गौरव: " तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सांप या बिच्छू ने डंख मार दिया हो...इसकी जान जा रही हो...चीटी के काटने से यह मर थोड़े ही जायेगी?"
पूजा ने उसे जल्दी जल्दी नहला डाला...
बच्ची केवल ३० दिन की थी..आगे पूरी ज़िंदगी पडी थी...पूजाकी आँखों के आगे भविष्य का नज़ारा घूम गया..अब आगे पढ़ें...
२ माह की बच्ची को लेके पूजा बंगलोर अपने नैहर से चली आयी थी.
गुज़रते दिनों के साथ पूजाको रोज़ ही ना जाने कितनीही कठिनाईयों का सामना करना पड़ता! चैन से वो बच्ची को स्तनपान भी न करा पाती..सास की दो मिनट के अन्दर आवाज़ लग जाती:
" तुम जब देखो तब इसे लिए बैठ जाती हो...यहाँ चाहे किसीको चाय चाहिए हो या नाश्ता...तुम्हें तो पहले उस लडकी की पडी रहती है..हमारे घरमे तो ये ३ री लडकी है..अब बेगम साहिबा उठिए और हमें पराठें बना दें! लगता है,तुम्हें और कोई कामही नही...!"
पूजा: बस पाँच मिनट रुक जाएँ आप.. मै तुरंत बना दूँगी...सुबह से ३ बार इसे रोता छोड़ मै उठ गयी हूँ.."
सासूमा :" तो हमपे एहसान किया है? घरके काम तुम नही करोगी तो और कौन?"
गौरव: " सुना नही माँ ने क्या कहा? माँ से बढ़के आज ये हो गयी? रखो इसे नीचे और माँ जो कह रहीं हैं करो.."
बिचारी उस नन्ही-सी जान को फिर एकबार भूखे पेट अपने पलनेमे जाना पड़ा...बेचारी बड़ी करुण सुरमे रोने लगी..
पूजा गरम,गरम पराठे बना अपनी सास को परोसती गयी..
पराठें बन गए तो कुत्तेको घुमाके लानेका आदेश मिला. पूजाने फिर बिनती की:" बच्ची भूक के मारे रोये जा रही है...मुझे १० मिनट देदो, मै घुमा लाऊँगी ..please !
गौरव:" तुमने लडकी को सरपे चढ़ा रखा है...चलो मेरे साथ लिफ्ट में नीचे उतारो, मै दफ्तर निकल पडूँगा, तुम कुत्तेको घुमाके ले आओ...ये भी बाहर जानेके लिए मचल रहा है..."
अंतमे हुआ वही जो गौरव और उसकी सास चाहती!पूजा की आँखें नम होती जा रही थीं..जब भी उसके पलने के पास से पूजा गुज़रती, वो बड़ी आशासे अपनी माँ को देखती...और तवज्जो न पाके रो उठती.
कुत्तेको घुमाने के पश्च्यात उसने सबकी इजाज़त ली तब वो बच्ची को दूध पिला सकी.
एक बार पूजा घरकी बालकॉनी में खड़ी हो, बिटिया को परिंदे दिखा रही थी...वहाँ कौवे भी थे. कुत्तेको कव्वों से बेहद चिढ थी...उसने जैसे ही कव्वे को देखा, उसने ज़ोरदार हमला बोल दिया...बच्ची डर के मारे चींख उठी..पूजा ने उसे अपने काँधों पे चिपकाके वहाँ से हट जाने का सोंचा...लेकिन गौरव ने टांग अड़ा दी:
गौरव:"ये मेरे कुत्तेसे डरती है? देखता हूँ कबतक डरती है..."
कहके उसने कुत्तेको और कव्वे दिखाए...कुत्ता और जोरसे भोंक के हमला बोलने लगा...
अंतमे पूजा गौरव के प्रतिकार करने के बावजूद बच्ची को कमरेमे ले आयी...बच्ची बुरी तरह सहम गयी थी..काँप-सी रही थी..उसे शांत करने के लिए स्तनपान के अलावा और कोई तरीका नही था...जैसे ही बच्ची दूध पीने लगी, गौरव ने एक और तमाशा खड़ा कर दिय!
गौरव: " तुम तो एकदम गाँव की गंवार औरतों की तरह इस चिपकाये फिरती हो!इसे बोतल का दूध पिलाओ..मै देखता हूँ कैसे और कबतक नही पीती.."
उसने बच्ची को पलंग पे डलवाया और पूजाको आदेश दिया:" चलो लाओ दूध बनाके.."
पूजा: " आप तो जानते हैं की ये बोतल से नही पीती, थोड़ी और बड़ी होगी तब पीने लग जाय...!"
गौरव: " जो मै कह रहा हूँ, वैसा करो..अब लाओ ये बोतल मुझे पकडाओ ..तुम्हारेसे गर रोना धोना बर्दाश्त न हो तो दूसरे कमरेमे चली जाओ!"
पूजने गौरव को बोतल पकड़ा दी और सहमी-सी वहीँ पे कोनेमे बैठ गयी..
बच्ची बदहवास-सी अपनी माँ को घूरे जा रही थी..उसकी ओर बाहें फैला रही थी...उसे बोतल से चिढ थी..पूरे एक घंटा ये तमाशा चला ! अंतमे पूजाने बच्ची को गौरव से छीन लिया और कमरा अंदरसे बंद कर दिया.
उस रात नींद में न जाने वो कितनी बार डरके रोते हुए उठी...लेकिन मासूम का प्यार देखो...सुबह अपने पितापे दृष्टी पड़तेही खिल उठी..पूजा की आँखों से चुपचाप नीर बहा..हर गुज़रता दिन न जाने कितनी चुनौतियाँ भरा होता!
सास अक्सर मिलने जुलने वालों से कहती." अरी बड़ी चीवट जात है..पहले दो लड्कोंको खा गयी..इसे जो पैदा होना था..कुलक्षनी है.."
इस मासूम जान की ज़िम्मेदारी अब केवल पूजाकी थी..बीमारी, दावा दारू, हर चीज़ में अडंगा खड़ा हो जाता..इतनीसी बीमारी के लिए कोई डॉक्टर के जाता है?
क्रमश:
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
सोमवार, 25 जनवरी 2010
बिखरे सितारे! ५: नन्ही कली...
पूर्व भाग: पूजाका दोबारा गर्भ पात हो गया. माँ तथा बहन तब उसके घर पहुँचे थे. पूजाका जीवन, उसका दुःख दर्द उनकी आँखों के आगे एक खुली किताब बन गया. अब आगे पढ़ें.
कुछ दिन बाद माँ और छोटी बहन तो चले गए,लेकिन दिलमे एक गहरा सदमा लेकर. माँ भी समझ नही पा रही थी,की, गर गौरव को इस तरह बर्ताव करना था तो उसने पूजासे ब्याह किया क्यों? खैर...दिन इसी तरह गुज़रते रहे.
एक दिन गौरव खबर लाया की, उसका तबादला इलाहाबाद हो गया है. मन ही मन पूजा ख़ुश हुई. उसे लगा, शायद दिल्ली से बाहर निकल गौरव का रवैय्या बदलेगा. दिल्ली में रहते समय, कई बार किशोर का आमना सामना हो जाता. पूजा के मन में उसके लिए कडवाहट के अलावा कुछ न था पर गौरव के दिल में एक वहम, एक जलन बनी रहती. हर ऐसे समारोह के बाद वो पूजा को ताने ज़रूर सुनाता.
पूजा का दूसरा गर्भपात हुए तकरीबन एक साल होने आया था और उसे फिर से गर्भ नही ठहरा था. उसके ससुराल वालों के लिए यह भी चिंता का विषय बन गया. लेकिन पूजा ने तभी खबर सुना दी. अबके एहतियातन पूजा को दो माह चलने फिरने या सीढ़ी उतरने के लिए मनाई की गयी. पूजा की माँ उसके साथ रहने आ गयी. चौथा माह गुज़र गया तो सबने आश्वस्त होनेकी साँस ली.
पाँचवा माह शुरू हुआ ही था,की, पूजा का nervous ब्रेक डाउन हो गया. उसके मन में एक डर समा गया की, कहीँ घरवालों की कहा सुनी में आके गौरव उसे छोड़ न दे. वो रो रो के गौरव से आश्वासन माँगती और उसे नही मिलता. एक और बात से वह डर गयी. किसी ने भविष्य वाणी कर दी की, पूजा को दो औलाद होगी तथा दोनों बेटे होंगे. पूजा और अधिक डर गयी...सभी परिवार वाले मान के चल रहे थे,की, उसे बेटाही होगा. ...जबकी पूजा मनही मन डरने लगी...कहीँ बेटी हुई तो? उस बच्ची का क्या हश्र होगा? उस निष्पाप जीव को क्या उसके ससुरालवाले अपनाएंगे? क्या उसे वो प्यार मिलेगा जिसकी वो हक़दार होगी?
गुज़रते दिनों के साथ पूजा की मनोदशा और अधिक ख़राब होती गयी. जब प्रसव के दिन करीब आए तो उसकी डॉक्टर ने सिजेरियन की सलाह दी. एक और कारण भी था...गर्भ उलटा था..डॉक्टर को डर लगा की, प्रसव के दौरान गर गर्भ को कुछ हो गया तो पूजा या तो पगला जायेगी या मरही जायेगी..तारीख तय कर ली गयी और इलाहाबाद के सिविल हॉस्पिटल में उसे दाखिल कराया गया. दोपहर तक उसका ऑपरेशन हो गया. जब उसकी आँख खुली तो उसे बेटी होने की खबर मिली. उसके मनमे बच्ची के प्रती प्यार के अलावा अपार करुणा भर गयी..अपनी माँ को खबर सुनाते हुए, गौरव ने कहा,"माँ तुझे सुनके खुशी तो नही होगी..बेटी हुई है.."
बेटीका जीवन अब पूजा के लिए चुनौती बन गया. अस्पताल से पूजा घर लौटी तो नवागत की खुशी के तौरपे किसी के मुह्पे हँसी न थी. एक पूजा की माँ तथा, अंतिम दिनों में आयी बहन थी, जो बेहद ख़ुश थे.पूजा जानती थी, की, उसकी बिटिया का उसके नैहर में खूब स्वागत होगा. भरी गर्मी में ३ दिन का सफ़र कर पूजा अपने नैहर पहुँच गयी. वहाँ उसे पहली बार माँ होने की खुशी हुई.
आनेवाले दिनों में उसका भय सही साबित हुआ...उसे बच्ची को छूने के लिए भी घरवालों इजाज़त लेनी पड़ती. पूजा को अपने नैहर आए कुछ ही दिन हुए थे,की, गौरव के तबादले की खबर उसे ख़त द्वारा मिली. तबादला कर्नाटक में हुआ था. गौरव सामान बाँधने से पूर्व अपनी नयी पोस्ट का मुआयना करने आया. उस समय वो वो पूजा के नैहर आया.
सब नाश्ते की मेज़ पे बैठे हुए थे की, कमरेमे से बच्ची की रोने की ज़ोरदार आवाज़ आयी. पूजा उठने लगी तो गौरव ने कहा:" तुम अपना नाश्ता ख़तम करो तब जाना. अभी मेराभी नाश्ता नही हुआ और तुम चली? कल जन्मी बच्ची से ये असर? तुम्हारा मेरे प्रती रवैय्या ही बदल गया!"
पूजा चुपचाप कुर्सी पे बैठ गयी. पूजा की दादी उठ खड़ी होने लगी तो गौरव ने उन्हें भी रोक दिया...बेचारी दादी...उनके घर में उन्हीं को उठने की इजाज़त नही थी! बच्ची और न जाने कितनी देर रोती गयी, और साथ दादी भी...वो चुपचाप आँसूं बहाती रहीं...पूजा को तो उतनी भी इजाज़त नही थी...जब सबकी चाय ख़त्म हुई तब गौरव ने कहा:
" अब जाओ अपनी लाडली के पास! ऐसे बर्ताव कर रही हो जैसे दुनिया में कोई पहली बार माँ बना हो!"
जो भी हो, पूजा तो पहली बार माँ बनी थी !
जब पूजा कमरेमे गयी और बिटिया को उठाने लगी तो देखा उसपे कई सारी लाल चीटियाँ चिपकी हुई थी...नन्हीं जान उसी के कारण बदहवास होके रो रही थी..!
उसके पीछे,पीछे कमरे में आए गौरव से वह बोली:" इसे तो चीटियों ने डस लिया था, इसीलिये रो रही है..."
गौरव: " तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सांप या बिच्छू ने डंख मार दिया हो...इसकी जान जा रही हो...चीटी के काटने से यह मर थोड़े ही जायेगी?"
पूजा ने उसे जल्दी जल्दी नहला डाला...
बच्ची केवल ३० दिन की थी..आगे पूरी ज़िंदगी पडी थी...पूजाकी आँखों के आगे भविष्य का नज़ारा घूम गया..
क्रमश:
कुछ दिन बाद माँ और छोटी बहन तो चले गए,लेकिन दिलमे एक गहरा सदमा लेकर. माँ भी समझ नही पा रही थी,की, गर गौरव को इस तरह बर्ताव करना था तो उसने पूजासे ब्याह किया क्यों? खैर...दिन इसी तरह गुज़रते रहे.
एक दिन गौरव खबर लाया की, उसका तबादला इलाहाबाद हो गया है. मन ही मन पूजा ख़ुश हुई. उसे लगा, शायद दिल्ली से बाहर निकल गौरव का रवैय्या बदलेगा. दिल्ली में रहते समय, कई बार किशोर का आमना सामना हो जाता. पूजा के मन में उसके लिए कडवाहट के अलावा कुछ न था पर गौरव के दिल में एक वहम, एक जलन बनी रहती. हर ऐसे समारोह के बाद वो पूजा को ताने ज़रूर सुनाता.
पूजा का दूसरा गर्भपात हुए तकरीबन एक साल होने आया था और उसे फिर से गर्भ नही ठहरा था. उसके ससुराल वालों के लिए यह भी चिंता का विषय बन गया. लेकिन पूजा ने तभी खबर सुना दी. अबके एहतियातन पूजा को दो माह चलने फिरने या सीढ़ी उतरने के लिए मनाई की गयी. पूजा की माँ उसके साथ रहने आ गयी. चौथा माह गुज़र गया तो सबने आश्वस्त होनेकी साँस ली.
पाँचवा माह शुरू हुआ ही था,की, पूजा का nervous ब्रेक डाउन हो गया. उसके मन में एक डर समा गया की, कहीँ घरवालों की कहा सुनी में आके गौरव उसे छोड़ न दे. वो रो रो के गौरव से आश्वासन माँगती और उसे नही मिलता. एक और बात से वह डर गयी. किसी ने भविष्य वाणी कर दी की, पूजा को दो औलाद होगी तथा दोनों बेटे होंगे. पूजा और अधिक डर गयी...सभी परिवार वाले मान के चल रहे थे,की, उसे बेटाही होगा. ...जबकी पूजा मनही मन डरने लगी...कहीँ बेटी हुई तो? उस बच्ची का क्या हश्र होगा? उस निष्पाप जीव को क्या उसके ससुरालवाले अपनाएंगे? क्या उसे वो प्यार मिलेगा जिसकी वो हक़दार होगी?
गुज़रते दिनों के साथ पूजा की मनोदशा और अधिक ख़राब होती गयी. जब प्रसव के दिन करीब आए तो उसकी डॉक्टर ने सिजेरियन की सलाह दी. एक और कारण भी था...गर्भ उलटा था..डॉक्टर को डर लगा की, प्रसव के दौरान गर गर्भ को कुछ हो गया तो पूजा या तो पगला जायेगी या मरही जायेगी..तारीख तय कर ली गयी और इलाहाबाद के सिविल हॉस्पिटल में उसे दाखिल कराया गया. दोपहर तक उसका ऑपरेशन हो गया. जब उसकी आँख खुली तो उसे बेटी होने की खबर मिली. उसके मनमे बच्ची के प्रती प्यार के अलावा अपार करुणा भर गयी..अपनी माँ को खबर सुनाते हुए, गौरव ने कहा,"माँ तुझे सुनके खुशी तो नही होगी..बेटी हुई है.."
बेटीका जीवन अब पूजा के लिए चुनौती बन गया. अस्पताल से पूजा घर लौटी तो नवागत की खुशी के तौरपे किसी के मुह्पे हँसी न थी. एक पूजा की माँ तथा, अंतिम दिनों में आयी बहन थी, जो बेहद ख़ुश थे.पूजा जानती थी, की, उसकी बिटिया का उसके नैहर में खूब स्वागत होगा. भरी गर्मी में ३ दिन का सफ़र कर पूजा अपने नैहर पहुँच गयी. वहाँ उसे पहली बार माँ होने की खुशी हुई.
आनेवाले दिनों में उसका भय सही साबित हुआ...उसे बच्ची को छूने के लिए भी घरवालों इजाज़त लेनी पड़ती. पूजा को अपने नैहर आए कुछ ही दिन हुए थे,की, गौरव के तबादले की खबर उसे ख़त द्वारा मिली. तबादला कर्नाटक में हुआ था. गौरव सामान बाँधने से पूर्व अपनी नयी पोस्ट का मुआयना करने आया. उस समय वो वो पूजा के नैहर आया.
सब नाश्ते की मेज़ पे बैठे हुए थे की, कमरेमे से बच्ची की रोने की ज़ोरदार आवाज़ आयी. पूजा उठने लगी तो गौरव ने कहा:" तुम अपना नाश्ता ख़तम करो तब जाना. अभी मेराभी नाश्ता नही हुआ और तुम चली? कल जन्मी बच्ची से ये असर? तुम्हारा मेरे प्रती रवैय्या ही बदल गया!"
पूजा चुपचाप कुर्सी पे बैठ गयी. पूजा की दादी उठ खड़ी होने लगी तो गौरव ने उन्हें भी रोक दिया...बेचारी दादी...उनके घर में उन्हीं को उठने की इजाज़त नही थी! बच्ची और न जाने कितनी देर रोती गयी, और साथ दादी भी...वो चुपचाप आँसूं बहाती रहीं...पूजा को तो उतनी भी इजाज़त नही थी...जब सबकी चाय ख़त्म हुई तब गौरव ने कहा:
" अब जाओ अपनी लाडली के पास! ऐसे बर्ताव कर रही हो जैसे दुनिया में कोई पहली बार माँ बना हो!"
जो भी हो, पूजा तो पहली बार माँ बनी थी !
जब पूजा कमरेमे गयी और बिटिया को उठाने लगी तो देखा उसपे कई सारी लाल चीटियाँ चिपकी हुई थी...नन्हीं जान उसी के कारण बदहवास होके रो रही थी..!
उसके पीछे,पीछे कमरे में आए गौरव से वह बोली:" इसे तो चीटियों ने डस लिया था, इसीलिये रो रही है..."
गौरव: " तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे सांप या बिच्छू ने डंख मार दिया हो...इसकी जान जा रही हो...चीटी के काटने से यह मर थोड़े ही जायेगी?"
पूजा ने उसे जल्दी जल्दी नहला डाला...
बच्ची केवल ३० दिन की थी..आगे पूरी ज़िंदगी पडी थी...पूजाकी आँखों के आगे भविष्य का नज़ारा घूम गया..
क्रमश:
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
बिखरे सितारे !३ सितम औरभी थे!
पूर्व भाग..अजीबोगरीब मानसिक तथा शारीरिक तकलीफोंसे गुज़रती रही पूजा. उसके ब्याह को छ: माह हो गए और उसके पिता उसे मायके लेने आए.अब आगे ओ पढ़ें:
पूजा मायके पहुँची तो बेहद खामोश रहने लगी. वो क़तई नही चाहती थी की, उसके मायके वाले उसकी पीड़ा जान सकें. उसके दादा जी को शंका आती रही की सबकुछ ठीक नही है,लेकिन पूजा उन्हें हरबार खामोश कर देती. अपने कमरेमे बंद पडी पूजा को वे बाहर निकालना चाहते तो और उसकी खामोशी की वजह पूछते तो पूजा कह बैठती:
"कुछ भी तो नही..! आप क्यों खामखा परेशान होते हैं? मुझे अपने घर नींद कम मिलती है,इसलिए यहाँ सोती रहती हूँ !"
दादा जी छोटा -सा मूह लेके परे हो जाते. एक माह रुक पूजा अपने ससुराल लौट गयी. बेहद अंतर्मुखी हो गयी थी. सफ़र के दौरान उसने प्रण कर लिया की, चाहे जो हो जाय,वो अपने घरवालों का रवैय्या बदल के रहेगी...! हर मुमकिन कोशिश करेगी की, उनके चेहरों पे मुस्कान रहे..लेकिन ये उसकी क़िस्मत में नही था..
पती को लगता की, वो अगर घरवालों का साथ देते हुए उसे अपमानित न करेगा तो बीबी का गुलाम कहलायेगा! घरवाले उसे नीचा दिखानेका या अपमानित करनेका एक भी मौक़ा छोड़ते नही थे! पूजा अकेली पड़ती गयी...! उसके मनमे आता,की, गर उसका साथ नही देना था तो गौरव ने उसके साथ ब्याह किया ही क्यों?
पूजा एक अजीब-सी उदासी में घिर गयी. ऐसे में उसके फिर एकबार पैर भारी हो गए. दिवाली आने वाली थी...और उसकी माँ तथा बहन पहुँच गए. ! पूजा को फिर से रक्त स्त्राव शुरू हो गया और बिस्तरमे रहने की हिदायत दी गयी.
माँ और छोटी बहन के आँखों से पूजा की स्थती छुपाई न जा सकी. माँ को हालात देख बेहद सदमा पहुँचा. घरवालों ने माँ को भी कई बार बातों ही बातों में ज़लील किया. इन सब बातों के चलते पूजा का दोबारा गर्भपात हो गया. इस बार डॉक्टर तो दूसरी थी लेकिन उसने बच्चे का लिंग घरवालों को बता दिया. पहली बार भी लड़का था. कौन जनता था की, इन बातों का कितना दूरगामी असर होगा?
अस्पताल से पूजा जब घर आयी तो दर्द में थी. पिछले कुछ दिनों से बिस्तर में रहने के कारण कपडे आदी धो न सकी थी. सास ने उसे बुला के कपड़ों का ढेर आगे रख दिया और कहा," इन्हें पहले दो लो फिर आराम की सोचना. "
पूजाकी माँ:" मै धो देती हूँ...इसे दर्द हो रहा है..."
सास:" अजी ऐसे दर्द बतेरे देख रखे हैं..ये कौन बच्चा पैदा करके आयी है...आप हमारे घरके मामलों में दखल ना दें..इसे ज्यादा नज़ाक़त दिखाने की ज़रुरत नही है..!"
माँ खामोश रह गयी. छुपके आँसू बहाने के अलावा उनके पास अन्य चारा नही था. गौरव भी हर चीज़ खुली आँखों से देखता रहा. माँ तथा बहन के रहते ऐसी अन्य कई बाते हुई जो माँ और बहन के आगे पूजा की ज़िंदगी खुली किताब की तरह दिखा गयीं..ये तो भविष्य की एक झलक थी.
क्रमश:
पूजा मायके पहुँची तो बेहद खामोश रहने लगी. वो क़तई नही चाहती थी की, उसके मायके वाले उसकी पीड़ा जान सकें. उसके दादा जी को शंका आती रही की सबकुछ ठीक नही है,लेकिन पूजा उन्हें हरबार खामोश कर देती. अपने कमरेमे बंद पडी पूजा को वे बाहर निकालना चाहते तो और उसकी खामोशी की वजह पूछते तो पूजा कह बैठती:
"कुछ भी तो नही..! आप क्यों खामखा परेशान होते हैं? मुझे अपने घर नींद कम मिलती है,इसलिए यहाँ सोती रहती हूँ !"
दादा जी छोटा -सा मूह लेके परे हो जाते. एक माह रुक पूजा अपने ससुराल लौट गयी. बेहद अंतर्मुखी हो गयी थी. सफ़र के दौरान उसने प्रण कर लिया की, चाहे जो हो जाय,वो अपने घरवालों का रवैय्या बदल के रहेगी...! हर मुमकिन कोशिश करेगी की, उनके चेहरों पे मुस्कान रहे..लेकिन ये उसकी क़िस्मत में नही था..
पती को लगता की, वो अगर घरवालों का साथ देते हुए उसे अपमानित न करेगा तो बीबी का गुलाम कहलायेगा! घरवाले उसे नीचा दिखानेका या अपमानित करनेका एक भी मौक़ा छोड़ते नही थे! पूजा अकेली पड़ती गयी...! उसके मनमे आता,की, गर उसका साथ नही देना था तो गौरव ने उसके साथ ब्याह किया ही क्यों?
पूजा एक अजीब-सी उदासी में घिर गयी. ऐसे में उसके फिर एकबार पैर भारी हो गए. दिवाली आने वाली थी...और उसकी माँ तथा बहन पहुँच गए. ! पूजा को फिर से रक्त स्त्राव शुरू हो गया और बिस्तरमे रहने की हिदायत दी गयी.
माँ और छोटी बहन के आँखों से पूजा की स्थती छुपाई न जा सकी. माँ को हालात देख बेहद सदमा पहुँचा. घरवालों ने माँ को भी कई बार बातों ही बातों में ज़लील किया. इन सब बातों के चलते पूजा का दोबारा गर्भपात हो गया. इस बार डॉक्टर तो दूसरी थी लेकिन उसने बच्चे का लिंग घरवालों को बता दिया. पहली बार भी लड़का था. कौन जनता था की, इन बातों का कितना दूरगामी असर होगा?
अस्पताल से पूजा जब घर आयी तो दर्द में थी. पिछले कुछ दिनों से बिस्तर में रहने के कारण कपडे आदी धो न सकी थी. सास ने उसे बुला के कपड़ों का ढेर आगे रख दिया और कहा," इन्हें पहले दो लो फिर आराम की सोचना. "
पूजाकी माँ:" मै धो देती हूँ...इसे दर्द हो रहा है..."
सास:" अजी ऐसे दर्द बतेरे देख रखे हैं..ये कौन बच्चा पैदा करके आयी है...आप हमारे घरके मामलों में दखल ना दें..इसे ज्यादा नज़ाक़त दिखाने की ज़रुरत नही है..!"
माँ खामोश रह गयी. छुपके आँसू बहाने के अलावा उनके पास अन्य चारा नही था. गौरव भी हर चीज़ खुली आँखों से देखता रहा. माँ तथा बहन के रहते ऐसी अन्य कई बाते हुई जो माँ और बहन के आगे पूजा की ज़िंदगी खुली किताब की तरह दिखा गयीं..ये तो भविष्य की एक झलक थी.
क्रमश:
शनिवार, 9 जनवरी 2010
पूजा की कहानी...
२/३ दिनों में पूजा की कहानी आगे बढ़ेगी..देरी के लिए माफी चाहती हूँ..ख़राब तबियत इसकी वजह रही..आप सभीका प्यार बना रहे यही दुआ है!
मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
बिखरे सितारे :भाग २: सैलाबे दर्द...
पिछले भाग में पढ़ा :मकान मालकिन चाभी ले गयी, और पूजा पर गौरव औरभी गरज पडा..पूजा से बोला ना गया..बोलती भी तो उसकी कौन सुनता? उसने अपनी सास तथा जेठानी के मुखपे एक कुटिल -सी मुस्कान देखी.
और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..
अब आगे:
पूजा इन हालातों में अपने आपको बेहद अकेला महसूस करने लगी...पलकों पे आँसूं तैरते रहते और वो उन्हें अन्दर ही अन्दर पी जाती..किसे कहे..किसे सुनाये..जिसके साथ वो दो बातें प्यारकी करना चाहती, जिससे दो बातें प्यारकी सुनना चाहती, वो बडाही बेदर्द निकला...पूजा को विश्वास नही होता की,गौरव इस तरह का बर्ताव करेगा...दिन गुज़रते रहे..वो मुरझा-सी गयी...
ब्याह को तीन माह होने आए और उसके पैर भारी हो गए...एक अतीव आनंद उसके मनमे समाया...खुदके माँ बन्ने से अधिक उसे इस बात की खुशी हुई, की, उसकी माँ नानी बनेगी..उसकी दादी परनानी बनेगी...वो लोग कितने ख़ुश होंगे...और खुशी का ज़रिया उनकी लाडली पूजा तमन्ना होगी..लेकिन विधीका विधान कुछ और था...उसे रक्त स्त्राव शुरू हो गया, और गर्भ पात हो गया..उसके मनमे आया,काश, उसने अपने नैहर ख़त न लिखा होता..! उसके पीहर में सब कितने निराश हो जायेंगे जब ये खबर सुनेंगे!.सभी को पूजा की चिंता होगी..की उसका स्वस्थ तो ठीक है...
जब पूजा को ऑपरेशन के लिए ले गए तो उसे लोकल अनेस्थेशिया देने का भी उस महानगर के doctors को ध्यान नही रहा...जैसे साग सब्ज़ी काटनी हो उस तरह से वो ऑपरेशन कर दिया गया..पूजा चींख चींख के कहती रही,की, उसे बेहद दर्द है, और डॉक्टर ने डांट दिया," इतना दर्द तो सहनाही पडेगा..."
इतना अमानवीय बर्ताव उसने कहीँ न देखा था ना सुना था..! जब कमरेमे आयी तो पीली फक्क पड़ गयी थी..गर उसके दादी दादा उसकी ये हालत देखते तो उनपे क्या गुज़रती?
गौरव का उसके साथ बर्ताव उन्हें कितना दर्द पहुँचाता? उसने क्या करना चाहिए? चुपचाप सहना चाहिए या....?गौरव और उसके परिवारवालों को समय देना चाहिए? फिलहाल उसे चुपही रहना चाहिए...नैहर में कुछ नही बताना चाहिए,उसके मनने उसे गवाही दी...किसे पता था,की, इतनी कोमल लडकी शारीरिक मानसिक दर्द का ऐसा सैलाब थाम सकती थी?
ब्याह के छ: माह बाद उसे अपने नैहर जाने का मौक़ा मिला..उसके पिता उसे लेने आए..
क्रमश:
और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..
अब आगे:
पूजा इन हालातों में अपने आपको बेहद अकेला महसूस करने लगी...पलकों पे आँसूं तैरते रहते और वो उन्हें अन्दर ही अन्दर पी जाती..किसे कहे..किसे सुनाये..जिसके साथ वो दो बातें प्यारकी करना चाहती, जिससे दो बातें प्यारकी सुनना चाहती, वो बडाही बेदर्द निकला...पूजा को विश्वास नही होता की,गौरव इस तरह का बर्ताव करेगा...दिन गुज़रते रहे..वो मुरझा-सी गयी...
ब्याह को तीन माह होने आए और उसके पैर भारी हो गए...एक अतीव आनंद उसके मनमे समाया...खुदके माँ बन्ने से अधिक उसे इस बात की खुशी हुई, की, उसकी माँ नानी बनेगी..उसकी दादी परनानी बनेगी...वो लोग कितने ख़ुश होंगे...और खुशी का ज़रिया उनकी लाडली पूजा तमन्ना होगी..लेकिन विधीका विधान कुछ और था...उसे रक्त स्त्राव शुरू हो गया, और गर्भ पात हो गया..उसके मनमे आया,काश, उसने अपने नैहर ख़त न लिखा होता..! उसके पीहर में सब कितने निराश हो जायेंगे जब ये खबर सुनेंगे!.सभी को पूजा की चिंता होगी..की उसका स्वस्थ तो ठीक है...
जब पूजा को ऑपरेशन के लिए ले गए तो उसे लोकल अनेस्थेशिया देने का भी उस महानगर के doctors को ध्यान नही रहा...जैसे साग सब्ज़ी काटनी हो उस तरह से वो ऑपरेशन कर दिया गया..पूजा चींख चींख के कहती रही,की, उसे बेहद दर्द है, और डॉक्टर ने डांट दिया," इतना दर्द तो सहनाही पडेगा..."
इतना अमानवीय बर्ताव उसने कहीँ न देखा था ना सुना था..! जब कमरेमे आयी तो पीली फक्क पड़ गयी थी..गर उसके दादी दादा उसकी ये हालत देखते तो उनपे क्या गुज़रती?
गौरव का उसके साथ बर्ताव उन्हें कितना दर्द पहुँचाता? उसने क्या करना चाहिए? चुपचाप सहना चाहिए या....?गौरव और उसके परिवारवालों को समय देना चाहिए? फिलहाल उसे चुपही रहना चाहिए...नैहर में कुछ नही बताना चाहिए,उसके मनने उसे गवाही दी...किसे पता था,की, इतनी कोमल लडकी शारीरिक मानसिक दर्द का ऐसा सैलाब थाम सकती थी?
ब्याह के छ: माह बाद उसे अपने नैहर जाने का मौक़ा मिला..उसके पिता उसे लेने आए..
क्रमश:
रविवार, 13 दिसंबर 2009
भाग २ :बिखरे सितारे:२ पीका नगर
अबतक की मलिका का सारांश: भाग २ :बिखरे सितारे:२ पीका नगर
एक गांधी वादी,मुस्लिम परिवार में पूजा/तमन्ना का जन्म हुआ...उसका बचपन गाँव में बीता. दादा दादी का भरपूर प्यार उसने पाया. खुले विचारों में पली बढ़ी. लेकिन एक समस्या उसे हमेशा परेशान करती रही...अपनी माँ के प्रति दादा का सख्त व्यवहार...पिता की ओरसे भी माँ छली गयी..
यौवन की दहलीज़ पे उसकी मुलाक़ात किशोर से हुई. किशोर सरकारी, तबादलों वाली नौकरी में कार्यरत था. मुलाक़ात भी अजीब हालात में हुई...पूजाके भाईके हाथ से( जो तब केवल १२/१३ साल का था),बंदूक से गोली छूट गयी...दादाजी ने अपनी ओरसे बंदूक खाली कर दी थी,लेकिन उसमे एक गोली रह गयी थी.भाई को भी नही पता था. खेतपर के किसी लड़के के उकसाए जानेपर, उसने उसके पैरों पर निशाना ले गोली दाग दी.
खून में लथपथ उस लड़के को दादा जी अस्पताल ले गए. लड़का तो ठीक हो गया. लेकिन दादा जी बंदूक ज़प्त कर ली गयी. उन्हों ने हादसे की ज़िम्मेदारी पूरी तरह खुद पे ले ली. वो बेहद सत्य वचनी थे.इन्ही हालातों के चलते IAS के अफसर किशोर से उस परिवार की मुलाक़ात हुई. पूजा उस वक़्त छात्रावास में थी. लौटी तो किशोर से परिचय हुआ. दोनों के मनमे प्यार पनपा.
किशोर का दिल्ली तबादला हो गया. जानेसे पूर्व उसने पूजासे अपना धरम परिवर्तन की मांग की. मासूम पूजा बात की गहराई को समझी नही और उसने हाँ कर दी.
जब पूजा की माँ और पूजा किशोर के परिवार से मिलने दिल्ली गए तो वहाँ इस बात का ज़िक्र छिड़ा. पूजा की माँ हैरान हो गयी..खुद पूजा को भी जब बात का गाम्भीर्य पता चला तो वो भी सकते में आ गयी..उसने अपनी गलती मान ली और किशोर से इस बात का विरोध जताया. वो प्यार करके हार गयी..सपने चकनाचूर हुए.
इसमे उसके मूहसे यह बात कोशोर के चंद दोस्तों के आगे निकल गयी और वो खूब रोई. इन दोस्तों में एक गौरव भी था. गौरव ने अपने परिवार की सहमती से पूजा के साथ ब्याह करने का निर्णय लिया. पूजाके परिवार ने स्वीकार किया.
ब्याह के पश्च्यात पूजा की समझमे आ गया की, गौरव की मानसिकता किशोर से अलग नही थी...उसने चाहा की, पूजा उसके परिवारकी एहसान मंद रहे,की, उन्हों ने एक' ऐसी, लडकी से ब्याह करने की इजाज़त दी..मानो वो किसी की उतरन हो! सुहाग रात को ही पूजा को यह बात सुननी पडी और वो दर्द से कराह उठी.
अब आगे पढ़ें:
पूजा ने अपने आप को ऐसे माहौल में बेहद अकेला पाया. पूरा दिन वो घरवालों के ताने सुनती. शाम जब गौरव घर आता, तो घरवाले पूजा के खिलाफ उसके कान भरते. पूजा को समझ में नही आया,की, गर ऐसे हालात थे,तो गौरव ने उसके साथ शादी क्यों की...उसने कुछ छुपाया नही था...
घरका सारा काम,बिना किसी नौकर चाकर के उसने संभाल लिया था, लेकिन जी जान लगा के भी, उसे ताने ही सुनने पड़ते थे.
बल्कि, जिस रात वो सब लखनऊ से दिल्ली पहुँचे उसके अगले दिन की बात:
गौरव अपनी भाई के साथ सुबह कहीँ घूमने गया. पड़ोस का एक कमरा इन दोनों के खातिर तीन दिनों के लिए, लिया गया था.गौरव ने लौटते ही पूजा से पूछा
:" तुमने वहाँ झाडू लगाई?"
पूजा:" ना..नही तो..मुझे नही पता था..मै तो सवेरे ४ बजे ही नीचे आ गयी थी.."
( उस दिन करवा चौथ का व्रत था)
गौरव: " तो झाडू तुम्हारा बाप आके लगाएगा या मेरा बाप?"
गौरव ने भरे हुए घर में,सबके सामने, पूजा का अपमान किया..पूजा की आँखें भर आयीं..
पूजा:" मै अभी लगा देती हूँ..."
पूजा का इतना कहना भर था,की, उस घरकी मालकिन वहाँ आ पहुँची और बोली:" माफी चाहती हूँ, हमें आज ही कमरा चाहिए.."
पूजा के मनमे झाडू का विचार भी आता तो चाभी गौरव के पास थी...और गौरव बाहर चला गया था...
मकान मालकिन चाभी ले गयी, और पूजा पर गौरव औरभी गरज पडा..पूजा से बोला ना गया..बोलती भी तो उसकी कौन सुनता? उसने अपनी सास तथा जेठानी के मुखपे एक कुटिल -सी मुस्कान देखी.
और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..
क्रमश:
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एक गांधी वादी,मुस्लिम परिवार में पूजा/तमन्ना का जन्म हुआ...उसका बचपन गाँव में बीता. दादा दादी का भरपूर प्यार उसने पाया. खुले विचारों में पली बढ़ी. लेकिन एक समस्या उसे हमेशा परेशान करती रही...अपनी माँ के प्रति दादा का सख्त व्यवहार...पिता की ओरसे भी माँ छली गयी..
यौवन की दहलीज़ पे उसकी मुलाक़ात किशोर से हुई. किशोर सरकारी, तबादलों वाली नौकरी में कार्यरत था. मुलाक़ात भी अजीब हालात में हुई...पूजाके भाईके हाथ से( जो तब केवल १२/१३ साल का था),बंदूक से गोली छूट गयी...दादाजी ने अपनी ओरसे बंदूक खाली कर दी थी,लेकिन उसमे एक गोली रह गयी थी.भाई को भी नही पता था. खेतपर के किसी लड़के के उकसाए जानेपर, उसने उसके पैरों पर निशाना ले गोली दाग दी.
खून में लथपथ उस लड़के को दादा जी अस्पताल ले गए. लड़का तो ठीक हो गया. लेकिन दादा जी बंदूक ज़प्त कर ली गयी. उन्हों ने हादसे की ज़िम्मेदारी पूरी तरह खुद पे ले ली. वो बेहद सत्य वचनी थे.इन्ही हालातों के चलते IAS के अफसर किशोर से उस परिवार की मुलाक़ात हुई. पूजा उस वक़्त छात्रावास में थी. लौटी तो किशोर से परिचय हुआ. दोनों के मनमे प्यार पनपा.
किशोर का दिल्ली तबादला हो गया. जानेसे पूर्व उसने पूजासे अपना धरम परिवर्तन की मांग की. मासूम पूजा बात की गहराई को समझी नही और उसने हाँ कर दी.
जब पूजा की माँ और पूजा किशोर के परिवार से मिलने दिल्ली गए तो वहाँ इस बात का ज़िक्र छिड़ा. पूजा की माँ हैरान हो गयी..खुद पूजा को भी जब बात का गाम्भीर्य पता चला तो वो भी सकते में आ गयी..उसने अपनी गलती मान ली और किशोर से इस बात का विरोध जताया. वो प्यार करके हार गयी..सपने चकनाचूर हुए.
इसमे उसके मूहसे यह बात कोशोर के चंद दोस्तों के आगे निकल गयी और वो खूब रोई. इन दोस्तों में एक गौरव भी था. गौरव ने अपने परिवार की सहमती से पूजा के साथ ब्याह करने का निर्णय लिया. पूजाके परिवार ने स्वीकार किया.
ब्याह के पश्च्यात पूजा की समझमे आ गया की, गौरव की मानसिकता किशोर से अलग नही थी...उसने चाहा की, पूजा उसके परिवारकी एहसान मंद रहे,की, उन्हों ने एक' ऐसी, लडकी से ब्याह करने की इजाज़त दी..मानो वो किसी की उतरन हो! सुहाग रात को ही पूजा को यह बात सुननी पडी और वो दर्द से कराह उठी.
अब आगे पढ़ें:
पूजा ने अपने आप को ऐसे माहौल में बेहद अकेला पाया. पूरा दिन वो घरवालों के ताने सुनती. शाम जब गौरव घर आता, तो घरवाले पूजा के खिलाफ उसके कान भरते. पूजा को समझ में नही आया,की, गर ऐसे हालात थे,तो गौरव ने उसके साथ शादी क्यों की...उसने कुछ छुपाया नही था...
घरका सारा काम,बिना किसी नौकर चाकर के उसने संभाल लिया था, लेकिन जी जान लगा के भी, उसे ताने ही सुनने पड़ते थे.
बल्कि, जिस रात वो सब लखनऊ से दिल्ली पहुँचे उसके अगले दिन की बात:
गौरव अपनी भाई के साथ सुबह कहीँ घूमने गया. पड़ोस का एक कमरा इन दोनों के खातिर तीन दिनों के लिए, लिया गया था.गौरव ने लौटते ही पूजा से पूछा
:" तुमने वहाँ झाडू लगाई?"
पूजा:" ना..नही तो..मुझे नही पता था..मै तो सवेरे ४ बजे ही नीचे आ गयी थी.."
( उस दिन करवा चौथ का व्रत था)
गौरव: " तो झाडू तुम्हारा बाप आके लगाएगा या मेरा बाप?"
गौरव ने भरे हुए घर में,सबके सामने, पूजा का अपमान किया..पूजा की आँखें भर आयीं..
पूजा:" मै अभी लगा देती हूँ..."
पूजा का इतना कहना भर था,की, उस घरकी मालकिन वहाँ आ पहुँची और बोली:" माफी चाहती हूँ, हमें आज ही कमरा चाहिए.."
पूजा के मनमे झाडू का विचार भी आता तो चाभी गौरव के पास थी...और गौरव बाहर चला गया था...
मकान मालकिन चाभी ले गयी, और पूजा पर गौरव औरभी गरज पडा..पूजा से बोला ना गया..बोलती भी तो उसकी कौन सुनता? उसने अपनी सास तथा जेठानी के मुखपे एक कुटिल -सी मुस्कान देखी.
और फिर इसतरह के वाक़यात का एक सिलसिला-सा बनता गया..
क्रमश:
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गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
Poojaki kahani!
माफी चाहती हूँ ,की , पिछली कड़ी के बाद इतना लम्बा अंतराल हो गया...२/३ दिनों के भीतर अगली कड़ी लिख दूँगी! ख़राब तबियत के कारण नही पोस्ट कर पाई...
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