रविवार, 3 जुलाई 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार!!3


( गतांक : इन सब बातों के चलते मैंने गौर किया की,आयुषी बड़े दिनों से स्क्रैप पे कुछ लिख नहीं रही है. ना मेरे पूछने पर ही कुछ जवाब दे रही है! इसे क्या हो गया? ये जो मेरे तथा अर्चना के लिए कहती थी," तुम दोनों मेरे लिए दो नायाब रत्न हो....!"कहाँ खो गयी है? .....अब आगे....)
जब भी rediffconnexions पे जाती,मुझे आयुषी की तलाश रहती....पर वो नहीं मिलती. अचानक एक दिन उसका पर्सनल मेसेज बॉक्स में मेल मिला. उसने लिखा था," मेरा जी करता बिस्तर पर लेटी रहूँ .....और यही करती हूँ...लेटे,लेटे छत को निहारती रहती हूँ..."
मैंने तुरंत जवाब दिया," आयुषी ऐसा क्यों? तुम इतनी निराश किसलिए हो?कुछ तो कहो....मुझे तो ये पढके तुम्हारी बहुत अधिक चिंता हो रही है...आखिर क्या चाहती हो जीवन में जो तुम्हें नहीं मिल रहा? ऐसा कौनसा अभाव है जो तुम्हें इतना अधिक खल रहा है?"
उसका जवाब आया," ज़िंदगी में हरेक चीज़ तो हासिल नहीं होती....." 
बस एक पंक्ती....इससे किसी को क्या पता चल सकता था? मैंने दोबारा उसे लिखा, लेकिन इस बार वो फिर गायब हो गयी. कोई जवाब नहीं, कोई प्रतिक्रया नहीं. मै फिर परेशान हो गयी. निराशाजनक  स्थिती क्या होती है,मै अच्छी तरह जानती थी,समझती थी. क्या किया जाये? समझ नहीं पा रही थी...इसे ऐसा क्या दर्द हो सकता है जो बाँट भी नहीं रही....!

" आयुषी! कुछ तो कहो! मुझे नहीं तो किसी अन्य सहेली से कहो....ऐसे कैसे चलेगा! कुछ कहोगी तो जी हल्का होगा! कम से कम जवाब तो दो !"

क्या इसे किसी से प्यार हो गया है और माता पिता राज़ी नहीं रिश्ते को लेके? लडकी कुछ कहती भी तो नहीं!!

इसी दौरान अर्चना तथा  सौगात के स्क्रैप पर से पता चलता रहा की,सौगात  शायद देहली से मुंबई शिफ्ट करनेवाला है.  अर्चना ने लिखा था," तुम्हारा मुंबई आने का बहुत इंतज़ार है. मै अम्मीजान से संगीत सीख सकूंगी". मतलब अर्चना गाती भी थी! किसी और के एक स्क्रैप से पता चला था की वो दिखने में भी बहुत सुन्दर है!

मै आयुषी को लगातार  लिखती रही और एक दिन उसका जवाब आया,"हाँ! मुझे प्यार हो गया है...."
" आयुषी! किससे प्यार हुआ है? कुछ उसके बारे में भी तो लिखो!  और प्यार हुआ है तो इतनी निराश क्यों हो? तुम दोनों के बीछ ऐसी कौनसी बाधा है जो तुम्हें निराश कर रही है?"

