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शनिवार, 17 जुलाई 2010

:बिखरे सितारे: adhyaay 2 :२ )पी का नगर

भाग २ :बिखरे सितारे:२ पी का नगर

अबतक  की  मलिका  का  सारांश: भाग  २  :बिखरे सितारे:२  पीका नगर

एक गांधी वादी,मुस्लिम परिवार में   पूजा/तमन्ना का  जन्म हुआ...उसका बचपन गाँव में बीता. दादा दादी का भरपूर प्यार उसने पाया. खुले विचारों में पली बढ़ी. लेकिन एक समस्या उसे हमेशा परेशान करती रही...अपनी माँ के प्रति दादा का सख्त व्यवहार...पिता की ओरसे भी माँ छली गयी..

यौवन की दहलीज़ पे उसकी मुलाक़ात किशोर से हुई. किशोर सरकारी, तबादलों वाली नौकरी में कार्यरत था. मुलाक़ात भी अजीब हालात में हुई...पूजाके भाईके हाथ से( जो तब केवल १२/१३ साल का था),बंदूक से गोली छूट गयी...दादाजी ने अपनी ओरसे बंदूक खाली कर दी थी,लेकिन उसमे एक गोली रह गयी थी.भाई  को भी नही पता था. खेतपर के किसी लड़के के उकसाए जानेपर, उसने उसके पैरों पर निशाना ले गोली दाग दी.

खून में लथपथ उस लड़के को दादा जी अस्पताल ले गए. लड़का तो ठीक हो गया. लेकिन दादा जी बंदूक ज़प्त कर ली गयी. उन्हों ने हादसे की ज़िम्मेदारी पूरी तरह खुद पे ले ली. वो बेहद सत्य वचनी थे.इन्ही हालातों के चलते IAS के अफसर किशोर से उस परिवार की मुलाक़ात हुई. पूजा उस वक़्त छात्रावास में थी. लौटी तो किशोर से परिचय हुआ. दोनों के मनमे प्यार पनपा.

किशोर का दिल्ली तबादला हो गया. जानेसे पूर्व उसने पूजासे अपना धरम परिवर्तन की मांग की. मासूम पूजा बात की गहराई को समझी नही और उसने हाँ कर दी.

जब पूजा की माँ और पूजा किशोर के परिवार से मिलने दिल्ली गए तो वहाँ इस बात का ज़िक्र छिड़ा. पूजा की माँ हैरान हो गयी..खुद पूजा को भी जब बात का गाम्भीर्य  पता चला तो वो भी सकते में आ गयी..उसने अपनी गलती मान ली और किशोर से इस बात का विरोध जताया. वो प्यार करके हार गयी..सपने चकनाचूर हुए.

इसमे उसके मूहसे यह बात कोशोर के चंद दोस्तों के आगे निकल गयी और वो खूब रोई. इन दोस्तों में एक गौरव भी था. गौरव ने अपने परिवार की सहमती से पूजा के साथ ब्याह करने का निर्णय लिया. पूजाके परिवार ने स्वीकार किया.

ब्याह के पश्च्यात पूजा की समझमे आ गया की, गौरव की मानसिकता किशोर से अलग नही थी...उसने चाहा की, पूजा उसके परिवारकी एहसान मंद रहे,की, उन्हों ने एक' ऐसी, लडकी से ब्याह करने की इजाज़त दी..मानो वो किसी की उतरन हो! सुहाग रात को ही पूजा को यह बात सुननी पडी और वो दर्द से  कराह उठी.

अब आगे पढ़ें:

पूजा ने अपने आप को ऐसे माहौल में बेहद अकेला पाया. पूरा दिन वो घरवालों के ताने सुनती. शाम जब गौरव घर आता, तो घरवाले पूजा के खिलाफ उसके कान भरते. पूजा को समझ में नही आया,की, गर ऐसे हालात थे,तो गौरव ने उसके साथ शादी क्यों की...उसने कुछ छुपाया नही था...

घरका सारा काम,बिना किसी नौकर चाकर के उसने संभाल लिया था, लेकिन जी जान लगा के भी, उसे ताने ही सुनने पड़ते थे.
बल्कि, जिस रात वो सब लखनऊ से दिल्ली पहुँचे उसके अगले दिन की बात:

गौरव अपनी भाई के साथ सुबह कहीँ घूमने गया. पड़ोस का एक कमरा  इन दोनों के खातिर  तीन दिनों के लिए,  लिया गया था.गौरव ने लौटते ही पूजा से पूछा
:" तुमने वहाँ झाडू लगाई?"

पूजा:" ना..नही तो..मुझे नही पता था..मै तो सवेरे ४ बजे ही नीचे आ गयी थी.."
( उस दिन करवा चौथ का व्रत था)

गौरव: " तो झाडू तुम्हारा बाप आके लगाएगा या मेरा बाप?"

गौरव ने भरे हुए घर में,सबके सामने, पूजा का अपमान किया..पूजा की आँखें भर आयीं..

पूजा:" मै अभी लगा देती हूँ..."
पूजा का इतना कहना भर था,की, उस घरकी मालकिन वहाँ आ पहुँची और बोली:" माफी चाहती हूँ, हमें आज ही कमरा चाहिए.."

पूजा के मनमे झाडू का विचार भी आता तो चाभी गौरव के पास थी...और गौरव बाहर चला गया था...

मकान मालकिन चाभी ले गयी, और पूजा पर गौरव औरभी गरज पडा..पूजा से बोला ना गया..बोलती भी तो उसकी कौन सुनता? उसने अपनी सास तथा जेठानी के मुखपे एक कुटिल -सी मुस्कान देखी.
और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..

क्रमश:

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

अध्याय २)..१)छूट गया वो अंगना ...


( पिछली कड़ी: मेरा..मतलब पूजा तमन्ना का ब्याह गौरव के साथ हो गया....बेलगाम के छोटा से गाँव से निकाल मै लखनऊ पहुँच गयी...अभी  गुह प्रवेश  ही  हो  रहा  था ,की , कानों  में    अलफ़ाज़  पड़े ," ये  गौरव  भी  ना ! पता नही किसकी उतरन ले आया है...अब आगे पढ़ें...)

मै चौंक गयी... उस ओर देखा...फिर कनखियों से गौरव की तरफ देखा...समझ नही पायी की, उसने सुना या नही...दिल जोरसे धड़कने लगा...पूजा-पाठ होता रहा..लोग मिलने आते रहे...ट्रेन से तभी आए थे...नहाने का आदेश मिला...ठण्ड थी काफ़ी...मैंने आदेश मान लिया... जो कपडे मिले,समेटे और  स्नान कक्ष में घुस गयी... गीले ही स्नानकक्ष में किसी तरह साड़ी  लपेट बाहर आयी...

दिनभर लोग आते रहे, और शाम जल्दी में तैयार हो स्वागत समारोह के लिए मुझे ले जाया गया...भीड़ उमड़ पडी थी..मेहमानों में विलक्षण उत्सुकता थी...मुझे देखने की..

रात जब  घर पहुँचे तो पड़ोस के घरके एक कमरेमे सोने का इंतज़ाम था...( ये बता दूँ,की, इन सब बातों के चलते गौरव का तबादला बेलगामसे दिल्ली में हो गया था, उसी विभाग में जहाँ किशोर था..).
मैंने बात करने की कोशिश की...लेकिन गौरव ने तकरीबन मुझे धर दबोचा... धीरे, धीरे महसूस होने लगा की, उसकी मानसिकता किशोर से अलग नही थी...

सुबह हमें लखनऊ से दिल्ली लौटना था...दिल्ली घरवाले भी साथ चले...दो ही कमरों का घर था..मै डरी-डरी-सी थी..अपने आपको बेहद अकेला महसूस कर रही थी...फिर एकबार लगा, ज़िंदगी कहाँ ले चली? अपना नैहर याद आ रहा था...और गौरव ने मुझे कह डाला," मेरी माँ तथा घरवालों का एहसान मानो की, तुम्हें स्वीकार किया...वरना क्या करती तुम?"

सुनके मै दंग रह गयी...गौरव ऐसा तो नही लगा था...लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी...जो सच था वो सामने आ गया था...जीवन का एक नया और डरावना अध्याय शुरू हो रहा था...सब कुछ बर्दाश्त करने के अलावा चारा  नही था..यहाँ आँसूं पोछने वाला कोई नही था...समझमे आ गया ...झलक मिल गयी की, इन राहों में बेहद ख़तरा था...दर्द था...

क्रमश:

शनिवार, 3 जुलाई 2010

बिखरे सितारे ! ५) और दिन गुज़रते रहे...

जो जीवन अनगिनत घटनाओं से भरा हुआ हो...उन लम्हों को कैसे चुनूँ?? एक माला पिरोना चाहती हूँ, उनमे कौन से मोती शामिल करूँ..कौनसे छोड़ दूँ...?



तूफानों की शुरुआत तो शायद उस नन्हीं जान के इस दुनिया में आने के पहलेही हो चुकी थी..अब तक तो वह अपनी माँ की बाहोँ में..अपने दादा दादी की छत्र में महफूज़ थी...उसे इन तूफानों का मतलब तो समझ नही आता था..थपेडे चाहे लगते हों...



कोई, किसी दूसरे को, चाहे वो अपनी औलाद ही क्यों न हो, कितना महफूज़ रख सकता है...और कबतक? ये सवाल मेरे मनमे जब जब उभरेगा, शायद पाठकों के मन में भी उभरेगा...



तमन्ना की, ..जैसे कि, उसके दादा-दादी, माँ पिता कभी बुलाया करते, उसी गाँव में, पढाई शुरू कर दी गयी..एक मास्टर जी गाँव से घर आते और उसे प्रादेशिक भाषा में पढाते......तीन साल के बाद ये पढाई शुरू हुई..जब पूजा-तमन्ना, अपने माँ पिता के साथ निज़ामाबाद से लौट आयी...



उसे तो वो रटना रटाना क़तई नही भाता..लेकिन और कोई तरीक़ा तो नही था...फिर जब वो छ: सालकी हुई तो पास के एक छोटे-से शहर की पाठशाला में उसका दाखिला कराया गया..अन्य बच्चे जैसे, पाठशाला के पहले कुछ दिन रोते हैं, येभी खूब रोई...उसके दादा या पिता, स्कूल के बाद उसे लेने आते..गर देर हो जाती,तो इसका दिल बैठ ही जाता..उसके गुरूजी बड़े ही अच्छे थे..बेचारे उसको खूब मानते रहते..



अबतक एक और बच्ची परिवार में आ गयी थी..उसकी छोटी बहन...वह भी दादा दादी की बेहद लाडली थी..पर पूजा की बात ही उन दिनों अलग थी..उस परिवारकी पहली पोती...! शैतानी भी कर जाती...अपनी बहन के आगे,वो स्वयं को खूब बड़ा समझती....!



जब वह चौथे वर्ग में आ गयी,तो वहाँ उसके गुरूजी बड़े ही बदमिज़ाज निकले...उन्हें बच्चों को जाती परसे पुकारने की आदत थी...इतनी छोटी थी पूजा..लेकिन उसको उन दिनों भी ये बात बड़ी ही अखरती...



एक दिन गुरूजी ने एकेक बच्चे को खड़ा करके बताना शुरू किया," हाँ..तो तुम कल दोपहर में सड़क पे क्या कर रहे थे? मैंने देखा तुम्हें!"

वो बच्चा,अपनी गर्दन लटकाए खड़ा रहा..किसी बच्चे ने ये नही कहा कि, मै तो वहाँ था ही नही या थी ही नही...पूजा को भी खड़ा किया गया..और गुरूजी बोले," हाँ..तो तुम्हें मैंने तुम्हारे दादा के साथ दुकान में जाते देखा..तुम क्यों उनको परेशान कर रही थी? अपने बड़ों ऐसे परेशान करते हैं?"

सारा वर्ग ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा..अन्य बच्चों को डांट मिल रही देख,अक्सर बच्चे मज़ा लेते हैं...! पूजा को बेहद अपमानित महसूस हुआ...!



वह हैरान भी हो गयी....! उसने कहा,

"लेकिन कल तो मै पूरा दिन घर पे थी.....कल तो इतवार था...! मै तो कहीँ नही गयी..और दुकान में तो मुझे दादा ले जाते हैं..मै नही कहती ले जाने को...!"



बस..इतना कहना था,कि, गुरूजी उसपे बरस पड़े," मै झूठ बोल रहा हूँ? तू सही बोल रही है? ये मजाल तेरी....? तुझे घर पे ऐसा सिखाया है? कि गुरूजी का अपमान करे..?चल,निकल वर्ग के बाहर...जा खड़ी हो जा, उस खंभे के पास..धूप में.."



अप्रैल माह की चिलचिलाती धूप थी..और पूजा, अपने आँसू चुपचाप बहाते हुए, धूप में जाके खड़ी हो गयी...उसे दोपहर का खाना खाने की इजाज़त भी नही मिली...उसे अपने तीसरे वर्ग के गुरूजी बड़े याद आए...वो कितना प्यार से समझाया करते थे..जब वो कुछ गलती कर जाती...और पूरा वर्ग उसपे हँस पड़ता,तो गुरूजी पूरे वर्ग को डांट के चुप करते..वैसे भी, पूजा सुंदर थी, नाज़ुक थी..और कई लड़कियाँ उसपे जलती भी थीं..



बच्ची ने घर जाके यह बात अपने दादा को बताई..दादा तो सत्य के पुजारी थे..उन्हों ने तुंरत इस घटना का ब्योरा मुख्याध्यापक को दे दिया...उसके बात तो गुरूजी ने उसपे और अधिक खुन्नस पकड़ ली...उसके दिमाग़ से बरसों ये बात निकल नही पायी,कि, आख़िर वो गुरूजी उससे झूठ क्यों बुलवाना चाहते थे?



क्रमश:

बुधवार, 16 जून 2010

बिखरे सितारे: गला क्यों न घोंटा?

(गतांक: केतकी,किसी अन्य शहर  अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई  को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...

हर हँसी  की  कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू  हैं  कि थमते नही!
अब आगे:)

मै होश में तो आ गयी उस समय,पर यह कुछ दिनों के लिए एक सिलसिला-सा बन गया. जब मानसिक तनाव बरदाश्त के परे हो जाता तो मै होश खो बैठती. माँ वैसे ही चिंतित रहती,मेरे कारण,अब और अधिक चिंतित हो गयीं.

केतकी गौरव के पास ही थी उन दिनों. एक शाम उसका फोन आया:" माँ, आप इस वक़्त अकेली हैं या आस पास कोई है?"
मै:" इस समय तो कोई नही है..कहो,क्या बात है?"
केतकी:" माँ, पापा,अमन और मै कल दिन में वहाँ पहुँच रहे हैं...."
मै:" लेकिन तुम लोग तो तीन चार दिनों के लिए ऊटी जानेवाले थे न? उसका क्या?"
केतकी:" नही जा रहे अब..पापा कहते हैं,की,अब वो आपके साथ क़तई नही निबाह सकते. वह अमन और मेरे सामने कुछ बातें कहना चाहते हैं...जैसे की,आपको प्रतिमाह क्या दिया जाय...तथा आप कहाँ रहेंगी.."

कुछ देर तो मेरे मूह से अलफ़ाज़ ही नही निकले...शायद आँखें भर आयीं थीं....गला रूंध रहा था. अंत में मैंने कहा:" ठीक है बेटे..जो तुम लोग ठीक समझो..इस समय और कह भी क्या सकती हूँ?"

कैसा तमाशा बना रखा था क़िस्मत ने मेरा! चार दिन भी चैन नही मिल रहा था..गौरव और बच्चे आए. गौरव ने काफ़ी बहकी,बहकी बातें की

उनकी मुखालिफ़त करना मैंने मौज़ूम न समझा. पत्थर पे सर फोड़ने वाली बात होती वह तो..उसने एक घर मेरे नाम से करने की बात कही. और प्रतिमाह कुछ रक़म. कितनी,यह बात मुझे अब याद नही. वो सब कुछ कागज़ात पे लिख लाया था. एक प्रत  मुझे पकड़ा दी गयी. अगले दिन वह और अमन,दोनों लौट गए. उनके वहाँ रहते मै तीन चार बार बेहोश हो कर ,पता नही क्या बडबडाती रही. अमन ने तो अपने आपको इन सब बातों से अलग थलग कर लिया था.




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इसी दौरान एक रोज़ केतकी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा:" पापा अब तुम्हारे नाम मकान नही करना चाहते..उनका कहना है,की,तुम अपना संतुलन खो बैठी हो.."
यह अलफ़ाज़ मै हज़म कर ही रही थी,की,केतकी रोते हुए उठ खड़ी हुई और तमतमाती हुई बोली:" माँ! तुमने पैदा होते ही मेरा गला क्यों न घोंट दिया? आप लोगों ने मेरी ज़िंदगी नरक बना रखी है..." उस बच्ची की नन्हीं,मासूम सूरत मेरे आखों के पानी में तैर गयी...जिसे उसके परिवार ने धुतकारा था...मै ही उसकी रक्षक थी..या मेरा खुदा..लगा,काश, मेरी ही माँ ने मेरा गला घोंट दिया होता!

मै दंग रह गयी ! कभी न सोचा था की,मुझे अपनी लाडली संतान के मूह से यह अलफ़ाज़ सुनने होंगे! पल भर लगा,गर मेरे दादा-दादी कहीँ से  सुन रहे हों,तो उनपे क्या बीतेगी? जिस पूजा तमन्ना,यानी मुझे, पाके उन्हें लगा था,आसमान का सितारा मिल गया..उसी को, उनकी लाडली पोती को,उसकी औलाद यह अलफ़ाज़ सुना रही थी? यह क़िस्मत की कैसी विडम्बना थी? मै,उनकी आखों का सितारा,टूट  टूट के बिखर रही थी..और वो दोनों कुछ न कर सक रहे थे!

मैंने कमरे से बाहर निकल जाना चाह,लेकिन केतकी मानो चंडिका का रूप धारण कर चुकी थी...उसने मेरी बाँह पकड़ दोबारा कमरे में खींच लिया...उसकी आँखों में आग थी...जिसे मेरे आँसूं चाहकर  भी बुझा न पा रहे थे..

क्रमश:
इस  कड़ी  का  काफ़ी  अंश  डिलीट  कर  दिया  गया  है ..क्षमा  करें !