(गतांक: केतकी,किसी अन्य शहर अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...
हर हँसी की कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू हैं कि थमते नही!
अब आगे:)
मै होश में तो आ गयी उस समय,पर यह कुछ दिनों के लिए एक सिलसिला-सा बन गया. जब मानसिक तनाव बरदाश्त के परे हो जाता तो मै होश खो बैठती. माँ वैसे ही चिंतित रहती,मेरे कारण,अब और अधिक चिंतित हो गयीं.
केतकी गौरव के पास ही थी उन दिनों. एक शाम उसका फोन आया:" माँ, आप इस वक़्त अकेली हैं या आस पास कोई है?"
मै:" इस समय तो कोई नही है..कहो,क्या बात है?"
केतकी:" माँ, पापा,अमन और मै कल दिन में वहाँ पहुँच रहे हैं...."
मै:" लेकिन तुम लोग तो तीन चार दिनों के लिए ऊटी जानेवाले थे न? उसका क्या?"
केतकी:" नही जा रहे अब..पापा कहते हैं,की,अब वो आपके साथ क़तई नही निबाह सकते. वह अमन और मेरे सामने कुछ बातें कहना चाहते हैं...जैसे की,आपको प्रतिमाह क्या दिया जाय...तथा आप कहाँ रहेंगी.."
कुछ देर तो मेरे मूह से अलफ़ाज़ ही नही निकले...शायद आँखें भर आयीं थीं....गला रूंध रहा था. अंत में मैंने कहा:" ठीक है बेटे..जो तुम लोग ठीक समझो..इस समय और कह भी क्या सकती हूँ?"
कैसा तमाशा बना रखा था क़िस्मत ने मेरा! चार दिन भी चैन नही मिल रहा था..गौरव और बच्चे आए. गौरव ने काफ़ी बहकी,बहकी बातें की
उनकी मुखालिफ़त करना मैंने मौज़ूम न समझा. पत्थर पे सर फोड़ने वाली बात होती वह तो..उसने एक घर मेरे नाम से करने की बात कही. और प्रतिमाह कुछ रक़म. कितनी,यह बात मुझे अब याद नही. वो सब कुछ कागज़ात पे लिख लाया था. एक प्रत मुझे पकड़ा दी गयी. अगले दिन वह और अमन,दोनों लौट गए. उनके वहाँ रहते मै तीन चार बार बेहोश हो कर ,पता नही क्या बडबडाती रही. अमन ने तो अपने आपको इन सब बातों से अलग थलग कर लिया था.
.
इसी दौरान एक रोज़ केतकी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा:" पापा अब तुम्हारे नाम मकान नही करना चाहते..उनका कहना है,की,तुम अपना संतुलन खो बैठी हो.."
यह अलफ़ाज़ मै हज़म कर ही रही थी,की,केतकी रोते हुए उठ खड़ी हुई और तमतमाती हुई बोली:" माँ! तुमने पैदा होते ही मेरा गला क्यों न घोंट दिया? आप लोगों ने मेरी ज़िंदगी नरक बना रखी है..." उस बच्ची की नन्हीं,मासूम सूरत मेरे आखों के पानी में तैर गयी...जिसे उसके परिवार ने धुतकारा था...मै ही उसकी रक्षक थी..या मेरा खुदा..लगा,काश, मेरी ही माँ ने मेरा गला घोंट दिया होता!
मै दंग रह गयी ! कभी न सोचा था की,मुझे अपनी लाडली संतान के मूह से यह अलफ़ाज़ सुनने होंगे! पल भर लगा,गर मेरे दादा-दादी कहीँ से सुन रहे हों,तो उनपे क्या बीतेगी? जिस पूजा तमन्ना,यानी मुझे, पाके उन्हें लगा था,आसमान का सितारा मिल गया..उसी को, उनकी लाडली पोती को,उसकी औलाद यह अलफ़ाज़ सुना रही थी? यह क़िस्मत की कैसी विडम्बना थी? मै,उनकी आखों का सितारा,टूट टूट के बिखर रही थी..और वो दोनों कुछ न कर सक रहे थे!
मैंने कमरे से बाहर निकल जाना चाह,लेकिन केतकी मानो चंडिका का रूप धारण कर चुकी थी...उसने मेरी बाँह पकड़ दोबारा कमरे में खींच लिया...उसकी आँखों में आग थी...जिसे मेरे आँसूं चाहकर भी बुझा न पा रहे थे..
क्रमश:
इस कड़ी का काफ़ी अंश डिलीट कर दिया गया है ..क्षमा करें !
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बुधवार, 16 जून 2010
रविवार, 16 मई 2010
बिखरे सितारे:अध्याय ३इल्ज़ामे बेवफाई..
(गतांक :बैठे,बैठे एक दिन मैंने किसी नेट वर्क पे अपना वर्क प्रोफाइल डाल दिया...मै जो कुछ करती,वो सब लिखा..और मेरा contact नंबर भी दिया ....सोचा, गर फ्री lancing का तरीका अपना के काम किया जाय तो ठीक रहेगा..नही पता था,की, मुझे इसके क्या परिणाम भुगतने पड़ेंगे..ख्वाबो-ख़याल में जो नही सोची थी, ऐसी परेशानियों का एक सिलसिला मेरे इंतज़ार में था...अब आगे).
जीवन के इस हिस्से पे लिखना सबसे अधिक कठिन है मेरे लिए..इतनी ठहरी हुई ज़िंदगी..कितने छंद रहे मेरे..लेकिन इतनी लम्बी कालावधी के बाद इन्हीं छंदों को बढ़ाते हुए व्यावसायिक रूप देना नामुमकिन-सा नज़र आ रहा था मुझे..
केतकी के मेल का रोज़ इंतज़ार रहता मुझे..नही,उसकी शादी के बाद,उसकी कभी चिंता नही हुई मुझे..चश्मे-बद-दूर! उसका हमसफ़र बेहद संजीदा था..है..बहुत खुला,दोस्ती भरा रिश्ता..लेकिन वो इतनी दूर..मेरे पहुँच के परे लगती मुझे,की,मै अपनेआप को बेबस महसूस करती..जानती थी की,मेरी सेहत देखते हुए,मै उसके घर कभी न जा पाऊँगी..
ऐसी ही एक तनहा रात ....करवटें बदल,बदल बीत रही थी...अंत में मै उठी और इस रचना में अपना दर्द उंडेल दिया..बहुत दिनों से उसकी कोई मेल मुझे नही मिली थी...मन बहुत ही उदास था..
तुझसे जुदा होके,
जुदा हूँ,मै ख़ुद से ,
यादमे तेरी, जबभी,
होती हैं नम, पलकें मेरी,
भीगता है सिरहाना,
खुश रहे तू सदा,
साथ आहके एक,
निकलती है ये दुआ
जहाँ तेरा मुखड़ा नही,
वो आशियाँ मेरा नही,
इस घरमे झाँकती
किरणों मे उजाला नही!
चीज़ हो सिर्फ़ कोई ,
उजाले जैसी, हो जोभी,
मुझे तसल्ली नही!
वार दूँ, दुनिया सारी,
तुझपे मेरी,लम्हा घड़ी,
तू नज़र तो आए सही,
कहाँ है मेरी लाडली..
ये आँखें भीगी, भीगी,
कर लेती हूँ बंदभी,
तू यहाँसे हटती नही...!
मेरी गिरती हुई मानसिक अवस्था को देख, माँ ने ज़िद की के मै किसी अच्छे मानसोपचार तग्य के पास जाके सलाह मशवरा लूँ.. मै राज़ी हो गयी ..दवाईयाँ भी शुरू हो गयीं..अपनी नानी से मिलने डॉक्टर हर हफ्ते हमारे घरके करीब आते रहते..वहाँ से मै अपना ड्राईवर गाडी भेज अपने यहाँ बुला लेती. उनका कहीँ क्लिनिक नही था..या तो वो अपने घरपे मरीज़ को देखते या फिर मरीज़ के घर जाते..
मैंने जिस नेटवर्क पे अपना वर्क प्रोफाइल डाला था,वहाँ से तो निराशाही हाथ लग रही थी..कई बार बकवास पोस्ट्स आती और उन्हें डिलीट करने के लिहाज़ से मै उसे खोल लिया करती..मैंने चंद दिनों के भीतर वहाँ से अपना फोन नम्बर तो हटा दिया था..लेकिन कुछ लोगों के हाथ वह लग गया था..पर यह भी सच था..मेरा नम्बर हासिल करना कठिन नही था..मै अपने काम के लिहाज़ से मौक़ा मिलने पे,प्रेज़ेंटेशन देती रहती...अपने विज़िटिंग कार्ड्स भी देती रहती..कई बार मेरी कुछ गद्य/पद्य रचनाएँ, किताब या पत्रिकाओं के ज़रिये किसी के हाथ लग जाती..कभी,कभी सम्मलेन में सहभागी होने के लिए भी फोन आते..
एक दिन गौरव के रहते एक फोन आया और उसे गौरव ने रिसीव किया..और गुस्से में आके पटक भी दिया..हम दोनों कहीं बाहर जानेवाले थे..फोन फिर बजा..फिर गौरव ने उठाया..तमतमा के फिर से पटक दिया..तीसरी बार मै पास खड़ी थी,सो मैंने उठा लिया..किसी सम्मलेन की इत्तेला और आमंत्रण देने के लिए यह फोन बज रहा था..मैंने शांती से जवाब दे दिया:" इस वक़्त मै अपने परिवार के साथ व्यस्त हूँ...आप फिर कभी फोन करें..."मैंने भी रख दिया..
गौरव दुसरे दिन लौट गए..मैंने रात ८ बजेसे लेके ११ बजे तक नियमसे लेखन करना जारी किया था..सलाह मेरे डॉक्टर की थी..उसी दिन रात ९ बजे के करीब एक फोन आया,जिसे मेरी रात दिनकी नौकरानी ने उठाया..जब उसने आके मुझसे कहा,तो मैंने जवाब दिया:" तू उनसे कह दे मै व्यस्त हूँ...कल सुबह १० या ११ बजे फोन करें.."
लेखन ख़त्म कर मै सोने चली गयी.और फोन बजा..मैंने कहा:" माफ़ करें,देर हो गयी है ..सोना चाहती हूँ.."
इतना कह मैंने रिसीवर रख दिया..फोन फिर बजा..इस वक़्त मैंने बिना बात किये बंद कर दिया..यह लैंड लाइन का नंबर था..कुछ रोज़ पहले ही लगा था..उसमे उपलब्ध सुविधाएँ मैंने नही देखी थीं..इन जनाब को पता नही क्या सूझ गयी थी,की,वो करतेही चले जा रहे थे..अंत में मैंने उसे एक रजाई के नीचे दबा दिया..! उसे स्विच ऑफ़ कर सकते हैं,यह दूसरे दिन मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया..मैंने सहज भाव में उन्हें रातवाली घटना बता दी थी..
तीन दिनों बाद गौरव का फिर आना हुआ..हम दोनों किसी दोस्त के घर भोजन के लिए गए..वहाँ देर लगते देख मै पहले निकल आयी...मेरा भाई मुझसे कुछ देर मिलने आना चाह रहा था..हमारी बिल्डिंग के लिफ्ट के बाहर ही भाई और उसके साथ अपनी बहन को भी देख मै कुछ हैरान भी हुई और ख़ुश भी..बहन के आने का मुझे कोई संदेसा,अंदेसा नही था..
हम तीनो जाके मेरे कमरे में बैठ गए..बहन बोली: "आपसे कुछ बात करनी है..जीजाजी का कहना है,की,आप रात बेरात गैर मरदों से बातें करती हैं..लेकिन गर आपको सच में किसी से emotional attachment है,तो हम आपका साथ देंगे.."
मै हैरान रह गयी..बोली:" क्या बात करते हो? ऐसा कुछ भी नही है...! होता तो सबसे पहले तुम दोनों को और माँ को बता देती..किसी सती सावित्री का अभिनय नही कर रही हूँ...मुझे कभी कोई मिलाही नही..!"
मै अपना जुमला ख़त्म ही कर रही थी,की,गौरव वहाँ पहुँच गए...अपने कमरे से कुछ कागज़ के परचे उठा लाये...बोले:" इसपे सभी नंबर और समय दर्ज है...सब अपनी आँखों से देख लो...इन में कई नंबरों की तहकीकात भी हो चुकी है..."
कहते हुए उसने परचे मेरे सामने धर दिए..सच तो यह था,की,उसमे से एकभी नंबर मेरे परिचय का नही था..! इसके अलावा मेरे मोबाईल पे आए और किये गए फोन भी इनके पास दर्ज थे! इन में भी ज़्यादातर नंबर मेरे परिचित नही थे..मैंने गर किये भी होते तो,उन्हें याद रखना मुमकिन न था..
गौरव को मेरी किसी बात पे यक़ीन नही हो रहा था..मेरे छोटे भाई बहन, घरकी नौकरानी, ड्राईवर ...इन सब के आगे मुझे ज़लील करने से पहले गौरव ने एक बार सीधे मुझसे बात तो करनी थी..यह बातें मेरे मन ही में रह गयीं...सुबह तडके गौरव चला गया...और कह गया की,अब वो मुझ से रिश्ता रखना नही चाहता..
दिनमे ११ बजे डॉक्टर आने वाले थे..उस समय भाई वहीँ था...डॉक्टर से बोला:" मै अब जाता हूँ...शायद यह मेरे सामने खुलके बात नही करेगी.."
मैंने तो बिस्तर ही पकड़ लिया था..सर दर्द से फटा जा रहा था..पर अपने भाई को मैंने रोक लिया,कहा:" तू कहीँ नही जाएगा...यहीं बैठ..मुझे कुछ छुपाना नही है..छुपाने जैसा कुछ हैही नही..!"
मै बेतहाशा रोने लगी...इस तरह का इलज़ाम मेरी कल्पना के परे था..क्या से क्या हो गया था..जिस परिवार के ख़ातिर ,बच्चों की ख़ातिर मै हर तकलीफ़ सह गयी,उनमे से कोई मेरे पास न था..क्या करूँ? क्या करूँ? कहाँ जाऊं? कौनसी ऐसी जगह थी इस दुनियामे,जिसे मै अपना कह सकती थी? जहाँ से निकल जाने के लिए मुझे कोई न कहता? मेरी बेटी के ससुरालवाले क्या सोचेंगे..?
यहभी नही जानती थी,की,यह तो एक भयानक सिलसिले की शुरुआत भर है....
क्रमश:
जीवन के इस हिस्से पे लिखना सबसे अधिक कठिन है मेरे लिए..इतनी ठहरी हुई ज़िंदगी..कितने छंद रहे मेरे..लेकिन इतनी लम्बी कालावधी के बाद इन्हीं छंदों को बढ़ाते हुए व्यावसायिक रूप देना नामुमकिन-सा नज़र आ रहा था मुझे..
केतकी के मेल का रोज़ इंतज़ार रहता मुझे..नही,उसकी शादी के बाद,उसकी कभी चिंता नही हुई मुझे..चश्मे-बद-दूर! उसका हमसफ़र बेहद संजीदा था..है..बहुत खुला,दोस्ती भरा रिश्ता..लेकिन वो इतनी दूर..मेरे पहुँच के परे लगती मुझे,की,मै अपनेआप को बेबस महसूस करती..जानती थी की,मेरी सेहत देखते हुए,मै उसके घर कभी न जा पाऊँगी..
ऐसी ही एक तनहा रात ....करवटें बदल,बदल बीत रही थी...अंत में मै उठी और इस रचना में अपना दर्द उंडेल दिया..बहुत दिनों से उसकी कोई मेल मुझे नही मिली थी...मन बहुत ही उदास था..
तुझसे जुदा होके,
जुदा हूँ,मै ख़ुद से ,
यादमे तेरी, जबभी,
होती हैं नम, पलकें मेरी,
भीगता है सिरहाना,
खुश रहे तू सदा,
साथ आहके एक,
निकलती है ये दुआ
जहाँ तेरा मुखड़ा नही,
वो आशियाँ मेरा नही,
इस घरमे झाँकती
किरणों मे उजाला नही!
चीज़ हो सिर्फ़ कोई ,
उजाले जैसी, हो जोभी,
मुझे तसल्ली नही!
वार दूँ, दुनिया सारी,
तुझपे मेरी,लम्हा घड़ी,
तू नज़र तो आए सही,
कहाँ है मेरी लाडली..
ये आँखें भीगी, भीगी,
कर लेती हूँ बंदभी,
तू यहाँसे हटती नही...!
मेरी गिरती हुई मानसिक अवस्था को देख, माँ ने ज़िद की के मै किसी अच्छे मानसोपचार तग्य के पास जाके सलाह मशवरा लूँ.. मै राज़ी हो गयी ..दवाईयाँ भी शुरू हो गयीं..अपनी नानी से मिलने डॉक्टर हर हफ्ते हमारे घरके करीब आते रहते..वहाँ से मै अपना ड्राईवर गाडी भेज अपने यहाँ बुला लेती. उनका कहीँ क्लिनिक नही था..या तो वो अपने घरपे मरीज़ को देखते या फिर मरीज़ के घर जाते..
मैंने जिस नेटवर्क पे अपना वर्क प्रोफाइल डाला था,वहाँ से तो निराशाही हाथ लग रही थी..कई बार बकवास पोस्ट्स आती और उन्हें डिलीट करने के लिहाज़ से मै उसे खोल लिया करती..मैंने चंद दिनों के भीतर वहाँ से अपना फोन नम्बर तो हटा दिया था..लेकिन कुछ लोगों के हाथ वह लग गया था..पर यह भी सच था..मेरा नम्बर हासिल करना कठिन नही था..मै अपने काम के लिहाज़ से मौक़ा मिलने पे,प्रेज़ेंटेशन देती रहती...अपने विज़िटिंग कार्ड्स भी देती रहती..कई बार मेरी कुछ गद्य/पद्य रचनाएँ, किताब या पत्रिकाओं के ज़रिये किसी के हाथ लग जाती..कभी,कभी सम्मलेन में सहभागी होने के लिए भी फोन आते..
एक दिन गौरव के रहते एक फोन आया और उसे गौरव ने रिसीव किया..और गुस्से में आके पटक भी दिया..हम दोनों कहीं बाहर जानेवाले थे..फोन फिर बजा..फिर गौरव ने उठाया..तमतमा के फिर से पटक दिया..तीसरी बार मै पास खड़ी थी,सो मैंने उठा लिया..किसी सम्मलेन की इत्तेला और आमंत्रण देने के लिए यह फोन बज रहा था..मैंने शांती से जवाब दे दिया:" इस वक़्त मै अपने परिवार के साथ व्यस्त हूँ...आप फिर कभी फोन करें..."मैंने भी रख दिया..
गौरव दुसरे दिन लौट गए..मैंने रात ८ बजेसे लेके ११ बजे तक नियमसे लेखन करना जारी किया था..सलाह मेरे डॉक्टर की थी..उसी दिन रात ९ बजे के करीब एक फोन आया,जिसे मेरी रात दिनकी नौकरानी ने उठाया..जब उसने आके मुझसे कहा,तो मैंने जवाब दिया:" तू उनसे कह दे मै व्यस्त हूँ...कल सुबह १० या ११ बजे फोन करें.."
लेखन ख़त्म कर मै सोने चली गयी.और फोन बजा..मैंने कहा:" माफ़ करें,देर हो गयी है ..सोना चाहती हूँ.."
इतना कह मैंने रिसीवर रख दिया..फोन फिर बजा..इस वक़्त मैंने बिना बात किये बंद कर दिया..यह लैंड लाइन का नंबर था..कुछ रोज़ पहले ही लगा था..उसमे उपलब्ध सुविधाएँ मैंने नही देखी थीं..इन जनाब को पता नही क्या सूझ गयी थी,की,वो करतेही चले जा रहे थे..अंत में मैंने उसे एक रजाई के नीचे दबा दिया..! उसे स्विच ऑफ़ कर सकते हैं,यह दूसरे दिन मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया..मैंने सहज भाव में उन्हें रातवाली घटना बता दी थी..
तीन दिनों बाद गौरव का फिर आना हुआ..हम दोनों किसी दोस्त के घर भोजन के लिए गए..वहाँ देर लगते देख मै पहले निकल आयी...मेरा भाई मुझसे कुछ देर मिलने आना चाह रहा था..हमारी बिल्डिंग के लिफ्ट के बाहर ही भाई और उसके साथ अपनी बहन को भी देख मै कुछ हैरान भी हुई और ख़ुश भी..बहन के आने का मुझे कोई संदेसा,अंदेसा नही था..
हम तीनो जाके मेरे कमरे में बैठ गए..बहन बोली: "आपसे कुछ बात करनी है..जीजाजी का कहना है,की,आप रात बेरात गैर मरदों से बातें करती हैं..लेकिन गर आपको सच में किसी से emotional attachment है,तो हम आपका साथ देंगे.."
मै हैरान रह गयी..बोली:" क्या बात करते हो? ऐसा कुछ भी नही है...! होता तो सबसे पहले तुम दोनों को और माँ को बता देती..किसी सती सावित्री का अभिनय नही कर रही हूँ...मुझे कभी कोई मिलाही नही..!"
मै अपना जुमला ख़त्म ही कर रही थी,की,गौरव वहाँ पहुँच गए...अपने कमरे से कुछ कागज़ के परचे उठा लाये...बोले:" इसपे सभी नंबर और समय दर्ज है...सब अपनी आँखों से देख लो...इन में कई नंबरों की तहकीकात भी हो चुकी है..."
कहते हुए उसने परचे मेरे सामने धर दिए..सच तो यह था,की,उसमे से एकभी नंबर मेरे परिचय का नही था..! इसके अलावा मेरे मोबाईल पे आए और किये गए फोन भी इनके पास दर्ज थे! इन में भी ज़्यादातर नंबर मेरे परिचित नही थे..मैंने गर किये भी होते तो,उन्हें याद रखना मुमकिन न था..
गौरव को मेरी किसी बात पे यक़ीन नही हो रहा था..मेरे छोटे भाई बहन, घरकी नौकरानी, ड्राईवर ...इन सब के आगे मुझे ज़लील करने से पहले गौरव ने एक बार सीधे मुझसे बात तो करनी थी..यह बातें मेरे मन ही में रह गयीं...सुबह तडके गौरव चला गया...और कह गया की,अब वो मुझ से रिश्ता रखना नही चाहता..
दिनमे ११ बजे डॉक्टर आने वाले थे..उस समय भाई वहीँ था...डॉक्टर से बोला:" मै अब जाता हूँ...शायद यह मेरे सामने खुलके बात नही करेगी.."
मैंने तो बिस्तर ही पकड़ लिया था..सर दर्द से फटा जा रहा था..पर अपने भाई को मैंने रोक लिया,कहा:" तू कहीँ नही जाएगा...यहीं बैठ..मुझे कुछ छुपाना नही है..छुपाने जैसा कुछ हैही नही..!"
मै बेतहाशा रोने लगी...इस तरह का इलज़ाम मेरी कल्पना के परे था..क्या से क्या हो गया था..जिस परिवार के ख़ातिर ,बच्चों की ख़ातिर मै हर तकलीफ़ सह गयी,उनमे से कोई मेरे पास न था..क्या करूँ? क्या करूँ? कहाँ जाऊं? कौनसी ऐसी जगह थी इस दुनियामे,जिसे मै अपना कह सकती थी? जहाँ से निकल जाने के लिए मुझे कोई न कहता? मेरी बेटी के ससुरालवाले क्या सोचेंगे..?
यहभी नही जानती थी,की,यह तो एक भयानक सिलसिले की शुरुआत भर है....
क्रमश:
मंगलवार, 30 मार्च 2010
बिखरे सितारे 13: जुदाई
(पूजा को हमेशा अपने पती से छुपके केतकी की ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता. और बेचारी की ज़रूरतें ही कितनी-सी थी? कई बार तो उसे भूखे पेट सो जाना पड़ता! छात्रावास का भोजनालय, केतकी जबतक लौटती, बंद हो जाता और आसपास खान पान की कोई सुविधा नहीं थी.
केतकी वास्तुशास्त्र के ३रे सालमे आ गयी और...अब आगे पढ़ें...)
.....और अमन बी.कॉम के प्रथम वर्षमे. अमन अपने माता पिताके साथ रहता था. जब गौरव का तबादला हुआ तब अमन १२ वी कक्षा में था. उस साल उसे ३ महाविद्यालय बदलने पड़े! खैर!
वास्तुशाश्त्र के ३ रे वर्ष में जब एक बार केतकी अपने माँ पिता के पास आई हुई थी तब, उसने अपनी माँ को बताया की, उसे एक लड़का पसंद है. लड़का, राघव, इंजीनियरिंग का course कर रहा था और वो भी ३ रे साल में था. वो केतकी की बचपनकी सहेली, मुग्धा के क्लास में था.
केतकी ने एक दिन राघव की मुलाक़ात अपनी माँ तथा पितासे करवा दी. लड़का वाक़ई मेघावी और ख़ुशमिज़ाज था. अपनी माँ बाप की एकलौती औलाद. पहले तो पूजा समझी उसके माता पिता उसी शहरमे रहते हैं. उसकी खुशीका ठिकाना न रहा, क्योंकि पूजा और गौरव ने सेवा अवकाश के बाद उसी शहर में रहने का फैसला कर लिया था. लेकिन ये पूजाकी यह खुशफहमी ज़्यादा दिन टिकी नहीं. राघव छ्त्रवास में रहके पढ़ रहा था तथा, उसके माता पिता hydarabaad के बाशिंदे थे. फिरभी पूजा ख़ुश ही हुई की, कमसे कम अपने देशमे तो था!
उस साल पूजा और गौरव के विवाह को २५ साल पूरे होनेवाले थे. पूजा हर प्रकारसे अपनी शादी को खुशगवार बनाये रखने का यत्न किया करती. उसने उस समय उनके जहाँ जहाँ तबादले हुए थे, वहाँ के सब मित्र परिवारों को न्योता दिया. कुछ उसकी अपनी स्कूलकी सहेलियाँ भी शामिल थीं. भाई बहन के परिवार भी आए.
शादी की सालगिरह पड़ती इतवारके रोज़ थी,लेकिन शनिवार की रात को मनाने का तय हुआ, की, बाहर से आनेवाले लोगों को लौटने में सुविधा हो. शनिवारको देर रात ,मतलब रातके एक डेढ़ बजे तक कुछ करीबी दोस्त सहेलियाँ बतियाते रहे. मतलब इतवार का दिन शुरू ही हो गया था. बहन आदि दो दिन रुक के लौटने वाले थे.
सुबह को पूजाके कमरेमे कुछ जल्दी ही खिटर पिटर सुनाई दी. पूजा ने आँख खोली तो भी उसके पास खड़ा था...बहन के कंधेपे पर्स थी...माजरा कुछ समझमे नही आया...बहन ने पूजा के हाथ में चाय की प्याली थमाई...पूजा फटी फटी आँखों से सबको देखे जा रही थी..!
भाई बोला: "आपा आप चाय तो पियो!"
पूजा ने दो घूँट लिए और बहनसे बोली:" तू पर्स लटकाए क्यों घूम रही है?"
भाई . ने पीछे से अपनी आपा को गले लगते हुए कहा:"आपा, दादिअम्मा नहीं रहीं...सुबह, सुबह गुज़र गयीं...चलिए जाना है.."
कुछ पल तो पूजा की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई...और फिर उसे एहसास हुआ की, उसके जीवन का एक अध्याय ख़त्म हुआ. उसके दादा तो जिस साल गौरव का यहाँ तबादला हुआ उसी साल चल बसे थे.दादिअम्मा मानो शादी का सालगिरह हो जानेके इन्तेज़ारमे थीं...
वो ज़ारोज़ार रो पडी. चाहे जिस भी उम्र में उसके दादा दादी का निधन हुआ, उन तीनो भाई बहनों के लिए वो एक सपूर्ण अध्याय का समापन था...
जब उनकी गाडियाँ उनके फ़ार्म हाउस के गेट से अन्दर पहुँची तो पूजा के लिए उस घरको बिना दादा दादी के देखना असह्य हो उठा..सच का सामना करना ही था...
चंद रोज़ वहाँ रुक, पूजा लौट आई...गौरव और बच्चे तो उसी रोज़ शामको लौट गए.पूजा ने अपने मनको केतकी के ब्याह के विचारों में लगाने की कोशिश की.
सालगिरह के कुछ रोज़ पहले ही पूजा ने अपनी एक सहेली के साथ मिलके अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी की थी,जो बहुत कामयाब हुई थी. पूजा ख़ुश थी,की, अब उसे एक स्थायी काम मिल गया. उनका चाहे कहीं तबादला हो, उसकी सहेली उसी शहरसे देखरेख करेगी. पूजा ने डिज़ाइन आदिका ज़िम्मा खुदपे ले लिया था..लेकिन चंद ही रोज़ में सहेली ने अपनी मजबूरी बता दी...इतनी माथा पच्ची उसके बस की नही थी.
इधर पूजा को पता चला की, राघव तो अगले साल आगेकी पढाई के लिए अमरीका जानेवाला था....वहीँ नौकरी भी करनेवाला था...तथा, केतकी ने भी आगेकी ( M.arch ) . के लिए वहीँ जानेकी सोच रखी थी. पूजा अंदरही अन्दर टूटने लगी. उसकी लाडली इतनी दूर अपना घोंसला बना लेगी, उसने कभी सोचही नही था...
केतकी का आखरी साल ख़त्म हुआ औरपूजा ने अमरीका जाने की तैय्यारी शुरू कर दी. उसे शिश्यव्रुत्ती भी मिल रही थी. GRE की तैय्यारी करने के लिए वो अपने माँ पिता के साथ रहने चली आई इनटर्न शिप उसने वहीँ से की. एन दिन कंप्यूटर के आगे बैठ केतकी कुछ काम रही थी. पूजा उसके लिए फल काटके ले गयी ..... प्लेट पकडाते हुए उसने पीछेसे केतकी के गले में बाहें डाली और कहा," तुम्ही बच्चे मेरी दुनिया हो..."
केतकी ने एक झटके से उसे परे करते हुए कह दिया," माँ तुम अपनी दुनिया अब हमसे अलग बनाओ...अपनी दुनिया में हमें मत खींचो...अब मुझे पढाई करने दो प्लीज़.."
पूजा झट से हट गयी और अपने कमरे में जाके खूब रोई...उसका मानो जीने का हर सहारा छीन रहा था...वो और और अकेली पड़ती जा रही थी...गौरव तो अपने दफ्तर के काम में व्यस्त रहता...लेकिन वैसे भी औरत के इन कोमल भावों को उसने कब समझा?
उसी समय गौरव फिर एक तबादला हुआ...अबके अमन को भी पीछे छोड़ना पड़ा क्योंकि, उसका M.BA का साल था. इसबार तबादले के पश्चात जो घर मिला वो बेहद बड़ा था...ना अडोस ना पड़ोस...केतकी आती जाती रहती...अब अपनी माँ के साथ उसका बर्ताव बेहद चिडचिडा हो गया था..पूजा का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया था. ...केतकी इन सब बातों को अब बर्दाश्त नही कर पा रही थी. इन सब बातों के लिए उसे उसकी माँ भी उतनीही ज़िम्मेदार लग रही थी जितने के पिता..
जो भी हो माँ तो माँ थी...उसने अपनी जोभी जमा पूंजी गौरव से छुपाके राखी थी,वो केतकी के अमेरिका जानेके खर्च में लगा दी. और फिर वो दिनभी आ गया जब उसे अमरीका जाना था...हवाई अड्डे पे पूजा ,गौरव और केतकी खड़े थे..पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करगी..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी...
क्रमश:
केतकी वास्तुशास्त्र के ३रे सालमे आ गयी और...अब आगे पढ़ें...)
.....और अमन बी.कॉम के प्रथम वर्षमे. अमन अपने माता पिताके साथ रहता था. जब गौरव का तबादला हुआ तब अमन १२ वी कक्षा में था. उस साल उसे ३ महाविद्यालय बदलने पड़े! खैर!
वास्तुशाश्त्र के ३ रे वर्ष में जब एक बार केतकी अपने माँ पिता के पास आई हुई थी तब, उसने अपनी माँ को बताया की, उसे एक लड़का पसंद है. लड़का, राघव, इंजीनियरिंग का course कर रहा था और वो भी ३ रे साल में था. वो केतकी की बचपनकी सहेली, मुग्धा के क्लास में था.
केतकी ने एक दिन राघव की मुलाक़ात अपनी माँ तथा पितासे करवा दी. लड़का वाक़ई मेघावी और ख़ुशमिज़ाज था. अपनी माँ बाप की एकलौती औलाद. पहले तो पूजा समझी उसके माता पिता उसी शहरमे रहते हैं. उसकी खुशीका ठिकाना न रहा, क्योंकि पूजा और गौरव ने सेवा अवकाश के बाद उसी शहर में रहने का फैसला कर लिया था. लेकिन ये पूजाकी यह खुशफहमी ज़्यादा दिन टिकी नहीं. राघव छ्त्रवास में रहके पढ़ रहा था तथा, उसके माता पिता hydarabaad के बाशिंदे थे. फिरभी पूजा ख़ुश ही हुई की, कमसे कम अपने देशमे तो था!
उस साल पूजा और गौरव के विवाह को २५ साल पूरे होनेवाले थे. पूजा हर प्रकारसे अपनी शादी को खुशगवार बनाये रखने का यत्न किया करती. उसने उस समय उनके जहाँ जहाँ तबादले हुए थे, वहाँ के सब मित्र परिवारों को न्योता दिया. कुछ उसकी अपनी स्कूलकी सहेलियाँ भी शामिल थीं. भाई बहन के परिवार भी आए.
शादी की सालगिरह पड़ती इतवारके रोज़ थी,लेकिन शनिवार की रात को मनाने का तय हुआ, की, बाहर से आनेवाले लोगों को लौटने में सुविधा हो. शनिवारको देर रात ,मतलब रातके एक डेढ़ बजे तक कुछ करीबी दोस्त सहेलियाँ बतियाते रहे. मतलब इतवार का दिन शुरू ही हो गया था. बहन आदि दो दिन रुक के लौटने वाले थे.
सुबह को पूजाके कमरेमे कुछ जल्दी ही खिटर पिटर सुनाई दी. पूजा ने आँख खोली तो भी उसके पास खड़ा था...बहन के कंधेपे पर्स थी...माजरा कुछ समझमे नही आया...बहन ने पूजा के हाथ में चाय की प्याली थमाई...पूजा फटी फटी आँखों से सबको देखे जा रही थी..!
भाई बोला: "आपा आप चाय तो पियो!"
पूजा ने दो घूँट लिए और बहनसे बोली:" तू पर्स लटकाए क्यों घूम रही है?"
भाई . ने पीछे से अपनी आपा को गले लगते हुए कहा:"आपा, दादिअम्मा नहीं रहीं...सुबह, सुबह गुज़र गयीं...चलिए जाना है.."
कुछ पल तो पूजा की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई...और फिर उसे एहसास हुआ की, उसके जीवन का एक अध्याय ख़त्म हुआ. उसके दादा तो जिस साल गौरव का यहाँ तबादला हुआ उसी साल चल बसे थे.दादिअम्मा मानो शादी का सालगिरह हो जानेके इन्तेज़ारमे थीं...
वो ज़ारोज़ार रो पडी. चाहे जिस भी उम्र में उसके दादा दादी का निधन हुआ, उन तीनो भाई बहनों के लिए वो एक सपूर्ण अध्याय का समापन था...
जब उनकी गाडियाँ उनके फ़ार्म हाउस के गेट से अन्दर पहुँची तो पूजा के लिए उस घरको बिना दादा दादी के देखना असह्य हो उठा..सच का सामना करना ही था...
चंद रोज़ वहाँ रुक, पूजा लौट आई...गौरव और बच्चे तो उसी रोज़ शामको लौट गए.पूजा ने अपने मनको केतकी के ब्याह के विचारों में लगाने की कोशिश की.
सालगिरह के कुछ रोज़ पहले ही पूजा ने अपनी एक सहेली के साथ मिलके अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी की थी,जो बहुत कामयाब हुई थी. पूजा ख़ुश थी,की, अब उसे एक स्थायी काम मिल गया. उनका चाहे कहीं तबादला हो, उसकी सहेली उसी शहरसे देखरेख करेगी. पूजा ने डिज़ाइन आदिका ज़िम्मा खुदपे ले लिया था..लेकिन चंद ही रोज़ में सहेली ने अपनी मजबूरी बता दी...इतनी माथा पच्ची उसके बस की नही थी.
इधर पूजा को पता चला की, राघव तो अगले साल आगेकी पढाई के लिए अमरीका जानेवाला था....वहीँ नौकरी भी करनेवाला था...तथा, केतकी ने भी आगेकी ( M.arch ) . के लिए वहीँ जानेकी सोच रखी थी. पूजा अंदरही अन्दर टूटने लगी. उसकी लाडली इतनी दूर अपना घोंसला बना लेगी, उसने कभी सोचही नही था...
केतकी का आखरी साल ख़त्म हुआ औरपूजा ने अमरीका जाने की तैय्यारी शुरू कर दी. उसे शिश्यव्रुत्ती भी मिल रही थी. GRE की तैय्यारी करने के लिए वो अपने माँ पिता के साथ रहने चली आई इनटर्न शिप उसने वहीँ से की. एन दिन कंप्यूटर के आगे बैठ केतकी कुछ काम रही थी. पूजा उसके लिए फल काटके ले गयी ..... प्लेट पकडाते हुए उसने पीछेसे केतकी के गले में बाहें डाली और कहा," तुम्ही बच्चे मेरी दुनिया हो..."
केतकी ने एक झटके से उसे परे करते हुए कह दिया," माँ तुम अपनी दुनिया अब हमसे अलग बनाओ...अपनी दुनिया में हमें मत खींचो...अब मुझे पढाई करने दो प्लीज़.."
पूजा झट से हट गयी और अपने कमरे में जाके खूब रोई...उसका मानो जीने का हर सहारा छीन रहा था...वो और और अकेली पड़ती जा रही थी...गौरव तो अपने दफ्तर के काम में व्यस्त रहता...लेकिन वैसे भी औरत के इन कोमल भावों को उसने कब समझा?
उसी समय गौरव फिर एक तबादला हुआ...अबके अमन को भी पीछे छोड़ना पड़ा क्योंकि, उसका M.BA का साल था. इसबार तबादले के पश्चात जो घर मिला वो बेहद बड़ा था...ना अडोस ना पड़ोस...केतकी आती जाती रहती...अब अपनी माँ के साथ उसका बर्ताव बेहद चिडचिडा हो गया था..पूजा का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया था. ...केतकी इन सब बातों को अब बर्दाश्त नही कर पा रही थी. इन सब बातों के लिए उसे उसकी माँ भी उतनीही ज़िम्मेदार लग रही थी जितने के पिता..
जो भी हो माँ तो माँ थी...उसने अपनी जोभी जमा पूंजी गौरव से छुपाके राखी थी,वो केतकी के अमेरिका जानेके खर्च में लगा दी. और फिर वो दिनभी आ गया जब उसे अमरीका जाना था...हवाई अड्डे पे पूजा ,गौरव और केतकी खड़े थे..पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करगी..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी...
क्रमश:
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
बिखरे सितारे-६ तूफ़ान भरी राहें!
गौरव: " तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सांप या बिच्छू ने डंख मार दिया हो...इसकी जान जा रही हो...चीटी के काटने से यह मर थोड़े ही जायेगी?"
पूजा ने उसे जल्दी जल्दी नहला डाला...
बच्ची केवल ३० दिन की थी..आगे पूरी ज़िंदगी पडी थी...पूजाकी आँखों के आगे भविष्य का नज़ारा घूम गया..अब आगे पढ़ें...
२ माह की बच्ची को लेके पूजा बंगलोर अपने नैहर से चली आयी थी.
गुज़रते दिनों के साथ पूजाको रोज़ ही ना जाने कितनीही कठिनाईयों का सामना करना पड़ता! चैन से वो बच्ची को स्तनपान भी न करा पाती..सास की दो मिनट के अन्दर आवाज़ लग जाती:
" तुम जब देखो तब इसे लिए बैठ जाती हो...यहाँ चाहे किसीको चाय चाहिए हो या नाश्ता...तुम्हें तो पहले उस लडकी की पडी रहती है..हमारे घरमे तो ये ३ री लडकी है..अब बेगम साहिबा उठिए और हमें पराठें बना दें! लगता है,तुम्हें और कोई कामही नही...!"
पूजा: बस पाँच मिनट रुक जाएँ आप.. मै तुरंत बना दूँगी...सुबह से ३ बार इसे रोता छोड़ मै उठ गयी हूँ.."
सासूमा :" तो हमपे एहसान किया है? घरके काम तुम नही करोगी तो और कौन?"
गौरव: " सुना नही माँ ने क्या कहा? माँ से बढ़के आज ये हो गयी? रखो इसे नीचे और माँ जो कह रहीं हैं करो.."
बिचारी उस नन्ही-सी जान को फिर एकबार भूखे पेट अपने पलनेमे जाना पड़ा...बेचारी बड़ी करुण सुरमे रोने लगी..
पूजा गरम,गरम पराठे बना अपनी सास को परोसती गयी..
पराठें बन गए तो कुत्तेको घुमाके लानेका आदेश मिला. पूजाने फिर बिनती की:" बच्ची भूक के मारे रोये जा रही है...मुझे १० मिनट देदो, मै घुमा लाऊँगी ..please !
गौरव:" तुमने लडकी को सरपे चढ़ा रखा है...चलो मेरे साथ लिफ्ट में नीचे उतारो, मै दफ्तर निकल पडूँगा, तुम कुत्तेको घुमाके ले आओ...ये भी बाहर जानेके लिए मचल रहा है..."
अंतमे हुआ वही जो गौरव और उसकी सास चाहती!पूजा की आँखें नम होती जा रही थीं..जब भी उसके पलने के पास से पूजा गुज़रती, वो बड़ी आशासे अपनी माँ को देखती...और तवज्जो न पाके रो उठती.
कुत्तेको घुमाने के पश्च्यात उसने सबकी इजाज़त ली तब वो बच्ची को दूध पिला सकी.
एक बार पूजा घरकी बालकॉनी में खड़ी हो, बिटिया को परिंदे दिखा रही थी...वहाँ कौवे भी थे. कुत्तेको कव्वों से बेहद चिढ थी...उसने जैसे ही कव्वे को देखा, उसने ज़ोरदार हमला बोल दिया...बच्ची डर के मारे चींख उठी..पूजा ने उसे अपने काँधों पे चिपकाके वहाँ से हट जाने का सोंचा...लेकिन गौरव ने टांग अड़ा दी:
गौरव:"ये मेरे कुत्तेसे डरती है? देखता हूँ कबतक डरती है..."
कहके उसने कुत्तेको और कव्वे दिखाए...कुत्ता और जोरसे भोंक के हमला बोलने लगा...
अंतमे पूजा गौरव के प्रतिकार करने के बावजूद बच्ची को कमरेमे ले आयी...बच्ची बुरी तरह सहम गयी थी..काँप-सी रही थी..उसे शांत करने के लिए स्तनपान के अलावा और कोई तरीका नही था...जैसे ही बच्ची दूध पीने लगी, गौरव ने एक और तमाशा खड़ा कर दिय!
गौरव: " तुम तो एकदम गाँव की गंवार औरतों की तरह इस चिपकाये फिरती हो!इसे बोतल का दूध पिलाओ..मै देखता हूँ कैसे और कबतक नही पीती.."
उसने बच्ची को पलंग पे डलवाया और पूजाको आदेश दिया:" चलो लाओ दूध बनाके.."
पूजा: " आप तो जानते हैं की ये बोतल से नही पीती, थोड़ी और बड़ी होगी तब पीने लग जाय...!"
गौरव: " जो मै कह रहा हूँ, वैसा करो..अब लाओ ये बोतल मुझे पकडाओ ..तुम्हारेसे गर रोना धोना बर्दाश्त न हो तो दूसरे कमरेमे चली जाओ!"
पूजने गौरव को बोतल पकड़ा दी और सहमी-सी वहीँ पे कोनेमे बैठ गयी..
बच्ची बदहवास-सी अपनी माँ को घूरे जा रही थी..उसकी ओर बाहें फैला रही थी...उसे बोतल से चिढ थी..पूरे एक घंटा ये तमाशा चला ! अंतमे पूजाने बच्ची को गौरव से छीन लिया और कमरा अंदरसे बंद कर दिया.
उस रात नींद में न जाने वो कितनी बार डरके रोते हुए उठी...लेकिन मासूम का प्यार देखो...सुबह अपने पितापे दृष्टी पड़तेही खिल उठी..पूजा की आँखों से चुपचाप नीर बहा..हर गुज़रता दिन न जाने कितनी चुनौतियाँ भरा होता!
सास अक्सर मिलने जुलने वालों से कहती." अरी बड़ी चीवट जात है..पहले दो लड्कोंको खा गयी..इसे जो पैदा होना था..कुलक्षनी है.."
इस मासूम जान की ज़िम्मेदारी अब केवल पूजाकी थी..बीमारी, दावा दारू, हर चीज़ में अडंगा खड़ा हो जाता..इतनीसी बीमारी के लिए कोई डॉक्टर के जाता है?
क्रमश:
पूजा ने उसे जल्दी जल्दी नहला डाला...
बच्ची केवल ३० दिन की थी..आगे पूरी ज़िंदगी पडी थी...पूजाकी आँखों के आगे भविष्य का नज़ारा घूम गया..अब आगे पढ़ें...
२ माह की बच्ची को लेके पूजा बंगलोर अपने नैहर से चली आयी थी.
गुज़रते दिनों के साथ पूजाको रोज़ ही ना जाने कितनीही कठिनाईयों का सामना करना पड़ता! चैन से वो बच्ची को स्तनपान भी न करा पाती..सास की दो मिनट के अन्दर आवाज़ लग जाती:
" तुम जब देखो तब इसे लिए बैठ जाती हो...यहाँ चाहे किसीको चाय चाहिए हो या नाश्ता...तुम्हें तो पहले उस लडकी की पडी रहती है..हमारे घरमे तो ये ३ री लडकी है..अब बेगम साहिबा उठिए और हमें पराठें बना दें! लगता है,तुम्हें और कोई कामही नही...!"
पूजा: बस पाँच मिनट रुक जाएँ आप.. मै तुरंत बना दूँगी...सुबह से ३ बार इसे रोता छोड़ मै उठ गयी हूँ.."
सासूमा :" तो हमपे एहसान किया है? घरके काम तुम नही करोगी तो और कौन?"
गौरव: " सुना नही माँ ने क्या कहा? माँ से बढ़के आज ये हो गयी? रखो इसे नीचे और माँ जो कह रहीं हैं करो.."
बिचारी उस नन्ही-सी जान को फिर एकबार भूखे पेट अपने पलनेमे जाना पड़ा...बेचारी बड़ी करुण सुरमे रोने लगी..
पूजा गरम,गरम पराठे बना अपनी सास को परोसती गयी..
पराठें बन गए तो कुत्तेको घुमाके लानेका आदेश मिला. पूजाने फिर बिनती की:" बच्ची भूक के मारे रोये जा रही है...मुझे १० मिनट देदो, मै घुमा लाऊँगी ..please !
गौरव:" तुमने लडकी को सरपे चढ़ा रखा है...चलो मेरे साथ लिफ्ट में नीचे उतारो, मै दफ्तर निकल पडूँगा, तुम कुत्तेको घुमाके ले आओ...ये भी बाहर जानेके लिए मचल रहा है..."
अंतमे हुआ वही जो गौरव और उसकी सास चाहती!पूजा की आँखें नम होती जा रही थीं..जब भी उसके पलने के पास से पूजा गुज़रती, वो बड़ी आशासे अपनी माँ को देखती...और तवज्जो न पाके रो उठती.
कुत्तेको घुमाने के पश्च्यात उसने सबकी इजाज़त ली तब वो बच्ची को दूध पिला सकी.
एक बार पूजा घरकी बालकॉनी में खड़ी हो, बिटिया को परिंदे दिखा रही थी...वहाँ कौवे भी थे. कुत्तेको कव्वों से बेहद चिढ थी...उसने जैसे ही कव्वे को देखा, उसने ज़ोरदार हमला बोल दिया...बच्ची डर के मारे चींख उठी..पूजा ने उसे अपने काँधों पे चिपकाके वहाँ से हट जाने का सोंचा...लेकिन गौरव ने टांग अड़ा दी:
गौरव:"ये मेरे कुत्तेसे डरती है? देखता हूँ कबतक डरती है..."
कहके उसने कुत्तेको और कव्वे दिखाए...कुत्ता और जोरसे भोंक के हमला बोलने लगा...
अंतमे पूजा गौरव के प्रतिकार करने के बावजूद बच्ची को कमरेमे ले आयी...बच्ची बुरी तरह सहम गयी थी..काँप-सी रही थी..उसे शांत करने के लिए स्तनपान के अलावा और कोई तरीका नही था...जैसे ही बच्ची दूध पीने लगी, गौरव ने एक और तमाशा खड़ा कर दिय!
गौरव: " तुम तो एकदम गाँव की गंवार औरतों की तरह इस चिपकाये फिरती हो!इसे बोतल का दूध पिलाओ..मै देखता हूँ कैसे और कबतक नही पीती.."
उसने बच्ची को पलंग पे डलवाया और पूजाको आदेश दिया:" चलो लाओ दूध बनाके.."
पूजा: " आप तो जानते हैं की ये बोतल से नही पीती, थोड़ी और बड़ी होगी तब पीने लग जाय...!"
गौरव: " जो मै कह रहा हूँ, वैसा करो..अब लाओ ये बोतल मुझे पकडाओ ..तुम्हारेसे गर रोना धोना बर्दाश्त न हो तो दूसरे कमरेमे चली जाओ!"
पूजने गौरव को बोतल पकड़ा दी और सहमी-सी वहीँ पे कोनेमे बैठ गयी..
बच्ची बदहवास-सी अपनी माँ को घूरे जा रही थी..उसकी ओर बाहें फैला रही थी...उसे बोतल से चिढ थी..पूरे एक घंटा ये तमाशा चला ! अंतमे पूजाने बच्ची को गौरव से छीन लिया और कमरा अंदरसे बंद कर दिया.
उस रात नींद में न जाने वो कितनी बार डरके रोते हुए उठी...लेकिन मासूम का प्यार देखो...सुबह अपने पितापे दृष्टी पड़तेही खिल उठी..पूजा की आँखों से चुपचाप नीर बहा..हर गुज़रता दिन न जाने कितनी चुनौतियाँ भरा होता!
सास अक्सर मिलने जुलने वालों से कहती." अरी बड़ी चीवट जात है..पहले दो लड्कोंको खा गयी..इसे जो पैदा होना था..कुलक्षनी है.."
इस मासूम जान की ज़िम्मेदारी अब केवल पूजाकी थी..बीमारी, दावा दारू, हर चीज़ में अडंगा खड़ा हो जाता..इतनीसी बीमारी के लिए कोई डॉक्टर के जाता है?
क्रमश:
सोमवार, 25 जनवरी 2010
बिखरे सितारे! ५: नन्ही कली...
पूर्व भाग: पूजाका दोबारा गर्भ पात हो गया. माँ तथा बहन तब उसके घर पहुँचे थे. पूजाका जीवन, उसका दुःख दर्द उनकी आँखों के आगे एक खुली किताब बन गया. अब आगे पढ़ें.
कुछ दिन बाद माँ और छोटी बहन तो चले गए,लेकिन दिलमे एक गहरा सदमा लेकर. माँ भी समझ नही पा रही थी,की, गर गौरव को इस तरह बर्ताव करना था तो उसने पूजासे ब्याह किया क्यों? खैर...दिन इसी तरह गुज़रते रहे.
एक दिन गौरव खबर लाया की, उसका तबादला इलाहाबाद हो गया है. मन ही मन पूजा ख़ुश हुई. उसे लगा, शायद दिल्ली से बाहर निकल गौरव का रवैय्या बदलेगा. दिल्ली में रहते समय, कई बार किशोर का आमना सामना हो जाता. पूजा के मन में उसके लिए कडवाहट के अलावा कुछ न था पर गौरव के दिल में एक वहम, एक जलन बनी रहती. हर ऐसे समारोह के बाद वो पूजा को ताने ज़रूर सुनाता.
पूजा का दूसरा गर्भपात हुए तकरीबन एक साल होने आया था और उसे फिर से गर्भ नही ठहरा था. उसके ससुराल वालों के लिए यह भी चिंता का विषय बन गया. लेकिन पूजा ने तभी खबर सुना दी. अबके एहतियातन पूजा को दो माह चलने फिरने या सीढ़ी उतरने के लिए मनाई की गयी. पूजा की माँ उसके साथ रहने आ गयी. चौथा माह गुज़र गया तो सबने आश्वस्त होनेकी साँस ली.
पाँचवा माह शुरू हुआ ही था,की, पूजा का nervous ब्रेक डाउन हो गया. उसके मन में एक डर समा गया की, कहीँ घरवालों की कहा सुनी में आके गौरव उसे छोड़ न दे. वो रो रो के गौरव से आश्वासन माँगती और उसे नही मिलता. एक और बात से वह डर गयी. किसी ने भविष्य वाणी कर दी की, पूजा को दो औलाद होगी तथा दोनों बेटे होंगे. पूजा और अधिक डर गयी...सभी परिवार वाले मान के चल रहे थे,की, उसे बेटाही होगा. ...जबकी पूजा मनही मन डरने लगी...कहीँ बेटी हुई तो? उस बच्ची का क्या हश्र होगा? उस निष्पाप जीव को क्या उसके ससुरालवाले अपनाएंगे? क्या उसे वो प्यार मिलेगा जिसकी वो हक़दार होगी?
गुज़रते दिनों के साथ पूजा की मनोदशा और अधिक ख़राब होती गयी. जब प्रसव के दिन करीब आए तो उसकी डॉक्टर ने सिजेरियन की सलाह दी. एक और कारण भी था...गर्भ उलटा था..डॉक्टर को डर लगा की, प्रसव के दौरान गर गर्भ को कुछ हो गया तो पूजा या तो पगला जायेगी या मरही जायेगी..तारीख तय कर ली गयी और इलाहाबाद के सिविल हॉस्पिटल में उसे दाखिल कराया गया. दोपहर तक उसका ऑपरेशन हो गया. जब उसकी आँख खुली तो उसे बेटी होने की खबर मिली. उसके मनमे बच्ची के प्रती प्यार के अलावा अपार करुणा भर गयी..अपनी माँ को खबर सुनाते हुए, गौरव ने कहा,"माँ तुझे सुनके खुशी तो नही होगी..बेटी हुई है.."
बेटीका जीवन अब पूजा के लिए चुनौती बन गया. अस्पताल से पूजा घर लौटी तो नवागत की खुशी के तौरपे किसी के मुह्पे हँसी न थी. एक पूजा की माँ तथा, अंतिम दिनों में आयी बहन थी, जो बेहद ख़ुश थे.पूजा जानती थी, की, उसकी बिटिया का उसके नैहर में खूब स्वागत होगा. भरी गर्मी में ३ दिन का सफ़र कर पूजा अपने नैहर पहुँच गयी. वहाँ उसे पहली बार माँ होने की खुशी हुई.
आनेवाले दिनों में उसका भय सही साबित हुआ...उसे बच्ची को छूने के लिए भी घरवालों इजाज़त लेनी पड़ती. पूजा को अपने नैहर आए कुछ ही दिन हुए थे,की, गौरव के तबादले की खबर उसे ख़त द्वारा मिली. तबादला कर्नाटक में हुआ था. गौरव सामान बाँधने से पूर्व अपनी नयी पोस्ट का मुआयना करने आया. उस समय वो वो पूजा के नैहर आया.
सब नाश्ते की मेज़ पे बैठे हुए थे की, कमरेमे से बच्ची की रोने की ज़ोरदार आवाज़ आयी. पूजा उठने लगी तो गौरव ने कहा:" तुम अपना नाश्ता ख़तम करो तब जाना. अभी मेराभी नाश्ता नही हुआ और तुम चली? कल जन्मी बच्ची से ये असर? तुम्हारा मेरे प्रती रवैय्या ही बदल गया!"
पूजा चुपचाप कुर्सी पे बैठ गयी. पूजा की दादी उठ खड़ी होने लगी तो गौरव ने उन्हें भी रोक दिया...बेचारी दादी...उनके घर में उन्हीं को उठने की इजाज़त नही थी! बच्ची और न जाने कितनी देर रोती गयी, और साथ दादी भी...वो चुपचाप आँसूं बहाती रहीं...पूजा को तो उतनी भी इजाज़त नही थी...जब सबकी चाय ख़त्म हुई तब गौरव ने कहा:
" अब जाओ अपनी लाडली के पास! ऐसे बर्ताव कर रही हो जैसे दुनिया में कोई पहली बार माँ बना हो!"
जो भी हो, पूजा तो पहली बार माँ बनी थी !
जब पूजा कमरेमे गयी और बिटिया को उठाने लगी तो देखा उसपे कई सारी लाल चीटियाँ चिपकी हुई थी...नन्हीं जान उसी के कारण बदहवास होके रो रही थी..!
उसके पीछे,पीछे कमरे में आए गौरव से वह बोली:" इसे तो चीटियों ने डस लिया था, इसीलिये रो रही है..."
गौरव: " तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सांप या बिच्छू ने डंख मार दिया हो...इसकी जान जा रही हो...चीटी के काटने से यह मर थोड़े ही जायेगी?"
पूजा ने उसे जल्दी जल्दी नहला डाला...
बच्ची केवल ३० दिन की थी..आगे पूरी ज़िंदगी पडी थी...पूजाकी आँखों के आगे भविष्य का नज़ारा घूम गया..
क्रमश:
कुछ दिन बाद माँ और छोटी बहन तो चले गए,लेकिन दिलमे एक गहरा सदमा लेकर. माँ भी समझ नही पा रही थी,की, गर गौरव को इस तरह बर्ताव करना था तो उसने पूजासे ब्याह किया क्यों? खैर...दिन इसी तरह गुज़रते रहे.
एक दिन गौरव खबर लाया की, उसका तबादला इलाहाबाद हो गया है. मन ही मन पूजा ख़ुश हुई. उसे लगा, शायद दिल्ली से बाहर निकल गौरव का रवैय्या बदलेगा. दिल्ली में रहते समय, कई बार किशोर का आमना सामना हो जाता. पूजा के मन में उसके लिए कडवाहट के अलावा कुछ न था पर गौरव के दिल में एक वहम, एक जलन बनी रहती. हर ऐसे समारोह के बाद वो पूजा को ताने ज़रूर सुनाता.
पूजा का दूसरा गर्भपात हुए तकरीबन एक साल होने आया था और उसे फिर से गर्भ नही ठहरा था. उसके ससुराल वालों के लिए यह भी चिंता का विषय बन गया. लेकिन पूजा ने तभी खबर सुना दी. अबके एहतियातन पूजा को दो माह चलने फिरने या सीढ़ी उतरने के लिए मनाई की गयी. पूजा की माँ उसके साथ रहने आ गयी. चौथा माह गुज़र गया तो सबने आश्वस्त होनेकी साँस ली.
पाँचवा माह शुरू हुआ ही था,की, पूजा का nervous ब्रेक डाउन हो गया. उसके मन में एक डर समा गया की, कहीँ घरवालों की कहा सुनी में आके गौरव उसे छोड़ न दे. वो रो रो के गौरव से आश्वासन माँगती और उसे नही मिलता. एक और बात से वह डर गयी. किसी ने भविष्य वाणी कर दी की, पूजा को दो औलाद होगी तथा दोनों बेटे होंगे. पूजा और अधिक डर गयी...सभी परिवार वाले मान के चल रहे थे,की, उसे बेटाही होगा. ...जबकी पूजा मनही मन डरने लगी...कहीँ बेटी हुई तो? उस बच्ची का क्या हश्र होगा? उस निष्पाप जीव को क्या उसके ससुरालवाले अपनाएंगे? क्या उसे वो प्यार मिलेगा जिसकी वो हक़दार होगी?
गुज़रते दिनों के साथ पूजा की मनोदशा और अधिक ख़राब होती गयी. जब प्रसव के दिन करीब आए तो उसकी डॉक्टर ने सिजेरियन की सलाह दी. एक और कारण भी था...गर्भ उलटा था..डॉक्टर को डर लगा की, प्रसव के दौरान गर गर्भ को कुछ हो गया तो पूजा या तो पगला जायेगी या मरही जायेगी..तारीख तय कर ली गयी और इलाहाबाद के सिविल हॉस्पिटल में उसे दाखिल कराया गया. दोपहर तक उसका ऑपरेशन हो गया. जब उसकी आँख खुली तो उसे बेटी होने की खबर मिली. उसके मनमे बच्ची के प्रती प्यार के अलावा अपार करुणा भर गयी..अपनी माँ को खबर सुनाते हुए, गौरव ने कहा,"माँ तुझे सुनके खुशी तो नही होगी..बेटी हुई है.."
बेटीका जीवन अब पूजा के लिए चुनौती बन गया. अस्पताल से पूजा घर लौटी तो नवागत की खुशी के तौरपे किसी के मुह्पे हँसी न थी. एक पूजा की माँ तथा, अंतिम दिनों में आयी बहन थी, जो बेहद ख़ुश थे.पूजा जानती थी, की, उसकी बिटिया का उसके नैहर में खूब स्वागत होगा. भरी गर्मी में ३ दिन का सफ़र कर पूजा अपने नैहर पहुँच गयी. वहाँ उसे पहली बार माँ होने की खुशी हुई.
आनेवाले दिनों में उसका भय सही साबित हुआ...उसे बच्ची को छूने के लिए भी घरवालों इजाज़त लेनी पड़ती. पूजा को अपने नैहर आए कुछ ही दिन हुए थे,की, गौरव के तबादले की खबर उसे ख़त द्वारा मिली. तबादला कर्नाटक में हुआ था. गौरव सामान बाँधने से पूर्व अपनी नयी पोस्ट का मुआयना करने आया. उस समय वो वो पूजा के नैहर आया.
सब नाश्ते की मेज़ पे बैठे हुए थे की, कमरेमे से बच्ची की रोने की ज़ोरदार आवाज़ आयी. पूजा उठने लगी तो गौरव ने कहा:" तुम अपना नाश्ता ख़तम करो तब जाना. अभी मेराभी नाश्ता नही हुआ और तुम चली? कल जन्मी बच्ची से ये असर? तुम्हारा मेरे प्रती रवैय्या ही बदल गया!"
पूजा चुपचाप कुर्सी पे बैठ गयी. पूजा की दादी उठ खड़ी होने लगी तो गौरव ने उन्हें भी रोक दिया...बेचारी दादी...उनके घर में उन्हीं को उठने की इजाज़त नही थी! बच्ची और न जाने कितनी देर रोती गयी, और साथ दादी भी...वो चुपचाप आँसूं बहाती रहीं...पूजा को तो उतनी भी इजाज़त नही थी...जब सबकी चाय ख़त्म हुई तब गौरव ने कहा:
" अब जाओ अपनी लाडली के पास! ऐसे बर्ताव कर रही हो जैसे दुनिया में कोई पहली बार माँ बना हो!"
जो भी हो, पूजा तो पहली बार माँ बनी थी !
जब पूजा कमरेमे गयी और बिटिया को उठाने लगी तो देखा उसपे कई सारी लाल चीटियाँ चिपकी हुई थी...नन्हीं जान उसी के कारण बदहवास होके रो रही थी..!
उसके पीछे,पीछे कमरे में आए गौरव से वह बोली:" इसे तो चीटियों ने डस लिया था, इसीलिये रो रही है..."
गौरव: " तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सांप या बिच्छू ने डंख मार दिया हो...इसकी जान जा रही हो...चीटी के काटने से यह मर थोड़े ही जायेगी?"
पूजा ने उसे जल्दी जल्दी नहला डाला...
बच्ची केवल ३० दिन की थी..आगे पूरी ज़िंदगी पडी थी...पूजाकी आँखों के आगे भविष्य का नज़ारा घूम गया..
क्रमश:
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
बिखरे सितारे !३ सितम औरभी थे!
पूर्व भाग..अजीबोगरीब मानसिक तथा शारीरिक तकलीफोंसे गुज़रती रही पूजा. उसके ब्याह को छ: माह हो गए और उसके पिता उसे मायके लेने आए.अब आगे ओ पढ़ें:
पूजा मायके पहुँची तो बेहद खामोश रहने लगी. वो क़तई नही चाहती थी की, उसके मायके वाले उसकी पीड़ा जान सकें. उसके दादा जी को शंका आती रही की सबकुछ ठीक नही है,लेकिन पूजा उन्हें हरबार खामोश कर देती. अपने कमरेमे बंद पडी पूजा को वे बाहर निकालना चाहते तो और उसकी खामोशी की वजह पूछते तो पूजा कह बैठती:
"कुछ भी तो नही..! आप क्यों खामखा परेशान होते हैं? मुझे अपने घर नींद कम मिलती है,इसलिए यहाँ सोती रहती हूँ !"
दादा जी छोटा -सा मूह लेके परे हो जाते. एक माह रुक पूजा अपने ससुराल लौट गयी. बेहद अंतर्मुखी हो गयी थी. सफ़र के दौरान उसने प्रण कर लिया की, चाहे जो हो जाय,वो अपने घरवालों का रवैय्या बदल के रहेगी...! हर मुमकिन कोशिश करेगी की, उनके चेहरों पे मुस्कान रहे..लेकिन ये उसकी क़िस्मत में नही था..
पती को लगता की, वो अगर घरवालों का साथ देते हुए उसे अपमानित न करेगा तो बीबी का गुलाम कहलायेगा! घरवाले उसे नीचा दिखानेका या अपमानित करनेका एक भी मौक़ा छोड़ते नही थे! पूजा अकेली पड़ती गयी...! उसके मनमे आता,की, गर उसका साथ नही देना था तो गौरव ने उसके साथ ब्याह किया ही क्यों?
पूजा एक अजीब-सी उदासी में घिर गयी. ऐसे में उसके फिर एकबार पैर भारी हो गए. दिवाली आने वाली थी...और उसकी माँ तथा बहन पहुँच गए. ! पूजा को फिर से रक्त स्त्राव शुरू हो गया और बिस्तरमे रहने की हिदायत दी गयी.
माँ और छोटी बहन के आँखों से पूजा की स्थती छुपाई न जा सकी. माँ को हालात देख बेहद सदमा पहुँचा. घरवालों ने माँ को भी कई बार बातों ही बातों में ज़लील किया. इन सब बातों के चलते पूजा का दोबारा गर्भपात हो गया. इस बार डॉक्टर तो दूसरी थी लेकिन उसने बच्चे का लिंग घरवालों को बता दिया. पहली बार भी लड़का था. कौन जनता था की, इन बातों का कितना दूरगामी असर होगा?
अस्पताल से पूजा जब घर आयी तो दर्द में थी. पिछले कुछ दिनों से बिस्तर में रहने के कारण कपडे आदी धो न सकी थी. सास ने उसे बुला के कपड़ों का ढेर आगे रख दिया और कहा," इन्हें पहले दो लो फिर आराम की सोचना. "
पूजाकी माँ:" मै धो देती हूँ...इसे दर्द हो रहा है..."
सास:" अजी ऐसे दर्द बतेरे देख रखे हैं..ये कौन बच्चा पैदा करके आयी है...आप हमारे घरके मामलों में दखल ना दें..इसे ज्यादा नज़ाक़त दिखाने की ज़रुरत नही है..!"
माँ खामोश रह गयी. छुपके आँसू बहाने के अलावा उनके पास अन्य चारा नही था. गौरव भी हर चीज़ खुली आँखों से देखता रहा. माँ तथा बहन के रहते ऐसी अन्य कई बाते हुई जो माँ और बहन के आगे पूजा की ज़िंदगी खुली किताब की तरह दिखा गयीं..ये तो भविष्य की एक झलक थी.
क्रमश:
पूजा मायके पहुँची तो बेहद खामोश रहने लगी. वो क़तई नही चाहती थी की, उसके मायके वाले उसकी पीड़ा जान सकें. उसके दादा जी को शंका आती रही की सबकुछ ठीक नही है,लेकिन पूजा उन्हें हरबार खामोश कर देती. अपने कमरेमे बंद पडी पूजा को वे बाहर निकालना चाहते तो और उसकी खामोशी की वजह पूछते तो पूजा कह बैठती:
"कुछ भी तो नही..! आप क्यों खामखा परेशान होते हैं? मुझे अपने घर नींद कम मिलती है,इसलिए यहाँ सोती रहती हूँ !"
दादा जी छोटा -सा मूह लेके परे हो जाते. एक माह रुक पूजा अपने ससुराल लौट गयी. बेहद अंतर्मुखी हो गयी थी. सफ़र के दौरान उसने प्रण कर लिया की, चाहे जो हो जाय,वो अपने घरवालों का रवैय्या बदल के रहेगी...! हर मुमकिन कोशिश करेगी की, उनके चेहरों पे मुस्कान रहे..लेकिन ये उसकी क़िस्मत में नही था..
पती को लगता की, वो अगर घरवालों का साथ देते हुए उसे अपमानित न करेगा तो बीबी का गुलाम कहलायेगा! घरवाले उसे नीचा दिखानेका या अपमानित करनेका एक भी मौक़ा छोड़ते नही थे! पूजा अकेली पड़ती गयी...! उसके मनमे आता,की, गर उसका साथ नही देना था तो गौरव ने उसके साथ ब्याह किया ही क्यों?
पूजा एक अजीब-सी उदासी में घिर गयी. ऐसे में उसके फिर एकबार पैर भारी हो गए. दिवाली आने वाली थी...और उसकी माँ तथा बहन पहुँच गए. ! पूजा को फिर से रक्त स्त्राव शुरू हो गया और बिस्तरमे रहने की हिदायत दी गयी.
माँ और छोटी बहन के आँखों से पूजा की स्थती छुपाई न जा सकी. माँ को हालात देख बेहद सदमा पहुँचा. घरवालों ने माँ को भी कई बार बातों ही बातों में ज़लील किया. इन सब बातों के चलते पूजा का दोबारा गर्भपात हो गया. इस बार डॉक्टर तो दूसरी थी लेकिन उसने बच्चे का लिंग घरवालों को बता दिया. पहली बार भी लड़का था. कौन जनता था की, इन बातों का कितना दूरगामी असर होगा?
अस्पताल से पूजा जब घर आयी तो दर्द में थी. पिछले कुछ दिनों से बिस्तर में रहने के कारण कपडे आदी धो न सकी थी. सास ने उसे बुला के कपड़ों का ढेर आगे रख दिया और कहा," इन्हें पहले दो लो फिर आराम की सोचना. "
पूजाकी माँ:" मै धो देती हूँ...इसे दर्द हो रहा है..."
सास:" अजी ऐसे दर्द बतेरे देख रखे हैं..ये कौन बच्चा पैदा करके आयी है...आप हमारे घरके मामलों में दखल ना दें..इसे ज्यादा नज़ाक़त दिखाने की ज़रुरत नही है..!"
माँ खामोश रह गयी. छुपके आँसू बहाने के अलावा उनके पास अन्य चारा नही था. गौरव भी हर चीज़ खुली आँखों से देखता रहा. माँ तथा बहन के रहते ऐसी अन्य कई बाते हुई जो माँ और बहन के आगे पूजा की ज़िंदगी खुली किताब की तरह दिखा गयीं..ये तो भविष्य की एक झलक थी.
क्रमश:
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