रविवार, 25 सितंबर 2011

नाम में बहुत कुछ है!

बड़े दिनों बाद लिख रही हूँ. सोचती रहती थी,की,लिखूं तो क्या लिखूं? फिर अचानक कुछ अरसा पूर्व मराठी अखबार पढी हुई एक खबर दिमाग में कौंध गयी. वो खबर जब से पढी थी,तब से मन अशांत था.

खबर एक लडकी की थी. जो १०वी क्लास में पढ़ती है. नाम 'नकोशा'.उसकी स्कूल में एक शिबिर चल रहा था,उस दौरान एक समाज सेविका ने  उसका नाम पढ़ा तो चौंक गयी. उन्हों ने लडकी से पूछा," क्या तुम अपने नाम का मतलब जानती हो?"
लडकी: नहीं! 
समाज सेविका: यहाँ पे तुम्हारे साथ कोई आया है?
लडकी: मेरी दादी है.

जब दादी से बात हुई थी,तो उस लडकी के नाम और जनम की राम कहानी बाहर  आयी. नकोशा के पहले  उसके माँ-बाप   को एक लडकी हुई थी. इस बार सब को लड़के की उम्मीद थी. लडकी हुई तो सब ने उसे 'नकोशी'(unwanted )कर के बुलाना शुरू कर दिया. वो ३ माह की हुई तब उसकी माँ भी चल बसी. लडकी की  चाहत  किसी को भी न थी,इसलिए 'नकोशी' परसे  'नकोशा ' ये नाम उसे चिपक  गया. 

जब नकोशा को ये बात पता चली तो  पूरा दिन  उसने रो के काटा.' मुझे और किसी भी नाम से बुलाओ, लेकिन ये नाम हटा दो', कह के वो बिलखती रही. पाठशाला के बच्चों ने तथा शिक्षकों ने उसे shrawanee  कह के बुलाना शुरू किया. लेकिन  नाम बदलने की प्रक्रिया लम्बी है.

 शिक्षित,अमीर खानदानों में जहा लडकी नहीं चाहिए होती है,वहां नकोशा के अनपढ़ परिवार को कोई क्या कहे?नकोशा का ये किस्सा मुझसे भुलाये नहीं भूलता.



शनिवार, 27 अगस्त 2011

हद है खुदगर्जी की!!

   हफ्ता दस दिन मेरे पास रह के माँ पिताजी आज गाँव वापस लौट गए. माँ कैंसर की मरीज़ हैं. उनका चेक अप करवाना था. 

    Mai चाह रही थी की आये ही हैं तो कुछ रोज़ और रुक जाते. ख़ास कर जब माँ ने ये कह दिया,"बेटा ! समझ लो इसके बाद हम ना आ पाएंगे! सफ़र ने बहुत थका दिया!"      
 लेकिन पिताजी जिद पे अड़े रहे की नियत दिन लौटना ही लौटना है. कहते हुए दुःख होता है और शर्म भी आती है की वो हमेशा से बेहद खुदगर्ज़ किस्म के इंसान रहे. खुद की छोड़ किसी और की इच्छाओं या ज़रूरतों से उन्हें कभी कोई सरोकार रहा ही नहीं. माँ की तो हर छोटी बड़ी इच्छा को उन्हों ने हमेशा दरकिनार ही किया. माँ हैं की उनपे वारे न्यारे जाती रहती हैं! कैंसर की इतनी बड़ी सर्जरी के बाद जब उन्हें होश आया तो पहली बात मूह से निकली, "इन्हों ने ठीक से खाना खाया था? इनको दवाईयां दी गयीं थीं?" 
पिताजी किसी तरह से अपाहिज नहीं हैं! अपनी दवाई खुद ले सकते हैं! लेकिन आदत जो हो गयी थी की हरेक चीज़ सामने परोसी जाए! एक ग्लास पानी भी कभी अपने हाथों से लिया हो, मुझे याद नहीं! बहुत बार माँ पे गुस्सा भी आ जाता है की, इतना परावलम्बी क्यों बना दिया पिताजी को?
        माँ पिताजी गाँवसे अपनी कार से आये थे. सर्जरी के बाद माँ को मिलने के लिए लोग लगातार आते रहते. ऐसे में ज़रूरी था की, आने जाने वालों के साथ कोई बोले बैठे. मेरा अधिकतर समय रसोई में लग जाता. पिताजी ये ज़िम्मेदारी निभा सकते थे . उन्हें बातें करना बहुत भाता है! यहाँ फर्क इतना था, की, बातचीत का केंद्र वो नहीं,उनकी पत्नी थी! ये बात उनके बस की नहीं थी! वो केवल अपने बारे में बातें कर सकते हैं! सर्जरी के तीसरे दिन उन्हों ने गाडी ड्राईवर लिया और गाँव लौट गए! अपनी पत्नी के सेहत की ऐसी के तैसी! सोचती हूँ, कोई व्यक्ती इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है?


