मंगलवार, 30 मार्च 2010

बिखरे सितारे 13: जुदाई

 (पूजा को हमेशा अपने पती से छुपके केतकी की ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता. और बेचारी की ज़रूरतें ही कितनी-सी थी? कई बार तो उसे भूखे  पेट सो जाना पड़ता! छात्रावास का भोजनालय, केतकी जबतक लौटती, बंद हो जाता और आसपास खान पान की कोई सुविधा नहीं थी.
केतकी वास्तुशास्त्र के ३रे  सालमे आ गयी और...अब आगे पढ़ें...)

.....और अमन बी.कॉम के प्रथम वर्षमे. अमन अपने माता पिताके साथ रहता था. जब गौरव का तबादला हुआ तब अमन १२ वी कक्षा में था. उस साल उसे ३ महाविद्यालय बदलने पड़े! खैर!
वास्तुशाश्त्र के ३ रे वर्ष में जब एक बार केतकी अपने माँ पिता के पास आई हुई थी तब, उसने अपनी माँ को बताया की, उसे एक लड़का पसंद है. लड़का, राघव, इंजीनियरिंग का course कर रहा था और वो भी ३ रे साल में था. वो केतकी की बचपनकी सहेली, मुग्धा के क्लास में था.
केतकी ने एक दिन राघव की मुलाक़ात अपनी माँ तथा पितासे करवा दी. लड़का वाक़ई मेघावी और ख़ुशमिज़ाज था. अपनी माँ बाप की एकलौती औलाद. पहले तो पूजा समझी उसके माता पिता उसी शहरमे रहते हैं. उसकी खुशीका ठिकाना न रहा, क्योंकि पूजा और गौरव ने सेवा अवकाश के बाद उसी शहर में रहने का फैसला कर लिया था. लेकिन ये पूजाकी यह खुशफहमी ज़्यादा दिन टिकी नहीं. राघव छ्त्रवास में रहके पढ़ रहा था तथा, उसके माता पिता hydarabaad के बाशिंदे थे. फिरभी पूजा ख़ुश ही हुई की, कमसे कम अपने देशमे तो था!

उस साल पूजा और गौरव के विवाह को २५ साल पूरे होनेवाले थे. पूजा हर प्रकारसे अपनी शादी को खुशगवार  बनाये रखने का यत्न किया करती. उसने उस समय उनके जहाँ जहाँ तबादले हुए थे, वहाँ के सब मित्र परिवारों को न्योता दिया. कुछ उसकी अपनी स्कूलकी सहेलियाँ भी शामिल थीं. भाई  बहन के परिवार भी आए.
शादी की सालगिरह पड़ती इतवारके रोज़ थी,लेकिन शनिवार की रात को मनाने का   तय हुआ, की, बाहर से आनेवाले लोगों को लौटने में सुविधा हो. शनिवारको देर रात ,मतलब रातके एक डेढ़ बजे तक कुछ करीबी दोस्त सहेलियाँ बतियाते रहे. मतलब इतवार का दिन शुरू ही हो गया था. बहन आदि दो दिन रुक के लौटने वाले थे.

सुबह को पूजाके कमरेमे कुछ जल्दी ही खिटर  पिटर सुनाई दी. पूजा ने आँख खोली तो भी उसके पास खड़ा था...बहन के कंधेपे पर्स थी...माजरा कुछ समझमे नही आया...बहन ने पूजा के हाथ में चाय की प्याली थमाई...पूजा फटी फटी आँखों से सबको देखे जा रही थी..!
भाई बोला: "आपा आप चाय तो पियो!"
पूजा ने दो घूँट लिए और बहनसे बोली:" तू पर्स लटकाए क्यों घूम रही है?"
भाई . ने पीछे से अपनी आपा को गले लगते हुए कहा:"आपा, दादिअम्मा नहीं रहीं...सुबह, सुबह गुज़र गयीं...चलिए जाना है.."
कुछ पल तो पूजा की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई...और फिर उसे एहसास हुआ की, उसके जीवन  का एक अध्याय ख़त्म हुआ. उसके दादा तो जिस साल गौरव का यहाँ तबादला हुआ उसी साल चल बसे थे.दादिअम्मा मानो शादी का सालगिरह हो जानेके इन्तेज़ारमे थीं...

वो ज़ारोज़ार रो पडी. चाहे जिस भी उम्र में उसके दादा दादी का निधन हुआ, उन तीनो भाई बहनों के लिए वो एक सपूर्ण अध्याय का समापन था...
जब उनकी गाडियाँ  उनके फ़ार्म हाउस  के गेट से अन्दर पहुँची तो पूजा के लिए उस घरको बिना दादा दादी के देखना असह्य हो उठा..सच का सामना करना ही था...