बड़े इंतज़ार के बाद आयुषी का जवाब आया," जिसे प्यार करती हूँ,वो मुझे कभी हासिल नहीं हो सकता....."
"आयुषी! ऐसे क्यों कहती हो? "
" ये भी तो हो सकता है की,ये प्यार एकतरफा हो....!"
"क्या उसे पता है की,तुम उसे प्यार करती हो?क्या मै तुम दोनों के बछ किसी बात चीत का सिलसिला बना सकती हूँ?"मैंने पूछा.
" नहीं....उसे नहीं पता.....और तुम भी कुछ नहीं कर सकती..."आयुषी ने लिखा...अब इसका क्या मतलब लूँ मै?
"वो कौन है इतना तो बता सकती हो! फिर मेरी कोशिशों पे छोड़ देना. इतनाही हो सकता है न की,वो मना कर दे. कम से कम ये उलझन की स्थिती से तो वो बेहतर होगा! ये भी हो सकता है की,वो मान जाय! शायद उसके दिलमे भी तुम्हारे लिए कुछ कोमल भावनाएं हों?"
"नहीं...उसके मन में मेरे लिए शायद कोई जगह नहीं...वो किसी और से प्यार करता है...." आयुषी ने लिखा.
ओहो! ये भी क्या पेचीदा मामला हुआ जा रहा था. बताये तो सही ये लडकी एक बार उसका नाम पता. पता तो कराऊँ की,सही में ऐसा है,जैसा वो सोचती है...!
मैंने उससे दोबारा बहुत इसरार करना शुरू किया....!ऐतबार दिलाती रही,की,मै केवल उसका भला चाहती हूँ....इस निराशाजनक स्थिती से उसे उभारना चाहती हूँ.....और कुछ नहीं.
बड़े इंतज़ार के बाद उसने लिखा," वो लड़का और कोई नहीं,सौगात है......मै केवल एक बार उससे मिलना चाहती हूँ....एक बार अपना दिल खोलके उसके आगे रखना चाहती हूँ.....और कुछ नहीं....लेकिन मुझे नही लगता वो मेरी ये इच्छा भी पूरी करेगा....!"
सौगात! हे भगवान्! ये क्या कह दिया आयुषी ने?? जानते हुए की,वो अर्चना के प्यार में पूरी तरह  डूबा हुआ है!

क्रमश:

शनिवार, 25 जून 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार! 2

( गतांक:मेरा किरदार यहाँ क्या था? मैंने कौनसा रोल निभाया....या निभाने की कोशिश की,ये अगली बार....बड़े ही फ़िल्मी ढंगसे यहाँ प्रेम का एक त्रिकोण बनता जा रहा मुझे नज़र आ रहा था...अब आगे...)

मै अक्सर अपने स्क्रैप पे कोई कविता या नज़्म  लिखती  रहती. कई लोग उसे पसंद करते,उनमे से अर्चना एक थी. उसने मुझसे एक दिन पूछा," क्या मै तुम्हारी रचनाओं संकलन कर सकती हूँ?"
मैंने जवाब में कहा," क्यों नहीं? खुशी से करो!"
जब अर्चना को समय नहीं मिलता तो ये काम उसके लिए आयुषी कर दिया करती.

 एक दिन मैंने हमारी एक common सहेली के स्क्रैप पे आयुषी का कमेन्ट पढ़ा," क्या तुमने देखा सौगात दोबारा rediffconnxions पे लौटा है...उसने अपनी फोटो भी लगाई है और अर्चना के लिए मेसेज भी छोड़ा है?"
उस महिला का जवाब पढने मै आयुषी के स्क्रैप पे गयी. वहाँ उसने लिखा था," हाँ देखा और पढ़ा...जिसमे अर्चना को खुशी मिले ,सौगात वही कर रहा है तो करने दो....दोनों खुश रहें...god bless them both !"

मै उत्सुकतावश अर्चनाके स्क्रैप पे गयी. वहाँ सौगात का मेसेज था," तुम्हें सालगिराह बहुत,बहुत मुबारक हो! आज सुबह मुमानी जान के यहाँ कई तरीकों से तुम्हें बधाई देने के बाद, तुम्हारी इच्छा के अनुसार मै स्क्रैप पे भी तुमसे  अपने दिलकी बात कह रहा हूँ...आय  लव यू....आय लव यू,आय लव यू!"


अर्चना शादीशुदा थी और सौगात इतने खुलेआम अपने प्यार का इज़हार उससे कर रहा था? बात मुझे ज़रा अटपटी तो लगी! मै लिंक लेके सौगात के स्क्रैप पे गयी....देखना चाह रही थी,की,अर्चना ने उसका क्या जवाब दिया! 
अर्चना ने लिखा था," I adore you & will always adore you!"
 एक तरह से इतना निडर होके अपने प्यार का इज़हार करना....सौगात की ये बात मुझे अच्छी भी लगी. मैंने पर्सनल मेसेज बॉक्स में अर्चना को एक ख़त लिखा," अर्चना! ज़िंदगी हर किसी को खुश रहने का दोबारा मौक़ा नहीं देती. गर तुम्हें ये मौक़ा मिल रहा है तो मै तुम्हारे साथ हूँ....गँवाना नहीं...तुम ने मेरी कहानी," आकाशनीम" पढी ना?"

अर्चना का जवाब आया," सौगात को मै बचपन से जानती हूँ...उसके दिलकी हर बात मुझे पता रहती है......ऐसा नहीं की,मेरी शादी के लिए मैंने कम तकलीफें उठाई. ये शादी भी मेरी मर्ज़ी से हुई है...मेरी ज़िद से हुई है...बस .....! शायद ज़िंदगी में कई लोगों को कुछ हासिल हो जाने के बाद उसकी कद्र नहीं रहती.....शायद मेरे शौहर को भी वो कद्र नहीं रही... वैसे भी सब कुछ छोड़ देना इतना आसान नहीं...हाँ! कभी,कभी जी करता है,घंटों बैठ के रोती रहूँ! वो तो मेरी मसरूफियत है,जो मुझे रोने धोने का समय नहीं देती...!
वैसे मैंने "नीले पीले फूल" भी तो पढी...शायद मेरी ज़िंदगी इन दोनों कहानियों का मिश्रण है!"

मैंने लिखा," भगवान करे,तुम हमेशा इतनी मसरूफ़ रहो की,रोने धोने का तुम्हें मौक़ा  ही न मिले!"

इन सब बातों के चलते मैंने गौर किया की,आयुषी बड़े दिनों से स्क्रैप पे कुछ लिख नहीं रही है. ना मेरे पूछने पर ही कुछ जवाब दे रही है! इसे क्या हो गया? ये जो मेरे तथा अर्चना के लिए कहती थी," तुम दोनों मेरे लिए दो नायाब रत्न हो....!"कहाँ खो गयी है? 


क्रमश:




गुरुवार, 16 जून 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार..

चंद साल पूर्व मै rediffconnexion की मेम्बर बनी. स्क्रैप पे जो प्रोफाइल था वहाँ मैंने अपना वर्क प्रोफाइल डाला. जिन विषयों में मेरी रुची थी....जो मेरे रोज़गार के भी ज़रिये थे,मैंने उन सभी के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी.हफ्ते भर के अन्दर मै निराश हो गयी. मुझसे दोस्ती के लिए सब हाथ बढ़ा रहे थे,मेरे कामकाज में किसी को रुची नहीं थी. 

मैंने जल्द ही जो मालूमात ज़रूरी नहीं थी,तुरंत हटा दी. अपना सेल नंबर भी हटा दिया.गर कोई पूछता," आप कहा रहती हैं,तो मेरा जवाब होता,"हिंदी हैं हम,वतन है हिन्दोस्तान हमारा!"

खैर ! ऐसे ही निराशा के दौर में कुछ अच्छे दोस्त मिले. खासकर दो महिलाएँ थीं,जो मुझसे बड़े प्यारसे पेश आतीं...अर्चना जो एक डॉक्टर थी और विवाहिता.आयुषी,जो अपनी पढाई पूरी कर चुकी थी. जॉब के तलाश में थी. अर्चना और आयुषी की  मुझसे पहलेही आपस में जानपहचान थी.मतलब कुछ चंद माह पूर्व.मेल मिलाप नहीं.
मैंने अपने प्रोफाइल पे अपनी एक फोटो लगा रखी थी,जिसमे मैंने बडाही पारंपरिक पोशाख पहना था.सर चुनर से ढंका हुआ था. अन्य सदस्यों  की तरह,इन दोनोको भी इस तस्वीर ने आकर्षित किया.
आयुषी तथा अर्चनाने अपनी कोई तस्वीर नहीं लगाई थी. 

खैर समय बीतता रहा.एक दिन किसी अन्य सदस्य ततः आयुषी के बीच हुआ सम्वाद मैंने उन्हीं के स्क्रैप पे पढ़ा. मै अचानक सजग हो गयी. कुछ तो कहीं गड़बड़ है.....यहाँ पे एक तीसरे,बेहद सुदर्शन युवक का पदार्पण हुआ.नाम था उसका ,सौगात.और इसी के साथ,साथ,कुछ रिश्तों  की गुत्थियाँ बनी और धीरे,धीरे सुलझने भी लगीं.सुलझी....मतलब मेरे सामने कुछ अधिक स्पष्ट होता गया.इस गुत्थी में जो किरदार फंसे थे,वो तो फंसे ही रहे.ये एक अनजान दुनियामे क़दम रखने की फिसलन थी.....उसकी कीमत चुकानी थी,या दर्द सहना था....जोभी हो....इन सबसे निपटना और खुशी,खुशी बाहर निकलना ना -मुमकिन-सा लग रहा था...

मेरा किरदार यहाँ क्या था? मैंने कौनसा रोल निभाया....या निभाने की कोशिश की,ये अगली बार....बड़े ही फ़िल्मी ढंगसे यहाँ प्रेम का एक त्रिकोण बनता जा रहा मुझे नज़र आ रहा था...
क्रमश:






बुधवार, 11 मई 2011

दीपा 17

( गतांक :मै :" मुझे तो तुम्हारी चिंता हो रही है....सही गलत का निर्णय मै नही करुँगी.....पर तुम्हारी खुशी ज़रूर चाहती हूँ...आख़िर हर रिश्ते का मक़सद तो वही होता है,है ना? उसने अपनी पत्नी से भी यही वादा कभी किया होगा?"
दीपा:" लेकिन मेरा मन कहता है,सब ठीक होगा....हम दोनों कल भी कुछ देर मिलने वालें हैं! मेरा तो उससे पल भर भी अलग होने को जी नही चाहता!"

दीपा और भी बहुत कुछ बताती रही...बहुत उत्तेजित थी....लेकिन उसने मुझे गहरी सोचमे   अवश्य डाल दिया....पता नही,इस रिश्ते का भविष्य क्या था???क्या होगा???
अब आगे.....)
दीपा की सुदर्शन के साथ मुलाकातें चलती रहीं...वो मुझे हर मुलाक़ात का ब्योरा सुनाती....बेहद खुश थी...जब मुलाक़ात नहीं होती तो फोन,sms जारी रहते....sms भी मुझे दिखाती! फोन पे हुई बातचीत दोहराती...

एक दिन दीपा ने सुदर्शन को,उसे मिला एक शादी का प्रस्ताव sms के ज़रिये भेज दिया....दीपा उस समय मेरे घर पे थी. उसने तो मज़ाक़ ही मज़ाक़ में sms भेजा लेकिन सुदर्शन को बेहद ग़ुस्सा आ गया! उसने जवाब में, "अब मुझे तुम से कोई लेना देना नहीं....तुम लौट जाओ अपनी दुनिया में",ये अलफ़ाज़ लिख भेजे! दीपा पूरी रात रोती रही...सुबह बहुत बार माफी माँगी तब सुदर्शन का ग़ुस्सा शांत हुआ! डांटा तो मैंने भी दीपा को:" इस तरह के sms कोई पुरुष बर्दाश्त नहीं करेगा...उसे ईर्षा होगी और परिणामत: ग़ुस्सा आयेगा!"

सुदर्शन दीपा को लेके बहुत possesive   था. वैसे वो दीपा के पूरे परिवार को किसी ना किसी बहाने मिल लिया. उन दोनों की नज़दीकियाँ किस हद तक हैं,ये तो परिवार को नही पता था. 

सुदर्शन और दीपा,दोनों facebook पे हमेशा जाते रहते. दीपा के एक परिचित को सुदर्शन ने डिलीट करवाया. वो व्यक्ती उसे क़तई पसंद नही था,तथा उन दोनों का कुछ व्यक्तिगत पंगा भी था. वो व्यक्ती  property dealer था. इसी चक्कर  में दीपा ने उसे कुछ हफ़्तों बाद दोबारा 'फ्रेंड'स लिस्ट' में add कर दिया....और उसकी ज़िंदगी में कहर  ढाया ! सुदर्शन ने दीपा को ही अपनी लिस्ट से डिलीट कर दिया! 

दीपा ने ये बात मुझे फोन पे बतायी. वो बेहद परेशान हो उठी. सुदर्शन उसका फोन उठाता नही था....दीपा और उस के बीछ केवल sms चल रहा था.....और उस के जवाब भी सुदर्शन बड़ी देर लगा के देता. अब दीपा ने मुझे उससे बात करने के लिए कहा. मैंने फोन मिलाके  कहा," (थोड़ा अनजान बनते हुए): आप दोनों के बीछ मन मुटाव का सही कारण तो मै नही जानती....लेकिन दीपा की हालत मुझ से देखी नही जाते....एक दुसरे से एक बार फोन पे बात क्यों नही कर लेते? शायद उलझन कुछ सुलझ जाये!"
सुदर्शन:" आपको जब मन मुटाव का कारण ही नही पता तो आप सही गलत का फैसला कैसे कर सकतीं हैं?"
मै :" मै सही गलत का फैसला नही करना चाह रही हूँ...मै तो केवल जो भी गलत फहमी आप दोनों के बीछ है,उसे सुलझाने की कोशिश कर रही हूँ! जो भी बात हुई है,उसे लेके दीपा ने आप से कई बार क्षमा माँगी है,इतना तो मै जानती  हूँ.. आप दोनों फोन कर लेंगे तो बातें अधिक साफ़ हो जायेंगी ऐसा मेरा विचार है.....!"
सुदर्शन :" वैसे अब बात करने को कुछ बचा ही नही है...मुझे जिस चीज़ से सख्त नफरत है,वो वही बात करती है....उसे केवल खुद की परवाह है...उसे जो करना है,करे....अब मुझे कुछ सरोकार नही....!"

सुदर्शन की बातें सुन मेरा दिल बैठा जा रहा था फिर भी मैंने संभाषण जारी रखते हुए कहा:" देखिये! आप दोनों में बहुत नज़दीकियाँ थीं/हैं,इतना तो मै जानती हूँ....और कई महीनों से,तो रिश्ता ऐसे एक झटके से टूट तो नही जा सकता....आप सिर्फ एक बार दीपा से बात कर लीजिये,आगे आपकी मर्जी...मै दीपा से तुरंत आपको फोन करनेके वास्ते कहती हूँ...."
इतना कहके मैंने सुदर्शन से बातचीत समाप्त की और दीपा को फोन मिलाया:" दीपा,तुम तुरंत सुदर्शन को फोन करो....वो फोन उठा लेगा."
दीपा:" लेकिन उस ने क्या कहा?"
सुदर्शन ने कही हर बात दोहराने से मेरा जी कतराया...मैंने दीपा से कहा:
" तुम इस समय उससे बात कर लो....बाक़ी बातें बाद में होती रहेंगी."

चंद हफ़्तों पहले ही दीपा नानी बनी थी...सुदर्शन से बात करते हुए उसने उससे कहा:" मै तो अपनी नवासी की ठीक तौर से देख भाल भी नही कर पा रही हूँ...जी उचट गया है...तुम से बार,बार माफी माँग तो रही हूँ....! मुझ से भूल हुई,लेकिन मुझे इस बात का क़तई अंदाज़ा नही था,की,उस व्यक्ती से आप इस हद तक नफरत करते हैं...."
बातें करते हुए दीपा रोये चली जा रही थी. अंत में सुदर्शन ने उससे कहा,:" मै उस बच्ची की ख़ातिर अब के तुम्हें माफ़ किये देता हूँ...वरना नही करता...."

दीपा की जान में जान तो आयी! दीपा सुदर्शन के प्यार के  बिना रह नही सकती ये बात तो मुझे पूरी तरह समझ में आ गयी थी. उन दोनों का रिश्ता समाज की नज़रों में कितना सही या गलत है,इस बात का निर्णय मै नही ले सकती,नाही लेना चाहूँगी...

फिलहाल दोनों के बीछ वही पहले वाला प्यार है.....दीपा की खुशी चाहती हूँ,और वही दुआ करती हूँ...दुआ करती हूँ,की,उसे कोई सदमा न पहुँचे...

समाप्त 



मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

दीपा 16

( गतांक :मैंने फ़ोन रखा और दूसरी ओर  दीपा का फोन बजा! दोनों ने बड़ी देरतक बातें कीं. बादमे  दीपा ने बड़े इतमिनान से मुझे सारी बातें दोहराके बतायीं . प्रसाद ने उससे वादा किया की अब वो नियम से फ़ोन करेगा...या गर दीपा का फ़ोन होगा तो ज़रूर उठा लेगा...व्यस्त रहा तो बाद में बात कर लेगा! उदास,अस्वस्थ दीपा,अचानक खिल उठी थी!
अब आगे.....)

उस रोज़ के बाद चंद दिन तो प्रसाद के फोन आते रहे...लेकिन कुत्ते की दुम! टेढ़ी सो टेढ़ी!  वो दुबारा गायब हो गया! वजह भी समझ में न आये! पिछली बार तो उसने अति व्यस्तता ये वजह  बताई  थी....साथ ये भी कहा था,की, आइन्दा कितना ही व्यस्त क्यों न हो,कमसे कम एक sms तो ज़रूर भेजेगा .....सारे वादे धरे के धरे रह गए!

ऐसे ही कुछ तीन चार माह गुज़र गए. दीपा अपना समय बिताने face book आदि social network पे जाती रहती...नए,नए दोस्त बनाती रहती और उन से गप लगा लेती...

मै उन दिनों मुंबई में थी. दीपा बार बार मुझ से कह रही थी,की,मै जल्द लौट आऊँ .....उसे बहुत-सी बातें बतानी थी....!उसकी आवाज़ में खुशी झलक रही थी! मुझे बड़ा अच्छा लगा और जिज्ञासा  भी जागृत हो गयी...! मै मुंबई से लौटी तो दीपा मेरे घर कुछ रोज़ बिताने चली आयी....उसे देखा तो मैंने कहा:
" दीपा! बहुत खुश नज़र आ रही हो.....! क्या बात है? क्या प्रसाद ने फिर से फोन पे बात चीत शुरू कर दी?"
दीपा: " अरे नही! तुम काम से झटपट निपट लो....तुम से खूब सारी बातें करनी हैं....! बहुत कुछ बताना है....जब तक बता ना लूँगी,तुम्हें सोने नहीं दूँगी!"

रात का खाना खाके,मै चौका-बर्तन से फारिग हो गयी....हम दोनों बिस्तर पे पैर पसार के बैठ गए और दीपा बताने लगी...
" पता है...फेस बुक पे एक सुदर्शन नामक व्यक्ती कई बार मुझे फ्रेंड'स request भेज चुका था. मुझ से १० साल छोटा था,तो मै रिजेक्ट करती रही...एक दिन पता नहीं मुझे क्या सूझ गयी सो मैंने उसकी बिनती मान ली...! जब की,पिछले तकरीबन दो सालों से वाकफ़ियत भर भी नही थी...! वो इसी शहर का बाशिंदा निकला!  मुझ से मिलने के लिए बहुत आतुर था!"
मै:" अच्छा? और उसका परिवार? उस बारे में कुछ बताया? ये भी डिवोर्सी है? या फिर विधुर?"
दीपा : " नही....ऐसा कुछ नही...वो शादीशुदा है....दो बच्चे हैं...."
मै:"और उसकी पत्नी?"
दीपा:" पत्नी है.....अधिकतर बीमार रहती है...सौतेला बाप है,जो जायदाद को लेके उसे बहुत परेशान कर रहा है.."
मै :" दीपा! दीपा ! ये कहाँ फँस रही हो? आज गर वो अपनी पत्नी से बेवफाई कर रहा है,तो कलको तुम्हारे साथ भी वही कर सकता है....! "
दीपा :" नही...नही...मुझे ऐसा नही लगता...!"
मै :"क्या तुम दोनों मिल चुके हो एक दुसरे से?"
दीपा :" हाँ! मैंने उसे मेरे ही घर बुलाया था...उसने मेरा हाथ थामा तो मै सिहर गयी...उसके स्पर्श में वफ़ादारी है....वो मुझे अपनी कार में भी घुमाने ले गया...कई बार....मुझे बाहों में भी भर लिया....उसके स्पर्श में हवस नही है...वो तो बस कई बार मेरी एक झलक पाने के लिए,कितनी,कितनी दूर से चला आता है...."
मै :" लेकिन दीपा! एक शादीशुदा आदमी से इस तरह का रिश्ता.....क्या तुम्हें गलत नही लगता....??मुझे तो लगता है,के वो अपने परिवार के साथ विश्वासघात कर रहा है.....या फिर तुम्हारी दोस्ती का नाजायज़ फायदा उठा रहा है! "
दीपा :" नही....वो तो मुझ से ब्याह करने को राज़ी  है...!"
मै :" तो क्या अपनी पत्नी को क़ानूनन छोड़ देगा तुम से ब्याह करने के लिए? और उसके बच्चे?"
दीपा :" नही...पत्नी को छोड़ेगा तो नही...लेकिन वो कहता है,के मै तुम्हे भी वही दर्जा दूँगा,जो एक पत्नी का होता है!  "
मै :" दीपा! तुम अच्छी तरह से जानती हो के ऐसी शादी को क़ानून नही मानता! क्या तुम "दूसरी औरत" की हैसियत से रहोगी उस के साथ....?"
दीपा : " लेकिन मै शादी तो करना ही नही चाहती ...मुझे तो केवल एक पुरुष मित्र चाहिए था....वो मिल गया...इससे आगे मुझे और कुछ नही सोचना...ये समाज और उसके तौर तरीक़े...! इसी में बंध के इतने साल निकल गए! मै भावनात्मक तौर से उसके साथ बहुत जुड़ गयी हूँ...वैसे भी उसकी पत्नी का कोई अधिकार तो मै छीन नही रही. वो अपने परिवार के प्रती सारी ज़िम्मेदारी निभाता रहेगा! बल्कि,उसने तो मेरे बच्चों को अपने बच्चों की तरह मान लिया है....उन्हें वो "हमारे बच्चे" करके ही संबोधित करता है..."
मै : " ऐसा रिश्ता कितने दिन निभ सकेगा?? "
दीपा :" मै तो ताउम्र इसे निभाउंगी....! और सुदर्शन भी यही कहता है!"
मै :" मुझे तो तुम्हारी चिंता हो रही है....सही गलत का निर्णय मै नही करुँगी.....पर तुम्हारी खुशी ज़रूर चाहती हूँ...आख़िर हर रिश्ते का मक़सद तो वही होता है,है ना? उसने अपनी पत्नी से भी यही वादा कभी किया होगा?"
दीपा:" लेकिन मेरा मन कहता है,सब ठीक होगा....हम दोनों कल भी कुछ देर मिलने वालें हैं! मेरा तो उससे पल भर भी अलग होने को जी नही चाहता!"

दीपा और भी बहुत कुछ बताती रही...बहुत उत्तेजित थी....लेकिन उसने मुझे गहरी सोचमे   अवश्य डाल दिया....पता नही,इस रिश्ते का भविष्य क्या था???क्या होगा???

क्रमश:





रविवार, 17 अप्रैल 2011

दीपा 15

( गतांक: कुछ दिन और बीते....दीपा बेक़रार हो गयी...फिर अचानक से एक दिन प्रसाद का फोन आ गया! दीपा फिर से खिल गयी! लेकिन उस दिन के बाद वो फिर गायब हो गया! और अब के तो बहुत दिन बीत गए! मुझे दीपा को लेकर चिंता होने लगी. पिछली बार तो प्रसाद ने  बहुत माफी माँगी थी...अपनी व्यस्तता बताई थी,और आश्वासन दिया था,की, फिर से ऐसा नहीं होगा! और इसी तरह सप्ताह के बाद सप्ताह बीतते गए....
अब आगे....)
प्रसाद के ऐसे व्यवहार के कारण दीपा बहुत विचलित थी. वो जीवन में एक स्थिरता चाह रही थी. एक मन मीत जिसे वो अपने मन की कह सके....जिस के साथ रोजमर्रा की ज़िंदगी साझा कर सके...वैसे तो दीपा के साथ बहुतों ने संपर्क किया था,लेकिन दीपा अब ब्याह करना नहीं चाह रही थी. किसी का हाथ पकड़ सके, किसी की बाहों में बाहें डाल सके...किसी के साथ खामोश लम्हें बिता सके,या फिर फ़ोन पे खूब बतिया सके....इससे अधिक आगे उसे नही बढ़ाना था. उसे प्रसाद में वैसा व्यक्ती दिखाई दिया था,पर प्रसाद वो नही था...

इसी तररह महीनों बीते. एक दिन शाम हम दोनों मेरी छत पे बैठे बतिया रहे थे. दीपा उदास लग रही थी. बोली: "मेरा प्रसाद से बातें करने का बहुत मन करता है,और वो है की,फोन ही नही उठाता....! क्या करूँ?"
मै:" क्या तुम चाहोगी की,मै अपने फ़ोन से एक बार उसका नंबर मिलाके देखूँ? बता दूँ उसे,गर वो फ़ोन उठाये तो, की तुम कितनी विचलित हो? मै ये नही बताउँगी की तुम मेरे सामने बैठी हो...की उसे फोन करने के बारे में हमने एक दूजे से सलाह की है...सिर्फ इतना कहूँगी,के मै तुम से मिली,और मुझ से तुम्हारी हालत देखी नही गयी...और मैंने तुम से उसका नंबर माँग लिया..."
दीपा ने खुश होकर कहा:" सच? तुम ऐसा करोगी?"
मै:" क्यों नही? ये लो मेरा फ़ोन और घुमा दो उसका नंबर! देखती हूँ,उठाता है या नही!"

दीपा ने तुरंत नंबर घुमा के फ़ोन मुझे पकड़ा दिया....और उधर से प्रसाद ने फ़ोन उठा भी लिया! मैंने अपना परिचय देते हुए कहा,
" देखिये, मुझ से दीपा की हालत देखी नही जाती! आप उसे फ़ोन क्यों नही करते? या उसका फ़ोन आता है,तो क्यों नही उठाते? खैर! जो भी आपके वजूहात हों,आप तुरंत उसे फ़ोन करेंगे तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी और उसे सुकून मिलेगा..."
प्रसाद इनकार नही कर सका. मैंने फ़ोन रखा और दूसरी और दीपा का फोन बजा! दोनों ने बड़ी देरतक बातें कीं. बाद में दीपा ने बड़े इतमिनान से मुझे सारी बातें दोहराके बतायीं . प्रसाद ने उससे वादा किया की अब वो नियम से फ़ोन करेगा...या गर दीपा का फ़ोन होगा तो ज़रूर उठा लेगा...व्यस्त रहा तो बाद में बात कर लेगा! उदास,अस्वस्थ दीपा,अचानक खिल उठी थी!

क्रमश:



सोमवार, 11 अप्रैल 2011

दीपा 14

( गतांक : प्रसाद तो पूरी तरह से उसके प्यार में डूब गया था. उसके हर ख़त में," मै तुमसे बेहद प्यार करता हूँ," ये वाक्य कुछ नहीं तो दस बार होता! प्रसाद अहमदाबाद का बाशिंदा था. अंत में दीपा ने अहमदाबाद जाके उससे मिलने का फैसला किया और वो गयी. वो खुद अब किसी किशोरी की तरह उसे मिलने के लिए बेताब हो उठी थी.
अब आगे....)
दीपा प्रसाद से मिलने अहमदाबाद गयी.लेकिन जिस दिन लौटना था,उसके एक दिन पहलेही,मतलब उसी रोज़ वापसी के लिए चल दी. प्रसाद को जामनगर में अचानक कुछ काम आन पडा था.

प्रसाद ने दीपा से भेंट करने के लिए एक फार्म हाउस  बुक किया था. दीपा बस से पहुँची. प्रसाद ने उसे बाहों में भर लिया. उन दोनों ने अपनी चंद तस्वीरें उतारी.थकी  मांदी दीपा उसी कमरे में कुछ देर सो गयी. उठी तो प्रसाद ने कहा," सोते हुए तुम किसी छोटी बच्ची की तरह भोली भाली लग रही थीं!"

दीपा बहुत खुश होके लौटी. लौटने के अगले ही दिन मुझ से मिली. तसवीरें बताईं! मैंने दीपा को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था! मेरे सामने ही उसने प्रसाद से बात चीत भी की. मन ही मन मै दीपा के लिए बहुत खुश हो रही थी! उसे वो मीत मिल गया था,जिसकी ताउम्र  उसे तलाश रही थी!

दीपा उस समय मेरे घर तीन चार रोज़ रुक गयी. प्रसाद  के फोन sms ,मेल्स आदि जारी थे! चंद दिनों बाद दीपा घर लौट गयी.हम जब कभी फोन पे बात करते,वो मुझे प्रसाद की सारी खबर सुनाती. एक दिन देर रात बातें करते हुए उसने कहा," पता नहीं क्यों प्रसाद  ने ना तो मेल का जवाब दिया,ना मिस कॉल का,नाही sms का! आज तीन दिन हो गए! ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था!"

कुछ दिन और बीते....दीपा बेक़रार हो गयी...फिर अचानक से एक दिन प्रसाद का फोन आ गया! दीपा फिर से खिल गयी! लेकिन उस दिन के बाद वो फिर गायब हो गया! और अब के तो बहुत दिन बीत गए! मुझे दीपा को लेकर चिंता होने लगी. पिछली बार तो प्रसाद ने  बहुत माफी माँगी थी...अपनी व्यस्तता बताई थी,और आश्वासन दिया था,की, फिर से ऐसा नहीं होगा! और इसी तरह सप्ताह के बाद सप्ताह बीतते गए....
क्रमश: