मंगलवार, 22 जनवरी 2013

बेहद  खराब सेहत के   कारन ब्लॉग जगत से मेरा तकरीबन संपर्क छूट-सा गया है! आप सभी की दुआएं चाहती हूँ,कि ,अब इस दर्द से मुझे किसी तरह निजात मिल जाये .डॉक्टर्स को कहके हार गयी हूँ,कि इतना दर्द सहने के लिए मुझे जिंदा न रखें।कोई सुनता नहीं।ये सबके चलते टूटते रिश्तों का दर्द सहती जा रही हूँ।
आप सभी को भविष्य के लिए ढेरों शुभ कामनाएं।
आपकी क्षमा
मैंने लिखा  था :
अब सेहर होनेको है,
ये शमा बुझने को  है,
जो रात में जलते हैं,
वो सेहर कब देखते हैं?

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

इसे क्या कहेंगे ?

इस वक़्त एक टीवी .चैनेल  पे एक प्रोग्राम दिखाया जा रहा है।कौनसे शहर के लड़के लड़कियों को किस तरह छेड़ते हैं! मुझे हंसी आ गयी! मनमे सोचा,क्या सिर्फ लड़के? और सिर्फ लड़कियों को छेड़ते हैं?

एक बात जो मै  अपने पति से नहीं बता सकी यहाँ बताने जा रही हूँ।मेरी उम्र साठ  साल की है। मैंने सारी ज़िंदगी कुछ न कुछ तो काम किया लेकिन किसी एक जगह पे न रह पाने के कारन मुझे हर बार,पति के हर तबादले के साथ ,अपना काम छोड़ देना पड़ा। उनकी सेवा निवृत्ती का इंतज़ार करती रही,कि अपना कुछ काम शुरू कर सकूँ।इसलिए मुझे अपने कार्ड छपवाने ज़रूरी थे। मै किसी दफ्तर को तो अफ़ोर्ड नहीं कर सकती थी,सो मुझे अपनी इ-मेल ID तथा अपना कांटेक्ट नंबर  देना ज़रूरी था।

आप जान के दंग  रह जायेंगे कि 19 वर्षीय लड़के से लेके 65 साल के मर्दों ने मुझे कैसे कैसे परेशान  किया!एक दादाजी मेरे घर पहुँच गए।जब मैंने देखा कि जनाब काम की कोई बात नहीं कर रहे तो मैंने कहा कि मेरे पास अधिक समय नहीं है,मुझे बाहर  जाना है।मे  उठ खडी  हुई और उन्हें विदा किया।जनाब ने मुझे इ-मेल लिखी,कि क्या मै उन्हें अकेले में कभी नहीं मिल सकती ,और गर नहीं तो कमसे कम जब मै बाज़ार जाऊं तो उन्हें इत्तेला दूँ ताकि ये कहीं दूरसे मुझे घूर सकें!चलिए ,इन्हें हम कहेंगे कि ये सठिया गए हैं! 19/20 साल के लड़कों को क्या कहिये,जो मेरी उम्र जानते हैं?जानते हैं,कि , उनसे बड़े तो मेरे बच्चे हैं! गर उन्हें पलट के कहूँ,कि ,बेवकूफों! मेरी उम्र का तो लिहाज़ करो, तो जवाब मिलता है," तो क्या हुआ? आप दिखती तो 35 साल की हैं!"

मैंने अपनी जेठानी से एक बार ये बात( गलती से)कह दी तो वो कहने लगी," गलती तुम्हारी है। तुम्हें काम करने की क्या ज़रुरत आ पडी है?"
पति से कहूँ, तो वैसे ही घरमे क़ैद हूँ,किसी सखी सहेली का फोन भी अटेंड नहीं कर पाऊँगी ,इतनी बंदिशे लग जायेंगी!

दिन में न जाने कितनी ही बकवास इ-मेल डिलीट करती हूँ।गर मै  देखने में अच्छी लगती हूँ तो ये मुझे अपनी माँ से विरासत में मिला है।मेरी अपनी इसमें कोई कोशिश नहीं।आप सभी से पूछती हूँ,कि इन हालात में मैंने क्या करना चाहिए?अश्लील बकवास के लिए मे  इन जवान और बूढ़े दोनों को कटघरे में ला सकती हूँ,( इनके फोन नंबर और इ-मेल IDs ट्रेस हो सकते हैं)लेकिन इसके लिए मुझे अपने पति की मदद लेनी होगी। सब से पहले तो मुझे अपना काम बंद कर देने की सलाह मिलेगी अपने पति से! मैंने कभी ख्वाबों ख्यालों में सोचा नहीं था,कि ,इस उम्र में मुझे इन हालातों से रूबरू होना   होगा!

और येभी सुन लीजिये,की,इनमे से नब्बे प्रतिशत ये बात जानते हैं,कि मेरे पति पुलिस के एक आला अफसर रह चुके हैं!दिल तो करता है,कि हरेक की जम  के पिटाई हो,लेकिन कैसे? 

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

काश ऐसा संभव हो!

बलात्कार की  पीडिता की मौत की खबर सुनी . मेरे 60  वर्षीय जीवन  में इतना संताप,इतना दर्द मुझे किसी घटना से शायद ही कभी हुआ हो जितना कि पिछले कुछ दिनों में हुआ । मै कानून को अपने हाथों में लेने के हक में कभी नहीं रही .लेकिन आज लग रहा  है कि इन मुजरिमों को सजाए मौत तो मिलनी ही चाहिए,लेकिन फांसी के फंदे से नहीं।  इनकी सब से पहले तो आंतें बहार निकाल देनी चाहिए।सरेआम इनके एकेक अंग को काट के इन्हें चीलों और गिद्धों  के हवाले कर देना चाहिए। इन्हें अंतिम संस्कार भी नसीब न हो। और ये काम महिलाओं ने करना चाहिये .

लगने  लगा है कि बड़े शहरों में शाम 6 बजे के बाद महिलाओं के लिए अलग से बस सेवा मुहैय्या होना ज़रूरी है।


मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

क्या आप जानते हैं?



वैसे  तो ये बात पहले भी कई बार लिख चुकी हूँ। आज सुभाष तोमर,( दिल्ली पुलिस),की मौत के बारेमे खबर देखी तो फिर एक बार लिखने का मन किया। तोमर चूँकि एक आन्दोलन में मारे  गए तो उनके बारे में खबर बन गयी वरना तो रोज़ाना  न जाने कितने पुलिस कर्मी अपना कर्त्तव्य निभाते हुए मारे  जाते हैं,कहीं उफ़ तक नहीं होती। क्या आप जानते हैं कि  आज़ादी से लेके  अब तक अपना कर्त्तव्य निभाते हुए मारे  जाने की संख्या, भारतीय सेना की बनिस्बत पुलिस वालोंकी चार गुना से अधिक है? के नक्सलवादी इलाकों में पुलिस वाले सैकड़ों की संख्या में मरते हैं और किसी को खबर तक नहीं होती?
क्या आप जानते हैं कि  एक पुलिस कर्मी सबसे कम तनख्वाह पानेवाला सरकारी सेवक है? एक मुनिसिपल कर्मचारी जो झाड़ू लगता है,उसकी तनख्वाह कमसे कम 12000/- होती है,जबकि कांस्टेबल की केवल 4000/-? ये कि  उन्हें मकान  मुहैय्या नहीं होते? उनके पास अवाजाही का कोई ज़रिया नहीं होता?उन्हें सेना की तरह  भी वैद्यकीय अथवा अन्य  सेवाएँ उपलब्ध नहीं? क्यों? जबकि अंतर्गत सुरक्षा  के लिए पुलिस को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है? सीमा सुरक्षा दल,भारतीय  सेना के बनिस्बत कहीं  ज्यादा ज़िम्मेदारी निभाते हैं! हमारी पुलिसवालों से सैंकड़ों उम्मीदे होती हैं,लेकिन उनके प्रती हमारी  कोई ज़िम्मेदारे नहीं? तनख्वाह तो एक सैनिक भी पाता है,फिर हमारे दिलों में उनके लिए जितना दर्द होता है,उतना एक  अंतर्गत सुरक्षा  कर्मी के प्रती क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए कि  एक पुलिसवाला हमारी आँखों के सामने होता है,जबकि एक आन्दोलन नहीं?

मुझे तो येभी नहीं पता की इस आलेख को कोई पढ़ेगा या नहीं।पढ़ेगा तो शायद एक पल में नज़र अंदाज़ कर देगा क्योंकि हमें पुलिस के बारेमे हमेशा बुरा देखने या सुननेकी आदत जो पड़  गयी है!

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

शमा बुझनेको है

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
मैंने खुदको जला लिया,
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
पर सुना, चंद राह्गीरोंको
थोड़ा-सा हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

वैसे तो इस ब्लॉग पे मै  अपनी पद्य रचनाएँ नही  डालती,लेकिन आज डाल  रही हूँ।वो भी एक पुरानी रचना।


सोमवार, 26 नवंबर 2012

उफ़!

ज्यादा कुछ लिखने की अवस्था  में तो नहीं हूँ। कल कौन  बनेगा करोडपति में सोनाली को असली जीवन में देखा . उसके पूर्व क्राइम पेट्रोल में उसके जीवन के नाट्य  रूपांतर को देख चुकी थी। तब भी और अब भी सब से अधिक गुस्सा  उन घिनौने लड़कों के अलावा उनके वकीलों पे आया।  क्यों  ऐसे अपराधियों की वकालत करते हैं वकील? क्या समाज के प्रती उनका कोई दायित्व नहीं? करने दे किसी सरकारी वकील को उनकी तरफदारी! कानून जो कहता है कि  घिनौनेसे घिनौने अपराधी को वकील जो मिलना चाहिए! लानत है उन वकीलों पे जो ऐसे अपराधियों  की पैरवी करते हैं।
लानत है हमारे मुल्क के कानून पे जो ऐसे अपराधियों को बेल  पे छोड़ देता  है। ऐसे में एक पुलिस कर्मी क्या कर सकता है? ऐसे कानून पुलिस का नैतिक धैर्य पूरी तरह से नष्ट कर देते हैं। अपराधी पुलिस के  मूह पे थूंक  के कह देते हैं,कर लो जो करना है!


बुधवार, 7 नवंबर 2012


शुभ कामनाएँ

कभी कभी अनजाने कही बात  सच हो जाती है।   पिछली पोस्ट में मैंने लिख  दिया था कि  शायद अब वो मेरी आखरी पोस्ट होगी और  वही सच होता नज़र आ रहा है।    एक बीमारी से निजात नहीं पाती कि  दो और लग जाती हैं! अब ये हाल है कि  पांच मिनिट भी नेट पे  बैठ पाना   मेरे लिए मुमकिन नही । ब्लॉग जगत से तकरीबन कट-सी गयी हूँ।
खैर!  ये भी नहीं मालूम,कि  इस पोस्ट को पढ़ेगा भी या नहीं!  मै   ख़ुद जो टिप्पणियां दे  नहीं पाती    हूँ।
 
दीवाली की अनेक शुभ कामनाएँ !