसे दिखी...वो इतनी छोटी उम्र मे भी बेहतरीन निशाने बाज़ था...गुलेल से एक ही बार मे आम का या चीकू का फल टहनी से अलग कर देता..air gun भी बहुत ख़ूब चलाता..उसके लिए तो परवाने की ज़रूरत नही थी...चूहे भी मार गिराता...जो कि, खेती का नुकसान करते...
उसने जैसे ही बंदूक हाथ मे पकडी, सामने से बस्ती परका एक लड़का आया..उसी की उम्र का..उस लड़के ने भाई से उकसाते हुए कहा,
"चलाओ तो मुझ पे गोली...!"
वो भी खूब जनता था,कि, अगला कभी नही चलाएगा!
दादा जी की एक एहतियातन ताकीद थी...जब कभी निशाना check करना हों, हमेशा, ज़मीन की ओर..कभी ऊपर नही...राजू, (छोटे भाई को सब यही बुलाते) कभी भी किसी के ऊपर गोली नही दाग सकता...
खेलही खेल मे, राजू ने, उस लड़के की पैर की ओर निशाना लिया और बंदूक का ट्रिगर दबा दिया...

जैसा कि, दादा या अन्य परिवार वाले समझते थे,कि, बंदूक मे केवल १२ गोलियाँ होती हैं,वो बात सही नही थी...उसमे १३ गोलियाँ हुआ करतीं..आखरी गोली चल गयी..उस सुनसान खेतमे एक ज़ोरदार धमाका हुआ...पूजा तो थी नही...अन्य परिवारवाले दौडे...उस हादसे को बरसों बीते लेकिन,उस गोली की गूँज कोई नही भूला...या भुला सकता...
पूजा छात्रावास मे थी,जब ये घटना घटी....स्नातक पूर्व पढ़ाई चल रही थी...इसी अनुगूंज का असर पूजा की गैर मौजूदगी होके भी, उसके जीवन पे बेहद गहरा हुआ, ता-उम्र हुआ......उन परिणामों की चर्चा बाद मे....! जब उस IAS अफसर से पूजा के परिवार की मुलाक़ात हुई,तब पूजा, स्नातकोत्तर पढाई की एक साल पूरा कर चुकी थी...


लड़का तो नीचे गिर गया...बंदूक कमर से नीचे चली थी...दादा उसे लेके तुंरत अस्पताल दौडे...

अब एक बाप की नीयत देखिये..जिस बच्चे को गोली लगी थी,उसके बाप को अपने बेटे की जान प्यारी नही थी...और भी तो बच्चे थे..उसे तो पैसे निकलवाने थे! वो जाके छुप गया...चूँकि, दादा को पूरा शहर जानता था, पुलिस केस के पहले ही, दादा जी की सही लेके, surgery शुरू कर दी गयी..दादा जी बाद मे पुलिस स्टेशन पहुँचे..इज्ज़त इतनी थी,कि, हादसे के बारेमे जिस किसी ने सुना,( तबतक फ़ोन तो नही थे), वो सारे उनकी ज़मानत देने दौडे चले आए...

आगे, आगे क्या अंजाम हुए ?? क़िस्मत ने क्या रंग दिखाए? श्रवण कुमार ने शाप तो महाराजा दशरथ को दिया..लेकिन किस, किस ने भुगता?
पूजा के जीवन के दर्दनाक मोड़ तो उसी दागी गयी गोली के साथ शुरू हों गए...या और पीछे जायें,तो जब उसका पाठशाला मे रहते जो हादसा हुआ, तब से शुरू हुए...? तय करना कठिन है...जैसे मालिका आगे बढेगी...पाठक अपने अनुमान लगा लेंगे...कि, इस सवाल का जवाब किसी के पास नही...
एक मासूम, निर्दोष कथा नायिका का भविष्य क्या रहा? क्यों छली गयी एक निष्कपट लडकी ??
क्रमश:


शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

रहीमा 3

(गतांक: हमारी इतनी बात होही रही थी,की,एक फोन आया. फोन लतीफ़ का था. रहीमा ने लिया. दो चार पल बाद मुझे पकडाया...दूसरी ओरसे लतीफ़ चींख रहा था," मै पहले घरको और फिर पेट्रोल पम्प को आग लगाने जा रहा हूँ..साथ तुम्हारे बेटे को भी...बचाना चाहती हो तो अभी लौट आओ...." अब आगे पढ़ें.)

उफ़! क्या हो रहा था ये सब? मेरा दिमाग फिरभी तेज़ गती से काम कर रहा था. मैंने सब से पहले पुलिस कंट्रोल रूम को इस बात की ख़बर दी. पेट्रोल पम्प पे गार्ड देने की इल्तिजा की. पम्प रहीमा के  घर के सामने ही था. लतीफ़ परिवार  और हमारे परिवार का दोस्ताना उस छोटे से शहर में तक़रीबन सभी को मालूम था. मुझे इस तरह पुलिस कंट्रोल रूम से बातें करने में बड़ी शर्मिन्दगी महसूस हो रही थी.

अब आफताब का सवाल?? उसे घर से कैसे निकला जाये? इतने में एक और फोन बजा. फोन ज़ाहिद का था. रहीमा के लिए. वो दोनों में चाहे बरसों संपर्क ना रहा हो उनका प्यार बरक़रार था, इसमें शक नही. और इसमें ज़ाहिद का कोई स्वार्थ नही था. वो रहीमा को केवल ख़ुश देखना चाहता था,जो की नामुमकिन लगता जा रहा था. जब उसे लतीफ़ की बातों का पता चला तो उसने कहा," रहीमा,फ़िक्र ना करो..मै तुम्हारे घर  जाता हूँ..मेरे होते लतीफ़ ऐसी कोई हरकत कर नही सकता...चाहे जो हो जाये.."
लेकिन मैंने और रहीमा,दोनों ने उसे मना किया.

इधर से मै रहीमा के घर  पहुँच गयी.रहीमा को मेरे घरपे ही छोड़ा. पम्प के पास,घर के आगे,अपनी गाडी खड़ी कर मै रहीमा के घर में पहुँची और आफताब को ज़ोर से आवाज़ लगाई. जैसेही वो सामने आया ,उससे कहा," जाओ,अपनी ममा का गाडी से सामान ले आओ. उनकी तबियत ठीक नही है.उन्हें सहारा देके अन्दर ले आओ.",
तबतक लतीफ़ भी मेरे आगे खड़ा हो गया था. मैंने उससे कहा," एक मिनिट रुकिए...मै अभी आती हूँ.." ,कह के मै तेज़ी से घर के बाहर आयी और आफताब को हालात की इत्तेला दी. उसे घर में वापस लौटने से मना कर दिया और अपने साथ मेरे  घर ले आयी.

मेरे घर पहुँचते ही लतीफ़ का फिर फोन आया. इस बार वो मुझ से बात करना चाह रहा था...उसने कहा," मै बहुत शर्मिन्दा हूँ..कुरआन   शरीफ़ की क़सम खाके कहता हूँ,आइन्दा रहीमा को तकलीफ़ पहुँचे ऐसी कोई हरकत नही करुँगा...आप बस रहीमा और बच्चों को वापस ले आयें...!"
उसकी इन कसमों से रहीमा ने मुझे पूरी तरह वाबस्ता किया था.ना जाने कितनी बार उसने इन दिनों ऐसी कसमे खायीं थीं.
फिरभी मैंने कहा," ठीक है, इस वक़्त तो बहुत देर हो चुकी है. मैंने तो अब ड्राईवर की छुट्टी भी कर दी है. कल देखते हैं. "

देर रात मुझे मेरे पती का फोन आया. मैंने उन्हें हालात से वाबस्ता करना चाहा तो उन्हों ने चिढ  के कहा," देखो, इन सब झमेलों  में तुम्हें  पड़ने की ज़रुरत नही. रहीमा को अभी के अभी उसके घर भेज दो. वो जाने और लतीफ़ जाने."
मै: "लेकिन इन हालात   में मै रहीमा को कैसे उसके घर भेज दूं? वो तो उसकी पिटाई कर के उसे अधमरी कर देगा!"
पति:" मैंने जो कहना कह दिया. मुझे अपने घरमे ये मुसीबत नही चाहिए. रहीमा गर सुरक्षा चाहती है तो उसे पुलिस में कम्प्लेंट देने को कहो...उसका भाई है...वो क्या कर रहा है? और उसके अन्य रिश्तेदार?"
मै:" ठीक है..."

कह के मैंने फोन तो रख दिया लेकिन रहीमा  को उसके हाल पे बेसहारा छोड़ देनेका मेरा इरादा क़तई नही था. कुछ देर में एक और फोन आया. फोन रहीमा के भाई का था. रहीमा ने उसे ख़बर तो दी ही थी.
उसने कहा," मै और जीजा जी, जो परसों सुबह तक अमरीका से  मुंबई पहुँच जायेंगे  , परसों दोपहर तक वहाँ पहुँच रहे हैं. तबतक धीरज धरे रहो."

परसों शाम तक तक तो इन्हों ने भी आही जाना था. इनके आने के बाद तो रहीमा को अपने घर पनाह देनेका सवाल ही नही उठता था...मनमे आया," सभी मर्द एक जैसे..हमेशा सब गलती औरत के ही सरपे मढना चाहते हैं..."

दूसरे दिन सुबह की शुरुआत  फिर लतीफ़ के फोन से हुई. उसने कहा ," मै अपनी बंदूक लिए तुम्हारे घर आ रहा हूँ...रहीमा से बात करके रहूँगा...उसे और बच्चों को वापस लाके ही दम लूँगा..."
वैसे बेवक़ूफ़ लतीफ़,इतने नशे में धुत रहता था,की,इन हालात  में वो एक वरदान ही साबित हुआ...! गर उसका शातिर दिमाग काम करता तो मेरे अपने बच्चों को स्कूल से आते जाते अगुवा कर लेना मुश्किल काम नही था...!पहली  और तीसरी जमात के तो बच्चे थे!! वो दोनों किसी पुलिस सुरक्षा में स्कूल नही आते जाते थे. स्कूल घर के करीब था. रास्ता पार करना  उन्हें सिखा दिया गया था. वैसे भी उस रस्ते पे ज़्यादा रहगुज़र  नही होती थी. शुरू के कुछ दिन हमारे मकान के पीछे बने नौकरों के मकानों में से एक महिला साथ चली जाया करती थी.

लतीफ़ की धमकी सुन,मैंने  हमारे गेट पे तैनात पहरे को इत्तेला दी,की,गर कोई बंदूक लेके घर के परिसर में घुसना चाहे तो रोक देना...चाहे वो कोई भी हो और कुछ भी कहे. बंदूक ना भी तो भी, गेट से अन्दर,बिना मेरी इजाज़त के कोई घुस ना पाए. "

क्रमश:

बुधवार, 11 अगस्त 2010

बिखरे सितारे:रात अंधेरी...


पूजा को दिन प्रतिदिन सदमे मिलतेही जा रहे थे...एक से उभर नही पाती और दूसरा बाहें पसारे आगे खड़ा होता....

( गतांक: मैंने कमरे से बाहर निकल जाना चाहा ,लेकिन केतकी मानो चंडिका का रूप धारण कर चुकी थी...उसने मेरी बाँह पकड़ दोबारा कमरे में खींच लिया...उसकी आँखों में आग थी...जिसे मेरे आँसूं चाहकर  भी बुझा न पा रहे थे..अब आगे पढ़ें)

अपने आप को ऐसे मोड़ों पे खड़ा पा रही थी,जहाँ लगातार दिशा भ्रम महसूस होता...समझ नही पाती की,क्या करना चाहिए..किस राह निकलना सही होगा?

केतकी की मानसिकता समझ रही थी..वह लगातार दो पाटों के बीछ पीसी जा रही थी..अमन ने तो  अपनेआप को अलग कर लिया था. ऐसे अशांत माहौल में शांती कैसे ला सकती थी मै? केतकी के लिए दिल तार तार हुआ जा रहा था. बेटी को माँ के आँचल तले भी दर्द से निजात न मिले तो जाये कहाँ?
(ये कहानी नही जीवनी है. किरदार सब के सब असली जीवन से हैं.इस बात को मद्दे  नज़र रख,इस   कड़ी  का  उर्वरित  हिस्सा  मैंने  हटा  दिया  है . )


क्रमश:

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

बिखरे सितारे: गला क्यों न घोंटा?


(गतांक: केतकी,किसी अन्य शहर  अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई  को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...

हर हँसी  की  कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू  हैं  कि थमते नही!
अब आगे:)

मै होश में तो आ गयी उस समय,पर यह कुछ दिनों के लिए एक सिलसिला-सा बन गया. जब मानसिक तनाव बरदाश्त के परे हो जाता तो मै होश खो बैठती. माँ वैसे ही चिंतित रहती,मेरे कारण,अब और अधिक चिंतित हो गयीं.

केतकी गौरव के पास ही थी उन दिनों. एक शाम उसका फोन आया:" माँ, आप इस वक़्त अकेली हैं या आस पास कोई है?"
मै:" इस समय तो कोई नही है..कहो,क्या बात है?"
केतकी:" माँ, पापा,अमन और मै कल दिन में वहाँ पहुँच रहे हैं...."
मै:" लेकिन तुम लोग तो तीन चार दिनों के लिए ऊटी जानेवाले थे न? उसका क्या?"
केतकी:" नही जा रहे अब..पापा कहते हैं,की,अब वो आपके साथ क़तई नही निबाह सकते. वह अमन और मेरे सामने कुछ बातें कहना चाहते हैं...जैसे की,आपको प्रतिमाह क्या दिया जाय...तथा आप कहाँ रहेंगी.."

कुछ देर तो मेरे मूह से अलफ़ाज़ ही नही निकले...शायद आँखें भर आयीं थीं....गला रूंध रहा था. अंत में मैंने कहा:" ठीक है बेटे..जो तुम लोग ठीक समझो..इस समय और कह भी क्या सकती हूँ?"

कैसा तमाशा बना रखा था क़िस्मत ने मेरा! चार दिन भी चैन नही मिल रहा था..गौरव और बच्चे आए. गौरव ने काफ़ी बहकी,बहकी बातें की...

उनकी मुखालिफ़त करना मैंने मौज़ूम न समझा. पत्थर पे सर फोड़ने वाली बात होती वह तो..उसने एक घर मेरे नाम से करने की बात कही. और प्रतिमाह कुछ रक़म. कितनी,यह बात मुझे अब याद नही. वो सब कुछ कागज़ात पे लिख लाया था. एक प्रत  मुझे पकड़ा दी गयी. अगले दिन वह और अमन,दोनों लौट गए. उनके वहाँ रहते मै तीन चार बार बेहोश हो कर ,पता नही क्या बडबडाती रही. अमन ने तो अपने आपको इन सब बातों से अलग थलग कर लिया था.


इसी दौरान एक रोज़ केतकी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा:" पापा अब तुम्हारे नाम मकान नही करना चाहते..उनका कहना है,की,तुम अपना संतुलन खो बैठी हो.."
यह अलफ़ाज़ मै हज़म कर ही रही थी,की,केतकी रोते हुए उठ खड़ी हुई और तमतमाती हुई बोली:" माँ! तुमने पैदा होते ही मेरा गला क्यों न घोंट दिया? आप लोगों ने मेरी ज़िंदगी नरक बना रखी है..." उस बच्ची की नन्हीं,मासूम सूरत मेरे आखों के पानी में तैर गयी...जिसे उसके परिवार ने धुतकारा था...मै ही उसकी रक्षक थी..या मेरा खुदा..लगा,काश, मेरी ही माँ ने मेरा गला घोंट दिया होता!

मै दंग रह गयी ! कभी न सोचा था की,मुझे अपनी लाडली संतान के मूह से यह अलफ़ाज़ सुनने होंगे! पल भर लगा,गर मेरे दादा-दादी कहीँ से  सुन रहे हों,तो उनपे क्या बीतेगी? जिस पूजा तमन्ना,यानी मुझे, पाके उन्हें लगा था,आसमान का सितारा मिल गया..उसी को, उनकी लाडली पोती को,उसकी औलाद यह अलफ़ाज़ सुना रही थी? यह क़िस्मत की कैसी विडम्बना थी? मै,उनकी आखों का सितारा,टूट  टूट के बिखर रही थी..और वो दोनों कुछ न कर सक रहे थे!

मैंने कमरे से बाहर निकल जाना चाह,लेकिन केतकी मानो चंडिका का रूप धारण कर चुकी थी...उसने मेरी बाँह पकड़ दोबारा कमरे में खींच लिया...उसकी आँखों में आग थी...जिसे मेरे आँसूं चाहकर  भी बुझा न पा रहे थे..

क्रमश:

इस कड़ी को भी निजी वजूहात से काफ़ी डिलीट कर दिया गया है...क्षमा करें!

सोमवार, 9 अगस्त 2010

बिखरे सितारे: ६: और भी सिलसिले...


( गतांक:केतकी ने अंत में इस बात की इत्तेला मेरे जेठ जेठानी को दी..उनको गौरव ने नही बताया था..सगे भाई जो नही थे..लेकिन जेठानी ने गौरव को तुरंत फोन किया..और कह दिया:' तुम गर हमारी बहू को घर से निकालोगे,तो,मेरा मरा मूह देखोगे..हम दोनों को उसके चरित्र पे किंचित भी शंका आ नहीं सकती.."
यह बात सुन,गौरव ना जाने क्यों सकपका गया..और उसने उन्हें कहा," ठीक है भाभी,आपकी बात रख  लेता हूँ.."
इस के पश्च्यात वो दोनों मेरे पास पहुँच गए...अब आगे पढ़ें...)

भाभी-भैया आ गए. मुझे अच्छा भी बहुत लगा,की,वो दोनों आए तो..मेरे साथ तो खड़े रहे. लेकिन मेरे समझ से परे था,की,गौरव ने उनकी बात कैसे रख ली?

माँ को भी इसी बात का अचरज था. और माँ ने जो अंदाज़ लगाया,वो भी एकदम सही था. मुझे छोड़ देना गौरव के अहम को ठेस थी. इसके अलावा वह यह भी जताना चाह रहा था,की, पत्नी ने किये छल के बावजूद उसने,बड़ा दिल कर के माफ़ कर दिया..और कोई होता,तो घर से धक्के मार के निकाल देता..भविष्य में मैंने यह अलफ़ाज़ गौरव  के मुख से अनगिनत बार सुने.गर मेरे पास एक भी पर्याय मौजूद होता,तो शायद मै स्वयं उस घर में नही ठहरती. यही हमारे समाज की विडम्बना है.खैर!
भाभी-भैया कुछ रोज़ रुक के लौट गए.

माँ के मन से भी अविश्वास धुंद हट गयी. भाई ने भी इतना तो कह दिया: मै बाजी  के चरित्र पर शक कर ही नही सकता. और यह भी सच है,की, उन्हों ने जीजा जी से इजाजात भी माँगी होती,तो वो कौन देनेवाले थे!"
काश! मेरी बहन का भी यही रवैय्या रहता!
इस घटना के कुछ ही दिन पूर्व,मुझे एक सहेली ने दो चित्र नेट पे फॉरवर्ड किये थे. माँ पास ही खड़ी थीं. मैंने उन्हें पहला चित्र दिखाया और पूछा: आपको क्या नज़र आ रहा है इस चित्र में?"
माँ:" किसी बगीचे में एक बेंच है. उसपे एक लड़का, किसी सुनहरी बालवाली लडकी के गले में हाथ डाले बैठा है".
मै: " अच्छा! यह तो जो पीछे से दिख रहा है,वो है....अब इसी तसवीर को सामने से देखिये!"
मैंने अगली तसवीर पे क्लिक किया और माँ हँस ने लगीं! सामने से देखा तो समझे,की,वो सुनहरे बालवाली लडकी नही,बल्कि,एक कुत्ता था!
क्या ख़बर थी,की,मेरे साथ यही होगा? के तसवीर की एक ही बाज़ू देखी जायेगी?

केतकी अब मेरे पीछे पड़ गयी,की,मैंने कुछ ना कुछ अपना काम शुरू करना ही चाहिए. चाहत मेरी भी यही थी. लेकिन हम चाहें,और तुरंत वैसा हो जाये....जीवन में ऐसा तो होता नही. मैंने अपने दिमाग के दरवाज़े पूरी तरह खोल दिए.

केतकी वैसे बेहद चिड चिडी हो गयी थी. बात बात पे उलझ पड़ती. इतनी,की,मेरी माँ,जो उसे अपनी जान से बढ़ के प्यार करतीं,उनसे भी वह कई बार बड़ी बदतमीज़ी से पेश आती. माँ और मै,दोनों ही उसकी इस मानसिक अवस्था को समझ रहे थे. बरसों उस पे ना इंसाफी हुई थी. मुझ पे भी हुई थी,जिसकी वह गवाह थी. और जैसे भी हो,उसने मेरा साथ निभाया था. अवि के समय भी वह और उसका पति,दोनों मेरे साथ खड़े रहे. वरना मै ज़लालत से ही मर जाती.
चंद दिनों बाद केतकी लौट गयी.

फिल्म मेकिंग के दौरान चंद लोगों से परिचय हुआ. बड़ा मन करता की,समाज की ज्वलंत समस्याओं पे छोटी,छोटी फ़िल्में बनाऊं . आर्थिक हालत तो ऐसी न थी,की,बना सकूँ. तलाश में थी की,कोई producer या distributer मिले.

मै भी एक कोष में चली गयी थी. अपने आप से सवाल करती,क्या सच में मुझे,इतनी सहजता से,अपना मन पसंद काम मिल गया है? शायद कोई आंतरिक  शक्ती होती है,जो हमें आगाह कराती है.लेकिन किस बात से मैंने आगाह होना था? हर क़दम फूँक  फूँक के उठा रही थी...!

केतकी दोबारा आनेवाली थी. उसे कुछ अपने काम के लिहाज़ से assignments मिले थे. वह पहले गौरव के पास पहुँची. बाद में मेरे पास. उसका मिज़ाज कुछ और अधिक चिडचिडा महसूस हुआ मुझे....

किसी अन्य शहर वो अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई  को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...

हर हँसी  की  कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू  हैं  कि थमते नही!

क्रमश:

कड़ी का काफ़ी अंश डिलीट कर दिया है. क्षमा करें !

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

बिखरे सितारे भाग ३ गर्दिशमे क़िस्मत.

बिखरे सितारे भाग ३ गर्दिशमे क़िस्मत.

(गतांक: बेवफाई?..मै बेतहाशा रोने लगी...इस तरह का इलज़ाम मेरी कल्पना के परे था..क्या से क्या हो गया था..जिस परिवार के ख़ातिर ,बच्चों की ख़ातिर मै हर तकलीफ़ सह गयी,उनमे से कोई मेरे पास न था..क्या करूँ? क्या करूँ? कहाँ  जाऊं? कौनसी ऐसी जगह थी इस दुनियामे,जिसे मै अपना कह सकती थी? जहाँ से निकल जाने के लिए मुझे कोई न कहता? मेरी बेटी के ससुरालवाले क्या सोचेंगे..?

यहभी नही जानती थी,की,यह तो एक भयानक सिलसिले की शुरुआत भर है....अब आगे पढ़ें.)

पता नहीं कैसे,पर यह ख़बर माँ को भी मिली..वो भी आ गयीं..एक दिन के लिए बेटा,अमन भी आया..गौरव ने ज़ाहिर है,उसे भी बताया..मै बेहद अपमानित महसूस कर रही थी..जानती थी,की, गौरव अक्सर अपनी बात इस तरह पेश करता है,की, सामने वाला उस वक्तव्य को सच समझ  लेता है... उसकी इस आदत से परिचित लोग भी उसकी बातों में आ जाते हैं.....

मैंने अमन से  पूछा:" अमन, तुझे विश्वास होता है की, मै सच कह रही हूँ? मै अपने आपको पुन: स्थापित करना चाह रही हूँ..लोग जानकारी के लिए फोन करते हैं..मिस कॉल के मै जवाब भी देती हूँ..ऐसे नंबर याद रखना मेरे बसकी बात नही.."
अमन: " पता नही...क्या देर  रातको बात करना ज़रूरी है? ऐसी कौनसी आफत थी,की, रात को बात करनी पड़े?"
अमन का जवाब सुन मुझे सख्त चोंट पहुँची..गौरव ने अपनी पत्नी के बारेमे, अपनी ही औलाद को क्या बताया होगा? मुझे अधिक बहस में पढ़ना नही था..मेरी गरिमा के खिलाफ था..

बरसों बंजारों की तरह दिन काटे थे..कोई गिला शिकवा नही था..गौरव की सेवा निवृत्ती के बाद मैंने सोचा था, मै अपने कितने ही छंद दोबारा शुरू कर सकती हूँ..घर से दूर रह नौकरी करने का निर्णय गौरव का था..गाडी की सर्विसिंग, पूरे घरमे आए दिन होनेवाले मरम्मत के काम, कभी तरखान खोजना है,तो कभी  प्लंबर..सारा ज़िम्मा मुझ पे था..और  ऐसा अविश्वास?

ऐसा नही की, गौरव का यह रूप मुझे पता ही नही था..उसके सामने गर कोई मेरी तारीफ़ कर देता तो ,मै कुछ कहूँ,उससे पहले,वह खुद हँसते,हँसते कह देता," अरे भाई टाइम पास तो करना होता है न! "
अन्यथा मेहमानों को दीवारें चद्दरें आदि की ओर इंगित कर ,मेरी तारीफों के पुल भी बाँध लेता! लोगबाग कह उठते,कितना अभिमान है इसे अपनी पत्नी का! उसके रहते,किसी के सामने ,मै अपनी कला या काम के बारे में मूह खोलती ही न थी..पर यह इलज़ाम तो सारी हदें पार कर गया था..

गुज़रे सालों में मै कई नाकाम कोशिशें कर चुकी थी,की, कमसे कम हफ्ते में एकबार हम सब इकट्ठे बैठ, अपने,अपने मन की बातें एक दूसरे से साझा करें..लेकिन हर बार हश्र यह होता,की, गौरव छोड़ अन्य कोई बात ही न कर पाता..किसी और की बात को तवज्जो देना उसके मिज़ाज में ही नही था..इस हदतक की, गर उसके दोस्त या सहकर्मी मेरे पास कुछ मेसेज छोड़ते तो मुझे उसके मूड की प्रतीक्षा करनी पड़ती या,कागज़ पे लिख उसके PA के पास मै पुर्ज़ा पहुँचा देती..अवकाश प्राप्ती के बाद भी उसके पास सब्र न होता की, मेरी बात सुने..दो तीन बार हताश,हो मैंने इ-मेल लिख दी थी..आपसी संपर्क सहजता से बनाये रखने के मेरे सारे यत्न हमेशा असफल हुए..

माँ को तो मुझपे पूरा विश्वास हुआ..की, जोभी हुआ वो केवल एक हादसा था..मेरी बहन बहनोई उसी शहर में थे जहाँ गौरव को नौकरी मिली थी..अफ़सोस! जो बहन अपने जीजा को अच्छी तरह जानती थी, वो भी उसके झासे में आ गयी..बहन, जो मेरी सबसे अज़ीज़ सहेली थी..

मुझे याद नही,की मै किस तरह दिन काट रही थी..सोचने की शक्ती जवाब दे गयी..यह बात तो माँ ने कही:" इस हदतक जाने की गौरव को सूझी कैसे? "
कुछ हफ़्तों पहले की एक घटना,जिसे मैंने क़तई तूल नहीं दिया,था,याद आई..जूली, मेरी निरक्षर नौकरानी, जिसकी बेटी के पढाई लिखाई.....और बाद में ब्याह का ज़िम्मा मैंने ले रखा था...जो एक विधवा थी....जिसकी गलतियों पे मै अक्सर पर्दा डाल देती थी..के उसे डांट न पड़े..मेरे  पास कॉर्ड लेस फोन ले आई. घुस्से में थी, की,वो शख्स ठीक से अपना परिचय नही दे रहा था..

दूसरी ओरसे,एक व्यक्ती पूछना  चाह रहा था,की, क्या  मै, शहर से काफ़ी दूर बने उसके फार्म हाउस का landscaping कर सकती हूँ?
पल भर सोच,मैंने कहा:" मै डिज़ाइन तो बना दे सकती हूँ..लेकिन मेरे पास अपनी टीम नहीं है...फिलहाल मेरा काम सुझाव तक सीमित है.."
उसने कहा:" गर मै आपको एक टीम बना दूँ,तो आप कभी कभार supervion कर सकती हैं?"
मै:" गर आप मुझे अपना नंबर दें,तो मै कलतक सोच के बता दूँगी...माफी चाहती हूँ,की,तुरंत नही बता सकती..!"

मैंने बात ख़त्म की ही थी,की, माँ का फोन आ गया..मैंने ही उठा लिया और हम दोनों बातें करने लगी...जूली दो तीन बार मुझ से कहने आई की, मै खाना खा लूँ..मै हरबार इशारे से ,'बस पाँच मिनट', जताती रही..
माँ से बातचीत ख़त्म कर मै बाथरूम में हाथ धोने चली गयी...मुझे पहले तो फोन बजने की आवाज़ आई..और फिर जूली के अलफ़ाज़ कान पे पड़े:" मैडम बाथरूम में हैं.."
कुछ पलके बाद:" हाँ..यह फोन बिजी था...वो किसी साहब का फोन था.. हमेशा आता है..ठीक से नाम नही बताता .."
इससे पहले की,मै उसके हाथ से रिसीवर लेलूँ,उसने रख दिया था..मैंने चिढ के  कहा" जूली....! क्या बकवास कर रही है..अव्वल तो मै माताजी से बात कर रही थी..और तुझे क्या ज़रुरत पडी है किसी को यह सब बताने की?"

जूली:" साहब का फोन था..वो पूछ रहे थे,की फोन engage क्यों आ रहा था..तो मैंने बता दिया,की.."
मै:" तू क्या बदतमीज़ी कर रही,है,तुझे कुछ पता भी है?"
उसने मेरे साथ बहस करनी चाही, पर तबतक मैंने पलटके गौरव को फोन लगाया..उसकी आवाज़ परसे ही पता चला की वह बहुत घुस्सेमे है.." मै तुमसे बाद में बात करूँगा',कह उसने उधर से फोन रख दिया..
अचानक मुझे महसूस हुआ,की, हो न हो, इस तरह की गलत फहमी में अबके जूली का भी हाथ है..
पर क्या सिर्फ उसका था?

इस प्रसंग से तो मै किसी तरह उभरी..मेरे भाई और बहनोई,दोनों ही ने गौरव को काफ़ी समझाया..इतने सालों में पहली बार,मेरे भाई  ने अपना मूह खोला था..मुझे अपने घर और जीवन से रफा दफा करने की बात उस समय तो गौरव ने नही दोहराई....क्या ख़बर थी,की,एक और,इससे कहीँ अधिक  भयानक प्रसंग मेरे इंतज़ार में था..??
क्रमश:

रविवार, 13 जून 2010

बिखरे सितारे: ६: और भी सिलसिले...

( गतांक:केतकी ने अंत में इस बात की इत्तेला मेरे जेठ जेठानी को दी..उनको गौरव ने नही बताया था..सगे भाई जो नही थे..लेकिन जेठानी ने गौरव को तुरंत फोन किया..और कह दिया:' तुम गर हमारी बहू को घर से निकालोगे,तो,मेरा मरा मूह देखोगे..हम दोनों को उसके चरित्र पे किंचित भी शंका आ नहीं सकती.."
यह बात सुन,गौरव ना जाने क्यों सकपका गया..और उसने उन्हें कहा," ठीक है भाभी,आपकी बात रख  लेता हूँ.."
इस के पश्च्यात वो दोनों मेरे पास पहुँच गए...अब आगे पढ़ें...)

भाभी-भैया आ गए. मुझे अच्छा भी बहुत लगा,की,वो दोनों आए तो..मेरे साथ तो खड़े रहे. लेकिन मेरे समझ से परे था,की,गौरव ने उनकी बात कैसे रख ली?

माँ को भी इसी बात का अचरज था. और माँ ने जो अंदाज़ लगाया,वो भी एकदम सही था. मुझे छोड़ देना गौरव के अहम को ठेस थी. इसके अलावा वह यह भी जताना चाह रहा था,की, पत्नी ने किये छल के बावजूद उसने,बड़ा दिल कर के माफ़ कर दिया..और कोई होता,तो घर से धक्के मार के निकाल देता..भविष्य में मैंने यह अलफ़ाज़ गौतम के मुख से अनगिनत बार सुने.गर मेरे पास एक भी पर्याय मौजूद होता,तो शायद मै स्वयं उस घर में नही ठहरती. यही हमारे समाज की विडम्बना है.खैर!
भाभी-भैया कुछ रोज़ रुक के लौट गए.

माँ के मन से भी अविश्वास धुंद हट गयी. भाई ने भी इतना तो कह दिया: मै आपा    के चरित्र पर शक कर ही नही सकता. और यह भी सच है,की, उन्हों ने जीजा जी से इजाजात भी माँगी होती,तो वो कौन देनेवाले थे!"
काश! मेरी बहन का भी यही रवैय्या रहता!
इस घटना के कुछ ही दिन पूर्व,मुझे एक सहेली ने दो चित्र नेट पे फॉरवर्ड किये थे. माँ पास ही खड़ी थीं. मैंने उन्हें पहला चित्र दिखाया और पूछा: आपको क्या नज़र आ रहा है इस चित्र में?"
माँ:" किसी बगीचे में एक बेंच है. उसपे एक लड़का, किसी सुनहरी बालवाली लडकी के गले में हाथ डाले बैठा है".
मै: " अच्छा! यह तो जो पीछे से दिख रहा है,वो है....अब इसी तसवीर को सामने से देखिये!"
मैंने अगली तसवीर पे क्लिक किया और माँ हँस ने लगीं! सामने से देखा तो समझे,की,वो सुनहरे बालवाली लडकी नही,बल्कि,एक कुत्ता था!
क्या ख़बर थी,की,मेरे साथ यही होगा? के तसवीर की एक ही बाज़ू देखी जायेगी?

केतकी अब मेरे पीछे पड़ गयी,की,मैंने कुछ ना कुछ अपना काम शुरू करना ही चाहिए. चाहत मेरी भी यही थी. लेकिन हम चाहें,और तुरंत वैसा हो जाये....जीवन में ऐसा तो होता नही. मैंने अपने दिमाग के दरवाज़े पूरी तरह खोल दिए.

केतकी वैसे बेहद चिड चिडी हो गयी थी. बात बात पे उलझ पड़ती. इतनी,की,मेरी माँ,जो उसे अपनी जान से बढ़ के प्यार करतीं,उनसे भी वह कई बार बड़ी बदतमीज़ी से पेश आती. माँ और मै,दोनों ही उसकी इस मानसिक अवस्था को समझ रहे थे. बरसों उस पे ना इंसाफी हुई थी. मुझ पे भी हुई थी,जिसकी वह गवाह थी. और जैसे भी हो,उसने मेरा साथ निभाया था. अवि के समय भी वह और उसका पति,दोनों मेरे साथ खड़े रहे. वरना मै ज़लालत से ही मर जाती.
चंद दिनों बाद केतकी लौट गयी.

फिल्म मेकिंग के दौरान चंद लोगों से परिचय हुआ. बड़ा मन करता की,समाज की ज्वलंत समस्याओं पे छोटी,छोटी फ़िल्में बनाऊं . आर्थिक हालत तो ऐसी न थी,की,बना सकूँ. तलाश में थी की,कोई producer या distributer मिले.

मै भी एक कोष में चली गयी थी. अपने आप से सवाल करती,क्या सच में मुझे,इतनी सहजता से,अपना मन पसंद काम मिल गया है? शायद कोई आंतरिक  शक्ती होती है,जो हमें आगाह कराती है.लेकिन किस बात से मैंने आगाह होना था? हर क़दम फूँक  फूँक के उठा रही थी...!

केतकी दोबारा आनेवाली थी. उसे कुछ अपने काम के लिहाज़ से assignments मिले थे. वह पहले गौरव के पास पहुँची. बाद में मेरे पास. उसका मिज़ाज कुछ और अधिक चिडचिडा महसूस हुआ मुझे....

किसी अन्य शहर वो अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई  को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...

हर हँसी  की  कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू  हैं  कि थमते नही!

क्रमश:

इस कड़ी का काफ़ी मौलिक अंश डिलीट कर दिया गया है...क्षमा करें!