चंद रोज़ वहाँ रुक, पूजा लौट आई...गौरव और बच्चे तो उसी रोज़ शामको लौट गए.पूजा ने अपने मनको केतकी के ब्याह के विचारों में लगाने की कोशिश की.
सालगिरह के कुछ रोज़ पहले ही पूजा ने अपनी एक सहेली के साथ मिलके अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी की थी,जो बहुत कामयाब हुई थी. पूजा ख़ुश थी,की, अब उसे एक स्थायी काम मिल गया. उनका चाहे कहीं तबादला हो, उसकी सहेली उसी शहरसे देखरेख  करेगी. पूजा ने डिज़ाइन   आदिका ज़िम्मा खुदपे ले लिया था..लेकिन चंद ही रोज़ में सहेली ने अपनी मजबूरी बता दी...इतनी माथा पच्ची उसके बस की नही थी.

इधर पूजा को पता चला की, राघव तो अगले साल आगेकी पढाई के लिए अमरीका जानेवाला था....वहीँ नौकरी भी करनेवाला था...तथा, केतकी ने भी आगेकी  ( M.arch ) . के लिए वहीँ जानेकी सोच रखी थी. पूजा अंदरही अन्दर  टूटने लगी. उसकी लाडली इतनी दूर अपना घोंसला बना लेगी, उसने कभी सोचही नही था...

केतकी का आखरी साल ख़त्म हुआ औरपूजा ने अमरीका जाने की तैय्यारी शुरू कर दी. उसे शिश्यव्रुत्ती भी मिल रही थी. GRE  की तैय्यारी करने के लिए वो अपने माँ पिता के साथ रहने चली आई इनटर्न शिप उसने वहीँ से की. एन दिन कंप्यूटर के  आगे बैठ केतकी कुछ काम रही थी. पूजा  उसके लिए फल काटके ले गयी ..... प्लेट पकडाते हुए  उसने पीछेसे केतकी के गले में बाहें डाली और कहा," तुम्ही बच्चे मेरी दुनिया हो..."
केतकी ने एक झटके से उसे परे करते हुए कह दिया," माँ तुम अपनी दुनिया अब हमसे अलग बनाओ...अपनी दुनिया में हमें मत खींचो...अब मुझे पढाई करने दो प्लीज़.."
पूजा झट से हट गयी और अपने कमरे में जाके खूब रोई...उसका मानो जीने का हर सहारा छीन रहा था...वो और और अकेली पड़ती जा रही थी...गौरव तो अपने दफ्तर के काम में व्यस्त रहता...लेकिन वैसे भी औरत के इन कोमल भावों को उसने कब समझा?

  उसी समय गौरव फिर एक तबादला हुआ...अबके अमन को भी पीछे छोड़ना पड़ा क्योंकि, उसका M.BA का साल था. इसबार तबादले के पश्चात जो घर मिला वो बेहद बड़ा था...ना अडोस ना पड़ोस...केतकी आती जाती रहती...अब अपनी माँ के साथ उसका बर्ताव बेहद चिडचिडा हो गया था..पूजा का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया था. ...केतकी इन सब बातों को अब बर्दाश्त नही कर पा रही थी. इन सब बातों के लिए उसे उसकी माँ भी उतनीही ज़िम्मेदार लग रही थी जितने के पिता..

जो भी हो माँ तो माँ थी...उसने अपनी जोभी जमा पूंजी गौरव से छुपाके राखी थी,वो केतकी के अमेरिका जानेके खर्च में लगा दी. और फिर वो दिनभी आ गया जब उसे अमरीका जाना था...हवाई अड्डे पे पूजा ,गौरव और केतकी खड़े थे..पूजा के आँखों से पिछले महीनों से रोका हुआ पानी बह निकला था...उसने अपनी लाडली के आँखों में झाँका...वहाँ भविष्य के सपने चमक रहे थे..जुदाई का एकभी क़तरा उन आँखों में नही था...एक क़तरा जो पूजा को उस वक़्त आश्वस्त करता,की, उसकी बेटी उसे याद करगी..उसकी जुदाई को महसूस करेगी...उसे उस स्कूल के दिनका एक आँसू याद आ रहा था,जो नन्हीं केतकी  ने बहाया था...जब स्कूल बस बच्ची को पीछे भूल आगे निकल गयी थी...समय भी आगे निकल गया था...माँ की ममता पीछे रह गयी थी...
क्रमश:

मंगलवार, 23 मार्च 2010

बिखरे सितारे १२: अब तेज़ क़दम राहें..

(इन्हीं दिनों केतकी को पहले तो विषम ज्वर(typhoid )    और बाद में मेंदुज्वर हो गया..पूजा की माँ, मासूमा, दौड़ी चली आयी वरना बिटिया शायद ठीक नही हो पाती...क्योंकि साथ, साथ पूजा की सासू माँ की दोनों आँखें रेटिनल detachment से चली गयीं...उनकी देखभाल की सारी ज़िम्मेदारी पूजा पे थी...इस घटना के कुछ माह पूर्व पूजा के ससुर का देहांत हो गया था..वोभी पता नही क्यों,लेकिन केतकी से खूब ही नफरत करते थे...पूजा को अपने सास-ससुर के रवैय्ये से हमेशा अफ़सोस होता...क्योंकि खुद उसने अपने दादा-दादी का बेहद प्यार पाया था....उसका जन्म किसी त्यौहार की तरह मना था...जबकि,केतकी मानो घर के लिए बोझ थी...इन बातों का नन्हीं केतकी के मन पे क्या आघात हो रहा था, किसने सोचा?भविष्य किसने देखा था?...अब  आगे  पढ़ें ...)

केतकी ९वी क्लास में आई और गौरव की माँ का देहांत हो गया..जीवन के अंतमे उन्हें यह  एहसास होने लगा था,की, उन्हों ने पूजा के साथ  काफ़ी ज़्यादती की है, लेकिन पूजा या  गौरव को यह बात नही बताई...बात तो उनके  जानेके बाद गौरव के दोस्तने पूजाको बताई..समय तो निकल चुका था..और पूजा को इस बात का अफ़सोस रहा की, अपनी दादी के चल बसने से बच्चों को क़तई दुःख नही हुआ...वो जानती थी की, दादा-दादी क्या नैमत होते हैं!

१० वी में केतकी को अच्छे मार्क्स मिले. उसने विद्यान शाखा चुनी. उसे लगाव तो पर्यावरण से था और आगे चलके वो पर्यावरण के लियेही काम करना चाहती थी लेकिन १२ वी बाद गौरव ने उसकी एक न चलने दी. अंतमे जो दूसरा पर्याय था, वास्तुशास्त्र, वह उसने चुन लिया.
१२ वी में रहते उसने अपनी माँ से Bombay Natural History Society के सभासदस्यता   के  लिए १०० रु.माँगे...गौरव ने सुन लिया और उसे बेहद डांट सुनाई," पैसे पेडपे लगते हैं जो तुने कह दिया और हम कर दें?"
बेचारी छोटा-सा मूह लेके चुप रही. बादमे पूजाने उसे पैसे दिलाये. हैरत तो इस बात की थी, की, गौरव और पूजा दोनों इस संस्था के आजीवन सदस्य थे!
केतकी के साथ लगातार नाइंसाफी होती रही. लडकी बेहद संजीदा थी. न उसे किसी latest fashion से लेना देना होता न होटल न सिनेमा...खादी या हाथ करघेके बने कपडेका  का शलवार कुरता और कोल्हापुरी  चप्पल यह उसका परिधान रहता..वो अपनी माँ के साथ होती तानाशाही भी समझती थी. माँ बेटी में अब एक दोस्ताना रिश्ता कायम होता जा रहा था. ३ साल पहले जब गौरव के व्यवहार की वजह से पूजा का nervous breakdown हुआ तो बेटी ने अपनी माँ को मानसिक रूपसे बेहद साथ दिया था..
केतकी  जब वास्तु शास्त्र के  दूसरे वर्ष में आयी तब गौरव का उस शहरसे तबादला हो गया. बिटिया को पीछे छोड़ना पड़ा..पहले एक रिश्तेदार के घर और फिर एक छात्रालय में. माँ-बेटी दोनों एक दूसरेको बेहद मिस करतीं...जब कभी पूजा तनाव में होती, अपनी माँ एक ख़त लिखती जिसकी शुरुमे एक दुखी चेहरा होता और ख़त के अंतमे एक संतुष्ट चेहरा बनाती...जैसे की, माँ को बस लिखने भरसे मन परका बोझ उतर गया हो..अफ़सोस की,पूजा ने यह ख़त जतन से सम्भालके नही रखे...आनेवाली ज़िंदगी क्या रंग दिखलाएगी किसे पता था? पूजा में  ढेरों कला गुण थे,जिसका केतकी को बहुत अभिमान था. पूजा को पाक कलामे भी महारत हासिल थी.
पूजा को हमेशा अपने पती से छुपके केतकी की ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता. और बेचारी की ज़रूरतें ही कितनी-सी थी? कई बार तो उसे भूखे  पेट सो जाना पड़ता! छात्रावास का भोजनालय, केतकी जबतक लौटती, बंद हो जाता और आसपास खान पान की कोई सुविधा नहीं थी.
केतकी वास्तुशास्त्र के ३रे  सालमे आ गयी और...
क्रमश:

सोमवार, 15 मार्च 2010

बिखरे सितारे:11 फिसलता बचपन

अध्याय  २:बिखरे सितारे:१० फिसलता बचपन (पूर्व भाग:जब बच्ची कुछ ठीक हुई तो उसने अपनी माँ से एक कागज़ तथा पेन्सिल माँगी...और अपनी माँ पे एक नायाब निबंध लिख डाला..." जब मै बीमार थी तो माँ मुझे बड़ा गन्दा खाना खिलती थी..लेकिन तभी तो मै अच्छी हो पायी..वो रोज़ गरम पानी और साबुनसे मेरा बदन पोंछती...मुझे खुशबूदार पावडर लगती...बालों में हलके हलके तेल लगाके, धीरे, धीरे मेरे बाल काढ़ती...." ऐसा और बहुत लिखा...पूजा ने वो नायाब प्रशस्ती पत्रक उसकी टीचर को पढ़ने दिया...जो खो गया..बड़ा अफ़सोस हुआ पूजा को...

और दिन बीतते गए....बच्चे समझदार और सयाने होते गए..अब आगे पढ़ें...)

ऐसा नही था,की, पूजाकी ज़िंदगी में हलके फुल्के लम्हें आते ही नही थे...आते,लेकिन उसके बच्चों के कारण...उनके सयाने पन में  भी निहायत भोलापन  था,मासूमियत थी..
एक बार पूजा खानेकी मेज़ लगा रही थी..पास ही में TV. था...जिसपे चित्रहार चल रहा था..उसका ५/६ साल का बेटा, अमन, देख रहा था..अचानक उसने अपनी माँ से सवाल किया:" माँ ! आप  अपनी शादी के पहले बगीचे में गाना गाते थे या सड़क पे?"
पूजा बेसाख्ता हँस पडी,बोली:" अरे बेटू ये सब तो फिल्मों में होता है...ऐसे थोडेही कोई गाना गता है....!"
बेटा:" आपने कहीँ नही गाना गया?"
पूजा:' नही तो!"
बेटा:" तो फिर आपको शादी करने को किसने कहा? पापा ने आपसे कहा या आपने पपासे?"
पूजा:" हम दोनोने एक दुसरे से कहा ..."
बेटा:" क्या??तुमने भी कहा?"
पूजा:" हाँ...!"
अब बेटेकी भोली आँखें   अचरज से और भी गोल गोल   हो गयीं...!
बेटा:" तुमको इस आदमी के साथ शादी करने के लिए सलकाली ओलडल   तो नही आया था?"
अब पूजा हँस  हँस के बेहाल हुए जा रही थी...!
बेटा:" तो माँ तुम्हाला  दिमाग खलाब  हो गया था जो तुमने इस आदमी के साथ शादी की?"
पूजा हँसते,हँसते लोटपोट हुए जा रही थी...क्या कहती  की, भोलेपनमे बेटे ने हक़ीक़त कह दी थी?

देखते ही,देखते बच्चों का भोला बचपन हाथों से फिसलता जा रहा था...वक़्त की तेज़ रफ़्तार कौन रोक पाया? बिटिया का बचपन तो घर के बड़ों ने छीन लिया था...वो समय से पहले खामोश और परिपक्व हो रही थी...पूजा देख रही थी,लेकिन कुछ कर नही पा रही थी...एक अपराधबोध तले वो दबी जाती,की, बिटिया पे समझदारी थोपी जा रही थी, और पूजा हतबल होके देखती जा रही थी...

इन्हीं दिनों केतकी को पहले तो विषम ज्वर(typhoid )    और बाद में मेंदुज्वर हो गया..पूजा की माँ, मासूमा, दौड़ी चली आयी वरना बिटिया शायद ठीक नही हो पाती...क्योंकि साथ, साथ पूजा की सासू माँ की दोनों आँखें रेटिनल detachment से चली गयीं...उनकी देखभाल की सारी ज़िम्मेदारी पूजा पे थी...इस घटना के कुछ माह पूर्व पूजा के ससुर का देहांत हो गया था..वोभी पता नही क्यों,लेकिन केतकी से खूब ही नफरत करते थे...पूजा को अपने सास-ससुर के रवैय्ये से हमेशा अफ़सोस होता...क्योंकि खुद उसने अपने दादा-दादी का बेहद प्यार पाया था....उसका जन्म किसी त्यौहार की तरह मना था...जबकि,केतकी मानो घर के लिए बोझ थी...इन बातों का नन्हीं केतकी के मन पे क्या आघात हो रहा था, किसने सोचा?भविष्य किसने देखा था?
क्रमश:

शनिवार, 6 मार्च 2010

बिखरे सितारे:१० बिटिया का तोहफा.

(पूर्व  भाग :वो दिनभी आया जब बिटिया को स्कूल जाना था....उन्हीं दिनों बिटिया ने अनजाने ही अपनी माँ को एक यादगार तोहफा दिया...जिसकी क़द्र बरसों बाद पूजा को हुई...उस का एहसास हुआ,की, वो तोहफा कितना नायाब था...अब आगे पढ़ें)

केतकी ३ साल की हुई तो स्कूल  जाने लग गयी. एक दिन स्कूल से फोन आया की, वापसी पे स्कूल बस बिना उसे लिए निकल गयी है...पूजा जल्दी जल्दी स्कूल पहुँची...बच्ची को दफ्तर में बिठाया गया था..उसके गाल पे एक आँसू लटका हुआ पूजा को नज़र आया...उसने धीरेसे उसे अपनी तर्जनी से पोंछ दिया और बच्ची को  गले लगा लिया..
माँ ने वो एक बूँद पोंछी तो बिटिया बोल उठी: " मुझे डर  लगा,तुम्हें आने में देर होगी,तो, पता नही कहीँ से  ये पानी मेरे गालपे आ गया..!"
बरसों बाद जब पूजा को ये वाक़या याद आया,तो लगा, काश वो उस एक बूँद को मोती में तब्दील कर एक डिबियामे संजो के रख सकती...बिटिया से मिला वो एक बेहतरीन तोहफा था...क्या हालात हुए,जो पूजा को ऐसा महसूस हुआ? अभी तो उस तक आने में समय है...इंतज़ार करना होगा...!
दिन बीतते गए...गौरव के तबादलों के साथ बच्चों के स्कूल बदलते गए...पूजा में हर किस्म का हुनर था..उसने कभी पाक कला के वर्ग लिए तो कभी बागवानी सिखाई...कमाने लगी तो उसमे थोडा आत्म विश्वास जागा..बच्चों का भविष्य, उनकी पढ़ाई...खासकर बिटियाकी, मद्देनज़र रखते हुए, उसने पैसों की बचत करना शुरू कर दी...हर महीने वो थोडा-सा सोना खरीद के रख लेती...गुज़रते वक़्त के साथ पूजा का यह क़दम बेहतरीन साबित हुआ..
एक और बात पूजा को ता-उम्र याद रहेगी...बिटिया ५/६ सालकी थी...बहुत तेज़ बुखार से बीमार पडी..रोज़ सुबह शाम इंजेक्शन लगते...जब डॉक्टर आते तो वो उनसे कहती,: " अंकल, माँ को बोलो दूसरी तरफ देखे..उसे बोलो, मुझे बिलकुल दर्द नही होता..माँ! आँखें  बंद करो या दरवाज़े के बाहर देखो तो..."
पूजा की आँख भर आती...!
जब बच्ची कुछ ठीक हुई तो उसने अपनी माँ से एक कागज़ तथा पेन्सिल माँगी...और अपनी माँ पे एक नायाब निबंध लिख डाला..." जब मै बीमार थी तो माँ मुझे बड़ा गन्दा खाना खिलती थी..लेकिन तभी तो मै अच्छी हो पायी..वो रोज़ गरम पानी और साबुनसे मेरा बदन पोंछती...मुझे खुशबूदार पावडर लगती...बालों में हलके हलके तेल लगाके, धीरे, धीरे मेरे बाल काढ़ती...." ऐसा और बहुत लिखा...पूजा ने वो नायाब प्रशस्ती पत्रक उसकी टीचर को पढ़ने दिया...जो खो गया..बड़ा अफ़सोस हुआ पूजा को...

और दिन बीतते गए....बच्चे समझदार और सयाने होते गए...
क्रमश:

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

बिखरे सितारे:९:होली का यह रंग भी..

(पूर्व भाग:उस दिनों पूजा की माँ दौड़ी चली आयीं थीं..हर तरह से उन्हों ने पूजा की सहायता की...वो दस दिन पूजा एक पलक नही सोयी..बच्ची को मौत के मूह से मानो छीन लाई...बच्ची जी कैसे गयी,यह तो अस्पताल वालों के लिएभी एक अजूबा था...
क्या पता था पूजा को की, ऐसे तो और कई हालात आने वाले थे...जो उसे आज़माने वाले थे...अब आगे पढ़ें...)

कब सोचा था पूजाने की, गौरव के साथ उसका जीवन इतना बदरंग हो जायेगा? बिटियाको अस्पताल में भरती करनेसे कुछ ही रोज़ पूर्व होली आयी और गयी.. बिटियाकी पहली होली थी,लेकिन घरमे जैसे मातम छाया रहता..पूजा अपनी ओरसे माहौल में हँसी घोलती रहती...यह सोच की, कहीँ केतकी पे विपरीत असर ना हो जाय..उसका जीवन बिटिया तथा घर संसार में सिमट के रह गया था...

पूजा अपने आपमें अनूठी कलाकार थी..जब कभी मौक़ा हात लगता वो बिटिया को लेके उसके सामने कलाकृतियाँ बनाती रहती...कभी कागज़ पे , कभी कपडे पे  तो कभी कपडे के टुकड़े और धागे लेके...बच्ची १३ माह की हुई और पूजा के पैर फिर से भारी हो गए...

ऐसा नही था,की, पूजा को आने वाली ज़िंदगी में किसीने पूछा ना हो..खासकर सखी सहेलियों ने की, उसने ऐसा घुट के जीना क्यों मंज़ूर किया? जवाब साफ़ था...गौरव का रसूक इतना था,की, पूजा गर अलग होने की बात भी करती तो, उससे बच्ची छीन ली जाती..चाहे बाद में वो नन्हीं जान मर मर के जीती...पूजा अपनी औलाद से जुदा होही नही सकती थी...वो कई बार टूटी...बिखरी..लेकिन हर बार संभल  गयी...एक माँ की ज़िम्मेदारी वो किसी भी हालत में नकार नही सकती थी...

और अब एक और जीव दुनियामे आनेवाला था...अबके तो सासू माँ ने बेटे की रट लगा दी...यह एक और भय पूजा तथा उसके नैहर वालों की  क़िस्मत लिखा था...बेटा हुआ तो, लेकिन पूजा तक़रीबन ३६ घंटे प्रसूती वेदना से गुज़री...उसका कारण मानसिक दबाव था...नैहर में बिटिया को सबसे अधिक प्यार मिलता लेकिन ससुराल में बेटे के आने के बाद तो बिटिया की औरभी दुर्दशा होने लगी...दिन गुज़रते गए...

वो दिनभी आया जब बिटिया को स्कूल जाना था....उन्हीं दिनों बिटिया ने अनजाने ही अपनी माँ को एक यादगार तोहफा दिया...जिसकी क़द्र बरसों बाद पूजा को हुई...उस का एहसास हुआ,की, वो तोहफा कितना नायाब था...

क्रमश:

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

बिखरे सितारे: ८जाना कहाँ ना जानू..

.(पूर्व भाग:सुबह तक पूजा नही संभल पाई... केतकी कुछ बेहतर थी..पूजाने लाख कहा: " आप दोनों निकल जाएँ...मै कल परसों बिटिया को लेके ट्रेन से बंगलौर लौट जाउँगी..."
लेकिन जनरीती की दुहाई देते हुए सब वापस लौट गए. पूजा और बिटिया से दोनों ने बात चीत करनी बंद कर दी...
इसके कुछ ही दिनों बाद एक ऐसी घटना घटी, जब केतकी मौत के मूह से लौट आयी...)अब आगे पढ़ें...

पूजा, केतकी, गौरव और माजी...चारों बंगलोर लौट आए.. पूजा सतत एक अपराध बोध तले दबी रहती..जैसे केतकी को जनम देके उसने कोई गुनाह किया हो..दूसरी ओर अपनी बेटी के प्रती भी उसे एक अपराधबोध ग्रासता रहता...उसे खूब महसूस होता की, बिटियाको...उस नन्हीं, मासूम जानको वो प्यार नही मिल रहा जिसकी वो हक़दार थी..

बंगलोर लौटने के चंद रोज़ बाद गौरव को किसी दफ्तर के कामसे देहली जाना पड़ा. वो गुरुवार का दिन था..गुरुवार शामसे केतकी की तबियत फिर एकबार बिगड़ गयी...उसे उल्टियाँ होना शुरू हो गयीं..पूजा उसे सरकारी डिस्पेंसरी  में ले गयी..वहाँ से जो दवा दी गयी,उससे बच्ची की तबियत क़तई संभली नही. उसने सुबह फिरसे उसे डिस्पेंसरी ले जाना चाहा,लेकिन सास ने टोक दिया," क्या इतनी उतनी बात से डॉक्टर के भागती फिरती हो...बच्ची को ज़रुरत से ज़्यादा ही  नाज़ुक बना रही हो..हमने भी बच्चे बड़े किये, हम तो घरेलु दवाई चटा देते थे.."
कहके उन्हों ने पूजा को टोक दिया और जायफल घिसके केतकी को चटाने के लिए कह दिया..उसने तुरंत पलट दिया...शुक्रवार की शाम हो आयी..पूजा उसे फिर डिस्पेंसरी ले गयी..वहाँ की डॉक्टर ने मूह से लेने की ही दवाई दे दी...जबकि,पूजा उनसे कहती रही," बच्ची के पेटमे कुछ टिक नही रहा है..आप इसे injection लगा दें..."

पूजा की एक न चली...शनिवार की सुबह्तक बच्ची निढाल हो गयी...न वो आँखें खोल पाती ना रो पाती...अबके पूजा ने गौरव के दफ्तर में फ़ोन लगाके इत्तेला दी तथा किसी बालरोग विशेषग्य की जानकारी चाही.
जब बाल रोग विशेषग्य ने सारी बात फ़ोन पे सुनी तो उसने पूजा को जोरसे डांट सुना दी," अपने आपको पढी लिखी कहती हो, और ये हाल होने  रुकी रहीं? मै नही ज़िम्मेदारी ले सकती...किसी बड़े अस्पताल में ले जाओ.."

अस्पताल ले जाने के लिए सरकारी डिस्पेंसरी से लिखत में नोट ज़रूरी थी...डिस्पेंसरी बंद हो चुकी थी...शनिवार को आधाही दिन खुलती थी...अब बात इतवारकी सुबह्तक पहुँच गयी...
गौरव के सहकर्मी ऐसे में दौड़े चले आए...पूजा ने चुपचाप एक बैग में  कपडे आदी भर लिए..सासू माँ को अस्पताल में दाखिले की बात नही बताई.

काफ़ी दौड़  भाग के बाद general वार्ड में केतकी को दाखिल कर लिया गया. अब उसकी नब्ज़ मिलना मुश्किल हो गया..doctors की के टीम IV चढ़ानेके लिए लग गयी...पूजा को वहाँ से  हटा दिया गया ..अंतमे २ घंटों के बाद एक vien मिली..अब बच्ची को दस्त भी लग गए..हर एक घंटे से शरीर में पानी की मात्रा चेक करने nurses आ जातीं और बच्ची बिलख उठती...

सोमवार के दिन गौरव लौट आया...बच्ची के पलंग के पास खड़ा रह वो डॉक्टर से कुछ बतिया रहा था तब, बची के कानों में अपने पिता की आवाज़ पडी...उसने धीरेसे आँखें खोली और चेहरेपे एक प्यारी-सी मुस्कान बिखेर दी...पूजा की आँख भर आयी..और इधर पूजा ने गौरव को डॉक्टर से कहते हुए सुन लिया," मुझे बच्ची के जान की परवाह नही,लेकिन गर उसे कुछ हो गया तो उसकी माँ मर जायेगी...!" सुनके पूजा के दिलपे नश्तर चल गए..

इसी तरह अस्पताल में १० दिन गुज़रे...५ वे या छटे दिन वहाँ के डॉक्टर ने पूजा को सभी के सामने पूछा," आखिर आपने इसे अस्पताल में भरती करने में इतने दिन क्यों लगा दिए?"
पूजा निरुत्तर हो खामोश रही तो गौरव ने उससे कहा," जवाब माँग रहे हैं डॉक्टर साहब...बोलो.."
अंत में हारके पूजा ने कहा," घरमे बच्ची की दादी बड़ी और अनुभवी थीं...उन्हों ने घरेलु इलाज की सलाह दी...इसलिए...वैसे मैंने डिस्पेंसरी के डॉक्टर से भी कहा की, injection लगा दें...लेकिन...लेकिन..."

खैर डॉक्टर तो वहाँ से हट गए,लेकिन पूजा की सासू माँ ने दहाड़ें मार के रोना शुरू कर दिया," ये लो सुनो..कलको लडकी गर मर जाय तो मै ठहरी हत्यारिन...मैंने तो भलाही करना चाहा..लेकिन मुझपे किसका भरोसा...?"
फिर एकबार पूजा, गौरव तथा उसकी माँ के गुस्से का शिकार हो गयी..
उस दिनों पूजा की माँ दौड़ी चली आयीं थीं..हर तरह से उन्हों ने पूजा की सहायता की...वो दस दिन पूजा एक पलक नही सोयी..बच्ची को मौत के मूह से मानो छीन लाई...बच्ची जी कैसे गयी,यह तो अस्पताल वालों के लिएभी एक अजूबा था...
क्या पता था पूजा को की, ऐसे तो और कई हालात आने वाले थे...जो उसे आज़माने वाले थे...
क्रमश:

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

बिखरे सितारे:7 मझधार में

.(पूर्व  भाग :उस रात नींद में न जाने वो कितनी बार डरके रोते हुए उठी...लेकिन मासूम का प्यार देखो...सुबह अपने पितापे दृष्टी पड़तेही खिल उठी..पूजा की आँखों से   चुपचाप नीर बहा..हर गुज़रता दिन न जाने कितनी चुनौतियाँ भरा होता!
सास अक्सर मिलने जुलने वालों से कहती." अरी बड़ी चीवट जात है..पहले दो लड्कोंको  खा गयी..इसे जो पैदा होना था..कुलक्षनी है.."
इस मासूम जान की ज़िम्मेदारी अब केवल पूजाकी थी..बीमारी, दवा  दारू, हर चीज़ में अडंगा खड़ा हो जाता..इतनीसी बीमारी के लिए कोई डॉक्टर के जाता है?)

पूजा की बिटिया कुछ ९ माह की थी तबकी ये बात है. गौरव को किसी कामसे बंगलौर के बाहर जाना था. पूजाकी सास का मन हुआ बेटे के साथ जानेका. तो फिर पूजा और बिटिया का ( केतकी) जाना भी तय हो गया...वजह? गर उन्हें पीछे छोड़ा तो लोग क्या कहेंगे?

भरी गरमी का मौसम था...रास्तेमे बिटिया को पानी पिलाने के लिए पूजाने कई मिन्नतें की लेकिन ,सासू माँ  और गौरव का एकही उत्तर: " ये क्या बिना पानी के मर जायेगी?"
बच्ची केतकी को पता नही क्यों बोतल से चिढ थी. वो छोटी-सी लुटिया से ही पानी या अन्य पेय पीती थी. इस कारण गाडी का रोकना ज़रूरी था, लेकिन उसकी कौन सुनता?

तकरीबन ५ घंटों के सफ़र के बाद वो लोग किसी अन्य अफसर के   घर भोजन के लिए रुके. उनकी पत्नी डॉक्टर थी. पूजा का सर दर्द से बुरा हाल हो रहा था..उसे उल्टियाँ  भी हो रही थी. भोजन के तुरंत बाद आगे का सफ़र करने जैसी उसकी हालत नही थी. गौरव और सासू माँ, दोनों का मूड ख़राब हो गया...मित्र ने एक गेस्ट हाउस बुक करा दिया..पूजा ने कुछ देर के लिए बच्ची को सास के हवाले किया और सासुमा को दहलीज़ ठोकर लगी...बच्ची जोर से ज़मीन पे जा गिरी...! ये हादसा तो किसी से भी हो सकता था..पूजा को कोई शिकायत नही थी...लेकिन कुछ देरमे बच्ची कोभी उल्टियाँ शुरू हो गयीं..४/५ बार हो चुकी तो पूजा ने गौरव से किसी बाल रोग विशेषग्य  को  बुलाने की इल्तिजा की...फिर वही जवाब:" तुम इतनी-सी बात पे चिंतित हो जाती हो..सुबह तक अपने आप ठीक हो जायेगी.."

लेकिन रात ९ बजने तक बच्ची को तकरीबन १० बार उल्टी हो चुकी..पूजा की अपनी हालत ठीक न थी,वो बच्ची को किसी तरह संभाल रही थी..अंत में उसने गौरव को बिना बताये गौरव के मित्र की पत्नी को फोन किया तथा, स्थिती बतायी..उसने तुरंत डॉक्टर का इंतज़ाम किया.

जब डॉक्टर गेस्ट हाउस  पहुँचा तो गौरव को बेहद गुस्सा आया  ! उसे बिना कहे डॉक्टर बुलाने की पूजाकी हिम्मत कैसे हुई..? डॉक्टर ने बी केतकी की चिकित्चा करते हुए पूजा को कई सवाल पूछे,उनमे से एक था," क्या बच्ची कहीँ   गिरी थी?"
पूजा ने साधारण से ढंग से  बता दिया की,वो दोपहर में  गिरी थी.

डॉक्टर गेस्ट हाउस से निकला और सासू माँ ने दहाड़े मार के रोना शुरू कर दिया...! कहने लगी, " मै तो अब इस बच्ची को कभी गोद में नही लेने वाली..बहू का तो मुझपे विश्वास ही नही..मर मारा जाती तो मेरे सर इलज़ाम मढ़ा जाता.."
गौरव तथा अपनी सास से पूजा ने कई बार कहा,की, उसके मनमे ऐसा वैसा कुछ नही था...डॉक्टर ने पूछा तब उसने बताया...और ये की, ऐसे तो वो किसी के भी हाथ से गिर सकती थी..लेकिन नही...कोई नही माना..गौरव उन दोनों को छोड़ माँ के कमरेमे सोने चला गया..

सुबह तक पूजा नही संभल पाई... केतकी कुछ बेहतर थी..पूजाने लाख कहा: " आप दोनों निकल जाएँ...मै कल परसों बिटिया को लेके ट्रेन से बंगलौर लौट जाउँगी..."
लेकिन जनरीती की दुहाई देते हुए सब वापस लौट गए. पूजा और बिटिया से दोनों ने बात चीत करनी बंद कर दी...
इसके कुछ ही दिनों बाद एक ऐसी घटना घटी, जब केतकी मौत के मूह से लौट आयी...

क्रमश: