सोमवार, 30 अगस्त 2010

इन सितारों से आगे..४

JHAROKHA ने कहा… aane wala kal kisne dekha hai fir bhi ham kal ki khatir sapane sanjote rahte hai aapki har kahani agali kadi kei utsukta ko aur bhi badha deti hai. aur yah panktiyan to shayad sabhi ko thodi der ke liye hi khushi de jati hongi----------

"हर खुशी हो वहाँ तू जहाँ भी रहे,
चाँद धुन्दला सही,ग़म नही है मुझे,
चांदनी हो वहाँ तू जहाँ भी रहे,
रौशनी हो वहाँ तू जहाँ भी रहे.
poonam

Apanatva ने कहा… agalee kadee ke intzar me dhadkane bad gayee hai.....

संहिता ने कहा…
कहानी का यह भाग, मर्म स्पर्शी ! हमेशा की तरह !! जीवन मे पग पग पर समस्याए !!!! और कितना संघर्ष है , पूजा के जीवन मे??? यहां पति अपनी पत्नी की भावनाओ और उसकी परेशानियों को समझना ही नही चाहता है । पूजा के जीवन को जटिल बना कर रख दिया है । क्षमा जी , मेरे ब्लोग पर आपने सन्देश भेजा, इसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद!!! वास्तव मे पिछले कुछ दिनो मे मेरी अत्यधिक व्यस्तता के कारण ब्लोग पर कुछ लिख नही पायी हूँ । परंतु आपका ब्लोग नियमित रूप से पढ रही हूँ । इस मार्मिक कहानी ने मुझे बान्ध के रखा है । पुन: आशावादी हूँ ,कि अगली कडीयों मे शायद पूजा के जीवन मे खुशियो के पल आयेंगे।







arvind ने कहा…
जहाँ तेरा मुखड़ा नही, वो आशियाँ मेरा नही, इस घरमे झाँकती किरणों मे उजाला नही! चीज़ हो सिर्फ़ कोई , उजाले जैसी, हो जोभी, मुझे तसल्ली नही! ...bahut marmik. samvedanshil....pataa nahi aap itna dard kahan se laati hain...vah... bahut sundar. मो सम कौन ? ने कहा… आपके ब्लाग पर पन्द्रह बीस दिन में एक बार ही आता हूं। इस तरह कम से कम तीन चार बार सस्पेंस में जाने से बच जाता हूं। आखिरी तीन चार कडि़यां तो बहुत ही धाराप्रवाह चली हैं। आज फ़िर आगे क्या होगा की उत्सुकता लेकर लौट रहा हूं। जब भी लगता है कि बस, अब बहुत हो चुका, अगली पोस्ट और बड़े सवाल अधूरे छोड़ जाती है। लिखती रहें आप, दर्द शेयर करने से कम होता है। संजय भास्कर ने कहा… लघुकथा सा लगा आपका यह संस्मरण! बहुत सुन्दर! VICHAAR SHOONYA ने कहा… मैं थोडा सा उलझन में हूँ की ये कहानी हैं या वास्तविकता? जो कुछ भी लिखा गया है वो वास्तविक सा लगता है और ऊपर लिखा भी है ek jivanee. तो क्या ये सब सच हैं या फिर एक शानदार कहानी? दिलीप ने कहा… oh behad maarmik ant ki baat rula gayi....bachche kabhi kabhi kuch aisa keh dete hain ki nayanon se ashru barbas hi nikal padte hain...maarmik rachna गौतम राजरिशी ने कहा… पूजा/तमन्ना की इस यात्रा में इब्तिदा से संग रहा और अचानक से ये आखिरी किश्त का ऐलान जैसे सोयी नींद से जगा गया है। मुझे लग रहा था कि अंत में सब ठीक ही हो जायेगा....लेकिन ये आखिरी कड़ी और ऊपर से संपादित। क्या कुछ बीती होगी आप पर, हम तो पढ़ कर एक छटांश भी भाँप न पाये होंगे। दर्द की ये दास्तान शायद जाने कितने दिनों तक हांट करते रहे मुझे। आप जहाँ भी हों मैम...क्या कहूँ...just wishing you all the best...may god give you all the strength वन्दना ने कहा… कभी कभी हालात इंसान के बस मे नही होते और उसे किसि न किसी मजबूरी के कारण रिश्तों को ढोना ही पड्ता है और उस पर भारतीय स्त्री वो तो हमेशा ही दूसरों के लिये जीती आयी है तो इस मानसिकता से कभी बाहर ही नही आ पाती और अपने बच्चों की खातिर तो कभी समाज की खातिर तो कभी पति की खातिर अनचाहे रिश्तों का बोझ ढोती चली जाती है ………………शायद पूजा का भी यही हाल रहा है ना चाहते हुये भी ज़हर के घूँट ज़िन्दगी पिलाती चली गयी और पूजा पीती चली गयी मगर कोई पूछे उसे इस ज़िन्दगी और रिश्तों से क्या मिला………खुद को मिटाकर सब पर लुटाकर क्या मिला? जिनकी खातिर उसने अपने जीवन की आहुति दी उसका सिला उसे क्या मिला? ना जाने कब नारी सिर्फ़ अपने लिये जीना सिखेगी या समाज के खोखले नियमो से लड सकेगी? ऐसे ना जाने कितने ही अनुत्तरित प्रश्न मूँह बाये खडे हैं अपने जवाब के इंतज़ार में। 
इस  क़दर  भावना  प्रधान  और  तहे  दिल  से  दी  गयी  टिप्पणीयों  ने  मेरा  हौसला  बनाये  रखा ....साथ चल  रहे कारवाँ का एहसास होता रहा...कैसे शुक्रिया अदा करूँ? अगली और अंतिम कड़ी में  अली साहब और संवेदनाका संसार इनका अलग से शुक्रिया अदा करना है...इन्हीं चंद पाठकों के लिए इसका पुनः प्रकाशन किया...
क्रमश:..

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

इन सितारों से आगे..3

ali ने कहा…
हौलनाक ....ये वक़्त किसी पे ना गुज़रे ! जितनी बार पढता हूँ चोट सी लगती है !
















उफ़ बहुत ही भयानक परिणाम रहा………………ऐसा तो कोई सोच भी नही सकता था…………………………और अभी आगे भी मुश्किलों भरा सफ़र जान दुख हो रहा है…………कोई कैसे इतना सह सकता है।
















काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
बहुत सी बातें हैं जो बिन कहे ही की जाती हैं. सुंदर. rashmi ravija ने कहा… बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ..कहानी में भी कविता का आभास,वो खुला आसमान और चाँद का सफ़र...किसी बीते युग की बात लगती है ..स्मरण दिलाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया शिवराज गूजर. ने कहा… पहली बार आपके ब्लॉग पर आया. सच मानिये पहली बार में ही आपकी कलम का मुरीद हो गया.
Apoorv ने कहा…
बाँध लेने की क्षमता है आपकी कलम मे..अब तो सारे बिखरे सितारे इकट्ठे करने पड़ेंगे एक दिन..और अगली किश्त की प्रतीक्षा भी है..
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…
"उसके मिट्टी से सने पैरों के निशाँ वाली एक चद्दर ही हम रख लेते तो कितना अच्छा होता...." कितनी अच्छी बात कही है - काश यह समझदारी सब में नैसर्गिक ही होती तो दुनिया कितनी खूबसूरत होती!












Manoj Bharti ने कहा…
क्षमा जी ! सादर प्रणाम ! आज तीसरी कड़ी पढ़ी । अच्छा लगी । बड़े-बुजुर्गों का स्नेह भाव और उनकी तन्हाई का सुंदर चित्रण हुआ है । रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा… एक अच्छा सफ़र रहा... आपके साथ ऊपर-नीचे होते रहे.... पर इसे हटाना...यह क्यूं आखिर...? शहरोज़ ने कहा… इतनी सुघड़ भाषा ब्लॉग में तो कम ही देखाई देती है.प्रवाह तो है ही...संवेदनाओं को हौले हौले झक झोरती है धीरे-धीरे बढती कथा.. pragya ने कहा… मन  ही  नहीं  करता  की  ये  कहानी  कहीं  पर  ख़त्म  हो .. 







ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…
क्षमा जी ! कहानी की रोचकता और रहस्यमयता दौनों ही प्रभावित करती हैं ! कभी टिप्पणी चूक जाती है परन्तु रचना पढ़ता अवश्य हूँ !बहुत अच्छा लिख रही हैं आप ! 





रचना दीक्षित ने कहा…
क्या लेखन कला है ?कमाल है ........एकदम बाँध कर रखती है. साँस की लय भी कहानी की लय से बांध जाना चाहती है.अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी. आभार Dr.R.Ramkumar ने कहा… फिर वो दिनभी आ गया जब उसे अमरीका जाना था...हवाई अड्डे पे पूजा ,गौरव और केतकी खड़े थे..पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करगी..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी... अंतस से लिखी प्रभावशाली कहानी। शब्दों में आंतरिक सच लिपटा हुआ आया । दर्द तो फिर आना ही था। समकालीन टूटते बिखरते मजबूर विकास का उम्दा चित्रण। अनुभूतियों की ‘शमा’ मौजूद है, ‘क्षमा’ बनकर। ali ने कहा… क्षमा जी आज फुर्सत से पढ़ा ... लगता है मन रम जायेगा चूंकि यह आलेख धारावाहिक की शक्ल में है इसलिए मुझे आगा पीछा सोचने और प्रतिक्रिया देने का अवसर दीजिये ! आज बस इतना ही कि पढना अच्छा लग रहा है ! शुक्रिया ! अल्पना वर्मा ने कहा… माँ और उसकी ममता भी असहाय हो जाती है..बच्चों के फैसलों के आगे! बहुत भावपूर्ण लिखा है ..आगे के भाग की प्रतीक्षा रहेगी.
अरुणेश मिश्र ने कहा…
पूरा पढने की इच्छा । माँ महान है ।

alka sarwat ने कहा…
बिटिया का ब्याह और मै नही जा सकूँगी... ये पीड़ा अभी कुछ दिन पहले मैंने भोगी है ,इसका दर्द तो बस आसन हिला देता है ऊपर वाले का भी ,सच बहुत गहन पीड़ा है ये ..........

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…
यही होती है माँ, बच्चे चाहे रूठे रहें माँ की ममता बच्चों के लिये छलकती ही रहती है चाहे वे सामने हों या नहों । बिटिया का ब्याह और मै नही जा सकूँगी.....इस वाक्य में आपके दिल का सारा दर्द उभर आया है ।

aruna kapoor 'jayaka' ने कहा…
स्रियां जीवन में कितनी गंभीर समस्याओं से झूझ रही होती है...इसका शब्दों मे सचित्र वर्णन आपने किया है आपने क्षमाजी!.. मीनाक्षी ने कहा… कमाल  है  ...देखते  ही  देखते  पहली   से  अब  2010 मे  की  किश्त  भी  पढ़  ली ....शायद  कथा  के  पात्र  हमारे  में  से  ही  कोई  होता  है  एक  जादुई  प्रवाह  में  बस  पढ़ती  चली  गयी ..... 
 
इस सफ़र की सख्त धूप में आप की टिप्पणियों के घने साए साथ चलते रहे...रहगुज़र आसान होती गयी...बहुत,बहुत शुक्रिया!
अगली दो कड़ियों में सफ़र में अन्य साथी,जिनकी  रहनुमाई न होती तो सफ़र पूरा न होता , उनका ज़िक्र  ज़रूर करुँगी..
क्रमशः

इन सितारों से आगे..२

बसंता जी हर कड़ी के साथ जुड़े रहे और अपनी अनमोल टिप्पणी देते रहे..हालांकि वो नेपाली भाषा में ब्लॉग लिखते हैं,और वही भाषा बेहतर जानते हैं,वो वो मेरे हिन्दी लेखन की  हरेक बारीकी समझते रहे!

डॉक्टर रूपचंद शाश्त्री जी की," कथा बहत रोचक है और इस में लयबद्धता बनी रही है," जैसी टिप्पणी हौसला अफज़ाई करती रही.

योगेश जी स्वप्न की टिप्पणी," पढ़ना शुरू किया तो पढता ही गया, अक्सर लेख पढता नही हूँ. बहुत दिल को छू लेनेवाली लगी कहानी. कभी बहुत पहले पढी मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की याद आ गयी," ज़र्रानवाज़ी नही तो और क्या थी?

शारदा अरोरा जी अंत तक जुडी रहीं.."लगती तो ये आप बीती है. शानदार उपन्यास का लुत्फ़ देती है"....इस में उनका बड़प्पन नज़र आता है.

दिगंबर नासवा जी  जुड़े रहे..."बच्चे की किल्कारिया तो किसी को भी आनंद में ले जाती हैं...फिर दादा-दादी की तो बात ही क्या..आपका आगे का सफ़र भी सुन्दर  होगा !"..ये सद्भावना   हमेशा   साथ रही.

सुरेन्द्र  'मुल्हिद 'शुरू से जुड़े रहे और हौसला अफज़ाई करते रहे...शायद अंत में कुछ मसरूफ़ हो गए!

गर्दू गाफिल जी ने लिखा," सुनेंद्र जी आपको जादूगर कह रहे हैं...किन्तु मुझे तो संवेदनाओं का सागर लगती हैं...!
क्या खूब नज़्म लिखी है! आपके वाक़यात पढ़ते हुए मुझे शिवानी और मीना कुमारी याद आ गयीं...शिवानी की तरह शब्द चित्र और मीना कुमारी की तरह दर्द का दरिया..
ये कैसा अद्भुत संयोग है! आपकी लेखनी मन्त्र मुग्ध करती है""
भला ऐसी टिप्पणी कोई भुला सकता है?

मुकेश कुमार तिवारी जी लिखते हैं,

"अब तो कथानक के साथ रिश्ता जुड़ता महसूस हो रहा है। सांस रोक के पढना होता है एकबार में।

बहुत ही अच्छा और सधा हुआ लेखन।"
महफूज़  अली  कभी  जुड़े  कभी  बच  निकले !

निर्मला कपिला जी की बड़ी उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ रहीं!एक  में  लिखा,
"बहुत दिल्चस्प मोड पर कहानी को छोडा है अगली कडी के लिये उत्सुकत और् बढ गयी है।"...अब बताईये की,अगली कड़ी कैसे न लिखती?

'मुमुक्ष की रचनाएँ, से टिप्पणी रही(अनेकों में से एक),
"आगे, आगे क्या अंजाम हुए ?? क़िस्मत ने क्या रंग दिखाए?

श्रवण कुमार ने शाप तो महाराजा दशरथ को दिया..लेकिन किस, किस ने भुगता?

पूजा के जीवन के दर्दनाक मोड़ तो उसी दागी गयी गोली के साथ शुरू हों गए...

कहानी रोचक होती ही जा रही है. पढने की ललक बढती ही जा रही है."

ज्योति  सिंह   जी एक जगह कहती हैं,
"दो   बार  आकर  लौट  गयी .. इतनी  बढ़िया  रचना  को  पढ़कर  टिपण्णी  न  देने  का  अफ़सोस  हो  रहा  था  पर  आज  सफलता  मिलने  पर  ख़ुशी  हुई  .पूजा  की  कहानी  दिल  को  छूने  वाली  अवं  रोचक  बनती  जा  रही  है  .आगे  पढने  फिर  आउंगी  ."

BrijmohanShrivastava ने कहा… १४वी कड़ी पढने के बाद आज ऐसा लग रहा है दोबारा शुरू से पढना शुरू करुँ| बात ये है कि अभी तक कहानी /उपन्यास की द्रष्टि से पढ़ रहा था अब साहित्य की द्रष्टि से पढ़ा जायेगा |आज जब इस ओर मेरा ध्यान गया तो यह विचार आया ""सितारों जडी रात चूनर लेकर उसके जिस्म पर पैरहन डालने वाली थी ""तथा ""कपोलों पे रक्तिमा छा गई "" और ""फिजायें महकने लगीं चहकने लगीं जिस्म को वादे सबा छू गई एक सिरहन सी दे गई ""और भी "" वो आँखों का सितारा सुबह का तारा "

बाद में कहीँ खो गए ब्रिजमोहन जी....!

भाग्यश्री, दीपक 'मशाल','अदा'जी,ललित मोहन त्रिवेदी...इन सभी की बेहद उत्साह वर्धक टिप्पणियाँ रहीं!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…" पूजा की तरह ही मैं भी इन्तज़ार करती हूं इस श्रृंखला की हर कडी का, लेकिन इन्तज़ार जितना लम्बा होता है, पढने में उतना ही कम समय लगता है. लगता है जैसे अभी तो पढना शुरु किया था और कडी खत्म भी हो गई?"
कितनी प्यारी-सी टिप्पणी है ये!
विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
प्यार का दर्द सचमुच बहुत कठिन होता है बेहद संवेदनशील कहानी ..पूजा के हालत इस कदर होना स्वाभाविक है क्योंकि आदमी जब किसी को चाहे और वो किसी प्रकार दूर होता प्रतीत हो तो तकलीफ़ तो होती ही है..और ऐसे में दादा दादी का भी इस प्रकार प्यार करना और सहारा देना कुछ पल के लिए एक सुखद एहसास देता है..बढ़िया कहानी आगे के कड़ियों का इंतज़ार है..




Dipak 'Mashal' ने कहा…
Is qalam ke kamaal ko bhala main kya naam doon? adbhut ya manmohak.... Jai हिंद 'अदा' ने कहा… "ये गौरव भी ना.. पता नही किसी की उतरन ले आया है " बहुत ही सहजता से आपने सबकुछ कह डाला.... आप ..लिखती रहे हम आते रहते हैं.... बस ये है कि कभी-कभी टिपण्णी नहीं दे पाते..... बहुत अच्छा...वाह ..कहके चले जाना हमें अच्छा नहीं लगता.. लेकिन ये बताना चाहते हैं कि आपको पढ़ते हमेशा ही हैं..... और आपकी लेखनी को सलाम भी करते हैं.... बहुत ही सरलता से सीधी सच्ची बात कहतीं हैं आप... आज भी अच्छा लगा पढ़ना आपको.....हमेशा की तरह....!! "
आप सभी का शुक्रिया! क्षमा क्रमश:

बुधवार, 25 अगस्त 2010

इन सितारों से आगे..

२३ जून के बाद मैंने इस ब्लॉग पे नही लिखा...हाँ..पुनः प्रकाशन ज़रूर कर दिया. स्वयं नही सोचा था,की,पूजा की जीवनी ख़त्म होने के बाद मै आगे क्या लिखूँगी..एक और जीवनी के अलावा और क्या लिखा जा सकता था? दिमाग में कुछ रोज़ पूर्व लिया हुआ एक साक्षात्कार घूम रहा है...पर लगता है,अभी पूजा की जीवनी दिमाग पे बहुत अधिक हावी है. मै गर इस वक़्त कुछ और लिखूँ तो उसे न्याय नही दे पाऊँगी . दीपा,जिसका साक्षात्कार लिया,वो इंतज़ार में है,की,अब मै उसके बारे में कब लिखना शुरू करुँगी! और मुझे शर्मिन्दगी महसूस होती है जब मै उसे कहती हूँ...अभी नही...रुक जाओ ज़रा-सा की,'बिखरे सितारे'के अपने आप पे पड़े प्रभाव से उभर जाऊँ !अपने खुद के लेखन का प्रभाव नही ! जानती हूँ,की,लेखन में कई कमियाँ रह गयीं. खुद को तसल्ली दे देती हूँ,की,मै वैसे भी लेखक या लेखिका तो हूँ नही! यहाँ बात कर रही हूँ, एक जीवन से उसके अतीत में जाके जुड़े रहने का प्रभाव.
मुख पृष्ठ   से शायद पूजा  की तसवीर अब हटानी चाहिए. लेकिन दीपा की कोई मौज़ूम तसवीर फिलहाल उपलब्ध नही.दो तीन ब्लॉगर दोस्तों से मैंने उस तसवीर को हटा देने के बारे में बात कही तो सभी ने निषेध कर कहा,की,वो तसवीर अब इस ब्लॉग की पहचान है! सवाल ये भी है,की,दीपा की कहानी,जो इतनी लम्बी निश्चित ही नही,का शीर्षक क्या होना चाहिए? दिमाग में उहापोह जारी है.

इस अंतराल में पूजा के जीवन में चंद घटनाएँ और घटीं..क्या उन्हें लिखना चाहिए या जहाँ मालिका रोक दी,वहीँ अब रुक जाना चाहिए? तय नही कर पा रही हूँ.
इस सफ़र में अनेक पाठक जुड़े. उनकी टिप्पणियाँ पढना अपने आप में मुझे एक सफ़र पे ले जाता है. पहले प्रकाशन के समय जिनकी हर किश्त पे टिप्पणी आती रही वो हैं हम  सब के चहेते मेजर गौतम राजरिशी. मै स्वयं हैरान हूँ,की इतना व्यस्त इंसान इस तरह एक साल भर किसी मालिका से जुड़ के ,इतने नियम से,हरेक लफ्ज़ पढ़ के कैसे टिप्पणी दे सका? कुछ टिप्पणियाँ तो उन्हों ने अस्पताल के बिस्तर परसे की हुई हैं! उनका जितना शुक्रिया अदा करूँ,कम है. गौतमजी, आपने बेहद हौसला अफज़ाई की. कई बार दो कड़ियों के बीछ दो हफ़्तों तक का अंतराल पड़ जाता था,और मुझे लगता की,शायद अब आगे बढना मुमकिन नही. तभी ख़याल आता की,ये ऐसे पाठकों के साथ नाइंसाफी है जो इतने मन से और नियम से इस श्रीन्खलाके साथ जुड़े हैं.
वंदना अवस्थी दुबे,वंदना गुप्ता, ज्योति सिंह, इन सभी की हरेक कड़ी के बाद टिप्पणियाँ हैं. अगली बार इन सभी के बारे में लिखना चाहूँगी. अपने प्रथम प्रकाशन के बाद जब दोबारा प्रकाशन  किया तो कुछ और पाठक मित्र जुड़े. उनकी भी टिप्पणियाँ पढके लगता है,की,लेखन सफल हो गया.
क्रमशः ( ज़्यादा नही,और दो या तीन किश्तें...आप सभी के साथ जुड़े रहने का एक सुखद संस्मरण!)

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

बिखरे सितारे: टूटते हुए....


( गतांक:बिटिया ने कहा," माँ अब तुम पर से विश्वास उठ गया है..न जाने फिर कब लौटेगा..! उस के पास तुम्हारी तस्वीरें और आवाज़ कहाँ से आयी? "
मै :" मै हज़ार बार कह चुकी हूँ,की,मेरी शूटिंग भी हुई थी और रेकॉर्डिंग भी! और गर नही है विश्वास तो उसी व्यक्ती से पूछ लो...और मै क्या कह सकती हूँ...इस विषय पे मै और एक शब्द भी सुनना नही चाहती...ख़ास कर तुम से..मै आत्म ह्त्या कर लूँगी...मेरे बरदाश्त की अब हद हो गयी है...!" खैर!
दो माह के बाद इन जनाब का एक माफी नामा आया. उन्हें पश्च्याताप हो रहा था..देर आए,दुरुस्त आए..पर मै बहुत कुछ  खो चुकी थी...आत्म विश्वास और अपनों का विश्वास..खासकर अपनी बेटी का..गौरव के अविश्वास की तो आदत पड़ गयी थी...अब आगे.)
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इन्हीं हालातों के चलते एक बार पूजा और उसकी माँ के दरमियान अन्तरंग बातें हो रही थी.माँ ने कहा:" पता नही,ख़ता किसकी होती है,और भुगतना किसे पड़ता है!  अजब दुनिया है...कभी सोचती हूँ,तूने,मेरी इस बिटिया  ने   कभी किसी का बुरा न किया...उसकी क़िस्मत में क्यों इतना दर्द लिखा है?
"अन्दर से इक आवाज़ आती है-इसका सिरा मेरी माँ से जुड़ता है..तेरी नानी ने अपनी ननद की बेटी से बहुत बुरा बर्ताव किया था. जबकि तेरी इस मासी ने कभी उन्हें पलट के लफ्ज़ नही कहा..बेचारी बिन माँ बाप की अनाथ लडकी थी...मै तो उनसे काफ़ी छोटी थी...तब नही समझ पाती  थी,लेकिन आज लगता है,क़ुदरत ने यह न्याय किया है...ना जीवन में मुझे चैन मिला न तुझे..."

पूजा गहरी सोच में पड़ गयी थी. उसे याद आया,उसका ही लिखा एक आलेख,जिसमे उसने लिखा था--श्रवन कुमार ने श्राप तो राजा दशरथ को दिया था. उस श्राप से उसके अंधे माता पिता की मुश्किलें तो कम नही हुई. लेकिन उसका असर कहाँ से कहाँ हुआ.
राम को बनवास भेजनेवाली कैकेयी ने खुद भुगता. माता कौशल्या ने भुगता, भरत  की पत्नी,लक्ष्मण की पत्नी और सीता..इन सबने भुगता...इन तीनों के नैहर वालों ने उसकी आँच सही होगी...न सिर्फ यह,अंत में,सीता के बच्चे लव कुश जो राजपुत्र थे,वाल्मिकी मुनी ने वन में पाला पोसा.
सीता ने अग्नी परिक्षा दी,फिरभी क़िस्मत में वनवास ही लिखा था.  ..इन सब की क्या खता थी?

नही,पूजा तमन्ना स्वयं को सीता नही समझती है. ऐसा कोई मुगालता उसे नही है. वो केवल एक इंसान है. इंसान जो गलतियाँ करता है,वह गलतियाँ उससे भी हुई. पर अपराध नही.

उसे अनेक बार अनेकों ने सवाल पूछे....उसने ऐसे पती को छोड़ क्यों नही दिया? इसका तो बहुत सरल जवाब रहा.. वह अपने बच्चों के बिना कदापि नही रह सकती. और गौरव ने उसे बच्चों के लिए ज़रूर तडपाया होता. वैसे भी उसे लगता की,पती से अलग हो जाना बहुत ही आसान उपाय कहलाता है..खैर यह सच तो नही,लेकिन जैसे की वह कहती है,क्या पता,उस बात पे भी दोष उसी के सर मढ़ा जाता...साथ रहते हुए भी गौरव ने बच्चों को कई बार उनके आपसी तकरार की एकही बाज़ू बतायी थी. पूजा भरसक कोशिश करती की,यह तकरार आपसमे ही निपट जाये. पर उसे पता तक न चलता और गौरव अमन को अपने तरीके  से  बात बता देता.
केतकी पे अपने बचपन का यह असर हुआ,की,वो अपने बच्चे नही चाहती!फिर वही बात दोहरा रही हूँ.... श्रवण कुमार ने श्राप राजा दशरथ को दिया और भुगता किस किस ने!

इस जीवनी लेखन की शुरुआत ठीक पिछले वर्ष इन्हीं दिनों हुई थी...पूजा की दादा-दादी के शुरुआती जीवन से यह दास्ताँ आरम्भ हुई...और अब आके थमी है...दास्ताँ या किस्सा गोई तो थमी है,जीवन नही. जीवन आगे क्या रंग दिखाएगा किसे पता?
चंद सवालों के जवाब जीवन में नही मिलते...तो इस जीवनी में भी कुछ सवाल अनुत्तरित रहे हैं. केतकी को आज भी पूजा दोष नही देती. मानसिक तौर से वह भी बिखर गयी थी. जब कभी उसे केतकी पे गुस्सा भी आता है,तो वह संभल जाती है...यह सोच के,की,इस बच्ची ने बचपन में बहुत अन्याय भुगता है.
केतकी और उसका पती,शुरू में अमरीका में थे. दो साल इंग्लॅण्ड में रहे.अब  कनाडा जाने की सोच रहे हैं. अमन कभी कभार नाइजीरिया जाने की बात करता है..एक अकेला पन पूजा को घेरे रहता है.
पूजा की चंद तस्वीरें पोस्ट कर रही हूँ. उसने बनाई लघु फिल्म 'धरोहर' से यह ली हैं.शिकायत मिली है की ये तस्वीरें नज़र नही आ रही हैं.मै एक दो दिनों में इस दोषको हटाने का यत्न ज़रूर करुँगी!फिलहाल माफी चाहती हूँ.

  ( 3 या  4 दिनों  बाद  यह  मालिका  ब्लॉग  पर  से  हटा  दी  जायेगी . सभी  पाठक ,जो  इस  मालिका  से  जुड़े  रहे ,उनका  तहे  दिलसे  शुक्रिया  अदा  करती  हूँ . उनकी  हौसला  अफ़्ज़ायी  के  बिना  यह  मालिका  लिखना  संभव  न  होता ! किसी को कुछ सवाल पूछने हों इस दरमियान तो ज़रूर पूछें!)

बुधवार, 11 अगस्त 2010

बिखरे सितारे:रात अंधेरी...


पूजा को दिन प्रतिदिन सदमे मिलतेही जा रहे थे...एक से उभर नही पाती और दूसरा बाहें पसारे आगे खड़ा होता....

( गतांक: मैंने कमरे से बाहर निकल जाना चाहा ,लेकिन केतकी मानो चंडिका का रूप धारण कर चुकी थी...उसने मेरी बाँह पकड़ दोबारा कमरे में खींच लिया...उसकी आँखों में आग थी...जिसे मेरे आँसूं चाहकर  भी बुझा न पा रहे थे..अब आगे पढ़ें)

अपने आप को ऐसे मोड़ों पे खड़ा पा रही थी,जहाँ लगातार दिशा भ्रम महसूस होता...समझ नही पाती की,क्या करना चाहिए..किस राह निकलना सही होगा?

केतकी की मानसिकता समझ रही थी..वह लगातार दो पाटों के बीछ पीसी जा रही थी..अमन ने तो  अपनेआप को अलग कर लिया था. ऐसे अशांत माहौल में शांती कैसे ला सकती थी मै? केतकी के लिए दिल तार तार हुआ जा रहा था. बेटी को माँ के आँचल तले भी दर्द से निजात न मिले तो जाये कहाँ?
(ये कहानी नही जीवनी है. किरदार सब के सब असली जीवन से हैं.इस बात को मद्दे  नज़र रख,इस   कड़ी  का  उर्वरित  हिस्सा  मैंने  हटा  दिया  है . )


क्रमश:

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

बिखरे सितारे: गला क्यों न घोंटा?


(गतांक: केतकी,किसी अन्य शहर  अपने काम से गयी थी और मैंने उसे कुछ पूछने के ख़ातिर फोन किया. वह फोन पे मुझपे कुछ इस तरह बरस पडी,जैसे मैंने पता नही क्या कर दिया हो...! फोन को कान पे पकडे,पकडे ही,मै मूर्छित हो फर्श पे गिर गयी...घर पे सफाई करनेवाली बाई थी और मेरा एक टेलर भी..उसने घबराके मेरे भाई  को फोन कर दिया....वो आभी गया...नही जानती थी,की,क़िस्मत ने अपनी गुदडी में और कितने सदमे छुपा रखे थे...

हर हँसी  की  कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने,
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी,
आँसू  हैं  कि थमते नही!
अब आगे:)

मै होश में तो आ गयी उस समय,पर यह कुछ दिनों के लिए एक सिलसिला-सा बन गया. जब मानसिक तनाव बरदाश्त के परे हो जाता तो मै होश खो बैठती. माँ वैसे ही चिंतित रहती,मेरे कारण,अब और अधिक चिंतित हो गयीं.

केतकी गौरव के पास ही थी उन दिनों. एक शाम उसका फोन आया:" माँ, आप इस वक़्त अकेली हैं या आस पास कोई है?"
मै:" इस समय तो कोई नही है..कहो,क्या बात है?"
केतकी:" माँ, पापा,अमन और मै कल दिन में वहाँ पहुँच रहे हैं...."
मै:" लेकिन तुम लोग तो तीन चार दिनों के लिए ऊटी जानेवाले थे न? उसका क्या?"
केतकी:" नही जा रहे अब..पापा कहते हैं,की,अब वो आपके साथ क़तई नही निबाह सकते. वह अमन और मेरे सामने कुछ बातें कहना चाहते हैं...जैसे की,आपको प्रतिमाह क्या दिया जाय...तथा आप कहाँ रहेंगी.."

कुछ देर तो मेरे मूह से अलफ़ाज़ ही नही निकले...शायद आँखें भर आयीं थीं....गला रूंध रहा था. अंत में मैंने कहा:" ठीक है बेटे..जो तुम लोग ठीक समझो..इस समय और कह भी क्या सकती हूँ?"

कैसा तमाशा बना रखा था क़िस्मत ने मेरा! चार दिन भी चैन नही मिल रहा था..गौरव और बच्चे आए. गौरव ने काफ़ी बहकी,बहकी बातें की...

उनकी मुखालिफ़त करना मैंने मौज़ूम न समझा. पत्थर पे सर फोड़ने वाली बात होती वह तो..उसने एक घर मेरे नाम से करने की बात कही. और प्रतिमाह कुछ रक़म. कितनी,यह बात मुझे अब याद नही. वो सब कुछ कागज़ात पे लिख लाया था. एक प्रत  मुझे पकड़ा दी गयी. अगले दिन वह और अमन,दोनों लौट गए. उनके वहाँ रहते मै तीन चार बार बेहोश हो कर ,पता नही क्या बडबडाती रही. अमन ने तो अपने आपको इन सब बातों से अलग थलग कर लिया था.


इसी दौरान एक रोज़ केतकी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा:" पापा अब तुम्हारे नाम मकान नही करना चाहते..उनका कहना है,की,तुम अपना संतुलन खो बैठी हो.."
यह अलफ़ाज़ मै हज़म कर ही रही थी,की,केतकी रोते हुए उठ खड़ी हुई और तमतमाती हुई बोली:" माँ! तुमने पैदा होते ही मेरा गला क्यों न घोंट दिया? आप लोगों ने मेरी ज़िंदगी नरक बना रखी है..." उस बच्ची की नन्हीं,मासूम सूरत मेरे आखों के पानी में तैर गयी...जिसे उसके परिवार ने धुतकारा था...मै ही उसकी रक्षक थी..या मेरा खुदा..लगा,काश, मेरी ही माँ ने मेरा गला घोंट दिया होता!

मै दंग रह गयी ! कभी न सोचा था की,मुझे अपनी लाडली संतान के मूह से यह अलफ़ाज़ सुनने होंगे! पल भर लगा,गर मेरे दादा-दादी कहीँ से  सुन रहे हों,तो उनपे क्या बीतेगी? जिस पूजा तमन्ना,यानी मुझे, पाके उन्हें लगा था,आसमान का सितारा मिल गया..उसी को, उनकी लाडली पोती को,उसकी औलाद यह अलफ़ाज़ सुना रही थी? यह क़िस्मत की कैसी विडम्बना थी? मै,उनकी आखों का सितारा,टूट  टूट के बिखर रही थी..और वो दोनों कुछ न कर सक रहे थे!

मैंने कमरे से बाहर निकल जाना चाह,लेकिन केतकी मानो चंडिका का रूप धारण कर चुकी थी...उसने मेरी बाँह पकड़ दोबारा कमरे में खींच लिया...उसकी आँखों में आग थी...जिसे मेरे आँसूं चाहकर  भी बुझा न पा रहे थे..

क्रमश:

इस कड़ी को भी निजी वजूहात से काफ़ी डिलीट कर दिया गया है...क्षमा करें!