बुधवार, 3 अगस्त 2011

कौन सही है ,कौन गलत ?

कई बार सोचती हूँ...मैंने क्या लिखना चाहिए? क्या लिखना चाहती हूँ? मैंने सामाजिक दायित्व निभाना है? या बिखरते परिवारों के बारेमे लिखना है?अंदरसे कोई आवाज़ नहीं आती....एक खालीपन का एहसास मात्र रह जाता है.

बरसों बीत गए इस बात को. mai    अपने नैहर गयी थी. शाम को बगीचे में टेबल लगाके mai ,दादी अम्म्मा और दादा बैठे हुए गप लगा रहे थे. अचानक दादा को नमाज़ के समय का ख्याल आया. वो दादी अम्मासे  बोले," चलो,नमाज़ का वक़्त हो गया है."
दादी अम्मा बोलीं," अरे यही बच्चे तो मेरी नमाज़ हैं....यही तो मेरी दुनिया हैं....आप जाईये,पढ़िए....mai इसी के साथ बातें करती बैठुंगी. इसने कहाँ बार बार आना है!"
दादी अम्मा का ये जवाब मुझे बेहद पसंद आ गया और ज़ेहन में  बैठ  गया.
और बरस बीते. मेरी बेटी विद्यालय  के आखरी साल में पढ़ रही थी. mai उसके लिए जलपान ले गयी और उसके सरपे हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से कहा," तुम्ही बच्चे तो मेरी दुनिया  हो!"
बिटिया ने झट से अपने सरपर से मेरा हाथ हटाया और कहा," माँ! तुम अपनी दुनिया  अलग बनाओ. हमारी दुनिया से अलग.....हमें अलग से जीने दो!"
मुझे लगा जैसे किसी ने एक तमाचा जड़ दिया हो. mai अपनी पलकों पे आंसूं तोलते हुए अपने कमरे में चली गयी और जी भर के रो ली. गलत कौन था....मेरी समझ में नहीं आया...माँ या बेटी? या दोनों अपनी,अपनी जगह पे  सही थे?मुझे भीतर तक कुछ कचोट गया था...
मेरे छंद तो बहुत से थे. लेकिन जीवनका अधिकतर समय घरकी देखभाल,रसोई,खानपान,सफाई,फूल पौधे,बागवानी, कमरों में फूल सजाना,बच्चों की पढ़ाई,पति  के अति व्यस्त जीवन के साथ मेलजोल....इसी में व्यतीत होता रहा...अचानक से इन सभी से भिन्न mai अपनी अलग एक दुनिया कैसे बना लेती?
कौन  सही  है ,कौन  गलत ?है किसी के पास जवाब?

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार...!४

( गतांक : बड़े इंतज़ार के बाद उसने लिखा," वो लड़का और कोई नहीं,सौगात है......मै केवल एक बार उससे मिलना चाहती हूँ....एक बार अपना दिल खोलके उसके आगे रखना चाहती हूँ.....और कुछ नहीं....लेकिन मुझे नही लगता वो मेरी ये इच्छा भी पूरी करेगा....!"
सौगात! हे भगवान्! ये क्या कह दिया आयुषी ने?? जानते हुए की ,वो अर्चना के प्यार में पूरी तरह  डूबा हुआ है! अब  आगे ..)


आयुषी का जवाब पढके मै उदास-सी हो गयी...क्या करूँ? क्या न करूँ? मेरे पास तो सौग़ात की मेल Id भी नही थी....किससे हासिल करूँ? अर्चना के पास हो सकती है,लेकिन उसे क्या कहूँ?इत्तेफाक़न हमारी जो एक कॉमन सहेली थी,उससे मेरी बात हुई. उसके पास सौग़ात की ID थी! मै थोड़ी ख़ुश हो गयी...

उसने मुझे ये भी कहा," सौग़ात  अर्चना के प्यार में आकंठ डूबा हुआ है...वो किसी औरसे मेल मुलाक़ात करना  चाहेगा,ऐसा मुझे नही लगता!"
बात सच थी! पर कुछ तो करना होगा...आयुषी को मद्दे नज़र रखते हुए! क्या कहूँ सौग़ात से? कैसे कहूँ? क्या वो मुझे जवाब देगा? या अर्चना  को बता देगा? ऐसे में अर्चना क्या महसूस करेगी? उसे आयुषी के बारे में क्या लगेगा? वो दोनों तो आपस में सहेलियों की तरह हैं! सौग़ात को जब कभी मैंने उसके स्क्रैप पे मेसेज भेजा था,उसने अक्सर जवाब देनाटाल दिया था...और जब दिया था,तो बड़ा मायूसी भरा...
मैंने आयुषी से पूछा," सौग़ात से मिलने तुम्हें देहली जाना होगा! गर वो राज़ी हो गया तो तुम जा पाओगी?"
आयुषी ने कहा," हाँ मै चली जाउँगी..."
मैंने बड़ी ही एहतियात बरतते हुए सौग़ात को लिखा," सौग़ात...आयुषी को तुम से बहुत लगाव हो गया है...वो केवल एक बार तुम से मिलना चाहती है...क्या उसकी ये आरज़ू तुम पूरी करोगे? वो देहली आ जायेगी. तुम जहाँ कहोगे वहीँ तुम से मिलेगी....बस, एक बार उससे मिल लो...उसकी तसल्ली के लिए...उसे अपनी दिलकी बात तुम से कह लेने दो....मै तुम से इल्तिजा करती हूँ! मुझे नही पता की,ये सही है या गलत....लेकिन आयुषी के नज़रिए से देखती हूँ,तो गलत भी नही लगता...एक बार मेरी इतनी बात मान जाओ....दिल पर से बहुत बड़ा बोझ उतर जाएगा!"
मै सौग़ात के जवाब का इंतज़ार करने लगी.  मुझे उसका जवाब नही मिला. इस दरमियान मैंने गौर किया की,उसने अपने स्क्रैप पर से अर्चना के मेसेजेस के अलावा हर किसी के मेजेज डिलीट कर दिए थे! मैंने आयुषी को भी मेल लिखी लेकिन उसका भी कोई जवाब नही मिला. दो तीन महीने ऐसे ही बीत गए. अर्चना ने भी इस दौरान मुझसे संपर्क नही किया था.

मै जब कभी rediffconnexions खोलती,मुझे बेहद इंतज़ार रहता....! और एक दिन अचानक rediffconnoxions ने मेरा पास वार्ड एक्सेप्ट करना बंद कर दिया...! मैंने दूसरे पास वार्ड के लिए इल्तिजा भेजी लेकिन कोई असर नही हुआ और मेरी वो ID बंद हो गयी! आयुषी और अर्चना से मेरा हमेशा के लिए संपर्क टूट गया! सौगात के रवय्ये से आयुषी ज़रूर बहुत मायूस  हुई होगी....पर ये दिलकी बातें थीं.....इनपे किसका बस था??सौग़ात पे तो किसी का बस नही था,और नाही आयुषी के दिलपे!
समाप्त

रविवार, 3 जुलाई 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार!!3


( गतांक : इन सब बातों के चलते मैंने गौर किया की,आयुषी बड़े दिनों से स्क्रैप पे कुछ लिख नहीं रही है. ना मेरे पूछने पर ही कुछ जवाब दे रही है! इसे क्या हो गया? ये जो मेरे तथा अर्चना के लिए कहती थी," तुम दोनों मेरे लिए दो नायाब रत्न हो....!"कहाँ खो गयी है? .....अब आगे....)
जब भी rediffconnexions पे जाती,मुझे आयुषी की तलाश रहती....पर वो नहीं मिलती. अचानक एक दिन उसका पर्सनल मेसेज बॉक्स में मेल मिला. उसने लिखा था," मेरा जी करता बिस्तर पर लेटी रहूँ .....और यही करती हूँ...लेटे,लेटे छत को निहारती रहती हूँ..."
मैंने तुरंत जवाब दिया," आयुषी ऐसा क्यों? तुम इतनी निराश किसलिए हो?कुछ तो कहो....मुझे तो ये पढके तुम्हारी बहुत अधिक चिंता हो रही है...आखिर क्या चाहती हो जीवन में जो तुम्हें नहीं मिल रहा? ऐसा कौनसा अभाव है जो तुम्हें इतना अधिक खल रहा है?"
उसका जवाब आया," ज़िंदगी में हरेक चीज़ तो हासिल नहीं होती....." 
बस एक पंक्ती....इससे किसी को क्या पता चल सकता था? मैंने दोबारा उसे लिखा, लेकिन इस बार वो फिर गायब हो गयी. कोई जवाब नहीं, कोई प्रतिक्रया नहीं. मै फिर परेशान हो गयी. निराशाजनक  स्थिती क्या होती है,मै अच्छी तरह जानती थी,समझती थी. क्या किया जाये? समझ नहीं पा रही थी...इसे ऐसा क्या दर्द हो सकता है जो बाँट भी नहीं रही....!

" आयुषी! कुछ तो कहो! मुझे नहीं तो किसी अन्य सहेली से कहो....ऐसे कैसे चलेगा! कुछ कहोगी तो जी हल्का होगा! कम से कम जवाब तो दो !"

क्या इसे किसी से प्यार हो गया है और माता पिता राज़ी नहीं रिश्ते को लेके? लडकी कुछ कहती भी तो नहीं!!

इसी दौरान अर्चना तथा  सौगात के स्क्रैप पर से पता चलता रहा की,सौगात  शायद देहली से मुंबई शिफ्ट करनेवाला है.  अर्चना ने लिखा था," तुम्हारा मुंबई आने का बहुत इंतज़ार है. मै अम्मीजान से संगीत सीख सकूंगी". मतलब अर्चना गाती भी थी! किसी और के एक स्क्रैप से पता चला था की वो दिखने में भी बहुत सुन्दर है!

मै आयुषी को लगातार  लिखती रही और एक दिन उसका जवाब आया,"हाँ! मुझे प्यार हो गया है...."
" आयुषी! किससे प्यार हुआ है? कुछ उसके बारे में भी तो लिखो!  और प्यार हुआ है तो इतनी निराश क्यों हो? तुम दोनों के बीछ ऐसी कौनसी बाधा है जो तुम्हें निराश कर रही है?"

बड़े इंतज़ार के बाद आयुषी का जवाब आया," जिसे प्यार करती हूँ,वो मुझे कभी हासिल नहीं हो सकता....."
"आयुषी! ऐसे क्यों कहती हो? "
" ये भी तो हो सकता है की,ये प्यार एकतरफा हो....!"
"क्या उसे पता है की,तुम उसे प्यार करती हो?क्या मै तुम दोनों के बछ किसी बात चीत का सिलसिला बना सकती हूँ?"मैंने पूछा.
" नहीं....उसे नहीं पता.....और तुम भी कुछ नहीं कर सकती..."आयुषी ने लिखा...अब इसका क्या मतलब लूँ मै?
"वो कौन है इतना तो बता सकती हो! फिर मेरी कोशिशों पे छोड़ देना. इतनाही हो सकता है न की,वो मना कर दे. कम से कम ये उलझन की स्थिती से तो वो बेहतर होगा! ये भी हो सकता है की,वो मान जाय! शायद उसके दिलमे भी तुम्हारे लिए कुछ कोमल भावनाएं हों?"
"नहीं...उसके मन में मेरे लिए शायद कोई जगह नहीं...वो किसी और से प्यार करता है...." आयुषी ने लिखा.
ओहो! ये भी क्या पेचीदा मामला हुआ जा रहा था. बताये तो सही ये लडकी एक बार उसका नाम पता. पता तो कराऊँ की,सही में ऐसा है,जैसा वो सोचती है...!
मैंने उससे दोबारा बहुत इसरार करना शुरू किया....!ऐतबार दिलाती रही,की,मै केवल उसका भला चाहती हूँ....इस निराशाजनक स्थिती से उसे उभारना चाहती हूँ.....और कुछ नहीं.
बड़े इंतज़ार के बाद उसने लिखा," वो लड़का और कोई नहीं,सौगात है......मै केवल एक बार उससे मिलना चाहती हूँ....एक बार अपना दिल खोलके उसके आगे रखना चाहती हूँ.....और कुछ नहीं....लेकिन मुझे नही लगता वो मेरी ये इच्छा भी पूरी करेगा....!"
सौगात! हे भगवान्! ये क्या कह दिया आयुषी ने?? जानते हुए की,वो अर्चना के प्यार में पूरी तरह  डूबा हुआ है!

क्रमश:

शनिवार, 25 जून 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार! 2

( गतांक:मेरा किरदार यहाँ क्या था? मैंने कौनसा रोल निभाया....या निभाने की कोशिश की,ये अगली बार....बड़े ही फ़िल्मी ढंगसे यहाँ प्रेम का एक त्रिकोण बनता जा रहा मुझे नज़र आ रहा था...अब आगे...)

मै अक्सर अपने स्क्रैप पे कोई कविता या नज़्म  लिखती  रहती. कई लोग उसे पसंद करते,उनमे से अर्चना एक थी. उसने मुझसे एक दिन पूछा," क्या मै तुम्हारी रचनाओं संकलन कर सकती हूँ?"
मैंने जवाब में कहा," क्यों नहीं? खुशी से करो!"
जब अर्चना को समय नहीं मिलता तो ये काम उसके लिए आयुषी कर दिया करती.

 एक दिन मैंने हमारी एक common सहेली के स्क्रैप पे आयुषी का कमेन्ट पढ़ा," क्या तुमने देखा सौगात दोबारा rediffconnxions पे लौटा है...उसने अपनी फोटो भी लगाई है और अर्चना के लिए मेसेज भी छोड़ा है?"
उस महिला का जवाब पढने मै आयुषी के स्क्रैप पे गयी. वहाँ उसने लिखा था," हाँ देखा और पढ़ा...जिसमे अर्चना को खुशी मिले ,सौगात वही कर रहा है तो करने दो....दोनों खुश रहें...god bless them both !"

मै उत्सुकतावश अर्चनाके स्क्रैप पे गयी. वहाँ सौगात का मेसेज था," तुम्हें सालगिराह बहुत,बहुत मुबारक हो! आज सुबह मुमानी जान के यहाँ कई तरीकों से तुम्हें बधाई देने के बाद, तुम्हारी इच्छा के अनुसार मै स्क्रैप पे भी तुमसे  अपने दिलकी बात कह रहा हूँ...आय  लव यू....आय लव यू,आय लव यू!"


अर्चना शादीशुदा थी और सौगात इतने खुलेआम अपने प्यार का इज़हार उससे कर रहा था? बात मुझे ज़रा अटपटी तो लगी! मै लिंक लेके सौगात के स्क्रैप पे गयी....देखना चाह रही थी,की,अर्चना ने उसका क्या जवाब दिया! 
अर्चना ने लिखा था," I adore you & will always adore you!"
 एक तरह से इतना निडर होके अपने प्यार का इज़हार करना....सौगात की ये बात मुझे अच्छी भी लगी. मैंने पर्सनल मेसेज बॉक्स में अर्चना को एक ख़त लिखा," अर्चना! ज़िंदगी हर किसी को खुश रहने का दोबारा मौक़ा नहीं देती. गर तुम्हें ये मौक़ा मिल रहा है तो मै तुम्हारे साथ हूँ....गँवाना नहीं...तुम ने मेरी कहानी," आकाशनीम" पढी ना?"

अर्चना का जवाब आया," सौगात को मै बचपन से जानती हूँ...उसके दिलकी हर बात मुझे पता रहती है......ऐसा नहीं की,मेरी शादी के लिए मैंने कम तकलीफें उठाई. ये शादी भी मेरी मर्ज़ी से हुई है...मेरी ज़िद से हुई है...बस .....! शायद ज़िंदगी में कई लोगों को कुछ हासिल हो जाने के बाद उसकी कद्र नहीं रहती.....शायद मेरे शौहर को भी वो कद्र नहीं रही... वैसे भी सब कुछ छोड़ देना इतना आसान नहीं...हाँ! कभी,कभी जी करता है,घंटों बैठ के रोती रहूँ! वो तो मेरी मसरूफियत है,जो मुझे रोने धोने का समय नहीं देती...!
वैसे मैंने "नीले पीले फूल" भी तो पढी...शायद मेरी ज़िंदगी इन दोनों कहानियों का मिश्रण है!"

मैंने लिखा," भगवान करे,तुम हमेशा इतनी मसरूफ़ रहो की,रोने धोने का तुम्हें मौक़ा  ही न मिले!"

इन सब बातों के चलते मैंने गौर किया की,आयुषी बड़े दिनों से स्क्रैप पे कुछ लिख नहीं रही है. ना मेरे पूछने पर ही कुछ जवाब दे रही है! इसे क्या हो गया? ये जो मेरे तथा अर्चना के लिए कहती थी," तुम दोनों मेरे लिए दो नायाब रत्न हो....!"कहाँ खो गयी है? 


क्रमश:




गुरुवार, 16 जून 2011

प्यार तेरे रंग हज़ार..

चंद साल पूर्व मै rediffconnexion की मेम्बर बनी. स्क्रैप पे जो प्रोफाइल था वहाँ मैंने अपना वर्क प्रोफाइल डाला. जिन विषयों में मेरी रुची थी....जो मेरे रोज़गार के भी ज़रिये थे,मैंने उन सभी के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी.हफ्ते भर के अन्दर मै निराश हो गयी. मुझसे दोस्ती के लिए सब हाथ बढ़ा रहे थे,मेरे कामकाज में किसी को रुची नहीं थी. 

मैंने जल्द ही जो मालूमात ज़रूरी नहीं थी,तुरंत हटा दी. अपना सेल नंबर भी हटा दिया.गर कोई पूछता," आप कहा रहती हैं,तो मेरा जवाब होता,"हिंदी हैं हम,वतन है हिन्दोस्तान हमारा!"

खैर ! ऐसे ही निराशा के दौर में कुछ अच्छे दोस्त मिले. खासकर दो महिलाएँ थीं,जो मुझसे बड़े प्यारसे पेश आतीं...अर्चना जो एक डॉक्टर थी और विवाहिता.आयुषी,जो अपनी पढाई पूरी कर चुकी थी. जॉब के तलाश में थी. अर्चना और आयुषी की  मुझसे पहलेही आपस में जानपहचान थी.मतलब कुछ चंद माह पूर्व.मेल मिलाप नहीं.
मैंने अपने प्रोफाइल पे अपनी एक फोटो लगा रखी थी,जिसमे मैंने बडाही पारंपरिक पोशाख पहना था.सर चुनर से ढंका हुआ था. अन्य सदस्यों  की तरह,इन दोनोको भी इस तस्वीर ने आकर्षित किया.
आयुषी तथा अर्चनाने अपनी कोई तस्वीर नहीं लगाई थी. 

खैर समय बीतता रहा.एक दिन किसी अन्य सदस्य ततः आयुषी के बीच हुआ सम्वाद मैंने उन्हीं के स्क्रैप पे पढ़ा. मै अचानक सजग हो गयी. कुछ तो कहीं गड़बड़ है.....यहाँ पे एक तीसरे,बेहद सुदर्शन युवक का पदार्पण हुआ.नाम था उसका ,सौगात.और इसी के साथ,साथ,कुछ रिश्तों  की गुत्थियाँ बनी और धीरे,धीरे सुलझने भी लगीं.सुलझी....मतलब मेरे सामने कुछ अधिक स्पष्ट होता गया.इस गुत्थी में जो किरदार फंसे थे,वो तो फंसे ही रहे.ये एक अनजान दुनियामे क़दम रखने की फिसलन थी.....उसकी कीमत चुकानी थी,या दर्द सहना था....जोभी हो....इन सबसे निपटना और खुशी,खुशी बाहर निकलना ना -मुमकिन-सा लग रहा था...

मेरा किरदार यहाँ क्या था? मैंने कौनसा रोल निभाया....या निभाने की कोशिश की,ये अगली बार....बड़े ही फ़िल्मी ढंगसे यहाँ प्रेम का एक त्रिकोण बनता जा रहा मुझे नज़र आ रहा था...
क्रमश: