शनिवार, 31 जुलाई 2010

बिखरे सितारे १५:फिर एक इम्तिहान!


 (गतांक : तीन अखबारों में अब मेरे साप्ताहिक column छपने लगे..लेकिन ,लेकिन..बच्चों की याद..खासकर केतकी की, मुझे रुलाती रही...जीवन में उसे चैन नही हासिल हुआ...और चाहे गलती किसीकी हो...उसकी ज़िम्मेदार,एक माँ की तौरपे मै भी थी..आज माँ की मामता मुझे चैन नही लेने दे रही थी...)

ऐसेही दिन बीतते रहे...मुझे रोज़ केतकी के मेलका इंतज़ार रहता.. चाहे वो दो पंक्तियाँ क्यों न हो..उसके जानेके चंद दिनों बाद गौरव का ऐसी जगह तबादला हुआ जहाँ घर नहीं था. नयी पोस्ट बनी थी और उसे deputation पे बुलाया गया था..मै कुछ दिन अपने नैहर  रह आयी..

'सामान बाँध के तैयार रहो...ताकि मकान मिलतेही निकल सको..." ,गौरव ने मुझे कह रखा था..तीन माह बीत गए लेकिन मकान का इंतज़ाम नहीं हुआ...बच्चों से दूर होके मुझे वैसेही उदासी ने घेर रखा था..अब तो गौरव के न होने के कारण घरपे लोगों का आना जानाभी बहुत कम हो गया..
केतकी जब गयी तब मैंने सोचा था,की, अब मै अपनी कला प्रदर्शनी करुँगी...कुछ तो मन लगेगा..मैंने उस लिहाज़ से कपड़ा,धागे आदि खरीद लिए...और बस तभी गौरव का तबादला हो गया..किसी भी समय सामान समेट दूसरी जगह जाना होगा सोच मैंने प्रदर्शनी का ख़याल दिलसे निकाल दिया..
सरकारी नियम के अनुसार मै उस मकान में तीन माह्से अधिक नही रह सकती थी..किसी ने मुझे मकान खाली करनेको कहा नहीं था,लेकिन मेराही मन मानता नहीं था...गौरव की जगह जो अफ़सर आए थे,वो अथिति गृह में रह रहे थे..क्या करूँ? सामान लेके कहाँ जाऊँ   ?  सिर्फ मेरे रहनेकी बात होती तो मै अपने नैहर में रह लेती..
अंतमे गौरवही लौट आया..उसे राज्य सरकार ने बुला तो लिया लेकिन कोई पोस्ट खाली नही थी..वो बिना पोस्ट का था,तो मकान का सवाल आही गया..अंत में बंगलौर में एक बेडरूम और रसोई वाला फ्लैट किरायेपर लेनेका तय हुआ..पर वो नौबत नहीं आयी,और उसकी पोस्टिंग बंगलौर में ही हो गयी...

देखते ही देखते केतकी को जाके तक़रीबन एक साल हो गया. वो दो सप्ताह के लिए भारत आयी. उस समय हम उसके भावी ससुराल वालों से मिले. कोशिश थी की, राघव तथा उसकी पढाई ख़त्म होतेही ब्याह कर दिया जाय...लेकिन ससुराल वालों के लिहाजसे कोई मुहूर्त अगले साल भरमे नही था...
केतकी के स्वभाव में आया परिवर्तन कायम था...बहुत चिडचिडी हो गयी थी...ख़ास कर मेरे साथ..कई बार मै अकेलेमे रो लेती..इतने बरसोंका तनाव अब उसपे असर दिखा रहा था..अपने पितासे तो वो कुछ कह नहीं सकती लेकिन भड़ास मुझपे निकलती..और उसके लौटने का समय भी आ गया..बिटिया आई और गयी...मै उसे आँख भर देख भी न पाई..बातचीत तो दूर..
मेरी चिड़िया फिर एकबार सात समंदर पार चली गयी..
इधर अमनकी पढ़ाई भी ख़त्म हो गयी..उसने M.B.A कर लिया और उसे चंडीगढ़ में नौकरी मिल गयी. केतकी पढाई के  साथ नौकरी भी कर रही थी. ...उसे final परिक्षा में अवार्ड भी मिला..मै बहुत ख़ुश हुई..लगा,बच्ची की मेहनत रंग लाई..
उसने भी नौकरी के लिए अर्ज़ियाँ दे रखी थी....उसे उसी शहर में नौकरी मिली जहाँ राघव को मिली थी..
एक दिन शाम गौरव घर आया और  मुझ से बोला," केतकी का फोन था..वो और राघव अगले माह रजिस्टर  पद्धती  से ब्याह कर ले रहे हैं..."
सुनके कुछ देर तो मेरी कोई प्रतिक्रया नही हुई...पर धीरे,धीरे मनमे बात उतरी..बिटिया का ब्याह और मै नही जा सकूँगी...कहाँ तो उसके ब्याह को लेके इतने सपने संजोये थे...उसके सारे कपडे मै खुद डिजाईन करने वाली थी...' बाबुल की दुआएँ लेती जा',इस गीत के पार्श्वभूमी में उसकी बिदाई करने वाली थी..जानती थी,की, वो नही रोयेगी, लेकिन मै अपनी माँ के गले लग खूब रोने वाली थी...
मेरी आँखों के आगे से गौरव का चेहरा ना जाने कब हट गया और मै ज़ारोज़ार रोने लगी...चंद घंटों की बिटिया मेरी निगाहों में समा गयी...वो आँखें भींचा हुआ कोमल मुखड़ा..जिसके इर्द गिर्द मै सपने बुनने वाली थी...उसे अपनी बाहों में लिया तो अनायास एक दुआ निकली...हे ईश्वर! इसकी राह के सारे काँटे मुझे दे देना...उसकी राहों में फूल ही फूल बिछा देना...

उसके जीवन का इतना अहम दिन और मै वहाँ हाज़िर नही...? दिल को मनाना मुश्किल था...नियती पे मेरा कोई वश नही था...ईश्वर क्यों मेरी ममता का इस तरह इम्तेहान ले रहा था? मैंने ऐसा कौनसा जुर्म कर दिया था? किया था..मेरे रहते,मेरी बिटियाको ज़ुल्म सहना पड़ा था..मुझे क़ीमत चुकानी थी...पर मेरा मन माने तो ना...

क्रमश:

10 टिप्‍पणियां:

ali ने कहा…

शादी के लिए देश आने का समय नहीं था ,बच्चों के पास ?
आपकी फीलिंग्स मैं समझ सकता हूं !

रचना दीक्षित ने कहा…

सच दुःख तो होता ही है जिसे डोली में बिठाने का सपना देखा हो और मौका न मिले अच्छी प्रस्तुति

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

शायद नई पीढ़ी को भावनाओं की वह क़द्र नहीं ...

Vijay Pratap Singh Rajput ने कहा…

बहुत सुंदर जी

नीलम शर्मा 'अंशु' ने कहा…

11.30pm पर अपने मेल बॉक्स मे रौशन जी के मेल द्वारा बिखरे सितारे को पढ़ने का सुझाव मिला, उसी वक्त चेक करके पढ़ना शुरू किया और यकीन मानिए एक ही सिटिंग में 1.17am पर ख़त्म किया। आपके साथ सारे उतार-चढ़ावों में शिरकत की। बयां करने के लिए अल्फाज़ नहीं हैं, सिर्फ़ महसूस करने की बात है।

मैं अक्सर कहा करती हूँ कि नेकी कर दरिया में डाल। आज के माता पिता को अपने बच्चों के प्रति सिर्फ़ अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए, उनसे किसी तरह की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। कुछ पॉज़िटव मिल जाए तो बहुत अच्छा, न मिले तो और भी अच्छा। जैसा कि अमित जी(बच्चन) अपने बाबू जी का हवाला देकर कहते हैं न, कि मन का हो तो अच्छा, न हो तो और अच्छा। लेकिन इतना सहज़ नहीं होता इस भावुक और बेवकूफ़ मन को समझाना। वर्ना क्यों कहना पड़ता कि दिल है कि मानता ही नहीं।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aisa lagta hai aap apne pe beeti baat likh rahi hon.........dil ko chhuti hai.......ketki ko bharat aana chahiye tha......saadi ke liye...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aisa lagta hai aap apne pe beeti baat likh rahi hon.........dil ko chhuti hai.......ketki ko bharat aana chahiye tha......saadi ke liye...

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! उम्दा पोस्ट!
मित्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

kshama ने कहा…

Anshuji,aapke blogpe pahunchne kee anginat koshishe keen.Page load error ke karan nahi pahunch payi.Pata nahi aisa kyon ho raha hai lagatar!Ab aapke saath kaise sampark kiya jaye?